November 29, 2020
पर्यावरण

संकट में है आज हिमालय पर्यावरण

‘हिमालय दिवस’ (9 सितम्बर) पर विशेष

  • डॉ. मोहन चंद तिवारी

आज हिमालय दिवस है.पिछले कुछ वर्षों से देश भर में, खासकर उत्तराखण्ड और हिमाचल प्रदेश में 9 सितम्बर को ‘हिमालय दिवस’ मनाया जा रहा है. हिमालय दिवस की शुरुआत 9 सितंबर,2010 को हिमालय पर्यावरण को समर्पित जाने माने पर्यावरणविदों सर्वश्री सुन्दर लाल बहुगुणा, सुरेश भाई, राजेन्द्र सिंह,पद्मश्री डॉ.अनिल प्रकाश जोशी आदि द्वारा की गई थी. इन पर्यावरणविदों का एक मंच पर आना इसलिए हुआ था कि तब सरकारें हिमालय पर्यावरण के संरक्षण व विकास को लेकर नाकाम ही साबित हो रही थी. ये पर्यावरणविद् सम्पूर्ण हिमालय में हिमालय दिवस के माध्यम से ऐसी जन चेतना जागृत करने के लिए एक मंच पर आए थे ताकि हिमालय के प्राकृतिक संसाधनों और उसकी जैव विविधता की रक्षा की जा सके.

‘हिमालय दिवस’ मनाने से अति संवेदनशील हिमालय पारिस्थितिकी और पर्यावरण का कुछ भला हुआ होता तो इस उत्तराखंड हिमालय में पिछले कई सालों से लगातार बार-बार भूस्खलन,भूकम्प,अतिवृष्टि, बादल फटने की प्राकृतिक आपदाएँ क्यों घटित होतीं?

तब से लेकर उत्तराखण्ड सहित अन्य हिमालयी राज्यों की सरकारें भले ही पूरे साल जल-जंगल-ज़मीन का बेरहमी से दोहन करते हुए कभी सड़क चौड़ीकरण के नाम पर तो कभी बिजली की आपूर्ति के बहाने टिहरी जैसे पर्यावरण विरोधी बांधों की योजनाएं बनाती आई हैं, लेकिन दिखावे के लिए हर वर्ष 9 सितम्बर को ‘हिमालय दिवस’ मनाकर वे अपना हिमालय प्रेम प्रकट करना भी नहीं भूलती हैं.

सोचने की बात यह है कि यदि ‘हिमालय दिवस’ मनाने से अति संवेदनशील हिमालय पारिस्थितिकी और पर्यावरण का कुछ भला हुआ होता तो इस उत्तराखंड हिमालय में पिछले कई सालों से लगातार बार-बार भूस्खलन,भूकम्प,अतिवृष्टि, बादल फटने की प्राकृतिक आपदाएँ क्यों घटित होतीं? ‘हिमालय दिवस’ के मनाने से हिमालय में बसने वाले नागरिकों,प्राकृतिक आपदाओं से पीड़ित वहां की बेहाल जनता, वहां के जल, जंगल, जमीन और वहां के वन्यजीवों को अब तक यदि कोई लाभ नहीं पहुँचा है,तो इस ‘हिमालय दिवस’ को सरकारी तौर पर मनाने का कोई खास औचित्य नहीं रह जाता है.

उत्तराखण्ड राज्य सहित आज समूचे हिमालयीय राज्य जम्मू-कश्मीर, हिमाचल, देश के अन्य पूर्वोत्तरी राज्य हिमालय पर्यावरण के साथ जिस तरह की बदसलूकी कर रहे हैं,वह समस्त पर्यावरणवादियों के लिए गम्भीर चिंता का विषय बना हुआ है,मगर उत्तराखण्ड हिमालय में स्थिति अन्य राज्यों की अपेक्षा ज्यादा ही नाज़ुक बनी हुई है. पर्यावरण को ताक पर रखते हुए जितनी निर्ममता के साथ उत्तराखंड राज्य में सड़क चौड़ीकरण,जंगलों को ढहाने, जल-विद्युत् प्रोजेक्ट्स और बाँध बनाए जाने की योजनाएं  चल रही हैं उतनी निर्ममता अन्य राज्यों जम्मू-कश्मीर, हिमाचल, सिक्किम, अरुणाचल और पूर्वोत्तर के राज्यों में दिखाई नहीं देती है. इन जल,जंगल और जमीन से जुड़ी विनाशकारी योजनाओं के कारण ही आज यह प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर उत्तराखंड हिमालय वहां के निवासियों के लिए एक सुरक्षित राज्य नहीं रहा. सालों साल जंगलों में आग लगने की घटनाएं हों या फिर बाढ़ और भूस्खलन की आपदाएं, राज्य का आपदा प्रबंधन नदारद ही रहता है.जो कुछ बचाव और राहत का काम होता है तो सीमावर्ती आईटीबीपी के सुरक्षा कर्मियों द्वारा ही संभव हो पाता है.

आज हिमालय दिवस पर कुछ प्रश्नों पर गम्भीरता से विचार करने की जरूरत है. वे प्रश्न हैं क्या विकास कार्य के लिए बड़े-बड़े बाँधों के स्थान पर छोटे छोटे बाँध नहीं बनाए जा सकते? क्या इनके बनाने में विश्व बाँध आयोग की शर्तों का पालन नहीं किया जा सकता? क्या सड़कों के चौड़ीकरण के लिए भीमकाय जेसीबी मशीनों के स्थान पर छोटे छोटे उपकरणों की सहायता से बेरोजगार लोगों को सड़क खोदने के काम पर नहीं लगाया जा सकता?

गौरतलब है कि पिछले छह-सात वर्षों में हुई केदारनाथ घाटी एवं कश्मीर हिमालय के जलप्रलय की त्रासदियां इतनी भयंकर और दिल दहलाने वाली थीं, जिनमें हजारों लोगों की मृत्यु हो गई तथा अरबों-खरबों की सम्पत्ति देखते-देखते नष्ट हो गई.भूकम्प, भूस्खलन,सूखा,अतिवृष्टि,अनावृष्टि आदि छोटी-मोटी प्राकृतिक आपदाओं के पिछले एक दशक के रिकार्ड बताते हैं कि अंधाधुंध विकास के कारण आज हिमालय प्रकृति तनाव के दौर से गुजर रही है. ज्यादा दूर न भी जाएं, पिछले पांच-छह वर्षों के दौरान जलवायु परिवर्तन की वजह से बादल फटने, भूस्खलन,पहाड़ों के खिसकने आदि के कारण कुमाऊं और गढ़वाल के इलाकों में जो बड़ी संख्या में जान माल का नुकसान हुआ,भूस्खलन में सैंकड़ों मकान तबाह हो गए,सड़कें गायब हो गई, पुल टूट गए किन्तु राज्य प्रशासन इन आपदाग्रस्त इलाकों में तुरंत राहत पहुंचाने में लाचार ही नजर आया क्योंकि राज्य के पास आपदाग्रस्त क्षेत्रों में राहत पंहुचाने की दूरदृष्टि और कार्ययोजना का सर्वथा अभाव रहा है. गढ़वाल के इलाकों में जब भी भारी वर्षा होती है तो अलकनंदा, सरयू,मंदाकिनी समेत राज्य की अधिकांश नदियां खतरे के निशान के ऊपर बहने लगती हैं. तब हर साल ऋषिकेश-बद्रीनाथ नेशनल हाईवे पर नंदप्रयाग व बद्रीनाथ के बीच कई स्थानों पर चट्टानें गिरने लगती हैं जिससे हाईवे बंद हो जाता है,नदी पर जगह-जगह बने अस्थायी पुल बहने लगते हैं.ये हालात जो छह-सात वर्ष पहले हुआ करते थे,आज भी ज्यों की त्यों बने हुए हैं. इन आपदाओं से राहत दिलाने की स्थायी योजना न राज्य सरकार के पास है और न ही केंद्र सरकार के पास.

यह कैसी विडंबना है कि आजादी मिलने के 72 वर्षों के बाद भी न तो केंद्र सरकार और न ही राज्य सरकारें हिमालय के पर्वतों, हिमनदों, नदियों, जलागम क्षेत्रों, वनों, कृषि जोतों और चकबन्दी, गूलों-कूलों-नहरों, सिंचाई, बागवानी, मत्स्यपालन, पशुपालन, वन्य-जीवों और वर्षाजल प्रबन्धन, इत्यादि को लेकर हिमालय पर्यावरण को बचाने की कोई राष्ट्रीय नीति ही नहीं बन पाई हैं, जिससे कि बार बार प्रकट हो रहे हिमालय पर्यावरण के खतरों से निपटा जा सके.

विकासवाद की योजनाओं को अमली जामा पहनाने की नीयत से कहीं बाँध बनाने के लिये बारूद बिछाकर पहाड़ों के भीतर सुरंगें बिछाई जा रही हैं,तो कहीं पहाड़ों का सीना चीरकर विकास के नाम पर सड़कें खोदी जा रही हैं. सरकारों के द्वारा आधुनिक विकास के लिये ऐसा करना आवश्यक बताया जा रहा है, किन्तु जब इन प्रकृति विरोधी विनाशकारी गतिविधियों से पहाड़ के पहाड़ दरकने लगते हैं,जंगलों के नष्ट होने से जल के स्रोत सूखने लगते हैं तो ये सरकारें इन आपदाओं को प्राकृतिक प्रकोप बताकर बहुत सफाई से अपना पल्ला भी झाड़ लेती हैं.

आज हिमालय दिवस पर कुछ प्रश्नों पर गम्भीरता से विचार करने की जरूरत है. वे प्रश्न हैं क्या विकास कार्य के लिए बड़े-बड़े बाँधों के स्थान पर छोटे छोटे बाँध नहीं बनाए जा सकते? क्या इनके बनाने में विश्व बाँध आयोग की शर्तों का पालन नहीं किया जा सकता? क्या सड़कों के चौड़ीकरण के लिए भीमकाय जेसीबी मशीनों के स्थान पर छोटे छोटे उपकरणों की सहायता से बेरोजगार लोगों को सड़क खोदने के काम पर नहीं लगाया जा सकता? ताकि पहाड़ों को निर्ममता से तोड़े और फोड़े बिना उनके पर्यावरण की रक्षा की जा सके और स्थानीय लोगों को भी इन विकास योजनाओं के माध्यम से रोजगार मिल सके.

आज हमारे देश के वैज्ञानिक एक ओर चांद पर पानी की खोज के लिए चंद्रमा के पास चंद्रयान भेज रहे हैं किंतु दूसरी ओर भूगर्भ विज्ञान से अनभिज्ञ पहाड़ के आधुनिक जल अभियंता इतना पारम्परिक जलविज्ञान के सिद्धांत भी नहीं जानते हैं कि हिमालय से केवल नदियों के स्रोत ही नहीं फूटते,बल्कि वहां के पहाड़ों की चट्टानों में जल के अत्यंत संवेदनशील विशाल सरोवर भी विद्यमान हैं,जिनसे उत्तराखंड के नौलों और झरनों को सारा साल जलनाडियों के माध्यम से जल उपलब्ध होता है. किन्तु उत्तराखंड राज्य बनने के बाद जब से सड़क निर्माता ठेकेदारों द्वारा जेसीटी की भारी भरकम मशीनों से पहाड़ों को बेरहमी से तोड़ने फोड़ने का सिलसिला शुरू हुआ तब से उत्तराखंड के नौले,धारों और गधेरों में प्राकृतिक जलस्रोत सूखते ही गए हैं.प्राचीन और आधुनिक जलविज्ञान की मान्यताओं के अनुसार पहाड़ों और चट्टानों में भूकम्प या विस्फोट अथवा भारी भरकम मशीनों से जब जरूरत से ज्यादा कम्पन होता है तो वहां विद्यमान भूमिगत जलस्रोत भी नष्ट हो जाते हैं.यही कारण है कि पहाड़ों में जब चौड़ी कंक्रीट की सड़के नहीं थीं,वहां प्रचुर मात्रा में जलस्रोत बहा करते थे किन्तु जैसे जैसे वहां पर्यावरण नीतियों के विरुद्ध बेतरतीब सड़कों का जाल बिछता गया वहां के जलस्रोत,नौले ,तालाब भी सूखते गए.

वर्त्तमान जलसंकट और प्राकृतिक आपदाओं के दौर में ‘हिमालय दिवस’ के मौके पर भारत सरकार और यहां की राज्य सरकारों से यह सवाल भी पूछा जाना चाहिए कि जब दुनिया के अनेक देशों में पर्वतों, नदियों और वनों के संरक्षण के नैसर्गिक अधिकार हो सकते हैं तो हिमालय पर्वत और वहां से निकलने वाली नदियों को उनके मौलिक अधिकार क्यों नहीं मिल सकते? विश्व पर्यावरण की रक्षा हेतु तत्पर सबसे अधिक हिम का संरक्षण करने वाले हिमालय के साथ ऐसा दुर्व्यवहार क्यों?

ठेकेदारों द्वारा प्रायः सड़क को चौड़ा करते समय निकलने वाले गाद और चट्टानों के मलबे को सड़क पर बिछाने के बजाय नदियों में बहा दिया जाता है. इसकी वजह से भी नदियों का अविरल और निर्मल प्रवाह प्रदूषित और बाधित हुआ है.आज हिमालय को बचाना है तो पहाड़ों और नदियों को इन जेसीटी मशीनों के अत्याचार से बचाने की सख्त जरूरत है.

वर्त्तमान जलसंकट और प्राकृतिक आपदाओं के दौर में ‘हिमालय दिवस’ के मौके पर भारत सरकार और यहां की राज्य सरकारों से यह सवाल भी पूछा जाना चाहिए कि जब दुनिया के अनेक देशों में पर्वतों, नदियों और वनों के संरक्षण के नैसर्गिक अधिकार हो सकते हैं तो हिमालय पर्वत और वहां से निकलने वाली नदियों को उनके मौलिक अधिकार क्यों नहीं मिल सकते? विश्व पर्यावरण की रक्षा हेतु तत्पर सबसे अधिक हिम का संरक्षण करने वाले हिमालय के साथ ऐसा दुर्व्यवहार क्यों? क्या हममें यह पर्यावरण वैज्ञानिक सोच जागृत नहीं होनी चाहिए कि हजारों हिमनद, सैकड़ों नदियों और अनगिनत ताल,सरोवरों को जल की आपूर्ति करने वाला हिमालय ग्लोबल वार्मिंग के खतरों से सदा बचा रहे, ताकि करोड़ों,अरबों और खरबों जीवधारियों का जीवन सुरक्षित रह सके?आज भयावह स्थिति यह हो गई है कि हिमालय पर्यावरण के सरोकारों को लेकर जो भी राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय स्तर की पर्यावरणवादी संस्थाएं  चिन्तित हैं,केंद्र सरकार और देश के भीतर हिमालयी राज्यों की सरकारें उन चिंताओं के प्रति ज्यादा गम्भीर नहीं हैं.

हिमालय दिवस मनाने की सार्थकता तो तब ही सिद्ध हो पाएगी जब हिमालय की स्थानीय पर्यावरण पारिस्थितिकी के अनुकूल और मानव संवेदी दीर्घकालिक नीतियां बनें. इसके लिये दीर्घकालिक ऐसी नीतियां बनाने की आवश्यकता है, जिनमें इसके पर्वतों, हिमनदों,नदियों,वनों,जलागम क्षेत्रों, वन्य जन्तुओं और वनस्पतियों और यहां के निवासियों के संरक्षण और संवर्धन का संकल्प निहित हो.

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम’ (यूएनईपी) की एक रिपोर्ट के अनुसार हिमालय क्षेत्र के हिम ग्लेशियर जिस तेजी से पिघल रहे हैं उसके कारण 21वीं सदी के अन्त तक भारत और पड़ोसी देशों की नदियां पानी न मिलने के कारण सूख जाएंगीं. इसलिए आज हिमालय के पर्यावरण की रक्षा को राष्ट्रधर्म की अपेक्षा से प्रमुख वरीयता देने की  आवश्यकता है.

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम’ (यूएनईपी) की एक रिपोर्ट के अनुसार हिमालय क्षेत्र के हिम ग्लेशियर जिस तेजी से पिघल रहे हैं उसके कारण 21वीं सदी के अन्त तक भारत और पड़ोसी देशों की नदियां पानी न मिलने के कारण सूख जाएंगीं. इसलिए आज हिमालय के पर्यावरण की रक्षा को राष्ट्रधर्म की अपेक्षा से प्रमुख वरीयता देने की  आवश्यकता है. आज हिमालय के बिगड़ते पर्यावरण को यदि बचाना है तो भारत सरकार के पर्यावरण मंत्रालय ने सन् 2009 में ‘गवर्नेंश फॉर सस्टेनिंग हिमालयन इको सिस्टम-गाइडलाइन्स एण्ड बैस्ट प्रैक्टिसिज’ की जो पर्यावरण सम्बन्धी आचारसंहिता का प्रारूप तैयार किया था उसे केन्द्र सरकार द्वारा उत्तराखण्ड सहित सभी हिमालयीय राज्यों में तुरन्त लागू करने की आवश्यकता है ताकि विकास और पर्यावरण के मध्य संतुलन कायम किया जा सके और उत्तराखण्ड हिमाचल प्रदेश तथा जम्मू और कश्मीर के हिमालयीय राज्यों को भविष्य में होने वाली भूस्खलन,जलप्रलय जैसी भयंकर प्राकृतिक आपदाओं की त्रासदी से बचाया जा सके.

जहां तक हिमालय दिवस के अवसर पर पलायन,आजीविका,आर्थिक विकास से जुड़े जरूरी मुद्दे हैं,उसके लिए भी राज्य सरकार की अन्धविकासवादी एवं पर्यावरण विरोधी योजनाएं मुख्य रूप से जिम्मेदार हैं. उत्तराखण्ड राज्य की आर्थिक बदहाली का आज यह हाल है कि पहाड़ के अधिकांश मूल निवासी खेती-बाड़ी के बंजर हो जाने से अपने घरों में ताला लगाकर रोजगार की तलाश में मैदानों की ओर लगातार पलायन कर रहे हैं. उत्तराखण्ड राज्य के गठन के बाद पिछले 20 वर्षों में अनेक राज्य सरकारों ने चाहे वह किसी की पार्टी की हो, हिमालय के प्राकृतिक संसाधनों की लूट-खसोट मचाने वाली पर्यावरण विरोधी योजनाओं को जो राजनैतिक संरक्षण प्रदान किया उसी का परिणाम है कि पहाड़ के पर्यावरण मित्र परम्परागत उद्योग धन्धे तथा आजीविका के साधन लुप्त होते जा रहे हैं और विकास के नाम पर हिमालय पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने वाले उद्योगों को पर्यावरण के नियमों की अनदेखी करते हुए विशेष प्रोत्साहन दिया जा रहा है.अंधाधुन्ध वनों की कटाई, डायनामाइट विस्फोट से हिमालय की गिरि कन्दराओं की तोड़-फोड़ तथा विशालकाय बांधों की पर्यावरण विरोधी योजनाओं से समूचे हिमालय पर्यावरण की पारिस्थिकी निरन्तर रूप से बिगड़ती जा रही है तथा ग्लोबल वॉर्मिंग का राक्षस हिमालय के ग्लेशियरों को लील जाना चाहता है.

दरअसल, साल में एक दिन हिमालय दिवस मनाने से कुछ नहीं होगा. देवतात्मा हिमालय की रक्षा करनी है तो हर दिन हिमालय दिवस मनाने की जरूरत है.हिमालय को बचाने के लिए प्रतिदिन पर्यावरण संरक्षण की मुहिम  चलानी होगी.यह काम सर्वप्रथम हिमालय के पर्वतों, हिमनदों,नदियों,जलागम क्षेत्रों और वनों के नैसर्गिक अधिकारों को संरक्षण देने की नीतियों को लागू करने से ही संभव होगा.

अन्त में कहना चाहुंगा कि आज हिमालय को उसके गौरवशाली अतीत से जोड़ने की जरूरत है,जिसकी कल्पना स्कन्दपुराण के ‘मानसखंड’ में महर्षि दत्तात्रेय ने एक पर्यावरण नियंता पर्वतराज महातीर्थ के रूप में की है,एक ऐसा महान तीर्थ जो स्वयं पवित्र होते हुए भी पावन जलधाराओं और शिव सेवकों से समायुक्त है,जहां से गंगा,सरयू आदि महानदियां निकलती हैं.वही हिमालय समस्त नद और नदियों का प्रमुख उद्गम स्थल भी है-
“पुण्यं  पुण्यजलैरयुक्तं सेवितं शिवकिंकरै:.
यस्मात् पुण्या महानद्यो गंगाद्या नृपसत्तम..
सरव्याद्यास्तथा पुण्याः संभूताः सरितां वराः.
नदानां च नदीनां च यमाद्यं प्रवदन्ति हि..”
           -स्कन्दपुराण,मानसखंड,8.50-51

सभी मित्रों को ‘हिमालय दिवस’ की हार्दिक शुभकामनाएं!!

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज से एसोसिएट प्रोफेसर के पद से सेवानिवृत्त हैं. एवं विभिन्न पुरस्कार व सम्मानों से सम्मानित हैं. जिनमें 1994 में ‘संस्कृत शिक्षक पुरस्कार’, 1986 में ‘विद्या रत्न सम्मान’ और 1989 में उपराष्ट्रपति डा. शंकर दयाल शर्मा द्वारा ‘आचार्यरत्न देशभूषण सम्मान’ से अलंकृत. साथ ही विभिन्न सामाजिक संगठनों से जुड़े हुए हैं और देश के तमाम पत्रपत्रिकाओं में दर्जनों लेख प्रकाशित.)

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