December 3, 2020
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संस्मरण

घास और थुपुड का पहाड़

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—23 प्रकाश उप्रेती हम इसे- ‘घा थुपुड’ कहते हैं. यह एक तरह से सूखी घास को लंबे समय तक धूप-बरसात से बचाकर सुरक्षित रखने का तरीका है. जब जंगलों में आग लग जाती थी और घास नहीं मिलती थी तो इसी घास से काम चलता था. पहाड़ अपनी परिस्थितियों […]
संस्मरण

‘गीला या सूखा’ का खेल

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—22 प्रकाश उप्रेती आज बात उस खेल की जिसकी लत बचपन में लगी और मोह अब तक है. हम इसे- “बैट- बॉल” खेलना कहते थे और दूसरे गाँव में ‘क्रिकेट’ नहीं ‘मैच खेलने’ जाते थे. पांव से लेकर सर तक जितने ‘घो’ (घाव) हैं उनमें से कइयों की वजह […]
संस्मरण

पहाड़ों में ब्याह-बारात की सामूहिकता

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—21 प्रकाश उप्रेती आज बात उस पहाड़ की जो आपको अकेले होने के एहसास से बाहर रखता है. वो पहाड़ जो आपको हर कदम पर सामूहिकता का बोध कराता है. हमारे लिए ‘गौं में ब्याह’ (गाँव में शादी) किसी उत्सव से कम नहीं होता था. खासकर लड़की की शादी […]
संस्मरण

चीड़ को इस नज़र से भी देखना होगा

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—20 प्रकाश उप्रेती पहाड़ की हर चीज आपको कुछ न कुछ देती है. पहाड़ के लोगों का हर पेड़, ढुङ्ग (पत्थर), भ्योव (पहाड़), गढ्यर, और झाड़ियों से एक रिश्ता होता है. आज बात करते हैं- ‘सोह डाव’ (चीड़ के पेड़) और उसकी धरोहर- ‘ठिट'(चीड़ का फल) और ‘छिलुक’ (आग […]
संस्मरण

पेट पालते पेड़ और पहाड़ 

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—19 प्रकाश उप्रेती आज बात उस पहाड़ की जो आपको भूखे नहीं रहने देता था. तस्वीर में आपको- तिमिल और कोराय के पेड़ नज़र आ रहे हैं. तिमिल की हमारे यहां बड़ी मान्यता थी. गाँव में तिमिल के तकरीबन 10-12 पेड़ थे. कहने को वो गाँव के अलग-अलग लोगों […]
संस्मरण

जागर, आस्था और सांस्कृतिक पहचान की परंपरा

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—18 प्रकाश उप्रेती आज बात बुबू (दादा) और हुडुक की. पहाड़ की आस्था जड़- चेतन दोनों में होती है . बुबू भी दोनों में विश्वास करते थे. बुबू ‘जागेरी’ (जागरी), ‘मड़-मसाण’, ‘छाव’ पूजते थे और किसान आदमी थे. उनके रहते घर में एक जोड़ी भाबेरी बल्द होते ही थे. […]
संस्मरण

कब चुभेंगे हिसाऊ, क़िलमोड के कांटे

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—17 प्रकाश उप्रेती आज बात हिसाऊ, क़िलमोड और करूँझ की. ये हैं, कांटेदार झाड़ियों में उगने वाले पहाड़ी फल. इनके बिना बचपन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है. देश के अन्य राज्यों में ये होते भी हैं या नहीं इसकी जानकारी मुझे नहीं है. बचपन में कभी […]
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पहाड़ों में गुठ्यार वीरान पड़े…

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—16 प्रकाश उप्रेती ये है हमारा- छन और गुठ्यार. इस गुठ्यार में दिखाई देने वाली छोटी, ‘रूपा’ और बड़ी, ‘शशि’ है. गाय-भैंस का घर छन और उनका आँगन गुठ्यार कहलाता है. गाय- भैंस को जिनपर बांधा जाता है वो ‘किल’. किल जमीन के अंदर घेंटा जाता है. हमारी एक […]
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पुरखे निहार रहे मौन, गौं जाने के लिए तैयार है कौन?

ललित फुलारा सुबह-सुबह एक तस्वीर ने मुझे स्मृतियों में धकेल दिया. मन भर आया, तो सोशल मीडिया पर त्वरित भावनाओं को उढ़ेल दिया. ‘हिमॉंतर’ की नज़र पढ़ी, तो विस्तार में लिखने का आग्रह हुआ. पूरा संस्मरण ही एक तस्वीर से शुरू हुआ और विमर्श के केंद्र में भी तस्वीर ही रही. तस्वीर के बहाने ही […]
संस्मरण

आत्मनिर्भर पहाड़ की दुनिया

प्रकाश उप्रेती मूलत: उत्तराखंड के कुमाऊँ से हैं. पहाड़ों में इनका बचपन गुजरा है, उसके बाद पढ़ाई पूरी करने व करियर बनाने की दौड़ में शामिल होने दिल्ली जैसे महानगर की ओर रुख़ करते हैं. पहाड़ से निकलते जरूर हैं लेकिन पहाड़ इनमें हमेशा बसा रहता है। शहरों की भाग-दौड़ और कोलाहल के बीच इनमें ठेठ […]