Author: Himantar

हिमालय की धरोहर को समेटने का लघु प्रयास
प्राचीन भारत में मेघविज्ञान और बादलों के प्रकार

प्राचीन भारत में मेघविज्ञान और बादलों के प्रकार

जल-विज्ञान
भारत की जल संस्कृति-14डॉ. मोहन चंद तिवारी(7 फरवरी, 2013 को रामजस कालेज, ‘संस्कृत परिषद्’ द्वारा आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी ‘प्राचीन भारत में जलवायु विज्ञान’ के अंतर्गत मेरे द्वारा दिए गए वक्तव्य “प्राचीन भारत में मेघविज्ञान” का संशोधित लेख)भारत प्राचीन भारतीय मेघविज्ञान का इतिहास भी अन्य विज्ञानों की भांति वेदों से प्रारम्भ होता है.because वैदिक संहिताओं के काल में इस मेघवैज्ञानिक मान्यता का ज्ञान हो चुका था कि पृथिवी या समुद्र का जो जल सूर्य द्वारा तप्त होकर वाष्प के रूप में ऊपर अन्तरिक्ष में जाता है वही जल मेघों के रूप में नीचे पृथिवी में बरसता है. आधुनिक जलविज्ञान इस वाष्पीकरण और जलवृष्टि की प्रक्रिया को ‘हाइड्रोलौजिकल साइकल’ अर्थात् ‘जलचक्र’ की संज्ञा प्रदान करता है- “समानमेतदुदकमुच्चैत्यव चाहभिः. भूमि पर्जन्या जिन्वन्ति दिवं जिन्वन्त्यग्नयः..”            - ऋग्वेद, 1.1...
बिखरी हुई कांग्रेस को जब महामना ने पुनर्जीवित किया

बिखरी हुई कांग्रेस को जब महामना ने पुनर्जीवित किया

इतिहास
पितृपक्ष में पुण्यात्मा महामना मदन मोहन मालवीय जी का पुण्यस्मरण!डॉ. मोहन चंद तिवारीआजादी से पहले कांग्रेस पार्टी में एक ऐसा भी दौर आया था, जब अंग्रेजों की कूटनीतिक चाल के कारण कांग्रेस के नेता बुरी तरह से बिखरकर तीन-चार खेमों में बँट चुके थे.अंग्रेज हुक्मरान 'फूट डालो राज करो' की रणनीति के तहत कांग्रेस को कमजोर करना चाहते थे. उस समय काग्रेस अधिवेशन में कोई आशा नहीं रह गयी थी कि बिखरे हुए नेतागण अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ कुछ कर सकेंगे. भारत की आजादी के समर्थक और कांग्रेस पार्टी में हिन्दू विचारों के प्रबल पक्षधर महामना मदनमोहन मालवीय जी,यह बात ताड़ गये कि कांग्रेसी नेताओं के इस वैचारिक मतभेद के कारण अंततोगत्वा अंग्रेजों का षड्यंत्र ही सफल होने वाला था. अतः मालवीय जी अधिवेशन के बीच में ही चुपके से खिसक गए और एक कमरे में तीन बार आचमन लेकर, शांत और ध्यानस्थ मुद्रा में बैठ गए. उन्हें अ...
अक्ल की महिमा

अक्ल की महिमा

किस्से-कहानियां
कहानीफकीरा सिंह चौहान ‘स्नेही’एक बार एक बालक ने अपनी मां से पूछा “मां”  तुम क्यों रो रही हो? मां ने बड़े करूण भाव से कहा, “बेटा तू अभी नादान है. तू मेरे हृदय की पीड़ा को अभी महसूस नहीं कर सकता है. "बालक ने अनायास ही पूछा, “आखिर क्यों मां?” मां ने स्नेह पूर्वक कहा, 'बेटा तूझे अभी  अच्छे बुरे का ज्ञान नहीं है, क्योंकि तेरे अंदर अभी अक्ल पैदा नहीं हुई है.” जिज्ञासावंश बालक ने पूछा, “अक्ल  कहां से पैदा होती है मां?”  माता निरुत्तर हो गई. बालक की जिज्ञासा इस प्रश्न के प्रति बढ़ती गई कि आखिर अक्ल कहां से पैदा होती है? एक दिन बालक अचानक राजा के बगीचे में चला गया. जहां राजा सुबह के समय भ्रमण हेतु आया करता था. बालक ने नम्रता पूर्वक राजा से पूछा, "महाराज!  आप हमारे राजा है. आपके पास हर समस्या का समाधान है तथा हर प्रश्न का उत्तर है. यदि आज्ञा हो तो मैं एक प्रश्न पूछूं? राजा ने कहा , अवश्य ...
बदलाव को लेकर हम परेशान व चिंतित क्यों…

बदलाव को लेकर हम परेशान व चिंतित क्यों…

योग-साधना
परिवर्तन प्रकृति का शाश्वत नियम है...डॉ. दीपा चौहान राणाबदलाव प्रकृति का शाश्वत नियम है, यह एक ऐसा विषय जिसके कई बदलाव, बदलना, बदल जाना आदि शब्दों को लेकर कई लोग शिकायत करते हैं, शिकायत  ही नहीं बल्कि चिंतित व परेशान भी रहते हैं. रिश्तों में भी खास शिकायत होती है कि वो बदल गया है. अब वो पहले जैसा नहीं रहा. मेरे पापा, मम्मी, पति, पत्नी सब पहले जैसे नहीं रहे अब वो बदल चुके हैं. कुछ इसी तरह की शिकायत हम सभी को किसी ना किसी से हो सकती है, जिस वजह से हमारे रिश्तों में दरारें आने लगती हैं क्यूंकि हमें बदलाव और बदलना पसंद नहीं है. जो जैसा है, हम उसे वैसा ही देखने के आदी हो गये हैं. मुझे आश्चर्य होता है कि हम बदलाव को स्वीकार क्यों नहीं कर पाते है, जबकि बदलाव तो प्रकृति का शाश्वत नियम है.  यह प्रकृति का स्वभाव है. बिना बदले किसी भी चीज की कल्पना मात्र भी धोखा है. सभी प्रकृतिवादियों में म...
संकट में है आज हिमालय पर्यावरण

संकट में है आज हिमालय पर्यावरण

पर्यावरण
‘हिमालय दिवस’ (9 सितम्बर) पर विशेषडॉ. मोहन चंद तिवारीआज हिमालय दिवस है.पिछले कुछ वर्षों से देश भर में, खासकर उत्तराखण्ड और हिमाचल प्रदेश में 9 सितम्बर को ‘हिमालय दिवस’ मनाया जा रहा है. हिमालय दिवस की शुरुआत 9 सितंबर,2010 को हिमालय पर्यावरण को समर्पित जाने माने पर्यावरणविदों सर्वश्री सुन्दर लाल बहुगुणा, सुरेश भाई, राजेन्द्र सिंह,पद्मश्री डॉ.अनिल प्रकाश जोशी आदि द्वारा की गई थी. इन पर्यावरणविदों का एक मंच पर आना इसलिए हुआ था कि तब सरकारें हिमालय पर्यावरण के संरक्षण व विकास को लेकर नाकाम ही साबित हो रही थी. ये पर्यावरणविद् सम्पूर्ण हिमालय में हिमालय दिवस के माध्यम से ऐसी जन चेतना जागृत करने के लिए एक मंच पर आए थे ताकि हिमालय के प्राकृतिक संसाधनों और उसकी जैव विविधता की रक्षा की जा सके.'हिमालय दिवस' मनाने से अति संवेदनशील हिमालय पारिस्थितिकी और पर्यावरण का कुछ भला हुआ होता तो इ...
 जहां विश्वास है, वहां प्यार है!

 जहां विश्वास है, वहां प्यार है!

संस्मरण
बुदापैश्त डायरी-12डॉ. विजया सतीविदेश में हम अपनी भाषा भी पढ़ाते हैं और अपने देश से भी परिचित कराते हैं – क्योंकि आखिरकार तो देश की पूरी तस्वीर देनी है हमें ! जैसे हमारा अध्यापन अपने देश के परिचय से जुड़ा रहता है, because उसी तरह दूसरे देश का पूर्ण परिचय भी हमारा लक्ष्य होता है. बहुत सी बातें दोनों देशों में समान–असमान होकर भी एक-दूसरे से जुड़ने में मदद करती हैं. जैसे हमारे देश की खासियतें वैसे ही हंगरी की भी. तो हंगरी की कहानी कुछ खासियतों के उल्लेख बिना अधूरी रहेगी ..ज्योतिष बुदापैश्त के पास ही है सेंत ऐंद्रे ...पर्वतों से घिरा, नदी किनारे का शांत प्रांत, जहां पथरीली पतली पत्थर गलियाँ हैं, कलाकारों की बस्ती है, कलावीथियां और संग्रहालय हैं. यहाँ पहुँचने के लिए because नदी के रास्ते या ट्रेन सेखूबसूरत सफ़र करते हैं, यहां ऐतिहासिक इमारतें, चर्च और रंग भरे बाज़ार हैं ! अपने देश से...
‘सरूली’ जो अब नहीं रही

‘सरूली’ जो अब नहीं रही

संस्मरण
मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—48प्रकाश उप्रेतीअविष्कार, आवश्यकता की उपज है. इस उपज का इस्तेमाल मनुष्य पर निर्भर करता है. पहाड़ के लोगों की निर्भरता उनके संसाधनों पर है. आज अविष्कार और आवश्यकता की उपज “थेऊ” because और “सरूली” की बात. 'थेऊ' पहाड़ के जीवन का अनिवार्य हिस्सा है. खासकर गाय-भैंस पालने वाले लोगों के लिए तो इसका जीवनदायिनी महत्व है. ईजा के 'छन' का तो यह, महत्वपूर्ण सदस्य था. ज्योतिष 'थेऊ' मतलब लकड़ी का एक ऐसा because प्याऊ जिसके जरिए नवजात बछड़े और 'थोरी' (भैंस की बच्ची) को दूध व तेल पिलाया जाता था. बांस की लकड़ी का बना यह प्याऊ अपनी लंबाई और गहराई में छोटा-बड़ा होता था. अंदर से खोखला और आगे से तराश कर पतला व  थोड़ा समतल बनाया जाता था ताकि तेल- दूध गिरे भी न और थोरी के मुँह में भी आ जाए. ज्योतिषईजा का 'गुठयार' (गाय-भैंस बांधने वाली जगह) भैंस के बिना कभी नहीं रहा. ईज...
पुत्र अपने कुल को ही तारता है, पुत्रियां दो-दो कुलों को तारतीं हैं

पुत्र अपने कुल को ही तारता है, पुत्रियां दो-दो कुलों को तारतीं हैं

साहित्‍य-संस्कृति
डॉ. मोहन चंद तिवारी  पितृपक्ष के अवसर पर प्राय: यह जिज्ञासा प्रकट की जाती है कि श्राद्ध का अधिकार किस किस को है? क्या पुत्र के अतिरिक्त पुत्री या पत्नी को भी श्राद्ध करने का अधिकार है या नहीं? कुछ पितृसत्तात्मक परंपरागत समाजों में स्थानीय मान्यताओं के कारण केवल पुत्र को या पुरुष को ही श्राद्ध का अधिकारी माना जाता है, पुत्री या स्त्री को नहीं. परन्तु इस सम्बंध में धर्मशास्त्रकार हेमाद्रि के अनुसार मुख्य नियम यह है कि पिता का श्राद्ध पुत्र को करना चाहिए. पुत्र न हो तो पत्नी श्राद्ध करे. पत्नी के अभाव में सहोदर भाई और उसके अभाव में सपिंडों को श्राद्ध करना चाहिए- “पितु: पुत्रेण कर्तव्या पिण्डदानोदकक्रिया. पुत्राभावे तु पत्नी स्यात् पत्न्याभावे तु सोदर:॥”‘श्राद्धकल्पलता’ में मार्कंडेयपुराण के द्वारा दी गई व्यवस्था के अनुसार भी पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र, पुत्रिका का पुत्र (दौहित्र), पत्नी...
‘गो-बैक मेलकम हैली’ ‘भारत माता की जय’

‘गो-बैक मेलकम हैली’ ‘भारत माता की जय’

इतिहास
6 सितम्बर, 1932 पौड़ी क्रान्ति के नायक-  जयानन्द ‘भारतीय’डॉ. अरुण कुकसालहाथ में तिरंगा उठा, नारे भी गूंज उठे,  भाग चला, लाट निज साथियों की रेल में, जनता-पुलिस मध्य, शेर यहां घेर लिया, वीर जयानन्द, चला पौड़ी वाली जेल में. - शान्तिप्रकाश ‘प्रेम’ ‘मैं वीर जयानन्द ‘भारतीय’ का शुक्रिया अदा करता हूं कि उसने मुझे जान से नहीं मारा’. सर विलियम मेलकम हैली ने ये बात पौड़ी से बच निकलने के बाद कही थी. किस्सा, देश की स्वाधीनता से पूर्व सविनय अवज्ञा आन्दोलन के दौर का है. इस आंदोलन के विरोध स्वरूप अंग्रेजों के पिठ्ठू संगठन ‘अमन सभा’ ने 6 सितम्बर, 1932 को पौड़ी में तत्कालीन संयुक्त प्रांत के वायसराय मेलकम हैली का सम्मान समारोह आयोजित किया था. इस कार्यक्रम के प्रति स्थानीय लोगों में गुस्सा तो था परन्तु वे सामने विरोध करने का साहस नहीं जुटा पा रहे थे. ऐसे समय में देश की आजादी के सच्चे सिपाही की भूम...
अनाज भंडारण की अनूठी परम्परा है कोठार

अनाज भंडारण की अनूठी परम्परा है कोठार

उत्तराखंड हलचल
आशिता डोभालकोठार यानी वह गोदाम जिसमें अनाज रखा जाता है, अन्न का भंडारण का वह साधन जिसमें धान, गेंहू, कोदू, झंगोरा, चौलाई या दालें सालों तक रखी जा सकती है. कोठार में रखे हुए इन धनधान्य के खराब होने की संभावना न के बराबर होती है. कोठार को पहाड़ी कोल्ड स्टोर के नाम से जाना जाता है, जिसमें धान, गेंहू, कोदू, झंगोरा, चौलाई या दालें सुरक्षित रखी जाती है. कोठार अथवा कुठार जो कि मुख्यतः देवदार की लकड़ी के बने होते हैं और ये सिर्फ भंडार ही नहीं हमारी संस्कृति के अभिन्न अंग भी रहे हैं, इस भंडार में हमारे बुजुर्गों ने कई पीढ़ियों तक अपने अनाजों और जरूरत के सारे साजो-सामान रखे हैं. ये दिखने में जितने आकर्षक होते हैं उतने ही फायदेमंद भी. पहाड़ों में पुराने समय में लोग सिर्फ खेती किसानी को ही बढ़ावा देते थे और उसी खेती किसानी के जरिए उनकी आमदनी भी होती थी वस्तु विनिमय का जमाना भी था तो लोग बाज़ार और...