Author: Himantar

हिमालय की धरोहर को समेटने का लघु प्रयास
नैतिक मूल्यों और पर्यावरण की रक्षा से ही सार्थक होगा अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस

नैतिक मूल्यों और पर्यावरण की रक्षा से ही सार्थक होगा अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस

योग-साधना
अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर विशेषडा.मोहन चंद तिवारीभारत सहित दुनियाभर में आज छठा अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाया जा रहा है. कोरोना महामारी के कारण इस बार योग दिवस का थीम है- "घर पर योग और परिवार के साथ योग". कोरोना संक्रमण के इस संकटकाल में योग की अहमियत और भी ज्यादा बढ़ गई है क्योंकि योग ही एक ऐसी क्रिया है,जिससे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य बेहतर होता है और बीमारियों से लड़ने की क्षमता भी बढ़ती है. इस अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र को संबोधित करते हुए कहा है कि  योग दिवस एकजुटता का दिन है.पीएम मोदी ने कहा, "आज भावात्मक योग का दिन है.जो दूरियां खत्म करे, वही योग है. योग से इम्युनिटी बढ़ाने में मदद मिलती है. हर दिन प्राणायाम कीजिए. दुनियाभर में योग का उत्साह बढ़ रहा है. योग का अर्थ समर्पण, सफलता है. हर परिस्थिति में समान रहने का नाम योग है. योग किसी से...
पिता तो पिता है, हमसे कब वो जुदा है

पिता तो पिता है, हमसे कब वो जुदा है

संस्मरण
पितृ दिवस पर विशेषडॉ. अरुण कुकसालमानवीय रिश्तों में सबसे जटिल रिश्ता पिता के साथ माना गया है. भारतीय परिवेश में पारिवारिक रिश्तों की मिठास में 'पिता' की तुलना में 'मां' फायदे में रहती है. परिवार में 'पिता' अक्सर अकेला खड़ा नज़र आता है. तेजी से बदलती जीवनशैली में परिवारों के भीतर पिता का पारंपरिक रुतवा लुढ़कता हुआ खतरे के निशान के आस-पास अपने अस्तित्व को बचाने की कोशिश कर रहा है. पर यह भी उतना ही सच है कि पिता के पैरों की नीचे की जमीन कितनी ही खुरदरी लगे परिवार में जीने का जज्बां और हौसला वहीं पनाह लेता है. पिता-पुत्र/पुत्र-पिता संबधों और उनकी आपसी कैमेस्ट्री की इवान सेर्गेयेविच तुर्गेनेव ने अपनी किताब 'पिता और पुत्र' में 150 साल पहले जो व्याख्या की थी वह आज भी प्रासंगिक है. इवान तुर्गेनेव (सन् 1818-1883) 19वीं शताब्दी के विश्व प्रसिद्व अग्रणी लेखकों में शामिल रहे हैं. टाॅलस्टा...
अंजीर ला सकता है रोजगार की बयार

अंजीर ला सकता है रोजगार की बयार

उत्तराखंड हलचल
बेडू और तिमला से ही विकसित हुआ है अंजीर. उत्तराखंड में उपेक्षित क्यों?जे. पी. मैठाणीपहाड़ों में सामान्य रूप से जंगली समझा जाने वाला बेडू और तिमला वस्तुत: एक बहुउपयोगी फल है. ​तिमला और बेडू के वृक्ष से जहां पशुओं के लिए जाड़ों में विशेषकर अक्टूबर से मार्च तक हरा चारा मिलता है, वहीं इसका फल अभी तक उपेक्षित माना गया है. दुनिया के कई देशों में लगातार शोध और अनुसंधान तथा कायिक प्रवर्धन से अंजीर को विकसित किया गया. शोध पत्र बताते हैं कि अंजीर जिसका वैज्ञानिक नाम फाइक्स कैरिका है यह मलबेरी ​परिवार यानी मोरेशी परिवार का सदस्य है. मूलत: अंजीर एशिया में तुर्की से उत्तर भारत तक का निवासी माना जाता है. पहले इसको गरीबों का भोजन भी कहा जाता था. जैसे कि आज भी उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में जिस परिवार को सब्जी नसीब ना हो, ऐसा माना जाता है कि वह परिवार तिमले की सब्जी बनाते हैं या चटनी बनाते ...
च्यलेल परदेश और चेलिलि सौरास जाणे होय

च्यलेल परदेश और चेलिलि सौरास जाणे होय

संस्मरण
मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—25प्रकाश उप्रेतीआज- ईजा, मैं और परदेश. ईजा की हमेशा से इच्छा रही कि हम भी औरों के बच्चों की तरह पढ़-लिखकर भविष्य बनाएँ. तब हमारे गाँव के बच्चों का भविष्य शहरों में जाकर ही बनता था. ईजा के लिए मुझे शहर भेजना मजबूरी और जरूरी दोनों था. ईजा बातों-बातों में कई बार कहती थीं- "च्यलेल परदेश और चेलिलि सौरास जाणे होय" (बेटे ने परदेश और बेटी ने ससुराल जाना ही है)... मुझे ईजा ने लड़की की तरह पाला था . ईजा मुझे फ्रॉक पहनाने से लेकर घास काटने तक साथ ले जाती थीं. मेरे बाल लंबे थे तो दो चोटी बनाकर ही खेलने भेजती थीं. रात को चूल्हे में रोटी बनाती तो मैं पास में बैठ जाता था. ईजा कहती थीं- "चुल हन लाकड़ लगा और आग ले फूंकने रहिए" (चूल्हे में लकड़ी लगाकर आग फूँकते रहना).रोटी बनाते हुए अंत में एक रोटी बनाने के लिए मुझे भी देती थीं. कहती थीं- "रोट बनाण सिख ले तो भो हैं प...
बहुत कठिन है माँ हो जाना

बहुत कठिन है माँ हो जाना

समसामयिक
डॉ. दीपशिखाजैसे-जैसे कोविड-19 भारत में भी अपने पैर फैलाता जा रहा, वैसे-वैसे मेरी एक माँ के तौर पर चिंता बढ़ती जा रही है. ये चिंताएं मुझ तक महदूद नहीं हैं, मेरे जैसी हर माँ सिर्फ अपने लिए नहीं बल्कि अपने बच्चे/बच्चों के लिए चिंतित है. ऊपर से जब से प्रेगनेंट हाथी की मौत वाली न्यूज सुनी है, हर समय दिमाग़ में वो ही चलता रहता है. फिर सुशांत की आत्महत्या की ख़बर. अब भारतीय सीमाओं पर बढ़ता तनाव. बड़ी घबराहट सी होती है. अजीब-अजीब ख़्याल, सपने आते हैं. कुछ समय से बस केवल नकारात्मकता ही फैल रही है विश्व में. हर माँ के लिए ये सबसे कठिन समय है मेरी नज़रों में. मैं भी नयी-नयी माँ बनी हूँ ना, तो ज़्यादा महसूस कर रही हूँ.एक माँ कैसे अपने बच्चे को शरहदों की रखवाली करने भेजती होगी? फिर कैसे वो सो पाती होगी? कैसे बहुत दिनों तक उस की आवाज़ सुने बिना निवाला गले से जाता होगा उसके. जब सुनती होगी सीमा ...
वो गाँव की लड़की

वो गाँव की लड़की

साहित्यिक-हलचल
एम. जोशी हिमानीगाँव उसकी आत्मा में इस कदर धंस गया है कि शहर की चकाचौंध भी उसे कभी अपने अंधेरे गाँव से निकाल नहीं पाई है वो गाँव की लड़की बड़ी बेढब सी है खाती है शहर का ओढ़ती है शहर को फिर भी गाती है गाँव को उसके गमले में लगा पीपल बरगद का बौनसाई जब पंखे की हवा में हरहराता है और उसके बैठक में एक सम्मोहन सा पैदा करता है वो गाँव की लड़की खो जाती है चालीस साल पहले के अपने गाँव में और झूलने लगती है अपने खेत में खड़े बुजुर्ग मालू के पेड़ की मजबूत बाहों में पड़े प्राकृतिक झूलों में अब किसी भी गाँव में उसका कुछ नहीं है सिवाय यादों केवो लड़की थी इसलिए किसी खसरा-खतौनी में उसका जिक्र भी नहीं है शहर में ब्याही वो गाँव की लड़की अपनी साँसों में बसाई है अब तक काफल, बांज, चीड़-देवदार बड.म्योल उतीस के पेड़ों को सभी नौलों धारों गाड़-गधेरों और बहते झरनों को ...
पाताल भुवनेश्वर : पृथ्वी के आदि और अंत का चित्रण 

पाताल भुवनेश्वर : पृथ्वी के आदि और अंत का चित्रण 

धर्मस्थल
ऋचा जोशीधरती पर एक जगह ऐसी भी है जहां एक ही स्थान पर पूरी सृष्टि के दर्शन होते हैं. सृष्टि की रचना से लेकर कलयुग का अंत कब और कैसे होगा इसका पूरा वर्णन यहां पर है. आइए आज आपको ऐसी जगह ले चलती हूं. बात हो रही है भारत के उत्तरी राज्य उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में स्थित पाताल भुवनेश्वर की.पाताल भुवनेश्वर दरअसल एक प्राचीन और रहस्यमयी गुफा है जो अपने आप में एक रहस्यमयी दुनिया को समेटे हुए है.  ये गुफा विशालकाय पहाड़ी के करीब 90 फिट अंदर है.पाताल भुवनेश्वर दरअसल एक प्राचीन और रहस्यमयी गुफा है जो अपने आप में एक रहस्यमयी दुनिया को समेटे हुए है.  ये गुफा विशालकाय पहाड़ी के करीब 90 फिट अंदर है. 90 फिट नीचे गुफा में उतरने के लिए चट्टानों के बीच संकरे टेढ़ी मेढ़े रास्ते से ढलान पर उतरना पड़ता है. देखने पर गुफा में उतरना नामुमकिन सा लगता है लेकिन गुफा में उतरने पर शरीर खुद ब खुद गुफा क...
जावेद साहब कंगना को घर बुलाकर हड़काना सहिष्णुता है क्या?

जावेद साहब कंगना को घर बुलाकर हड़काना सहिष्णुता है क्या?

सोशल-मीडिया
ललित फुलाराजावेद साहब पिछले छह साल से भड़क रहे हैं. कभी टीवी पर, तो कभी मंचों पर, लेकिन मुझे उनका यह भड़कना अभी तक इतना ख़राब नहीं लगता था, पर जब से कंगना पर भड़कने की ख़बर सुनी है, तब से जावेद साहब की बौद्धिकता और उदारता से रश्क होने लगा है. कथित गढ़ी गई असहिष्णुता पर भड़कते हुए पुरस्कार लौटाने वालों के पक्ष में गोलबंदी करने वाले जावेद साहब को देश के प्रधानमंत्री के हर भाव-भंगीमा, साक्षात्कार, ओबामा से दोस्ती और यहां तक की सोने के घंटों पर अजीब-सी शक्ल बनाते हुए भड़कते और उपहास उड़ाते हुए तो देखा था, लेकिन एक स्त्री को घर बुलाकर माफी मांगने के लिए उस पर भड़कते/ धमकाते हुए सुना, तो कलेजा गुस्से से भर उठा.इतना महान कवि और गीतकार एक स्त्री को अपने घर बुलाकर कैसे हड़का सकता है? माफी मांगने के लिए दबाव बनाने का प्रयास कर सकता है. यहां तक कहता है कि अगर कंगना ने राकेश रोशन और उनके परि...
जलविज्ञान के आविष्कर्ता ऋषि ‘सिन्धुद्वीप’ और उनके जलचिकित्सा मंत्र

जलविज्ञान के आविष्कर्ता ऋषि ‘सिन्धुद्वीप’ और उनके जलचिकित्सा मंत्र

साहित्‍य-संस्कृति
भारत की जल संस्कृति-5डॉ. मोहन चन्द तिवारीविश्व की प्राचीनतम सभ्यता वैदिक सभ्यता का उद्भव व विकास सिन्धु-सरस्वती और गंगा-यमुना की नदी-घाटियों में हुआ. इसी लिए इस संस्कृति को 'नदीमातृक संस्कृति' के रूप में जाना जाता है.ऋग्वेद के मंत्रों में यह प्रार्थना की गई है कि ये मातृतुल्य नदियां लोगों को मधु और घृत के समान पुष्टिवर्धक जल प्रदान करें- “सरस्वती सरयुः सिन्धुरुर्मिभिर्महो महीरवसाना यन्तु वक्षणीः. देवीरापो मातरः सूदमित्न्वो घृत्वत्पयो मधुमन्नो अर्चत..”             - ऋ.,10.64.9 वैदिक कालीन भारतजनों ने ही सरस्वती नदी के तटों पर यज्ञ करते हुए इस ब्रह्म देश को सर्वप्रथम 'भारत' नाम प्रदान किया था जैसा कि ऋग्वेद के इस मन्त्र से स्पष्ट है- "विश्वामित्रस्य रक्षति ब्रह्मेदं भारतं जनम्."                           -ऋग्वेद,3.53.12 सरस्वती नदी के तटों पर रची बसी भारत जनों की इस सभ्यता...
पेंटिंग की वैश्विक प्रदर्शनी में उत्तराखंड के तीन कलाकारों ने किया प्रतिनिधित्व

पेंटिंग की वैश्विक प्रदर्शनी में उत्तराखंड के तीन कलाकारों ने किया प्रतिनिधित्व

समसामयिक
हिमाँतर डेस्‍कउत्तराखंड के राजेश चंद्र की चित्रकला इनदिनों सुर्खियां बंटोर रही है. हाल ही में विश्व स्तर पर हुई एक प्रदर्शनी में उनकी पेंटिंग को खूब सराहा गया है. इस पेंटिंग में राजेश ने समुद्र बचाओ का संदेश दिया था. राजेश 24 साल के हैं और उनकी पेंटिंग्स को नमामि गंगे व जल शक्ति मंत्रालय भी सराह चुका है. राजेश की पेंटिंग की प्रदर्शनी यूनाइटेड नेशन वर्ल्ड ओसन डे ऑर्गनाइजेशन के वैश्विक स्तर पर हुए 'समुद्र बचाओ प्रदर्शनी'  में लगी थी. इस कार्यक्रम में उनके साथ ही विश्वभर के कई कलाकारों ने समुद्र बचाओ का संदेश दिया. राजेश के साथ ही इस प्रदर्शनी में उनके दो बाल कलाकारों शिवांश और मानव थापा की पेंटिंग भी प्रदर्शित की गई. इस वैश्विक प्रदर्शनी में भारत की तरफ से उत्तराखंड के तीन कलाकारों ने प्रतिनिधित्व किया.शिवांश ग्यारह और मानव महज सात साल के हैं जिनकी पेंटिंग इस प्रदर्शनी में प्रदर्शित ...