संस्मरण

सौण कम न भादौ

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—24

  • प्रकाश उप्रेती

आज बात- बरसात, रात, सूखा, ‘गोल्देराणी’ पूजना और पहाड़ की. पहाड़ में बरसात के दिन किसी आफ़त से और रातें आपदा से कम नहीं होती थीं. चौमास में ‘झड़’ (कई दिनों तक लगातार बारिश का होना) पड़ जाते थे तो वहीं बे-मौसम बारिश सबकुछ बहा ले जाती थी. ईजा कहती थीं कि- “सौण कम न भादौ”. बारिश होना, न होना दोनों पहाड़ की नियति में है और दोनों के अपने उपाय भी…

ईजा बारिश के दिनों में परेशान हो जाती थीं. एक तो ‘गुठ्यार में कच्यार’ (गाय-भैंस को बांधने वाली जगह में कीचड़) और दूसरा ‘भ्योव’ (जंगल) ‘खसखस’ (फिसलन भरे) हो जाते थे. दिनभर घर पर बैठना भी ईजा को ठीक नहीं लगता था. हम सब तो अंगीठी में ‘मुन’ (पेड़ों की जड़) लगाकर आग ‘तापते’ रहते थे. आग से फुर्सत मिलते ही रजाई ओढ़ के बैठ जाते और कुछ न कुछ खेलना या अम्मा से किस्से सुनते रहते थे. ईजा कभी भैंस, कभी पानी, कभी घास और कभी खाली बैठे रहने से परेशान रहती थीं. ईजा की चिंता थी कि- “भ्योव बे घा नि आल त भैंस के खाल के और दूध के द्याल” (जंगल से घास नहीं आएगी तो भैंस क्या खाएगी और क्या दूध देगी).

ईजा जहाँ-जहाँ से ‘चुहुन’ आता उसके नीचे गिलास या परात रख देती थीं. साथ ही ईजा बारिश के थमने के लिए सभी ईष्ट देवी- देवताओं का स्मरण करती रहती थीं. बारिश बंद हो जाए इसके लिए बाहर उल्टा तवा भी रख देती थीं लेकिन बारिश तवा थोड़ी न देखती है.

कभी-कभी लगातार 10-12 दिन तक बारिश होती थी. ईजा उसी बारिश में घास काटने से लेकर सब काम करती थीं. हमारा काम ‘नहो’ से पानी लाने का होता था. अम्मा बारिश के दिनों खूब ‘जानहर’ (घरेलू आटा पीसने की चक्की) चलाती थीं. बारिश के दिनों में अक्सर उनका यही काम होता था मगर कभी-कभी जब ज्यादा अनाज पीसना होता या बारिश की वजह से कोई और काम संभव नहीं होता तो ईजा भी उनका साथ दे देती थीं.

बारिश के दिनों में रात में होनी वाली ‘गड़म-गड़ाका’ (बादलों की गर्जन) और ‘चाल चमकने’ (बिजली चमकने) से हम डर जाते थे. ईजा को भी चिंता रहती थी. ‘पाख’ (छत) में कुछ जगह से ‘चुहुन’ (टपकने) आने लगता था . ईजा जहाँ-जहाँ से ‘चुहुन’ आता उसके नीचे गिलास या परात रख देती थीं. साथ ही ईजा बारिश के थमने के लिए सभी ईष्ट देवी- देवताओं का स्मरण करती रहती थीं. बारिश बंद हो जाए इसके लिए बाहर उल्टा तवा भी रख देती थीं लेकिन बारिश तवा थोड़ी न देखती है.

हम सब चुप-चाप सो जाते थे लेकिन मन के अंदर बरसात के बाद कि सुबह में ‘पाटो'(खेत) ‘छन’ (भैंस-गाय बांधने वाली जगह) ‘भ्योव’ (जंगल) और ‘नहो’ (पानी भरने वाली जगह) देखने की ललक होती थी. हम सुबह का इंतजार करते और ईजा बारिश खत्म होने की कामना.

बरसात में ‘चाल चमकती’ (बिजली) तो हम खिड़की- दरवाजे सब बंद कर लेते थे. वहां चीड़, तूंणी’ और आम के पेड़ में अक्सर ‘बाण’ (बिजली गिरना) गिर जाता था. ईजा ‘बाण’ गिरने की आवाज से अंदाजा लगा लेती थीं कि कहाँ गिरा होगा. फिर हमें कहती थीं- ‘पार बगीच पन आमो डाव हन बाण पड़ गो रे” (सामने आम के पेड़ में बिजली गिर गई है). बरसात में ‘गध्यर'(झरना जैसा) भी बहुत आते थे. कई जगहों से ‘छैवे’ (जमीन के अंदर से पानी का निकलना) फूट जाते थे. हमको यह सब देखने की हौंस'(उत्सुकता) होती थी लेकिन ईजा खेत, फसल और रास्ते टूट जाने से परेशान होती थीं. हम कई बार ईजा को कहते थे, “ईजा देख पार ऊ छैलू गध्यर आ गो”. ईजा के लिए उसमें आकर्षण से ज्यादा भय होता था.

बरसात के बाद ईजा कई जगह ‘म्यल’ (सब्जियों के बीज) बोने में लग जाती थीं. हम लोग ‘नहो गध्यर’ जाकर ‘घट’ व ‘खाव’ (तालाब) बनाते और पानी में खेलते रहते थे.

‘छैलू”  (एक पहाड़ का नाम) ‘गध्यर’ आने का मतलब होता था कि पानी के तेज बहाव से हमारा एक पूरा खेत और रास्ता बह जाएगा. ईजा को इसी की चिंता रहती थीं, हमसे कहतीं- “सब बही बे लिजाल ऊ”…(सब बहाकर ले जाएगा वो).

बरसात के बाद भ्योव एकदम साफ हो जाते और पुराने रास्ते टूटकर नए रास्ते बन जाते थे. उन नए रास्तों को पुराना करना भी हमारा काम होता था. बरसात के बाद ईजा कई जगह ‘म्यल’ (सब्जियों के बीज) बोने में लग जाती थीं. हम लोग ‘नहो गध्यर’ जाकर ‘घट’ व ‘खाव’ (तालाब) बनाते और पानी में खेलते रहते थे.

बरसात हो जाए इसके लिए हम एक टोटका या उसे पूजा भी कह सकते हैं, करते थे. वह था, ‘गोल्देराणी’ पूजना. यह पूजा किसी आम पूजा से अलग थी.

(दो)
यह बातें तो बरसात होने की थी लेकिन जब बरसात नहीं होती थी तो घास, खेत, पानी आदि को लेकर परेशानी होती थी. बरसात हो जाए इसके लिए हम एक टोटका या उसे पूजा भी कह सकते हैं, करते थे. वह था, ‘गोल्देराणी’ पूजना. यह पूजा किसी आम पूजा से अलग थी. ‘नोह’ जाने वाले रास्ते में तीन आम के पेड़ों के नीचे गध्यर में एक चार पत्थरों का मंदिर सा बना हुआ था. उस मंदिर के अंदर एक दिया, त्रिशूल और एक पत्थर था जिन्हें हम ‘गोल्देराणी’ देवता मानते थे.

 अक्सर ‘गोल्देराणी’ पूजने के दिन या उसके अगले दिन तक बारिश हो जाती थी. यह एक संयोग था कि कुछ और… अब सोच सकते हैं. तब तो यह ‘गोल्देराणी’ की कृपा थी.

‘गोल्देराणी’ पूजने के लिए तीन ‘ग्याज'(केकड़ा), तीन ‘भदू’ (मछलियों की तरह पानी में रहने वाले छोटे-छोटे जीव), एक ‘गज्याड़ू’ (इधर उसे लोग जिमीकंद कहते हैं) लाते थे. साथ ही गाँव के हर एक घर से थोड़ा-थोड़ा आटा, तेल, और गुड़ आता था. ग्याज, भदू और गज्याड़ू को वहीं मंदिर के पास एक पत्थर के नीचे दबा देते थे बाकी आटा, तेल और गुड़ के ‘पुए’ और ‘कसार’ बनाया जाता था. मंदिर में भोग लगाते हुए  ‘गोल्देराणी’ देवता के सामने बारिश न होने का रोना रोया जाता था. उसमें फसल, जानवर, खेत, बच्चे सबका हवाला दिया जाता था कि अगर बारिश नहीं हुई तो इन सबका क्या होगा!

गाँव के सारे बच्चे वहाँ इकट्ठा होते थे. सबको ‘पुए’ और ‘कसार’ बांटा जाता था. अगर बच गया तो सारे गाँव वालों में बराबर बांट दिया जाता था. अक्सर ‘गोल्देराणी’ पूजने के दिन या उसके अगले दिन तक बारिश हो जाती थी. यह एक संयोग था कि कुछ और… अब सोच सकते हैं. तब तो यह ‘गोल्देराणी’ की कृपा थी.

बे-मौसम बारिश होना और सूखा पड़ना जैसी बात आम होती जा रही है. ईजा कई बार कहती हैं कि ‘च्यला सब ख़त्म हेगो अब’. ईजा की इस बात पर मैं, मौन ही रहता हूँ क्योंकि उस ‘सबकुछ’ खत्म होने में मेरा भी योगदान है…

अब तो अक्सर पहाड़ों से बादल फटने की ही खबर आती है. बे-मौसम बारिश होना और सूखा पड़ना जैसी बात आम होती जा रही है. ईजा कई बार कहती हैं कि ‘च्यला सब ख़त्म हेगो अब’. ईजा की इस बात पर मैं, मौन ही रहता हूँ क्योंकि उस ‘सबकुछ’ खत्म होने में मेरा भी योगदान है…

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। पहाड़ के सवालों को लेकर मुखर रहते हैं।)

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