साहित्‍य-संस्कृति

सामर्थ्य के विमर्श में मातृभाषा का स्थान 

सामर्थ्य के विमर्श में मातृभाषा का स्थान 

साहित्‍य-संस्कृति
प्रो. गिरीश्वर मिश्र  मनुष्य इस अर्थ में भाषाजीवी कहा जा सकता है कि उसका सारा जीवन व्यापार भाषा के माध्यम से ही होता है. उसका मानस भाषा में ही बसता है और उसी से रचा जाता है. because दुनिया के साथ हमारा रिश्ता भाषा की मध्यस्थता के बिना अकल्पनीय है. इसलिए भाषा सामाजिक सशक्तीकरण के विमर्श में प्रमुख किरदार है फिर भी अक्सर उसकी भूमिका की अनदेखी की जाती है. भारत के राजनैतिक-सामाजिक जीवन में ग़रीबों, किसानों, महिलाओं, जनजातियों यानि हाशिए के लोगों को सशक्त बनाने के उपाय को हर सरकार की विषय सूची में दुहराया जाता रहा है. पढ़ें- अंतर्मन की शांति है प्रसन्नता की कुंजी ज्योतिष वर्तमान सरकार पूरे देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए कृतसंकल्प है. आत्म-निर्भरता के लिए ज़रूरी है कि अपने स्रोतों और संसाधनों का उपयोग को पर्याप्त बनाया जाए ताकि कभी दूसरों का मुँह न जोहना पड़े. इस दृष्टि से ‘स्वदेशी’ का नारा ...
महात्मा गांधी का सामाजिक प्रयोग

महात्मा गांधी का सामाजिक प्रयोग

साहित्‍य-संस्कृति
प्रो. गिरीश्वर मिश्र  आज कल विभिन्न राजनीतिक दलों के लोक लुभावन पैंतरों और दिखावटी  सामाजिक संवेदनशीलता के बीच स्वार्थ का खेल आम आदमी को किस तरह दुखी कर रहा है यह जग जाहिर है. परन्तु आज से एक सदी पहले पराधीन भारत में लोक संग्रह का विलक्षण प्रयोग हुआ था. में जीवन का अधिकाँश बिताने के बाद उम्र के सातवें दशक में पहुँच रहे अनुभव-परिपक्व गांधी जी ने आगे के समय के लिए वर्धा को अपनी कर्म-भूमि बनाया था.ज्योतिष नागपुर से75 किलोमीटर की दूरी पर स्थित वर्धा अब रेल मार्गों और कई राष्ट्रीय राजमार्गों से जुड़ चुका  है. तब महात्मा गांधी ने धूल-मिट्टी-सने और खेती-किसानी के परिवेश वाले इस पिछड़े ग्रामीण इलाके को  चुना और गाँव के साधारण किसान की तरह श्रम-प्रधान जीवन का वरण किया. इसके पीछे उनकी यह सोच और दृढ विश्वास था कि भारत का भविष्य देश के गाँवों के सशक्त होने में निहित है. उनकी दृष्टि में स्वतंत्रता ...
रवांई क्षेत्र में पत्रकारिता की अविरल लौ जलाते रहे राजेन्द्र असवाल

रवांई क्षेत्र में पत्रकारिता की अविरल लौ जलाते रहे राजेन्द्र असवाल

साहित्‍य-संस्कृति, देहरादून
पुण्य स्मरण: पुण्य तिथि (30 मई) पर विशेषमहावीर रवांल्टारवांई क्षेत्र में पत्रकारिता की बात करें तो आज अनेक लोग इस क्षेत्र में सक्रिय हैं लेकिन इस क्षेत्र से किसी भी  नियमित पत्र का प्रकाशन नहीं हो सका सिर्फ अस्सी के दशक के पूर्वाद्ध में  बर्फिया लाल जुवांठा और शोभा because राम नौडियाल के संपादन में पुरोला से निकले 'वीर गढ़वाल' की जानकारी मिलती है. सन् 1992 ई में पुरोला से पहली बार 'रवांई मेल' (साप्ताहिक) समाचार पत्र का प्रकाशन आरंभ हुआ और इसके संस्थापक, प्रकाशक व संपादक थे- राजेन्द्र असवाल.अपनेपन राजेन्द्र असवाल का जन्म नौगांव विकासखंड के because बलाड़ी गांव में 1 जनवरी सन् 1964 ई को हुआ था.आपके पिता का नाम नैपाल सिंह और मां का नाम चंद्रमा देवी था.तीन भाईयों में आप घर के सबसे बड़े बेटे थे. आपकी आरंभिक शिक्षा गांव में ही हुई फिर राजकीय इंटर कालेज नौगांव से करने के बाद स्नातक ...
बुद्ध का स्मरण संतप्त जीवन की औषधि है

बुद्ध का स्मरण संतप्त जीवन की औषधि है

साहित्‍य-संस्कृति
बद्ध पूर्णिमा पर विशेषप्रो. गिरीश्वर मिश्र  हम सभी अच्छी तरह जीना चाहते हैं परन्तु दिन प्रतिदिन की उपलब्धियों का हिसाब लगाते हुए संतुष्टि नहीं होती है. दिन बीतने पर खोने पाने के बारे में सोचते हुए और जीवन में अपनी भागीदारी पर गौर करते हुए आश्वस्ति कम और आक्रोश, because घृणा, असहायता, कुंठा और शिकायतों का ढेर लग जाता है. मन के असीम स्वप्न और सीमित भौतिक यथार्थ के बीच प्रामाणिक, समृद्ध और पूर्ण जीवन की तलाश तमाम भ्रांतियों और अंतर्विरोधों से टकराती रहती है. आज जब सब कुछ ऊपर नीचे हो रहा है तो क्या सोचें और क्या चुनें यह मुश्किल चुनौती होती जा रही है. दी हुई परिस्थितियों में कुशलतापूर्वक कैसे जियें यह इस पर निर्भर करता है कि हमारी दृष्टि कैसी है. हम स्वयं अपने शरीर की और अपने because विचारों की चेतना भी रखते हैं और अपने अनुभवों की समझ भी विकसित करते रहते हैं. हम कहाँ स्थित हैं ? क्या पाना...
जीवन का प्रयोजन है आत्म विस्तार  

जीवन का प्रयोजन है आत्म विस्तार  

साहित्‍य-संस्कृति
प्रो. गिरीश्वर मिश्र  गोस्वामी तुलसीदास रामचरितमानस के किष्किंधा काण्ड में प्रश्न करते हैं कि शरीर धारण करने का क्या परिणाम है और कहते हैं  इसका प्रयोजन राम भक्ति है : धरे कर यह फलु भाई, because भजिय राम सब काम बिहाई . यहाँ  शरीर की उपादेयता या देह धारण करने की फलश्रुति सब कुछ छोड़ कर श्रीराम के भजन में प्रतिपादित करती है. शरीर का अर्थ है एक भौतिक रचना जो गोस्वामी जी के शब्दों में ‘क्षिति (भूमि), जल, पावक (अग्नि), गगन (आकाश) समीरा (वायु) ’ के सूत्र के अंतर्गत निर्मित और संचालित होती है. यह शरीर हमें एक ठोस आधार प्रदान करता है और ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों की सहायता से हम विभिन्न कार्य संपादित करते हैं. मानस (अंत:करण), बुद्धि और अहंकार मिल कर हमारे लिए सोचना और कल्पना करना संभव बनाते हैं.ज्योतिष कालिदास की मानें तो शरीर ही धर्माचरण का प्रमुख साधन है: शरीरमाद्यं खलु धर्म साधनम ! ...
अल्मोड़ा अंग्रेज आयो… टैक्सी में

अल्मोड़ा अंग्रेज आयो… टैक्सी में

साहित्‍य-संस्कृति
विनोद उप्रेती ‘वागाबोंड’ अल्मोड़ा में अंग्रेज टैक्सी से आया या घोड़े पर, यह तो काल-यात्रा से ही पता लगेगा लेकिन उसका यहां तक पहुंचना, औपनिवेशिक विस्तार के बहुत बड़े आख्यान का छोटा सा हिस्सा भर है. जब अंग्रेज अल्मोड़ा आ रहा था, तब वह because सातों महाद्वीपों पर कहीं न कहीं और भी जा रहा था. ग्लोब के हर हिस्से में अपनी श्रेष्ठता की गंद मचाता वह कुदरत पर विजय हासिल करने के दंभ में चोटियों पर झंडे गाड़ रहा था, सागरों में नावें तैरा रहा था, और मछलियाँ मार रहा था.  पाताल से हीरे-जवाहरात चुरा रहा था, और जंगली जानवरों की खाल उतार जूते और बेल्ट बना रहा था.ज्योतिष इस ताकतवर लालची की भूख अनंत थी जो आज दुनियाभर के शासकों को संक्रमितकर धरती का नाश कर रही है. लेकिन इस ब्लैकहोल जैसी ताकत के पीछे-पीछे अन्वेषकों की जमातें भी संसार भर में घूमने लगीं. because हालाँकि इन खोजियों में से अधिकतर उसी रोग के मरीज ...
देवलांग से रू-ब-रू करवाता दिनेश रावत द्वारा लिखित एक तथ्यात्मक गीत

देवलांग से रू-ब-रू करवाता दिनेश रावत द्वारा लिखित एक तथ्यात्मक गीत

सोशल-मीडिया, साहित्‍य-संस्कृति
पूर्णता एवं तथ्यात्मकता के साथ देवलांग की विशेषताओं से परिचय करवाता दिनेश रावत का यह गीतशशि मोहन रवांल्टा सीमांत जनपद उपर साहित्यकार दिनेश रावत द्वारा लिखित गीत अब तक का सबसे पूर्णता एवं तथ्यात्मकता गीत है. रवांई घाटी के सुप्रसिद्ध देवलांग उत्सव की विशेषताओं को दर्शाता यह गीत रामनवमी के अवसर पर लॉन्च किया गया. because गीत साहित्यकार दिनेश रावत ने लिखा, जिसे रवांई घाटी सुप्रसिद्ध गायिका रेश्मा शाह ने आवाज दी और राजीव नेगी ने संगीतबद्ध किया है. गाने को इस तरह से पिरोया गया है कि उसमें देवलांग के आयोजन को आसानी से समझा जा सकता है. देवलांग पर लिखे गए इस गीत को हारूल शैली में गाया व संगीतबद्ध किया गया है.हरताली गीत में देवलांग की तैयारियों से लेकर देवलांग के खड़े होने और वहां से आखिर ओल्ला को मड़केश्वर महादेव तक ले जाने की पूरी जानकारी दी गई है. देवलांग के आयोजन में एक—एक गाँव की हिस्से...
ऐश्वर्य और सहज आत्मीयता की अभिव्यक्ति श्रीराम

ऐश्वर्य और सहज आत्मीयता की अभिव्यक्ति श्रीराम

साहित्‍य-संस्कृति
राम नवमी पर विशेषप्रो. गिरीश्वर मिश्र  सनातनी यानी सतत वर्त्तमान की अखंड अनुभूति के लिए तत्पर मानस वाला भारतवर्ष का समाज देश-काल में स्थापित और सद्यः अनुभव में ग्राह्य सगुण प्रत्यक्ष को परोक्ष वाले व्यापक और सर्व-समावेशी आध्यात्म से जुड़ने का माध्यम because बनाता है. वैदिक चिंतन से ही व्यक्त और अव्यक्त के बीच का रिश्ता स्वीकार किया गया है और देवता और मनुष्य परस्पर भावित करते हुए श्रेय अर्थात कल्याण की प्राप्ति करते हैं (परस्परं भावयन्त: श्रेय: परमवाप्स्यथ - गीता). इस तरह यहाँ का आम आदमी लोक और लोकोत्तर (भौतिक और पारलौकिक) दोनों को निकट देख पाता है और उनके बीच की आवाजाही उसे अतार्किक नहीं लगती. सृष्टि चक्र और जीवन में भी यह क्रम बना हुआ है यद्यपि सामान्यत: उधर हमारा ध्यान नहीं जाता.ज्योतिष उदाहरण के लिए सभी प्राणी अन्न से उत्पन्न और जीवित हैं, अन्न वर्षा से उत्पन्न होता है. वर्षा ...
युवा उम्र के छिछोरेपन एवं जीवन संघर्ष का अद्भुत उपन्यास है ‘घासी: लाल कैंपस का भगवाधारी’

युवा उम्र के छिछोरेपन एवं जीवन संघर्ष का अद्भुत उपन्यास है ‘घासी: लाल कैंपस का भगवाधारी’

साहित्‍य-संस्कृति
डॉक्टर कुसुम जोशीयुवा लेखक ललित फुलारा का प्रथम उपन्यास ''घासी: लाल कैंपस का भगवाधारी" पढ़ा, छात्र जीवन की वास्तविकता के साथ- साथ युवा मन की कल्पनाओं के ताने- बाने के साथ बुना गया यह एक ऐसा उपन्यास है जिसमें प्रवाह है और एक सांस में पढ़ने को प्रेरित करता है, भाषा सामान्य बोलचाल और भारतीय पुरुषों के जबान में रची- बसी गालियां जो राह चलते सुनाई पड़ती है, कह सकते हैं कि ये अल्हड़ और युवा उम्र के छिछोरेपन और जीवन संघर्ष का एक अद्भुत उपन्यास है जो पात्रों की सामाजिक पृष्ठभूमि, समय काल, ज्ञान-अज्ञान को प्रतिबिंबित करता है। (Book Review of Ghasi Lal Campus Ka Bhagwadhari)यह उन युवाओं का उपन्यास है जो सूदूर गांवों -कस्बों से जीवन को एक धार देने के लिए चले आते हैं और बहुत सारे काल्पनिक सपनों के साथ रूमानियत के संसार में विचरते हुए जब यथार्थ के धरातल में आकर अपनी क्षमताओं को परखते हैं तब तक ब...
नर से नारायण की यात्रा

नर से नारायण की यात्रा

साहित्‍य-संस्कृति
प्रो. गिरीश्वर मिश्र  स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव (swatantrata ka amrit mahotsav) भारत की देश-यात्रा का पड़ाव है जो आगे की राह चुनने का अवसर देता है. इस दृष्टि से पंडित दीन दयाल उपाध्याय की चिंतनपरक सांस्कृतिक दृष्टि में जो भारत का खांचा था बड़ा प्रासंगिक है. वह समाजवाद और साम्यवाद से अलग सबके उन्नति की खोज पर केन्द्रित था. वह सर्वोदय के विचार को सामने रखते है और सोच की यह प्रतिबद्धता भारतीय राजनैतिक सोच को औपनिवेशक सोच से अलग करती है. उनका स्पष्ट मत था कि समाजवाद और साम्यवाद सिर्फ शरीर और मन तक सीमित हैं और इच्छा (काम) because और धन (अर्थ) तक ही चुक जाते हैं. वे मनुष्य के समग्र अस्तित्व की उपेक्षा करते हैं. एक व्यापक आधार चुनते हुए वह मानव अस्तित्व के सभी पक्षों अर्थात शरीर, और मन के साथ बुद्धि तथा आत्म का भी समावेश करते हैं. इन्हीं के समानांतर धर्म, अर्थ, काम, और मोक्ष के पुरुषार्थों को भी...