November 25, 2020
समाज/संस्कृति

पुत्र अपने कुल को ही तारता है, पुत्रियां दो-दो कुलों को तारतीं हैं

  • डॉ. मोहन चंद तिवारी  

पितृपक्ष के अवसर पर प्राय: यह जिज्ञासा प्रकट की जाती है कि श्राद्ध का अधिकार किस किस को है? क्या पुत्र के अतिरिक्त पुत्री या पत्नी को भी श्राद्ध करने का अधिकार है या नहीं? कुछ पितृसत्तात्मक परंपरागत समाजों में स्थानीय मान्यताओं के कारण केवल पुत्र को या पुरुष को ही श्राद्ध का अधिकारी माना जाता है, पुत्री या स्त्री को नहीं. परन्तु इस सम्बंध में धर्मशास्त्रकार हेमाद्रि के अनुसार मुख्य नियम यह है कि पिता का श्राद्ध पुत्र को करना चाहिए. पुत्र न हो तो पत्नी श्राद्ध करे. पत्नी के अभाव में सहोदर भाई और उसके अभाव में सपिंडों को श्राद्ध करना चाहिए-
“पितु: पुत्रेण कर्तव्या पिण्डदानोदकक्रिया.
पुत्राभावे तु पत्नी स्यात् पत्न्याभावे तु सोदर:॥”

‘श्राद्धकल्पलता’ में मार्कंडेयपुराण के द्वारा दी गई व्यवस्था के अनुसार भी पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र, पुत्रिका का पुत्र (दौहित्र), पत्नी, भ्राता, पिता, माता, बहन, बहनोई तथा सपिंडी को भी उत्तरोत्तर क्रम से श्राद्ध का अधिकारी माना गया है. अर्थात् श्राद्ध करने का पहला अधिकार ज्येष्ठ पुत्र को है. इसके जीवित न रहने पर छोटा पुत्र श्राद्ध कर सकता है. पुत्र के जीवित न होने की स्थिति में पौत्र, इन दोनों के जीवित न होने की स्थिति में प्रपौत्र को श्राद्ध करना चाहिए. मृतक के पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र न हों तो ऐसी स्थिति में मृतक की पुत्री श्राद्ध कर सकती है. मृतक की पुत्रवधू भी श्राद्ध कर सकती है. अगर किसी स्त्री के पुत्र न हो तो वह स्वयं भी अपने पति का श्राद्ध कर सकती है. अगर इनमें से कोई न हो तो बहन भी श्राद्ध कर सकती है. बहन के न होने पर बहन का पुत्र भी श्राद्ध कर सकता है. मृतक का अगर कोई वंशज न हो और न ही सपिंडी और सोदक हों तो उस देश के राजा द्वारा दाह संस्कार एवं श्राद्ध करने का विधान है क्योंकि राजा अपनी प्रजा का बान्धव माना गया है.

गोभिलस्मृति’ में यह भी व्यवस्था दी गई है कि पिता द्वारा पुत्र को, बड़े भाई द्वारा छोटे भाई को पिंडदान नहीं किया जा सकता है. ‘मार्कंडेयपुराण’ के अनुसार श्राद्ध इत्यादि पितृपूजा को देशधर्म और कुलधर्म माना गया है.  

‘गोभिलस्मृति’ में यह भी व्यवस्था दी गई है कि पिता द्वारा पुत्र को, बड़े भाई द्वारा छोटे भाई को पिंडदान नहीं किया जा सकता है. ‘मार्कंडेयपुराण’ के अनुसार श्राद्ध इत्यादि पितृपूजा को देशधर्म और कुलधर्म माना गया है. इसलिए हेमाद्रि का कथन है, जिस देश तथा कुल में श्राद्ध नहीं होता वहां वीर निरोग शतायु पुरुष उत्पन्न नहीं होते और वह देश वास्तविक कल्याण से वंचित रह जाता है-
“न तत्र वीरा जायन्ते नारोग्यं न शतायुष:.
न चश्रेयोऽधिगच्छन्ति यत्र श्राद्धविवर्जितम्॥”  -हेमाद्रि‚श्राद्धकल्पलता

धर्मशास्त्रों के अनुसार पितरों को पिण्डदान करने वाले गृहस्थ को उनके आशीर्वाद के रूप में दीर्घायु पुत्र-पौत्रादि, यश, स्वर्ग,कीर्त्ति बल‚ लक्ष्मी‚धन-धान्य आदि की प्राप्ति होती है-

“आयुःपुत्रान् यशःस्वर्गं कीर्ति पुष्टि बलं श्रियम्.
पशून् सौख्यं धनं धान्यं प्राप्नुयात् पितृपूजनात् ..” -यमस्मृति‚श्राद्धप्रकरण

वस्तुतः श्राद्ध से तात्पर्य है पूर्वजों के प्रति सम्मान प्रकट करना. ‘श्राद्ध’ का अर्थ है जो वस्तु श्रद्धापूर्वक दी जाए- ‘श्रद्धया दीयते यत् तत् श्राद्धम्.’ गृहस्थ परिवार में वह श्रद्धाभाव केवल पुत्र के लिए ही नहीं पुत्री और पुत्रवधु के लिए भी उतना ही जरूरी है.

कुल मिलाकर धर्मशास्त्र के ग्रंथ ‘धर्मसिंधु” सहित ‘मनुस्मृति’ और पुराणों में मृतक की कन्या या विधवा धर्म पत्नी भी मृतक का अंतिम संस्कार व श्राद्ध कर सकती है.यहां तक कि शंकराचार्य ने भी इस व्यवस्था को तर्क सम्मत माना है ताकि श्राद्ध करने की परंपरा जीवित रहे और लोग अपने पितरों को भूलें नहीं. गरुड़ पुराण में उल्लेख मिलता है- कि कौन-कौन श्राद्ध कर सकता है-
“पुत्राभावे वधु कूर्यात, भार्याभावे च सोदन:. शिष्‍यो वा ब्राह्म्‍ण: सपिण्‍डो वा समाचरेत.. ज्‍येष्‍ठस्‍य वा कनिष्‍ठस्‍य भ्रातृ: पुत्रश्‍च: पौत्रके..”

गरुड़ पुराण के उपर्युक्त श्‍लोक के अनुसार ज्‍येष्‍ठ या कनिष्‍ठ पुत्र के अभाव में बहू,पत्‍नी को श्राद्ध करने का अधिकार है. इसमें ज्‍येष्‍ठ पुत्री या एक मात्र पुत्री भी शामिल है. यदि पत्‍नी जीवित न हो तो सगा भाई या भतीजा, भांजा,नाती, पोता भी श्राद्ध कर सकते हैं. इन सबके अभाव में शिष्‍य,मित्र, कोई रिश्‍तेदार या फिर कुल पुरोहित मृतक का श्राद्ध कर सकता है.यानी कि परिवार के पुरुष सदस्‍य के अभाव में कोई भी महिला सदस्‍य पितरों का श्राद्ध तर्पण कर सकती है.

इस पुराण में यह भी कहा गया है कि यदि घर में कोई वृद्ध महिला है तो युवा महिला से पहले श्राद्ध कर्म करने का अधिकार उसका होगा.

एक पौराणिक कथा के अनुसार वनवास के समय राम लक्ष्मण और सीता पितृपक्ष के दौरान श्राद्ध करने के लिए गया धाम पहुंचे वहां श्राद्ध कर्म के लिए आवश्यक सामग्री जुटाने हेतु राम लक्ष्मण नगर की ओर चल दिए. किन्तु दोपहर हो गई थी पिंडदान का समय निकला जा रहा था तो राम और लक्ष्मण की अनुपस्थिति में सीता जी ने दशरथ जी का  पिंडदान किया था.उन्होंने फल्गू नदी के साथ वटवृक्ष, केतकी के फूल और गाय को साक्षी मान बालू का पिंड बनाकर महाराज दशरथ का पिंडदान किया था और दशरथ जी सीता के हाथों से पिंडदान प्राप्त करके तृप्त हो गए थे. मध्य प्रदेश,महाराष्ट्र सहित भारत के ऐसे कई प्रांत हैं,जहां पुत्र या पौत्र न होने पर पत्नी, बेटी, बहन या नातिन द्वारा भी मृतक संस्कार करने की परम्परा प्रचलित है.

उपर्युक्त धर्मशास्त्र के ग्रन्थों में श्राद्ध के अधिकारी के रूप में जो विभिन्न व्यवस्थाएं दी गईं हैं,उसके पीछे यही उद्देश्य रहा है कि पितरों के निमित्त किया जाने वाला श्राद्ध- कर्म पीढ़ी दर पीढ़ी निरंतर रूप से चलते रहना चाहिए,उसकी परम्परा विलुप्त नहीं होनी चाहिए.

दरअसल,धर्मशास्त्रकारों ने पितृपूजा से सम्बद्ध श्राद्ध -तर्पण के कृत्य को पितृ कल्याण की भावना से किया जाने वाला एक पारिवारिक और सामाजिक दायित्व माना है.स्त्री पुरुष की अर्धांगिनी मानी गई है इसलिए वह भी विशेष परिस्थतियों में अपने पितर जनों का श्राद्ध-तर्पण करते हुए उनके पाप कर्मों का निस्तारण कर सकती है.

संस्कृत कोशकारों के अनुसार ‘पुत्र’  शब्द का अर्थ है- “पुं नाम नरकात त्रायते इति पुत्रः.” अर्थात् जो पुं नाम नरक से बचाए उसे पुत्र कहते हैं. पुत्र और पुत्री का यहां एक ही अर्थ ग्रहण करना चाहिए. अंतर केवल इतना है कि ‘पुत्री’ स्त्री-वाचक शब्द है. माता या पिता से अनजाने में यदि कोई ऐसी गलती हो जाए जिससे उनको नरक में जाना पड़े तो पिता या माता को उस  नरक से बचाने वाले को पुत्र या पुत्री कहते हैं.

संस्कृत कोशकारों के अनुसार ‘पुत्र’  शब्द का अर्थ है- “पुं नाम नरकात त्रायते इति पुत्रः.” अर्थात् जो पुं नाम नरक से बचाए उसे पुत्र कहते हैं. पुत्र और पुत्री का यहां एक ही अर्थ ग्रहण करना चाहिए. अंतर केवल इतना है कि ‘पुत्री’ स्त्री-वाचक शब्द है. माता या पिता से अनजाने में यदि कोई ऐसी गलती हो जाए जिससे उनको नरक में जाना पड़े तो पिता या माता को उस  नरक से बचाने वाले को पुत्र या पुत्री कहते हैं. ‘विष्णुधर्मसूत्र’ के अनुसार जो कोई भी मृतक की सम्पत्ति का अधिकारी है,वह चाहे पुत्र हो या पुत्री, उसके लिए श्राद्ध करना अनिवार्य है. ‘स्मृतिचंद्रिका’ में स्पष्ट कहा गया है कि ‘पुत्र’ कहलाने का वास्तविक हकदार वही है जो पिता की जीवितावस्था में उसके वचनों का पालन करता है और प्रतिवर्ष उनका श्राद्ध-तर्पण एवं पिंडदान करता है. प्रकारान्तर से वही नियम पुत्री या पुत्रवधु पर भी लागू होते हैं.

इस संदर्भ में  वाल्मीकि रामायण का वह प्रसंग भी उल्लेखनीय है जब श्री राम सुग्रीव की प्रशंसा करते हुए कहते हैं कि – “मेरे जैसा पुत्र, भरत जैसा भाई व सुग्रीव जैसा मित्र मिलना इस संसार में दुर्लभ है”. राम को उनके पिता दशरथ ने कभी वन जाने की आज्ञा नही दी. अयोध्या की जनता भी यह मानती थी कि राजा दशरथ और कैकयी को युवराज राम के राज्य का वंशानुगत उत्तराधिकार छीनने का कोई औचित्य नही था. किंतु राम ने अपने पिता की प्रतिज्ञाओं का पालन करते हुए स्वयं ही वनगमन का फैसला किया. क्योंकि वे जानते थे कि यदि पिता दशरथ द्वारा  दिए गए व माता कैकेयी द्वारा मांगे गए वरदान झूठे हो जाएंगे तो पिता को नरक में जाना पड़ेगा. वाल्मीकि रामायण के प्रसंगानुसार रावण वध के पश्चात् स्वर्ग से इंद्र सहित देवता लोग भगवान् राम का अभिनंदन करने आए तो उनके साथ स्वर्गवासी राजा दशरथ भी थे. उस समय राजा दशरथ राम से कहते है, “बेटा मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूँ कि तुमने मुझे नरक में जाने से बचा लिया.” इस प्रसंग से स्पष्ट है कि माता पिता कई बार अपने संतान मोह के कारण ऐसे कुकृत्य कर लेते हैं जिनसे अगले जन्म में उन्हें नरक वास की संभावना रहती है तो ऐसे में पुत्र या पुत्री ही उनका नरक वास से उद्धार कर सकते हैं.

भारत की समाजशास्त्रीय पृष्ठभूमि में तो पुत्र  की तुलना में पुत्री का सामाजिक दायित्व ज्यादा बड़ा हो जाता है. क्योंकि वह अपने माता पिता के घर में पुत्री के रूप में तथा अपने पति के घर में कुलवधु बनकर पुत्र  से ज्यादा दो परिवारों के सामाजिक दायित्वों का निर्वहन करती है. भारत को जगद्गुरु बनाने में वैदिक कालीन धर्मप्राण तपस्वी पुत्रियों, पत्नियों व माताओं का अद्वितीय योगदान रहा है. महाकवि कालिदास ने अपने महाकाव्य ‘कुमारसम्भव’ में पर्वतराज हिमालय और उसकी पूरी वंश परंपरा को पवित्र करने का श्रेय उसकी पुत्री पार्वती को दिया है जिसे आकाश गंगा की निर्मल धारा और प्रतिदिन सप्तर्षियों की पूजा-अर्चना करने से भी इतना पवित्र नहीं कर पाई थी जितना कि अपनी उग्र तपस्याओं से पार्वती ने अपने पिता हिमालय को पावन बना दिया था. पुत्री पार्वती की तपस्याओं के कारण ही हिमालय को ‘देवतात्मा’ कहा जाने लगा-
“विकीर्णसप्तर्षिबलिप्रहासिभिस्तथा
न गाङ्गै: सलिलैर्दिवश्च्युतैः.
यथा त्वदीयैश्चरितैरनाविलै–
र्महीधरः पावित एष सान्वयः..”         – कुमारसम्भव,5.10

पुराणों के युग में धार्मिक दृष्टि से स्त्री के अधिकारों को सीमित किया गया है किंतु वेदों और उपनिषदों के काल में स्त्री का स्थान पुरुष से कहीं कुछ कम नहीं था. यजुर्वेद के निम्न मन्त्र से ज्ञात होता है कि वैदिक परंपरा में स्त्रियां पुत्री,माता, बहिन व पत्नी के रूप में धर्मसाधिका बनकर महामृत्युंजय जैसे वेद मन्त्रों का उच्चारण करते हुए वीर‚साहसी और पराक्रमी पुत्रों को जन्म देती आई हैं और उन्होंने पुत्री तथा कुलवधु के रूप में अपने पितृकुल तथा पति के कुल की कल्याण कामना से एक शौर्यशाली और पराक्रमी समाज का निर्माण करने में भी सफलता पाई–
“ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्
उर्व्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीयमामृतात्॥त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पतिवेदनम्.उर्व्वारुकमिवबंधनादितोमुक्षीय मामुत:॥”
                         -यजुर्वेद,3.60

ऋग्वेद के ‘देवीसूक्त’ में अम्भृण ऋषि की परम विदूषी पुत्री वाग्देवी ब्रह्मस्वरूपा होकर रुद्रबाण से समस्त जगत के अज्ञान का विनाश करती हुई कहती है-
“अहं रुद्राय धनुरा तनोमि
ब्रह्मद्विषे शरवे हन्तवा उ.
अहं जनाय समदं कृष्णोम्यहं
द्यावापृथिवी आ विवेश..” –ऋ. 10.125.6

‘देव्यथर्वशीर्ष’ में भगवती देवों से अपने स्वरूप का परिचय देते हुए कहती है कि ‘मैं ब्रह्मस्वरूपा हूँ. मुझ से ही प्रकृति-पुरुषात्मक जगत् का अस्तित्व है’-
“साऽब्रवीत-अहं ब्रह्मस्वरूपिणी.
मतः प्रकृति-पुरुषात्मकं जगत्.”

भारत को अपने पितृभक्त मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम जैसे महापुरुषों और वैदिक कालीन तपस्विनी ऋषिकाओं पर गर्व है. इस पितृपक्ष में पृथ्वीलोक में आए हुए पितरदेव राष्ट्र के प्रदूषित वातावरण को शान्त करें तथा उनसे संचालित हमारे देश का ब्रह्मांडीय ऋतुचक्र राष्ट्र को निरोगता और खुशहाली प्रदान करे.

(सभी चित्र गूगल से साभार)

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज से एसोसिएट प्रोफेसर के पद से सेवानिवृत्त हैं. एवं विभिन्न पुरस्कार व सम्मानों से सम्मानित हैं. जिनमें 1994 में संस्कृत शिक्षक पुरस्कार’, 1986 में विद्या रत्न सम्मानऔर 1989 में उपराष्ट्रपति डा. शंकर दयाल शर्मा द्वारा आचार्यरत्न देशभूषण सम्मानसे अलंकृत. साथ ही विभिन्न सामाजिक संगठनों से जुड़े हुए हैं और देश के तमाम पत्रपत्रिकाओं में दर्जनों लेख प्रकाशित.)

 

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