Tag: रवांई घाटी

विलुप्ति के कगार पर पारंपरिक व्‍यंजन अरसे की मिठास

विलुप्ति के कगार पर पारंपरिक व्‍यंजन अरसे की मिठास

साहित्‍य-संस्कृति
आशिता डोभालअरसे/अरसा पहाड़ में समूण या कलेउ becauseके रूप मे दिया जाने वाला एक पकवान है, जो उत्तराखण्ड में सिर्फ गढ़वाल मण्डल में प्रमुखता से बनता है बल्कि हमसे लगे कुमाऊं, जौनसार—बावर, बंगाण, हिमाचल प्रदेश, नेपाल, तिब्बत कहीं भी अरसा नही बनता है. इसके इतिहास की बात करें तो बहुत ही रूचिपूर्ण इतिहास रहा है अरसे का. बताते हैं कि यह दक्षिण भारत से आया हुआ पकवान है. इतिहासकारो के अनुसार आदिगुरू शंकराचार्य ने जब बद्रीनाथ और केदारनाथ में कर्नाटक के पुजारियों को नियुक्त किया था, तो नवीं सदी में वहां से आए हुए ये ब्राहमण अपने साथ अरसा so यहां लेकर आए और साथ ही बनाने की परम्परा भी शुरू कर गये. कालांतर में ये परम्परा गढ़वाल के आमजन में भी शुरू हो गई. अरसा तमिलनाड, केरल, आंध्र प्रदेश, उडीसा, बिहार और बंगाल में भी बनाया जाता है, वहां इसको अलग-अलग जगह अलग-अलग नामों से जाना जाता है.अटल आंध्र प्रदे...
अपनी थाती-माटी से आज भी जुड़े हैं रवांल्‍टे

अपनी थाती-माटी से आज भी जुड़े हैं रवांल्‍टे

लोक पर्व-त्योहार
अपने पारंपरिक व्‍यंजनों और संस्‍कृति को आज भी संजोए हुए हैं रवांई-जौनपुर एवं जौनसार-बावर के बांशिदेआशिता डोभालजब आप कहीं भी जाते हैं तो आपको वहां के परिवेश में एक नयापन व अनोखापन देखने को मिलता है और आप में एक अलग तरह की अनुभूति महसूस होती है. जब आप वहां की प्राकृतिक सुंदरता, संपन्नता, सांस्कृतिक विरासत, खान-पान, रहन—सहन, आभूषण और कपड़े—लत्ते इन चीजों से रू—ब—रू होते हैं तो वह आपको बार—बार अपनी ओर आकर्षित करते हैं और हमारा मन फिर उस स्थान पर जाने को लालायित हो उठता है. ऐसी ही एक सुंदर और सांस्कृतिक परिवेश से संपन्न घाटी है— 'रवांई घाटी' जो आज भी अपनी विरासतों को जिंदा रखे हुए हैं.आज हम आपको रवांई के एक प्रसिद्ध व्यंजन से रू—ब—रू करवा रहे हैं. इसको रंवाई के व्यंजनों का राजा भी कहा जाय तो अतिश्योक्ति नहीं होगी. बल्कि नाम लिखने से पहले मैं आपको बताना चाहूंगी कि रवांई घाटी में ...
ना जाने कहां खो गई पोई और चुल्लू की महक

ना जाने कहां खो गई पोई और चुल्लू की महक

उत्तराखंड हलचल
आशिता डोभालपहाड़ों में बहुत—सी चीजें हमारे बुजुर्गों ने हमें विरासत के रूप में सौंपी हैं पर आज आधुनिकता की चमक—दमक और भागदौड़ भरी जीवनशैली में हम इन चीजों से कोसों दूर जा चुके हैं. हम अपनी पुराने खान—पान की चीजों को सहेजना और समेटना लगभग भूल ही गए हैं. अपने खान—पान में हमने पुराने अनाजों, पकवानों को कहीं न कहीं बहुत पीछे छोड़ दिया है. आज लोग उस खान—पान को ज्यादा पसंद कर रहे हैं जिसमें पौष्टिकता बहुत कम मात्रा में होती है और शरीर को नुकसान अलग से होता है, जिससे हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी आ रही है. हमारा शरीर रोगों से लड़ने के लिए कमजोर होता जा रहा है. जिस खाने में नाममात्र की भी पौष्टिकता नहीं होती है बल्कि शरीर को मजबूत बनाना तो दूर, कमजोर ज्यादा बना रहा है, ऐसे खान—पान को हमने अपने आज खाने में शामिल किया हुआ है.रवांई घाटी एक ऐसी घाटी है जहां पर लोगों ने आज भी अपनी परम्पराओ...
तिलाड़ी के शहीदों को याद करने का मतलब

तिलाड़ी के शहीदों को याद करने का मतलब

इतिहास, उत्तराखंड हलचल
30 मई शहादत दिवस पर विशेषआज 30 मई है. तिलाड़ी के शहीदों को याद करने का दिन. टिहरी राजशाही के दमनकारी चरित्र के चलते इतिहास के उस काले अध्याय का प्रतिकार करने का दिन. उन सभी शहीदों को विनम्र श्रद्धांजलि, जिन्होंने हमें अपने हक-हकूकों के लिये लड़ना सिखाया.चारु तिवारी अरे ओ जलियां बाग रियासत टिहरी के अभिमान! रवांई के सीने के दाग, तिलाड़ी के खूनी मैदान! जगाई जब तूने विकराल, बगावत के गणों की ज्वाल. उठा तब विप्लव का भूचाल, झुका आकाश, हिला पाताल. मचा तब शोर भयानक शोर, हिला सब ओर, हिले सब छोर. तिड़ातड़ गोली की आवाज, वनों में गूंजी भीषण गाज. रुधिर गंगा में स्नान, लगे करने भूधर हिमवान. निशा की ओट हुई जिस ओर, प्रलय की चोट हुई उस ओर. निशाचर बढ़ आते जिस ओर, उधर तम छा जाता घन-घोर. कहीं से आती थी चीत्कार, सुकोमल बच्चों की सुकुमार. विलखती अबलायें भी हाय! भटकती फिरती थी ...