Month: June 2020

जल मात्र प्राकृतिक संसाधन नहीं, हिमालय प्रकृति का दिव्य वरदान है

जल मात्र प्राकृतिक संसाधन नहीं, हिमालय प्रकृति का दिव्य वरदान है

साहित्‍य-संस्कृति
भारत की जल संस्कृति-3डॉ० मोहन चन्द तिवारी"शं ते आपो हेमवतीः शत्रु ते सन्तुतव्याः. शंते सनिष्यदा आपः शत्रु ते सन्तुवर्ष्या..                - अथर्ववेद 19.2.1 अर्थात् हिमालय से उत्पन्न होकर तीव्र गति से बहने वाली जलधाराएं और वर्षा द्वारा नदियों में प्रवाहित होने वाले जल प्रवाह,ये सभी जलस्रोत शुभकारक एवं कल्याणकारी हों. अथर्वर्वेद के ऋषि की जल विषयक यह प्रार्थना बताती है कि अनादि काल से ही उत्तराखंड सहित समूचे भारत का व्यवस्थित जलप्रबंधन हिमालय पर्वत से संचालित होता आया है,जिसमें ऊंची पर्वत श्रेणियों से उत्पन्न होने वाली नदियों,हिमनदों,गहरी घाटियों और भूमिगत विशाल जलचट्टानों की अहम भूमिका रहती है. जलस्रोतों का जन्मदाता होने के कारण भी वैदिक जल चिंतकों की हिमालय के प्रति अगाध श्रद्धा रही है.इसीलिए उन्होंने  आधुनिक जलवैज्ञानिकों की तरह जल को महज एक प्राकृतिक संसाधन नहीं माना, बल्...
हमारे हिस्से के प्रो. डीडी पंत

हमारे हिस्से के प्रो. डीडी पंत

संस्मरण
सुप्रसिद्ध भौतिकशास्त्री और हिमालय के चिंतक प्रो. डीडी पंत की पुण्यतिथि (11 जून, 2008) पर विशेषचारु तिवारीमैं तब बहुत छोटा था. नौंवी कक्षा में पढ़ता था. यह 1979-80 की बात है. बाबू (पिताजी) ने बताया कि दुनिया के एक बहुत बड़े वैज्ञानिक आज बग्वालीपोखर में आ रहे हैं. बग्वालीपोखर में उन दिनों सड़क तो नहीं आई थी. हां, बिजली के पोल गढ़ गये थे, या कहीं बिजली आ भी गई थी. हमारे लिये वैसे भी अपने क्षेत्र के बाहर के आदमी को देखना ही कौतुहलपूर्ण था. वैज्ञानिकों और उनकी खोजों के बारे में किताबों में ही पढ़ते थे. हमें लगता था कि वैज्ञानिक आम आदमी से कुछ अलग होते होंगे. प्रतिभा और विद्वता में तो होते ही हैं, लेकिन हमें लगता था कि देखने में भी अलग होते होंगे.प्रो. डीडी पंत जी को पहली बार दूर से देखने का सुख मात्र एक वैज्ञानिक को देखने की बालसुलभ जिज्ञासा थी. उस समय पृथक उत्तराखंड राज्य के ल...
चीड़ को इस नज़र से भी देखना होगा

चीड़ को इस नज़र से भी देखना होगा

संस्मरण
मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—20प्रकाश उप्रेतीपहाड़ की हर चीज आपको कुछ न कुछ देती है. पहाड़ के लोगों का हर पेड़, ढुङ्ग (पत्थर), भ्योव (पहाड़), गढ्यर, और झाड़ियों से एक रिश्ता होता है. आज बात करते हैं- 'सोह डाव' (चीड़ के पेड़) और उसकी धरोहर- 'ठिट'(चीड़ का फल) और 'छिलुक' (आग पकड़ने वाली लकड़ी) की. जाड़े के दिनों में हमारा एक काम 'भ्योव बे ठिट'(जंगल से चीड़ का फल) लाने का भी होता था. ईजा घास काटने जाती थीं तो हम उनके साथ ठिट चाहने जाते थे. जाड़े की सुबह-सुबह जब 'हॉल' (कोहरा) के कारण दिखाई भी मुश्किल से देता था तो ईजा कहती थीं- "भ्योव हिट च्यला वोति घाम ले तापी हाले और आग तापे हैं 'मुन' (पेड़ की जड़) और ठिट ले चाहा ल्याले". ( बेटा मेरे साथ पहाड़ चल वहाँ से अंगीठी में जलाने के लिए चीड़ के फल, लकड़ी की जड़े भी ले आएगा और धूप भी सेक लेगा)  यह कहते हुए ईजा हमको एक बोरी देती थीं. हम ईजा के साथ भ्यो चल...
अपनेपन की मिठास कंडारी बंधुओं का ‘कंडारी टी स्टाल’

अपनेपन की मिठास कंडारी बंधुओं का ‘कंडारी टी स्टाल’

संस्मरण
डॉ. अरुण कुकसालचर्चित पत्रकार रवीश कुमार ने अपनी किताब 'इ़श्क में शह़र होना’ में दिल से सटीक बात कही कि ‘'मानुषों को इश्क आपस में ही नहीं वरन किसी जगह से भी हो जाता है. और उस जगह के किन्हीं विशेष कोनों से तो बे-इंतहा इश्क होता है. क्योंकि बीते इश्क की कही-अनकही बातें और सफल-असफल किस्से उन्हीं कोनों में दुबके रहते हैं. ये अलग बात है कि नये वक्त की नई चमचमाहट और आपाधापी में उन किस्सों और बातों के निशां दिखाई नहीं देते हैं. पर दिल का सबसे नाजुक कोना उन्हें ताउम्र बखूबी महसूस करता है.’'श्रीनगर गढ़वाल के 'सेमवाल पान भंडार' और उससे सटा 'कंडारी की स्टाल' क्रमशः प्रोफेसरों और छात्रों का बिड़ला कालेज से इतर का मिलन केन्द्र हुआ करता था. अक्सर किसी सेमीनार या कार्यक्रम हाल में बैठे प्रतिभागियों से ज्यादा गम्भीर चर्चा उससे ऊब कर हाल से बाहर आये प्रतिभागियों में होती है.श्रीनगर में रहते ...
मुआवजा

मुआवजा

किस्से-कहानियां
एम. जोशी हिमानीभादों के पन्द्रह दिन बीत गये हैं बारिश है कि रूकने का नाम ही नहीं ले रही है, जयंती अपने छज्जे से चारों तरफ देखने की असफल कोशिश करती है। उसके घर की तीनों तरफ की पहाड़ियां घने सफेद कोहरे से पूरी तरह से ढकी हैं, समझ में नहीं आ रहा कहां तक कोहरा जा रहा है कहां से बादलों की सीमा रेखा शुरू हो रही है, धरती आसमान सब एक से लग रहे हैं। जयंती एक अनजाने भय से रात भर सो नहीं पाती उसे लगता है इतनी ही बारिश यदि होती रही तो यह भी हो सकता है कि उसके घर के पीछे की पहाड़ी किसी दिन नीचे खिसक आये और वह यह धुंधली कोहरे भरी सुबह भी न देख पाये। पहाड़ों से भगवान भी इधर कई वर्षों से बुरी तरह नाराज चल रहे हैं इसीलिए तो वे हर बरसात में जिस तरह से बरसते हैं लगता है कि वे पूरे पहाड़ों को ढहाकर नीचे मैदानों के साथ मिला देंगे। पिछली बरसात की अमावस की रात जयंती को अभी भी बुरी तरह से खौफजदा कर देती है पल्ली...
पप्पू कार्की: सुरीली आवाज का जादूगर

पप्पू कार्की: सुरीली आवाज का जादूगर

संस्मरण
चारु तिवारीहम लोग उन दिनों राजधानी गैरसैंण आंदोलन के लिये जन संपर्क करने पहाड़ के हर हिस्से में जा रहे थे. हमारी एक महत्वपूर्ण बैठक हल्द्वानी में थी. बहुत सारे साथी जुटे. कुमाऊं क्षेत्र के तो थे ही गढ़वाल के दूरस्थ क्षेत्रों से भी कई साथी आये थे. हमारे हल्द्वानी के साथी सीए सरोज आनंद जोशी ने कहा कि बैठक शुरू होने से पहले कुछ गीत गा लेंगे. हम अपने कार्यक्रमों को जनगीतों से ही शुरू भी करते हैं. उन्होंने कहा कि मैं कुछ अच्छे गाने वालों से बात करता हूं. बैठक शुरू होने से पहले हारमोनियम के साथ गीत बजा- ‘पहाडा ठंडो पांणी, सुण कसि मीठी वाणी छोड़न नी लागनी... हाय... छोड़न नी लागनी.’वह पूरी तरह गीत में डूब कर. लय, सुर, मिठास और भाव-भंगिमा के साथ गाया गीत आज भी स्मृतियों में ज्यों का त्यों है. लगता है कहीं आसपास गीत गा रहा है पप्पू. उसमें शालीनता प्रकृति प्रदत्त थी. बहुत कोमल और बहुत उन्...
याद करना लोक-संस्कृति के अध्येता को

याद करना लोक-संस्कृति के अध्येता को

उत्तराखंड हलचल
डॉ. गोविन्द चातक की पुण्यतिथि (9 जून, 2007) पर विशेषचारु तिवारी‘‘सदानीरा अलकनंदा की तरल तरंगों ने राग और स्वर देकर, उत्तुंग देवदारु के विटपों ने सुगंधिमय स्वाभिमान देकर और हिमवन्त की सौंदर्यमयी प्रकृति ने अनुभूतियां प्रदान कर गोविन्द चातक की तरुणाई का संस्कार किया है. इसलिये चातक प्रकृत कवि, कोमल भावों के उपासक, लोक जीवनके गायक और शब्द शिल्पी बने हुये हैं.’’ (सम्मेलन पत्रिकाः लोक संस्कृति अंक)गढ़वाल की लोकविधाओं के संरक्षण और प्रचार-प्रसार में ही उन्होंने अपना जीवन लगा दिया. एक गहन अध्येता, संवेदनशील लेखक, प्रतिबद्ध शिक्षक, कुशल नाटककार, गूढ़ भाषाविद, प्रबुद्ध आलोचक, लोक विधाओं के शोधकर्ता के रूप में उनका योगदान हमेशा याद किया जायेगा. गढ़वाली भाषा और साहित्य के एक ज्ञानकोश के रूप में हम सब उन्हें जानते हैं.वे अपने आप में एक पहाड़ थे. लोक साहित्य और लोकभाषा के. लोक वि...
पेट पालते पेड़ और पहाड़ 

पेट पालते पेड़ और पहाड़ 

संस्मरण
मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—19प्रकाश उप्रेतीआज बात उस पहाड़ की जो आपको भूखे नहीं रहने देता था. तस्वीर में आपको- तिमिल और कोराय के पेड़ नज़र आ रहे हैं. तिमिल की हमारे यहां बड़ी मान्यता थी. गाँव में तिमिल के तकरीबन 10-12 पेड़ थे. कहने को वो गाँव के अलग-अलग लोगों के थे लेकिन होते वो सबके थे. एक तरह से तिमिल साझी विरासत का पेड़ था. तिमिल के पत्ते बहुत चौड़े होते थे. उन पत्तों का इस्तेमाल शादी-ब्याह में पत्तल और पूड (दोने) के तौर पर होता था. साथी ही 'सज्ञान' (कोई भी लोक पर्व या उत्सव) के दिन गाँव में तिमिल के पत्तों में रखकर ही 'लघड़' (पूरी) बांटते थे. ईजा 'कौअ बाई' (कौए के लिए पूरी) निकालने के लिए भी तिमिल के पत्तों का उपयोग करती थीं. इसलिए पेड़ किसी का भी हो अधिकार सबका होता था.सज्ञान के दिन ईजा हमको सुबह-सुबह नहलाकर, पिठ्या लगाकर कहती थीं कि "च्यला जरा तिमिलेक पतेल ली हा". हम ...
कालेकावा और उतरैंणि कौतिक

कालेकावा और उतरैंणि कौतिक

संस्मरण
‘बाटुइ’ लगाता है पहाड़, भाग—10रेखा उप्रेतीमाघ की पहली भोर, पहाड़ों पर कड़कड़ाता जाड़े का कहर, सूरज भी रजाई छोड़ बाहर आने से कतरा रहा है, पर छोटे-छोटे बच्चे माँ की पहली पुकार पर उठ गए हैं. आज न जाड़े की परवाह है न अलसाने का लालच. झट से सबने अपनी ‘घुगुती माला’ गले में डाल ली है और छज्जे से बाहर झाँककर एक स्वर में गाने लगे हैं… काले कावा काले घुगुती मावा खाले… पहाड़ छूटे चालीस बरस हो चुके हैं, पर मकर-संक्रांति पर मनाये जाने वाले ‘घुगुती-त्यार’ के दृश्य अब भी आँखों में तिरते हैं…. एक शाम पहले गुड़ के पाग में गूँथे आटे से विभिन्न आकृतियों के घुगुत बनाए जा रहे हैं.  लोई को हथेलियों से पतले लम्बे रोल में बदल, उसे ट्विस्ट कर घुगुत का आकार दिया जा रहा है. बच्चे परात को घेर कर बैठे हैं. सबके हाथों में आटे की लोइयाँ हैं. कलाकारी दिखाने का अवसर है. ‘देखो, मैंने दाड़िम का फूल बनाया..’ एक कहता ‘और...
गढ़वाल की सैन्य परंपरा का प्रारम्भिक महानायक

गढ़वाल की सैन्य परंपरा का प्रारम्भिक महानायक

इतिहास
लाट सूबेदार बलभद्र सिंह नेगी (सन् 1829 - 1896)डॉ. अरुण कुकसाल‘जिस अंचल में बलभद्र सिंह जैसे वीरों का जन्म होता है, उसकी अपनी अलग रेजीमेंट होनी ही चाहिए.’ कमान्डर इन चीफ, पी. रोबर्टस ने सन् 1884 में तत्कालीन गर्वनर जनरल लार्ड डफरिन को गढ़वालियों की एक स्वतंत्र बटालियन के गठन के प्रस्ताव की भूमिका में ये महत्वपूर्ण तथ्य लिखा था. तत्कालीन बिट्रिश सरकार ने सन् 1887 में अल्मोड़ा में तैनात गोरखा राईफल में भर्ती गढ़वाली एवं अन्य सैनिकों को मिलाकर ‘गढ़वाल राईफल’ का गठन करके उसका मुख्यालय ‘कळों का डांडा’ (लैंसडौन) में स्थापित किया था. इससे पूर्व गढ़वाल के युवा गोरखा राईफल में ही भर्ती हो पाते थे.सैनिक सेवाओं के दौरान उन्हें दो बार ‘ऑडर ऑफ मेरिट’ का अवार्ड दिया गया. सन् 1887 में सेना से अवकाश ग्रहण करने के बाद बिट्रिश सरकार ने उनकी सराहनीय सैनिक सेवाओं का सम्मान करते हुए घोसीखाता (कोटद्व...