Author: Himantar

हिमालय की धरोहर को समेटने का लघु प्रयास
गंजी हो आई खोपड़ी में चार बालों सा हौसला

गंजी हो आई खोपड़ी में चार बालों सा हौसला

देहरादून
नीलम पांडेय नील जीवन में मित्रों का आना हमारे सर के बालों की तरह है. बाल जब नये - नये आते हैं, खूब चमकदार,घने होते हैं. देखने वाले भी सोचते हैं क्या चमक-दमक है? कुछ लोग because तो इस चमक-दमक से जल उठते हैं. चमकते मित्र व्यक्ति की सामाजिक एवम् वर्चुअल जिंदगी की कहानी में अचानक प्रशंसाओं की वृद्वि करने लगते हैं. लेकिन यह क्या?  धीरे-धीरे उनकी लाख देखभाल के बावजूद या शायद हमारी ही अनदेखी के कारण वे रुखे और बेजान होकर गिरने लगते हैं. कभी हम ही उनसे परेशान होकर उनको काट-छांट कर उनकी छंटनी कर देते हैं और बचे हुए को तराशने लगते हैं.ज्योतिषकुछ मित्र घुंघराले बालों की तरह समझने में बहुत जटिल होते हैं. लेकिन वे एक बार समझ में आ जाएं तो उन्हें अपने मन मुताबिक ढाला जा सकता है. कुछ मित्र बिल्कुल सीधे because सपाट होते हैं, वे अपनी बात पर खरे रहते हैं उनके साथ यह है कि अगर हम उन्हें समझ भी जाएं...
जलवायु संकट और कोविड ने मिलाया हाथ, 140 मिलियन लोग झेल रहे एक साथ

जलवायु संकट और कोविड ने मिलाया हाथ, 140 मिलियन लोग झेल रहे एक साथ

पर्यावरण
निशांत  चरम मौसम की घटनाओं और महामारी ने न सिर्फ एक साथ लाखों लोगों को बुरी तरह प्रभावित किया है, बल्कि जलवायु और कोविड संकट के संयोजन ने रिलीफ़ because (राहत-सहायता प्रतिक्रिया) प्रयासों में बाधा डालने के साथ-साथ 'अभूतपूर्व' मानवीय ज़रूरतें पैदा की हैं। यह कहना है इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ रेड क्रॉस एंड रेड क्रिसेंट सोसाइटीज़ (IFRC) की एक रिपोर्ट का. ज्योतिष इस रिपोर्ट के अनुसार, 140 मिलियन लोग - रूस की लगभग पूरी आबादी के बराबर - महामारी के दौरान बाढ़, सूखा, तूफान और जंगल की आग से प्रभावित हुए हैं. because 65 से अधिक या पांच साल से कम उम्र के 660 मिलियन लोग हीटवेव (गर्मी की लहर) की चपेट में आ गए, जो संयुक्त राज्य अमेरिका की आबादी का लगभग दोगुना है. ज्योतिष कोविड की चपेट में आने के बाद से सबसे घातक घटना (जिसके लिए डाटा उपलब्ध है) पश्चिमी यूरोप में 2020 की हीटवेव थी, जिसमें बेल्जियम, फ्रां...
डॉक्टर रेखा उप्रेती के यात्रा संस्मरण ‘क्षितिज पर ठिठकी सॉंझ’ का लोकार्पण

डॉक्टर रेखा उप्रेती के यात्रा संस्मरण ‘क्षितिज पर ठिठकी सॉंझ’ का लोकार्पण

साहित्यिक-हलचल
हिमांतर ब्यूरो, नई दिल्लीदिल्ली विश्वविद्यालय के इंद्रप्रस्थ कॉलेज के हिंदी विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर डॉक्टर रेखा उप्रेती के यात्रा संस्मरण 'क्षितिज पर ठिठकी सॉंझ' का रविवार को वसुंधरा में लोकार्पण हुआ. किताब में रेखा उप्रेती ने अपने यूरोप-यात्रा के संस्मरणों को शामिल किया है. 20 दिनों की इस यात्रा के दौरान लेखिका ने जो 15 संस्मरण लिखे थे, because वो किताब में शामिल हैं. यह किताब 120 पन्नों की है, जिसे परिकल्पना प्रकाशन ने छापा है. लोकार्पण और परिचर्चा कार्यक्रम में अभिनेता और रंगकर्मी भूपेश जोशी ने रेखा उप्रेती के संस्मरणों का पाठ किया. साहित्यकार कुसुम जोशी ने किताब में शामिल यात्रा-संस्मरणों के बारे में कहा कि ये संस्मरण इतने रोचक हैं, कि पाठक भी लेखक के साथ यात्रा के पलों को जीने लगता है.  यूरोप में भी लेखिका अपना पहाड़ खोज रही होती हैं. अपने गांव और बचपन को याद कर रही होती हैं. ...
ढाई दिन के झोंपड़े की तरह ढाई दिन का प्यार!

ढाई दिन के झोंपड़े की तरह ढाई दिन का प्यार!

संस्मरण
घट यानी पनचक्की (घराट)डॉ. हरेन्द्र सिंह असवाल पिछली सदी की बात है. उनके लिए जिन्होंने ये देखा नहीं, लेकिन हमारे लिए तो जैसे कल की बात है कि हम रविवार को पीठ में तीस पैंतीस किलो गेहूं, जौ  लादकर घट जा रहे हैं. दूर से ही देख रहा हूँ जैसे घट का पानी टूटा हुआ है और मैं दौड़ रहा हूँ. जैसे ही घट पर पहुँचा तब तक किसी ने पानी लगा दिया और मैं पिछड़कर दूसरे या तीसरे नंबर पर पहुँच गया हूँ. थोड़ा निराश, थोड़ा नज़र इधर-उधर देखकर और फिर सोच रहा हूँ   कि दूसरा घट ख़ाली होगा ? यह सिलसिला हर दूसरे  हफ़्ते में चला ही रहता. घट का पानी टूटना और लगना उसके चलने और न चलने से जुड़ा है. ये घट भी दो तरह के होते थे, एक तो सदा बहार होते  दूसरे बरसाती. बरसाती घट तीन महीने ही चल पाते थे. ऐसे हमारे गांव में कालोगाड पर तीन घट थे एक ग्वाड़  में  नाखून के  काला ताऊ जी का था, दूसरा  गहड़ गाँव के गुसाईं जी का और तीसरा ...
पशुधन की कुशलता और समृद्धि का लोकपर्व

पशुधन की कुशलता और समृद्धि का लोकपर्व

लोक पर्व-त्योहार
प्रकाश उप्रेती आज खतडू है. ठंड आरम्भ होने की सूचना देने वाला यह त्योहार गोठ-गुठयार से लेकर खेत- खलिहानों तक की सुख-समृद्धि का द्योतक है. ईजा भी कहती थीं- "खतडूक बाद च्यला जाड़ होने गोय" because (खतडू के ठंड होती गई). मैं, आज भी इसके इसी संदर्भ से वाकिफ हूँ कि खतडू ऋतु परिवर्तन और कृषि से जुड़े साधनों को कृतज्ञता अर्पित करने वाला त्योहार है.ज्योतिष यह पशुधन की कुशलता और समृद्धि पर आधारित लोकपर्व है. वैसे यह हर वर्ष आश्विन माह के प्रथम दिन यानि संक्रांति को मनाया जाता है. इस दिन सामूहिक तौर पर एक जगह सूखी लकड़ियां,because घास और झाड़ियों को इकट्ठा करके उसे पुतले के आकार का बनाया जाता है और अंधेरा होते ही सारे गाँव वाले 'छिलुक' (एक तरह से लकड़ी की मशाल) और ककड़ी लेकर आते हैं फिर उस पुतले पर आग लगाई जाती है, ककड़ी के टुकड़े उसमें डाले जाते हैं. फिर उस राख़ को घर में रखा जाता है.ज्योतिष ...
चंदेरी साड़ियां : मी टू, अहिल्याबाई होल्कर

चंदेरी साड़ियां : मी टू, अहिल्याबाई होल्कर

ट्रैवलॉग
मंजू दिल से… भाग-19मंजू कालाकिसी भी भारतीय महिला की संदूकची, या अलमारी कोई ...खोजी पति... खंगालेगा (जो पत्नी के खजाने की टोह लेता हो )  तो उसे  उनमें झिलमिल करती चंदेरी साड़ियां जरूर झांकते हुए नजर आ.. जायेंगी!   मैं भी जब अपने साड़ियों के पिटारे को खोलती हूँ... (यह मेरा प्रिय शगल है! फुरसत पाते ही मैं अपना साड़ियों का  पिटारा जरूर खोलती हूँ!)  तो यही चंदेरी साड़ियां...  मंद स्मित  बिखेरते हुए मुझे मेरे विवाह के वक्त की याद दिला देती हैं मसलन. माँ और  पिताजी का मेरे विवाह की तैयारियों में संलग्न रहना, पडो़सन आंटियों का मेरी साड़ियों में फाल लगाने आना!   मेरा चोरी- चोरी  पतिदेव के चित्र को निहारना,  माँ और दादी की नजर  से छुपकर.. विवाह के लिए बनाए गए आभूषणों की आजमाईश..सखियों के साथ मिलकर करना... और हाँ माँ के साथ रिक्शा में बैठकर दर्जी के यहाँ जाना भी इसी में शामिल है! मेरी माँ...
उत्तरकाशी: गर्तांगली का आधुनिक शिल्पी – राजपाल बिष्ट

उत्तरकाशी: गर्तांगली का आधुनिक शिल्पी – राजपाल बिष्ट

उत्तरकाशी
पुष्कर सिंह रावत इन दिनों उत्तरकाशी की गर्तांगली चर्चा में है. करीब डेढ़ सौ साल पुराना यह रास्ता किसने बनाया इस पर अभी शोध की जरूरत है. लेकिन हेरीटेज महत्व के इस पुल को नया रूप देने वाले because राजपाल बिष्ट को उत्तरकाशी के लोग बखूबी जानते हैं. पुल बनाने में महारत रखने वाले इस युवा ठेकेदार ने एक जोखिमभरी राह को आसान बना दिया. दरअसल इस काम के लिए वन विभाग और लोनिवि को काफी माथापच्ची करनी पड़ी. इसके खतरे को देखते हुए और कोई तैयार नहीं हुआ तो राजपाल बिष्ट आगे आए. उनसे बहुत पुरानी मित्रता होने के कारण मुझे उनकी कार्यशैली मालूम है. नफा नुकसान से ज्याआदा उनका because ध्यान काम के महत्व पर रहता है. उनसे लगातार संपर्क के कारण गर्तांगली के जीर्णोद्धार की हर खबर मुझे मिलती रही. संयोगवश देहरादून में हम दोनों पड़ोसी हैं. लिहाजा पुल के लिए देवदार की लकड़ी का इंतजाम करते वक्त मैं उनके साथ ही मौजूद था. ...
कच्चे रास्ते पक्के सबक – दीपा तिवारी

कच्चे रास्ते पक्के सबक – दीपा तिवारी

पुस्तक-समीक्षा
कैलास मानसरोवर यात्रा पर एक उपयोगी यात्रा-पुस्तकडॉ. अरुण कुकसालकैलास पर्वत (ऊंचाई समुद्रतल से 22,028 फीट) और मानसरोवर (ऊंचाई समुद्रतल से 14,950 फीट) हिन्दू, बोनपा, बौद्ध और जैनियों की आस्था के सर्वोच्च तीर्थस्थल हैं. हिन्दुओं के लिए यह शिव का विराट रूप है. तिब्बत के बोनपा यहां स्वास्तिक में विराजमान अपने देवों दैमचौक और दोरजे फांगमो के दर्शन करते हैं. because बौद्ध बुद्ध की तपस्थली और जैन प्रथम तीर्थकर ऋषभदेव की निर्वाण भूमि यहां मानते हैं. जीवनदायनी नदियां करनाली, सतलज, ब्रह्मपुत्र और सिन्धु नदियों का उद्गम क्षेत्र यही है.ज्योतिष एक आम हिन्दू, तिब्बती, जैन और बौद्ध व्यक्ति के लिए कैलास - मानसरोवर जाना मन की संपूर्ण मनोकामनाओं का तर जाना है. हिमालय प्रेमी और घुमक्कड़ों के लिए because कैलास - मानसरोवर की यात्रा जीवन की अमूल्य निधि को हासिल करना है. वर्षों से मेरा भी ख़्वाब है क...
हिंदी में हत्यारे पहचान लिए जाते हैं!

हिंदी में हत्यारे पहचान लिए जाते हैं!

साहित्‍य-संस्कृति
(हिंदी दिवस पर विशेष)  चंद्रेश्वरसारे विरोधों एवं अंतर्विरोधों के बावज़ूद हमारी हिंदी खिल रही है, खिलखिला रही है. हिन्दी को दबाने,पीछे करने या  किनारे लगाने के अबतक के सारे षडयंत्र विफल  होते रहे हैं. हिन्दी के नाम पर चाहे जो भी राजनीति होती रही हो; पर उसे कोई धूल नहीं चटा पाया है तो  इसी कारण से कि वह वास्तव में इस देश की मिट्टी की सुगंध  से पैदा हुयी भाषा है. इसमें कोटि-कोटि मेहनतकश कंठों की समवेत आवाज़ एवं पुकार शामिल है. यह समय के सुर-ताल को पहचानने वाली भाषा है. यह ज़्यादा लचीली एवं समावेशी प्रकृति की भाषा है. इस  भाषा एवं भारतीयता के बीच एक साम्य है कि दोनों में सहज स्वीकार्यता का भाव देखने को मिलता रहा है. जिस तरह भारतीयता के ताने-बाने का युगों-युगों से निर्माण होता रहा है,समन्वय के विविध रंगीन धागों से, ठीक उसी तरह हिन्दी भी बनी है कई बोलियों एवं भाषाओं के शब्दों को आत्मस...
ज्ञान की कब्रगाहों में हिंदी का प्रेत

ज्ञान की कब्रगाहों में हिंदी का प्रेत

साहित्‍य-संस्कृति
हिंदी दिवस (14 सितम्बर) पर विशेषप्रकाश उप्रेती हर वर्ष की तरह आज फिर से हिंदी पर गर्व और विलाप का दिन आ ही गया है. हिंदी के मूर्धन्य विद्वानों को इस दिन कई जगह ‘जीमना’ होता है. मेरे एक शिक्षक कहा करते थे कि “14 सितंबर because को हिंदी का श्राद्ध होता है और हम जैसे हिंदी के पंडितों का यही दिन होता जब हम सुबह से लेकर शाम तक बुक रहते हैं”.  कहते तो सही थे. इन 68 वर्षों में हिंदी प्रेत ही बन चुकी है. तभी तो स्कूल इसकी पढाई कराने से डरते हैं और अभिभावक इस भाषा को पढ़ाने में संकोच करते हैं. सरकार ने इसके लिए खंडहर बना ही रखा है. अब और कैसे कोई भाषा प्रेत होगी. हिंदी पर सेमिनार, संगोष्ठी, अखबारों के लंबे-लंबे संपादकीय और गंभीर मुद्रा में चिंतन व चिंता का आखिर यही एक दिन है. ज्योतिष...आज के हिंदी विभाग because लेखकों के नहीं, लिपिकों के उत्पादन केंद्र बन गए हैं" और गमों-रंजिश में ढहते हिं...