Tag: नैनीताल

यूसर्क द्वारा एक दिवसीय अन्तर्राष्ट्रीय वेबिनार

यूसर्क द्वारा एक दिवसीय अन्तर्राष्ट्रीय वेबिनार

समसामयिक
हिमांतर ब्‍योरोउत्तराखण्ड विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान केन्द्र (यूसर्क) एवं अखिल भारतीय आयुर्वेदिक संस्थान (एम्स) ऋषिकेश के संयुक्त तत्वाधान में “Psychological Well-being among Youth” विषय पर एक दिवसीय अन्तर्राष्ट्रीय वेबीनार का आयोजन गया. अन्तर्राष्ट्रीय वेबीनार के मुख्य अतिथि प्रो. एन. के. जोशी, कुलपति, कुमाऊँ विश्वविद्यालय, नैनीताल ने अपने सम्बोधन में वेबिनार के आयोजन को महत्वपूर्ण बताया एवं वर्तमान में काविड-19 से युवाओं पर पड़ने वाले विपरीत प्रभाव के बारे में विस्तार से समझाया एवं विषय को समय की आवश्यकता बताया. वेबिनार के संरक्षक एम्स के निदेशक पदमश्री प्रो. रविकान्त एवं यूसर्क के निदेशक प्रो. दुर्गेश पंत के द्वारा सभी विशेषज्ञों एवं प्रतिभागियों का स्वागत एवं आभार प्रकट किया गया. वेबिनार में यूनाइटेड किंगडम के प्रख्यात सलाहकार एवं मनोचिकत्सक डॉ. मोहन चावला के द्वारा मानसिक स्वास्थ्...
हमारे हिस्से के प्रो. डीडी पंत

हमारे हिस्से के प्रो. डीडी पंत

संस्मरण
सुप्रसिद्ध भौतिकशास्त्री और हिमालय के चिंतक प्रो. डीडी पंत की पुण्यतिथि (11 जून, 2008) पर विशेषचारु तिवारीमैं तब बहुत छोटा था. नौंवी कक्षा में पढ़ता था. यह 1979-80 की बात है. बाबू (पिताजी) ने बताया कि दुनिया के एक बहुत बड़े वैज्ञानिक आज बग्वालीपोखर में आ रहे हैं. बग्वालीपोखर में उन दिनों सड़क तो नहीं आई थी. हां, बिजली के पोल गढ़ गये थे, या कहीं बिजली आ भी गई थी. हमारे लिये वैसे भी अपने क्षेत्र के बाहर के आदमी को देखना ही कौतुहलपूर्ण था. वैज्ञानिकों और उनकी खोजों के बारे में किताबों में ही पढ़ते थे. हमें लगता था कि वैज्ञानिक आम आदमी से कुछ अलग होते होंगे. प्रतिभा और विद्वता में तो होते ही हैं, लेकिन हमें लगता था कि देखने में भी अलग होते होंगे.प्रो. डीडी पंत जी को पहली बार दूर से देखने का सुख मात्र एक वैज्ञानिक को देखने की बालसुलभ जिज्ञासा थी. उस समय पृथक उत्तराखंड राज्य के ल...
एक घुमक्कड़ की गौरव गाथा-दुनिया ने माना, हमने भुलाया

एक घुमक्कड़ की गौरव गाथा-दुनिया ने माना, हमने भुलाया

संस्मरण
पंडित नैन सिंह रावत (21 अक्टूबर, 1830-1 फरवरी, 1895)डॉ. अरुण कुकसाल19वीं सदी का महान घुमक्कड़-अन्वेषक-सर्वेक्षक पण्डित नैन सिंह रावत (सन् 1830-1895) आज भी ‘‘सैकड़ों पहाड़ी, पठारी तथा रेगिस्तानी स्थानों, दर्रों, झीलों, नदियों, मठों के आसपास खड़ा मिलता है. लन्दन की रॉयल ज्‍यॉग्रेफिकल सोसायटी, स्‍टॉटहोम के स्वेन हैडिन फाउण्डेशन, लन्दन की इण्डिया आफिस लाइब्रेरी, कलकत्ता के राष्ट्रीय पुस्तकालय, दिल्ली के राष्ट्रीय अभिलेखागार, देहरादून के सर्वे ऑफ इण्डिया के दफ्तरों में नैन सिंह, अन्य पण्डितों, मुन्शियों तथा उनके तमाम गौरांग साहबों को अर्से से शोधार्थी अभिलेखों में विराजमान देखते रहे हैं.’’ (एशिया की पीठ पर, पण्डित नैन सिंह रावत, पृष्ठ-21)पण्डित नैन सिंह रावत का जन्म उत्तराखंड में जोहार इलाके के गोरी नदी पार भटकुड़ा गांव में 21 अक्टूबर, 1830 को हुआ था. उनका पैतृक गांव मिलम था. उस दौरा...