November 25, 2020
जल विज्ञान

“सिन्धु सभ्यता के ‘हड़प्पा’ और ‘मोहन जोदड़ो’ नगरों  का जलप्रबंधन”

डॉ. मोहन चन्द तिवारी दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज से एसोसिएट प्रोफेसर के पद से सेवानिवृत्त हैं। वैदिक ज्ञान-विज्ञान के गहन अध्येता, प्रो.तिवारी कई वर्षों से जल संकट को लेकर लिखते रहे हैं। जल-विज्ञान को वह वैदिक ज्ञान-विज्ञान के जरिए समझने और समझाने की कोशिश करते हैं। उनकी चिंता का केंद्र पहाड़ों में सूखते खाव, धार, नोह और गध्यर रहे हैं। हमारे पाठकों के लिए यह हर्ष का विषय है कि प्रो. तिवारी जल-विज्ञान के संदर्भ में ‘हिमांतर’ पर कॉलम लिखने जा रहे हैं। प्रस्तुत है उनके कॉलम ‘भारत की जल संस्कृति’ की 9वीं कड़ी…


भारत की जल संस्कृति-9

  • डॉ. मोहन चन्द तिवारी

(12मार्च, 2014 को ‘उत्तराखंड संस्कृत अकादमी’, हरिद्वार द्वारा ‘आईआईटी’ रुडकी में आयोजित विज्ञान से जुड़े छात्रों और जलविज्ञान के अनुसंधानकर्ता विद्वानों के समक्ष मेरे द्वारा दिए गए वक्तव्य ‘प्राचीन भारत में जलविज्ञान‚ जलसंरक्षण और जलप्रबंधन’ के अंतर्गत “सिन्धु सभ्यता के जलप्रबंधन” से सम्बद्ध संशोधित लेख)

वैदिक कालीन मंत्रद्रष्टा ‘सिन्धुद्वीप’ आदि ऋषियों द्वारा की गई जलविज्ञान सम्बन्धी ज्ञान साधना का ही परिणाम था कि भारत में सिन्धु घाटी जैसी विकसित नगर सभ्यता का उदय हुआ.पुरातात्त्विक साक्ष्यों के अनुसार भारतीय जलविज्ञान तथा उससे अनुप्रेरित ‘वाटर हारवेस्टिंग’ प्रणाली का प्राचीन पुरातात्त्विक इतिहास सिन्धु घाटी की सभ्यता के काल यानी पांचवीं सहस्राब्दी ईस्वी पूर्व के बहुत पहले से शुरू हो जाता है. सिन्धु सभ्यता के रूप में प्राप्त हड़प्पा और मोहेनजोदड़ो के अवशेषों से ज्ञात होता है कि यह सभ्यता वैदिक आर्यों की ही सभ्यता थी और अयोध्या के मंत्रद्रष्टा ऋषि और सूर्यवंशी सम्राट सिन्धुद्वीप ने इस सिंधु सभ्यता की स्थापना की थी.

हडप्पा के प्रवेश द्वार के मध्य में स्थित वर्षाजल एवं गंदापानी निकासी हेतु बनी बड़ी नाली के अवशेष की कलात्मक प्रस्तुति

मैंने अपने शोधग्रंथ “अष्टाचक्रा अयोध्या : इतिहास और परंपरा” (उत्तरायण प्रकाशन, दिल्ली, 2006) में नदीमातृक संस्कृति के परिप्रेक्ष्य में इस तथ्य का भी सप्रमाण प्रतिपादन किया है कि ऋग्वैदिक आर्यों का मूल स्थान उत्तराखण्ड हिमालय था. सरयूघाटी की अयोध्या संस्कृति के पुरोधा हिमालय की गिरिकन्दराओं में तपश्चर्या करने वाले वे वसिष्ठ, विश्वामित्र, भरद्वाज आदि ऋषि-मुनि थे जिन्होंने सुदास, दिवोदास आदि भरतगणों  के राजाओं की सहायता से वैदिक कालीन सभ्यता की स्थापना की तथा कालान्तर में इन्हीं भरतजनों के नाम से इस देश का नाम ‘भारतवर्ष’ पड़ा. लगभग आठ हजार वर्ष पूर्व इन भरतगणों ने हिमालय की अति दुर्गम पर्वत घाटियों में विभिन्न नदियों के मूलस्रोतों की खोज करते हुए भगीरथ ने गंगा के उद्गम को ढूँढा, वसिष्ठ ने सरयू की और कौशिक ऋषि ने कोसी की खोज की.

हडप्पा के प्रवेश द्वार के मध्य में स्थित वर्षाजल एवं गंदापानी निकासी हेतु बनी बड़ी नाली के अवशेष

ऋग्वेद में वर्णित हिमालय के सूर्यवंशी आर्यों की ‘भलानस्’ नामक एक शाखा ने 6500 ई.पू. में पाकिस्तान स्थित बोलानपास के निकट मेहरगढ़ की आर्य सभ्यता की स्थापना की. आर्य इतिहास की इसी क्रोनोलौजी के अन्तर्गत अयोध्यावंशी इक्ष्वाकु नरेश ‘सिन्धुद्वीप’ तथा उनके पुरोहित कौशिक ‘विश्वामित्र’ के नेतृत्व में वैदिक आर्यों ने सिन्धु प्रदेश में भी अपना साम्राज्य स्थापित किया था.इसीलिए अयोध्या के सूर्यवंशी चक्रवर्ती राजा  ‘सिन्धुद्वीप’ के नाम से इस सभ्यता को सिन्धु घाटी की सभ्यता के नाम से जाना जाता है.ऐतिहासिक दृष्टि से ‘सिन्धुद्वीप’ ऋषि की पहचान सूर्यवंशी इक्ष्वाकुवंश के 47वीं पीढ़ी में हुए सूर्यवंशी राजा अम्बरीष के पुत्र के रूप में की जा सकती है.

हडप्पा में बने शौचालय हेतु बनी हौदी के अवशेष

सिन्धु घाटी की सभ्यता के लोग अपने दुर्गनगरों का निर्माण वैदिक जल विज्ञान की मान्यताओं के अनुरूप ही किया करते थे. मैं पिछले लेख (भारत की जल संस्कृति-5) में बता चुका हूं कि जलविज्ञान के प्राचीन इतिहास की दृष्टि से वेदों के मंत्रद्रष्टा ऋषियों में ‘सिन्धुद्वीप’ ही सबसे पहले जलविज्ञान के आविष्कारक ऋषि हुए हैं जिन्होंने जल के प्रकृति वैज्ञानिक‚सृष्टि वैज्ञानिक‚ मानसून वैज्ञानिक‚कृषि वैज्ञानिक‚ओषधि वैज्ञानिक तथा दुर्ग वैज्ञानिक महत्त्व को वैदिक संहिताओं के काल में ही उद्घाटित कर दिया था. प्राकृतिक जलचक्र अर्थात् ‘नैचुरल सिस्टम ऑफ हाइड्रोलौजी’ जैसे आधुनिक विज्ञान की अवधारणा का भी सर्वप्रथम आविष्कार सिन्धुद्वीप ऋषि ने किया था.

‘मोहन जोदड़ो’ का विशाल स्नानागार

वैदिक काल में नहरों को खोदने का कार्य युद्धस्तर पर चल रहा था तथा इसी नहर खनन अभियान में सगर की सेना कपिल मुनि के आश्रम तक जा पहुंची और उसका सर्वनाश भी हो गया. तब भी लोकहित की कामना से अयोध्यावंश के तीन नरेशों अंशुमान्‚ दिलीप और भगीरथ ने नदियों का जाल बिछाने का अभियान युद्धस्तर पर जारी रखा. उन्होंने उत्तर भारत की छोटी-मोटी नदियों को विशाल गंगा नदी का आकार देकर उसे समुद्र तक पहुंचाया.सिन्धुद्वीप के राज्यकाल में पश्चिमी समुद्र की ओर सिन्धु नदी को धार देने तथा वहां नदी- मातृक संस्कृति के उपनिवेश स्थापित करने का कार्य अयोध्यानरेश ‘सिन्धुद्वीप’ तथा उनके पुरोहित कौशिक ‘विश्वामित्र’ के नेतृत्व में हुआ. ‘अथर्ववेद’ के ‘विजयप्राप्ति’ सूक्त के 36वें मन्त्र में यह स्पष्ट उल्लेख आया है कि सिन्धुद्वीप राजा को इस विजय अभियान में बहुत धन-सम्पत्ति मिली थी तथा शत्रु की सेना को भी उसने अपने अधीन कर लिया था. इस प्रकार इतिहासकारों और आधुनिक जलवैज्ञानिकों द्वारा उपेक्षित इन सिन्धुद्वीप के वैदिक मन्त्रों में सिन्धु घाटी की सभ्यता और उनके द्वारा नियोजित जल प्रबंधन के अनेक ऐतिहासिक सूत्र हैं जिनसे प्राचीन भारत के जलप्रबंधन के इतिहास को एक नई दिशा मिलती है तथा इतिहास जगत् में विदेशी आर्य आक्रमण से जुड़ी भ्रान्त मान्यताओं का भी इनसे खंडन हो जाता है. सिन्धु घाटी की सभ्यता से जुड़े हड़प्पा, मोहन जोदड़ो, धौलवीरा, लोथल, कालीबंगन आदि ऐसे अनेक नगरों की खुदाई से भारतीय आर्यों के सुनियोजित जल प्रबन्धन व्यवस्था तथा ‘वाटर हारवेस्टिंग’ के जो पुरातात्त्विक अवशेष सामने आए हैं उसने विश्व के विद्वानों को भी अपनी ओर आकृष्ट किया है.  यहां सिन्धु घाटी की सभ्यता से जुड़े जलप्रबन्धन और ‘वाटर हारवेस्टिंग’ की विशेषताओं को दो भागों में प्रस्तुत किया जा रहा है.पहले भाग में हड़प्पा और मोहेनजोदड़ो की जलप्रबन्धन व्यवस्था पर प्रकाश डाला गया है तथा दूसरे भाग में धौलवीरा और लोथल की जल संचयन प्रणालियों की विशेषताओं का खुलासा किया गया है.

‘मोहन जोदड़ो’ का विशाल स्नागार और अन्नभंडार

‘हड़प्पा’ का सुनियोजित जलप्रबंधन

विश्व की प्राचीन नदी घाटी सभ्यताओं में से ‘हड़प्पा’ सभ्यता आर्यों की एक प्रमुख सभ्यता थी . ‘हड़प्पा’ पूर्वोत्तर पाकिस्तान के पंजाब प्रांत का एक पुरातात्विक स्थल है. यह साहिवाल शहर से 20 किलोमीटर पश्चिम में स्थित है. सिन्धु घाटी सभ्यता के अनेक अवशेष यहां से प्राप्त हुए है. 1921 में दयाराम साहनी ने हड़प्पा का उत्खनन किया. सबसे पहले 1927 में ‘हड़प्पा’ नामक स्थल पर उत्खनन होने के कारण ‘सिन्धु सभ्यता’ का नाम ‘हड़प्पा सभ्यता’ पड़ा. यह सभ्यता सिन्धु नदी घाटी में फैली हुई थी इसलिए कालांतर में इसका नाम सिन्धु घाटी सभ्यता रखा गया. हड़प्पा संस्कृति की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण विशेषता थी- इसकी सुनियोजित जलप्रबंधन से युक्त नगर योजना. यहां प्राप्त मकानों के अवशेषों से स्पष्ट होता है कि प्रत्येक ‘मकान’ के बीच में एक ‘आंगन’ होता था, आंगन के चारों ओर चार-पांच बड़े कमरे ‘रसोईघर’ एवं ‘स्नानागार’ होते थे. स्नानागार गली की ओर बने होते थे ताकि जल की निकासी सहज रूप में हो सके. हडप्पा के प्रवेश द्वार के मध्य में स्थित वर्षाजल एवं गंदापानी निकासी हेतु बनी एक बड़ी नाली के अवशेष भी मिले हैं. हडप्पा में स्थित विशाल सार्वजनिक कुएं तथा सार्वजनिक स्नानागार बने थे जहां लोग कपड़े भी धोते थे. यहां शौचालय हेतु बनी हौदी के अवशेष मिले हैं,जहां से मल प्रवाहन के लिए नालियां बनाई गई थी.

ढकी हुई नाली से युक्त ‘मोहन जोदड़ो’ के राजमार्ग

हड़प्पा में एक विशाल दुर्ग की सरंचना के अन्तर्गत बहुत बड़ा सार्वजनिक स्नानागार प्राप्त हुआ है. इसके मध्य में एक सीढ़ीदार आयताकार कुण्ड है. इस कुण्ड के चारों ओर छोटे–छोटे कमरे बने हैं और मध्य भाग में स्नान कुण्ड से युक्त एक विशाल बन्द स्थान भी था. स्नानागार के उत्तर में बीचों-बीच गलियारे से दो भागों में विभक्त एक विशेष प्रकार का भवन मिला है. गलियारे के बीच से पानी बहने के लिए नाली बनी है. भवन के दोनों ओर चार-चार कमरे हैं. रूसी विद्वान् कोरोत्स्काया का मत है कि दुर्ग स्थित यह वास्तुविन्यास धार्मिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण रहा होगा और निजी स्नानगृह से युक्त इन कमरों का प्रयोग सम्भवतः पुरोहितगण आदि विशिष्ट लोग करते होंगे. हड़प्पा तथा मोहन जोदड़ो में स्नानागार भी दो प्रकार के थे एक ऐसे जिनमें सार्वजनिक रूप से स्नान होता था और दूसरे स्नानागार वे जिनमें पुरोहित आदि विशिष्ट लोग स्नान करते थे. हड़प्पाई सार्वजनिक स्नानागारों की यह परम्परा आज भी दक्षिण भारत के मन्दिरों में देखी जा सकती है. कमरों के बीच में बहने वाली जल प्रणाली जिसका दुर्ग के मुख्य भवन से सम्बन्ध था‚ जलरूप में अवस्थित नदीमातृका देवी का प्रतीक हो सकती है. ध्यान रहे वैदिक आर्य नदीमातृक संस्कृति के उपासक रहे हैं और यह नदीमातृका देवी कालान्तर में दुर्गाधिष्ठित होने के कारण ही ‘दुर्गा’ देवी के रूप में उपास्य हो गई. हड़प्पा‚ मोहेनजोदड़ो और कालीबंगन के दुर्गों के सम्बन्ध में यह तथ्य देखने में आया है कि दुर्ग स्वयं नगर के लिए ही नहीं‚ आस-पास की सभी आवासीय बस्तियों के लिए भी जल व्यवस्था के नियोजन का काम करते होंगे.

‘मोहन जोदड़ो’ के निजी विशाल कुएं

‘मोहनजोदड़ो’ के सुनियोजित जलकुंड एवं स्नानागार

‘मोहनजोदड़ो’ विश्व का सबसे  प्राचीन सुनियोजित और जलप्रबंधन की दृष्टि से उत्कृष्ट नगर माना जाता है. इस नगर के अवशेष सिन्धु नदी के किनारे सक्खर ज़िले में स्थित हैं. ‘मोहनजोदड़ो’ शब्द का सिन्धी भाषा में सही उच्चारण ‘मुअन-जो -दड़ो’ है जिसका का अर्थ है ‘मुर्दों का टीला’. इस नगर की पुरातात्त्विक खोज राखालदास बनर्जी ने 1922 ई. में की. माना जाता है कि यह शहर 200 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला था. मुअन-जो-दड़ो में करीब चालीस फुट लम्बा और पच्चीस फुट चौड़ा प्रसिद्ध जलकुंड है, इसकी गहराई सात फुट है. कुंड में उत्तर और दक्षिण से सीढ़ियाँ उतरती हैं. कुंड के तीन तरफ़ साधुओं के कक्ष बने हुए हैं. उत्तर की ओर 2 पंक्तियों में 8 स्नानघर हैं. कुंड में बाहर का अशुद्ध पानी ना आए इसके लिए कुंड के तल में और दीवारों पर ईंटों के बीच चूने और चिरोडी के गारे का इस्तेमाल हुआ है. दीवारों में डामर का प्रयोग किया गया है. कुंड में पानी की व्यवस्था के लिये दोहरे घेरे वाला कुआँ बनाया गया है. कुंड से पानी बाहर निकालने के लिए पक्की ईंटों से नालियाँ भी बनाई गयी हैं, और खास बात यह है की इसे पक्की ईंटों से ढका गया है. हड़प्पा के दुर्ग में छः अनाज रखने के भंडार भी मिले हैं जो ईंटों के चबूतरे पर दो पांतों में खड़े हैं और नदी के किनारे से कुछेक मीटर की दूरी पर हैं. फर्श की दरारों में गेहूँ और जौ के दाने मिले हैं. इससे प्रतीत होता है कि इन चबूतरों पर फ़सल की दबनी होती थी. इससे यह प्रमाणित होता है कि ‘मोहनजोदड़ो’ के लोग उच्च कोटि के जलप्रबंधन में सिद्धहस्त थे.

‘मोहन जोदड़ो’ के विशाल कुएं

इस शोधलेख की प्रस्तुति में मुझे मेडिसन स्थित विस्कन्सिन यूनिवर्सिटी के प्रो. जोनाथन मार्क केनोयर द्वारा लिखी गई पुस्तक ‘एंशियेंट सिटी ऑफ द इन्डस वैली सिविलाइजेशन’ के पुरातात्त्विक चित्रों से विषय को समझाने में विशेष मदद मिली है तदर्थ उनका विशेष आभार प्रकट करता हूं.

आगामी लेख में पढ़िए- “सिन्धु सभ्यता के ‘धौलवीरा’ और ‘लोथल’ नगरों का जलप्रबंधन”

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज से एसोसिएट प्रोफेसर के पद से सेवानिवृत्त हैं. एवं विभिन्न पुरस्कार व सम्मानों से सम्मानित हैं. जिनमें 1994 में ‘संस्कृत शिक्षक पुरस्कार’, 1986 में ‘विद्या रत्न सम्मान’ और 1989 में उपराष्ट्रपति डा. शंकर दयाल शर्मा द्वारा ‘आचार्यरत्न देशभूषण सम्मान’ से अलंकृत. साथ ही विभिन्न सामाजिक संगठनों से जुड़े हुए हैं और देश के तमाम पत्र—पत्रिकाओं में दर्जनों लेख प्रकाशित।)

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