November 25, 2020
संस्मरण

जागर, आस्था और सांस्कृतिक पहचान की परंपरा

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—18

  • प्रकाश उप्रेती

आज बात बुबू (दादा) और हुडुक की. पहाड़ की आस्था जड़- चेतन दोनों में होती है . बुबू भी दोनों में विश्वास करते थे. बुबू ‘जागेरी’ (जागरी), ‘मड़-मसाण’, ‘छाव’ पूजते थे और किसान आदमी थे. उनके रहते घर में एक जोड़ी भाबेरी बल्द होते ही थे. खेती और पूजा उनकी आजीविका का साधन था.

उनका व्यक्तित्व बड़ा आकर्षक था. तकरीबन 5 फुट 8 इंच का कद, ललाट पर चंदन, कानों में सोने के कुंडल, हाथ में चांदी के कड़े, सर पर सफेद टोपी जिसमें एक फूल, बदन पर कुर्ता- भोटु और धोती, हाथ में लाठी जिसमें ऊपर की तरफ एक छोटा सा घुँघरू रहता व नीचे लोहे का ‘सम'(लोहे की नुकीली चीज) और आवाज इतनी कड़क की गाँव गूँजता था. इलाके भर में उनको सब जानते थे. जब भी जागेरी लगाने जाते थे तो कंधे पर एक झोला होता था जिसमें हुडुक, लाल वाला तौलिया, मुरली (बाँसुरी), ‘थकुल बजेणी आंटु’ (थाली बजाने वाले दो डंडे), एक हुडुके पूड, ‘तमकि थैल’ उसमें ‘तमाक’ (घर का बना तंबाकू), सुल्फी हॉक, ‘झुलस’ (आग पकड़ने वाला), कनगड़ (कांटा निकालने वाला), डियांसी (आग जलाने वाला पत्थर), बंद होने वाला चाकू और कागज में मिश्री होती थी.

उनका व्यक्तित्व बड़ा आकर्षक था. तकरीबन 5 फुट 8 इंच का कद, ललाट पर चंदन, कानों में सोने के कुंडल, हाथ में चांदी के कड़े, सर पर सफेद टोपी जिसमें एक फूल, बदन पर कुर्ता- भोटु और धोती, हाथ में लाठी जिसमें ऊपर की तरफ एक छोटा सा घुँघरू रहता व नीचे लोहे का ‘सम'(लोहे की नुकीली चीज) और आवाज इतनी कड़क की गाँव गूँजता था.

बुबू का हुडुक और लेखक

मेरी ट्रेनिंग बहुत छोटे से ही शुरू गई थी. गर्मियों के दिनों, चांद की रोशनी में ‘चोथर’ (सीढ़ी और दरवाजे के बीच की जगह)में बैठकर बुबू जागेरी लगाते थे और मैं थकुल बजाता था. सर्दियों में गोठ ‘अंगेठ’ (अंगीठी) के इधर- उधर बैठ जाते थे. बुबू दीवार से टेक लगाकर जागेरी लगाते और मैं थकुल बजाने की कोशिश करता. बीच- बीच में बुबू कहते ऐसे नहीं ऐसे बजा. हुडुक पर म्यर हाथ देख और चाल सुन उस हिसाब से बजा. घर के बाकी लोग तब तक सो जाते थे लेकिन मेरी ट्रेनिंग चलती रहती थी.

मासाब बुबू के सामने कुर्सी पर नहीं बैठते थे. इलाके भर में उनका बड़ा सम्मान था. अब मैं प्रॉपर इस्कूल जाने लगा था. बुबू भी मुझे अपने साथ जागेरी में थकुल बजाने के लिए ले जाने लगे थे. कभी-कभी तो इस्कूल से ही मैं चला जाता था. बुबू घर से आते थे और रास्ते में इस्कूल पड़ता था वहीं आकर मुझसे कहते ‘चल ‘नतिया’ आज ‘बेल’ (गाँव का नाम) जाणु’.

चार साल की उम्र तक आते-आते मैं थकुल बजाने और जागेरी लगाने के सारे बोल सीख गया था. बुबू की आदत थी कि वह अपना हुडुक बजाने के लिए किसी को नहीं देते थे .थोड़ा सीख लेने के बाद तो पानी लेने या गाय-भैंस को चराने जाते-आते हुए मैं गाँव के बच्चों के साथ जागेरी लगाने लगा था. नर्सिंग, लखुड़िया, देवी, भूत, ग्वेल देवता से लेकर कत्यूर तक को नचाने के सारे बोल मुँह ज़बानी याद हो गए थे.

मेरा हुडुक और बुबु की तस्वीर

चार बरस के बाद ईजा, भाई के साथ मुझे इस्कूल भेजने लग गई थीं. सुबह मैं इस्कूल चला जाता था तो रात को बुबू पूछते थे आज क्या पढ़ाया “त्यर मासाबुल” . मैं कुछ -कुछ बोलता था. उसके बाद बुबू मुझे ‘दो एकम दो, दो दूणी चार’ का पहाड़ा (टेबल) और जमीन पर कोयले से अ, आ लिख कर पढ़ाते थे. जागेरी की ट्रेनिंग रोज नहीं होती थी. बीच-बीच में बुबू मेरे से जागेरी सुनते थे. बोलते थे कि ‘बोल बिरत सुनाणा जरा’ और मैं सुनाने लग जाता था.

ईजा को मेरा जागेरी लगाना पसंद नहीं था. वह कई बार मुझे मना कर चुकी थीं. उनको लगता था कि मेरा भविष्य खराब हो रहा है. ईजा कई बार बातों- बातों में कहती थीं कि “मैसुक नन इस्कूल पढ़े मि तुम जागेरी लगावो” लेकिन बुबू को कहने की हिम्मत ईजा में भी नहीं थी. इसलिए लंबे समय तक यह सिलसिला बदस्तूर जारी रहा.

पांच साल का होने पर बुबू ने ही इस्कूल में मेरा नाम लिखाया. मासाब बुबू के सामने कुर्सी पर नहीं बैठते थे. इलाके भर में उनका बड़ा सम्मान था. अब मैं प्रॉपर इस्कूल जाने लगा था. बुबू भी मुझे अपने साथ जागेरी में थकुल बजाने के लिए ले जाने लगे थे. कभी-कभी तो इस्कूल से ही मैं चला जाता था. बुबू घर से आते थे और रास्ते में इस्कूल पड़ता था वहीं आकर मुझसे कहते ‘चल ‘नतिया’ आज ‘बेल’ (गाँव का नाम) जाणु’. मैं स्कूल से चल देता था. धीरे- धीरे मैंने बाकी सभी मंत्र सीख लिए थे . बुबू जहाँ भी जागेरी लगाने जाते उनसे कहते-“ये छू छोट जगरी’. मेरी बड़ी अच्छी आवो- भगत होती थी. 5 से 10 रुपए मुझे थकुल बजाई का टीका मिलता था. जैसे ही मुझे पैसे मिलते, मैं बुबू के ‘भोटु’ (नेहरू जैकेट जैसा) की जेब में डाल देता था. रात को 9-10 बजे जागेरी शुरू होती थी तो 2- 3 बजे तक खत्म होती थी. उसके बाद कभी वहीं रुक जाते थे तो कभी रात में ही घर के लिए लौट आते थे. बुबू को डर नहीं लगता था. मैं उनके साथ अंधेरी रातों में नदी, श्मशान, घने जंगलों में आया-गया हूँ. मुझे एक समय तक डर लगता था लेकिन धीरे-धीरे मेरा डर भी निकल गया था.

अब मेरी दुनिया इस्कूल, खेत, जागेरी, छाव पूजने में रमने लगी थी. दिल्ली से पिता जी ने एक छोटा हुडुक मेरे लिए खरीद कर भिजवा दिया था. अब मैं हुडुक भी बजाने लग गया था. बुबू की ट्रेनिंग में मैंने एक दो जगह हुडुक और उन्होंने थकुल बजाया. उसके बाद उनको तसल्ली हो गई थी कि ये अब अकेले भी कर सकता है.

ईजा मेरा भविष्य सोच रही थीं तो बुबू मुझ में अपना अक्स देख रहे थे. तब मैं भविष्य से ज्यादा अक्स की तरफ खिंचा जा रहा था. आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो बहुत कुछ है जो छूट गया है. एक ईजा हैं जो आज भी हर मोर्चे पर खड़ी हैं. अब ईजा ही तो पहाड़ हैं.

इधर ईजा को मेरा जागेरी लगाना पसंद नहीं था. वह कई बार मुझे मना कर चुकी थीं. उनको लगता था कि मेरा भविष्य खराब हो रहा है. ईजा कई बार बातों- बातों में कहती थीं कि “मैसुक नन इस्कूल पढ़े मि तुम जागेरी लगावो” लेकिन बुबू को कहने की हिम्मत ईजा में भी नहीं थी. इसलिए लंबे समय तक यह सिलसिला बदस्तूर जारी रहा.बुबू बहुत अच्छी मुरली बजाते थे. कभी-कभी वो ऊँचे पहाड़ पर शाम के समय बैठकर मुरली बजाने लग जाते थे. मैं उस आवाज को आज भी महसूस करता हूँ. बुबू हमेशा मेरे गुरु रहे और आज भी किसी न किसी रूप में हैं.

ईजा मेरा भविष्य सोच रही थीं तो बुबू मुझ में अपना अक्स देख रहे थे. तब मैं भविष्य से ज्यादा अक्स की तरफ खिंचा जा रहा था. आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो बहुत कुछ है जो छूट गया है. एक ईजा हैं जो आज भी हर मोर्चे पर खड़ी हैं. अब ईजा ही तो पहाड़ हैं. हम तो किसी अनदेखे भविष्य के पीछे दौड़ रहे हैं लेकिन यह वह भविष्य भी नहीं है जो कभी ईजा ने हमारे लिए देखा/सोचा था…

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। पहाड़ के सवालों को लेकर मुखर रहते हैं।)

 

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    Nandkishore says:

    उत्तम अभिव्यक्ति 👌👌👍👍पहाड़ों की ओर खींच कर ले जाता है ये संस्मरण ।

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    धीरज says:

    प्रकाश के इस संस्मरण में कुछ विमर्श के आयाम है और कुछ सामाजिक संरचना को समझने के सूत्र भी। बधाई !

  3. Avatar
    हरीश मेल्टी says:

    प्रकाश को जितना भी पड़ता और सुनता हूं मेरी जिज्ञासा उतनी ही बढ़ती जाती है , पड़ते सुनते कभी ऐसा नहीं हुआ कि तन तो यहां दिल्ली और मन पहाड़ ना पहुंचा हो।

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