
- हिमांतर ब्यूरो, नई दिल्ली
मोल्यार रिसोर्स फाउंडेशन (Molyar Resource Foundation) ने साउथेम्प्टन विश्वविद्यालय (यूके) के सहयोग से “हिमालय में सशक्तिकरण : सतत विकास और इको-टूरिज्म” विषय पर एक उच्च स्तरीय बहुविषयक संगोष्ठी का आयोजन किया। इस संगोष्ठी में प्रमुख शिक्षाविदों, नीति निर्माताओं, उद्योग प्रतिनिधियों, विचारकों एवं सामुदायिक कार्यकर्ताओं ने भाग लिया तथा हिमालयी क्षेत्र के सामने उपस्थित बढ़ती पारिस्थितिक, विकासात्मक और सामाजिक-सांस्कृतिक चुनौतियों पर विचार-विमर्श किया। कार्यक्रम में इस बात पर विशेष बल दिया गया कि वर्तमान दोहनकारी सामूहिक पर्यटन मॉडल के स्थान पर उत्तरदायी, समुदाय-केंद्रित और पर्यावरणीय रूप से संतुलित विकास मॉडल अपनाया जाना आवश्यक है।
कार्यक्रम का शुभारंभ पारंपरिक दीप प्रज्ज्वलन एवं सरस्वती वंदना के साथ हुआ, जो ज्ञान, सामंजस्य और सामूहिक प्रगति का प्रतीक है। सीमा भंडारी एवं दुर्गा सिंह भंडारी ने मोल्यार रिसोर्स फाउंडेशन की ओर से सभी अतिथियों का पौधों, शॉल और स्मृति-चिह्न भेंट कर स्वागत किया, जो भारतीय आतिथ्य एवं सतत विकास की भावना को दर्शाता है।
संगोष्ठी का उद्घाटन मोल्यार रिसोर्स फाउंडेशन के मुख्य समन्वयक एवं पूर्व महाप्रबंधक (एचआर), ओएनजीसी, दुर्गा सिंह भंडारी के संबोधन से हुआ। उन्होंने हिमालय के “विकास–आपदा विरोधाभास” विषय पर अपने विचार रखते हुए कहा कि वर्तमान पर्यटन प्रवृत्तियाँ स्थानीय पर्यावरण पर अत्यधिक दबाव डाल रही हैं, जो आर्थिक लाभों की तुलना में कहीं अधिक गंभीर है। उन्होंने विशेष रूप से पर्वतीय क्षेत्रों में इको-टूरिज्म की तत्काल आवश्यकता पर बल दिया तथा शोध समुदाय, उद्योग जगत, नीति निर्माताओं और अन्य हितधारकों से सतत विकास हेतु मिलकर कार्य करने का आह्वान किया।

संगोष्ठी के दौरान साबू एस. पद्मदास ने मोल्यार रिसोर्स फाउंडेशन और यूनिवर्सिटी ऑफ साउथैम्प्टन (विशेष रूप से यूनिवर्सिटी इंडिया सेंटर फॉर इन्क्लूसिव ग्रोथ एंड सस्टेनेबल डेवलपमेंट एवं यूनिवर्सिटी सस्टेनेबिलिटी एंड रेजिलिएंस इंस्टीट्यूट) के बीच सतत विकास और इको-टूरिज्म से संबंधित नवाचारपूर्ण एवं क्रियाशील गतिविधियों हेतु सहयोग की औपचारिक घोषणा की। इस अवसर पर उन्होंने श्री दुर्गा सिंह भंडारी को स्मृति-चिह्न प्रदान किया। श्री भंडारी ने फाउंडेशन की ओर से आभार व्यक्त करते हुए आश्वासन दिया कि इन पहलों को योजनाबद्ध और व्यावहारिक रूप में लागू किया जाएगा।
बी. डब्ल्यू. पांडे, प्रोफेसर, भूगोल विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय एवं निदेशक, सेंटर फॉर हिमालयन स्टडीज़, ने हिमालयी क्षेत्र में दशकों से किए गए अपने फील्ड अध्ययन पर आधारित व्याख्यान प्रस्तुत किया। उन्होंने हिमालय को पृथ्वी का “तीसरा ध्रुव” और विश्व की लगभग आधी आबादी के लिए जीवनदायिनी जलधारा का प्रमुख स्रोत बताया तथा इसकी पारिस्थितिक एवं भू-राजनीतिक महत्ता को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड में अधिकांश भूस्खलन संवेदनशील सड़क मार्गों के आसपास होते हैं, जबकि बढ़ता पर्यटन और वाहनों की संख्या हिमनद क्षेत्रों में ब्लैक कार्बन के जमाव को बढ़ा रही है। प्रो. पांडेय ने सिक्किम में लागू “DZUMA” नीति ढाँचे को अन्य हिमालयी राज्यों में अपनाने की वकालत की तथा “इको-टूरिज्म” से आगे बढ़कर “ग्रीन टूरिज्म” की अवधारणा को बढ़ावा देने पर बल दिया। उन्होंने हिमालय और वैश्विक जलवायु प्रणालियों के बीच गहरे संबंधों को भी स्पष्ट किया।
अपने मुख्य वक्तव्य में क्रेग हटन (Craig Hutton), निदेशक, सस्टेनेबिलिटी एंड रेजिलिएंस इंस्टीट्यूट, यूनिवर्सिटी ऑफ साउथैम्प्टन, ने सतत विकास की बदलती अवधारणा और उसकी “समग्र प्रकृति” पर विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि सतत पर्यटन में स्थानीय अर्थव्यवस्था, संस्कृति, जीवनशैली और विरासत का संरक्षण शामिल होना चाहिए। उन्होंने अनियंत्रित व्यावसायीकरण के कारण सांस्कृतिक पहचान के एकरूपीकरण को “McDonaldisation” की संज्ञा देते हुए पर्वतीय समुदायों की परंपराओं और सांस्कृतिक मूल्यों को सुरक्षित रखने की आवश्यकता पर बल दिया।
साबू एस. पद्मदास ने वैश्विक पहलों की एक श्रृंखला प्रस्तुत करते हुए आयुर्योग (AYURYOG) पहल का उल्लेख किया, जो आयुर्वेद और योग को वैश्विक स्तर पर निवारक एवं उपचारात्मक स्वास्थ्य पद्धति के रूप में स्थापित करने का प्रयास है। उन्होंने रवांडा और ओमान के उदाहरणों के माध्यम से पर्यटकों और सेवा प्रदाताओं में व्यवहारिक परिवर्तन की आवश्यकता पर बल दिया तथा ओमान के एआई-आधारित पर्यटन प्रबंधन मॉडल को अनुकरणीय बताया। उन्होंने “जन-से-जन संपर्क” को सतत विकास का प्रमुख आधार बताया और विज्ञान एवं तकनीक की नीति-निर्माण में भूमिका को रेखांकित किया।

रवि गोसाईं, अध्यक्ष (2025-27), भारतीय टूर ऑपरेटर संघ एवं प्रबंध निदेशक, एरको ट्रैवल्स, ने हिमालयी पर्यटन पर व्यावहारिक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि पर्यटन प्रकृति और पर्यावरण के अनुकूल, आर्थिक रूप से लाभकारी तथा स्थानीय संस्कृति और समुदायों के हित में होना चाहिए। उन्होंने “मास टूरिज्म” से “माइंड टूरिज्म” की ओर बदलाव का आह्वान करते हुए स्थानीय भोजन, हस्तशिल्प और सामुदायिक होमस्टे को समावेशी विकास का माध्यम बताया।
अब्दुल कय्यूम (Abdul Qayyum), निदेशक (तकनीकी) एवं उप-सीईओ, राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड (National Medicinal Plants Board), आयुष मंत्रालय, भारत सरकार, ने संरक्षण एवं नीति से संबंधित विचार प्रस्तुत किए। उन्होंने ब्रह्म कमल और ब्लैक-नेक्ड क्रेन जैसी उच्च हिमालयी प्रजातियों के विलुप्त होने के खतरे की चर्चा की तथा अंडमान द्वीप समूह के चयनात्मक एवं उत्तरदायी पर्यटन मॉडल का उल्लेख किया। उन्होंने सरकार की “ई-फॉरेस्ट फायर” निगरानी प्रणाली का भी उल्लेख किया।
मेजर गोर्की चंदोला (सेवानिवृत्त), सामाजिक उद्यमी एवं संस्थापक, पाथाल होमस्टे और पाथाल एग्रो, उत्तराखंड, ने सामुदायिक सशक्तिकरण का एक समग्र मॉडल प्रस्तुत किया, जो जलवायु संवेदनशीलता, शिक्षा, पलायन और अनियंत्रित पर्यटन जैसी समस्याओं पर कार्य करता है। उन्होंने “रन भुला रन भुली”, आदर्श मॉडल स्कूल, एआई कॉन्क्लेव इन द हिल्स तथा पाथाल होमस्टे जैसी पहलों का उल्लेख किया।
उत्तराखंड के प्रसिद्ध गायक, संगीतकार, गीतकार और निर्देशक वीरेंद्र नेगी राही ने अपनी कविताओं और गीतों के माध्यम से हिमालयी संकट की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति प्रस्तुत की। उन्होंने कहा, “हिमालय चिल्ला नहीं सकता, लेकिन वह भूस्खलन और बादल फटने की घटनाओं के माध्यम से अपनी पीड़ा व्यक्त करता है।” उन्होंने चेतावनी दी कि जंगलों के बीच कंक्रीट संरचनाओं का विस्तार सभ्यतागत मूल्यों की हानि है।
उपेंद्र दत्त अंथवाल ने नीति निर्माताओं, उद्यमियों और हितधारकों की भूमिका को रेखांकित करते हुए सामुदायिक-केंद्रित पर्यटन विकास मॉडल की आवश्यकता बताई तथा गुजरात के नरारा द्वीप के मॉडल का उदाहरण प्रस्तुत किया।

प्रकाश चंद खंडपाल, प्रोफेसर, सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ लॉ एंड गवर्नेंस, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (Jawaharlal Nehru University) एवं यूनिवर्सिटी ऑफ साउथैम्प्टन में आईसीसीआर चेयर ऑफ इंडियन स्टडीज़, ने उत्तराखंड के पर्यावरणीय आंदोलनों, विशेष रूप से चिपको आंदोलन, का उल्लेख करते हुए कहा कि अत्यधिक पर्यटन ने स्थानीय पारिस्थितिक क्षमता को कम कर दिया है और प्राकृतिक आपदाओं की संभावना बढ़ा दी है। उन्होंने कहा कि “व्यवहार परिवर्तन समय की आवश्यकता है।”
संगोष्ठी का आयोजन ONGC एवं HPCL के सहयोग से किया गया। कार्यक्रम का समापन विशिष्ट अतिथियों के सम्मान एवं भविष्य की पीढ़ियों के लिए सतत, सशक्त और जन-केंद्रित विकास मॉडल स्थापित करने के सामूहिक संकल्प के साथ हुआ।
