September 23, 2020
Home Posts tagged मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से
संस्मरण

जागरी, बूबू और मैं (घात-मघता, बोली-टोली) भाग-2

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—50 प्रकाश उप्रेती हुडुक बुबू ने नीचे ही टांग रखा था लेकिन किसी ने उसे उठा कर ऊपर रख दिया था. बुबू ने हुडुक झोले से निकाला और हल्के से उसमें हाथ फेरा, वह ठीक था. उसके बाद वापस झोले में रख दिया. so हुडुक रखने के लिए एक […]
संस्मरण

जागर, बूबू और मैं

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—49 प्रकाश उप्रेती आस्था, विश्वास का केंद्र बिंदु है. पहाड़ के लोगों की आस्था कई तरह के विश्वासों पर टिकी रहती है. ये विश्वास जीवन में नमक की तरह घुले होते हैं. ऐसा ही “जागर” को लेकर भी है. because “जागर” आस्था के साथ-साथ सांस्कृतिक धरोहर भी है. ‘हुडुक’ […]
संस्मरण

‘सरूली’ जो अब नहीं रही

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—48 प्रकाश उप्रेती अविष्कार, आवश्यकता की उपज है. इस उपज का इस्तेमाल मनुष्य पर निर्भर करता है. पहाड़ के लोगों की निर्भरता उनके संसाधनों पर है. आज अविष्कार और आवश्यकता की उपज “थेऊ” और “सरूली” की बात. ‘थेऊ’ पहाड़ के जीवन का अनिवार्य हिस्सा है. खासकर गाय-भैंस पालने वाले […]
संस्मरण

इनसे खेत आबाद रहे, हमसे जो बर्बाद हुए

प्रकाश उप्रेती मूलत: उत्तराखंड के कुमाऊँ से हैं. पहाड़ों में इनका बचपन गुजरा है, उसके बाद पढ़ाई पूरी करने व करियर बनाने की दौड़ में शामिल होने दिल्ली जैसे महानगर की ओर रुख़ करते हैं. पहाड़ से निकलते जरूर हैं लेकिन पहाड़ इनमें हमेशा बसा रहता है। शहरों की भाग-दौड़ और कोलाहल के बीच इनमें ठेठ […]
संस्मरण

‘खोपड़ा’ यही तो नाम मेरे गाँव का है

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—46 प्रकाश उप्रेती आज बात ‘खोपड़ा’ की. ये मेरे ‘गाँव’ का नाम है. गाँव मेरे लिए सिर्फ एक शब्द नहीं बल्कि पूरा जीवन है. गाँव सुनते ही चेहरा खिल उठता है. आँखों के सामने ‘वारे-पारे’ (आमने-सामने) बाखे और हमारी ‘बीचेक कुड़ी’ (बीच वाला घर) तैरने लगती है. गाँव सुनते […]
संस्मरण

बाजार ने कौतिक की रौनक भी छीन ली

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—45 प्रकाश उप्रेती आज बात “कौतिक” की. साल भर जिसका इंतजार बच्चे, बूढ़े, बड़े सबको रहता था, वह कौतिक था. कौतिक मतलब “मेला” हुआ. कौतिक की तब इतनी हाम थी कि परदेश गए लोग भी कौतिक पर घर पहुंच जाते थे. मासाब कौतिक के दिन हाज़िरि लगाकर छोड़ देते […]
संस्मरण

गुड़ की भेलि में लिपटे अखबार का एक दिन

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—44 प्रकाश उप्रेती आज किस्सा- “ईजा और अखबार” का.  ईजा अपने जमाने की पाँच क्लास पढ़ी हुई हैं. वह भी बिना एक वर्ष नागा किए. जब भी पढ़ाई-लिखाई की बात आती है तो ईजा ‘अपने जमाने’ वाली बात को दोहरा ही देती हैं. हम भी कई बार गुणा-भाग और […]
संस्मरण

‘वड’ झगडै जड़

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—43 प्रकाश उप्रेती आज बात “वड” की. एक सामान्य सा पत्थर जब दो खेतों की सीमा निर्धारित करता है तो विशिष्ट हो जाता है. ‘सीमा’ का पत्थर हर भूगोल में खास होता है. ईजा तो पहले से कहती थीं कि- “वड झगडै जड़” (वड झगड़े का कारण). ‘वड’ उस […]
संस्मरण

पहाड़ों में ‘छन’ की अपनी दुनिया

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—42 प्रकाश उप्रेती आज बात “छन” की. छन मतलब गाय-भैंस का घर. छन के बिना घर नहीं और घर के बिना छन नहीं.  पहाड़ में घर बनाने के साथ ही छन बनाने की भी हसरत होती थी. एक अदत छन की इच्छा हर कोई पाले रहता है. ईजा को […]
संस्मरण

कंकट सिर्फ लकड़ी नहीं बल्कि पहाड़ की विरासत का औज़ार है

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—41 प्रकाश उप्रेती पहाड़ जरूरत और पूर्ति के मामले में हमेशा से उदार रहे हैं. वहाँ हर चीज की निर्मिति उसकी जरूरत के हिसाब से हो जाती है. आज जरूरत के हिसाब से इसी निर्मिति पर बात करते हैं. यह -“कंकट” है. इसका शाब्दिक अर्थ हुआ काँटा, काटने वाला. […]