बिना पड़ाव (बिसोंण) के नहीं चढ़ा जाए पहाड़

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—55

  • प्रकाश उप्रेती

पहाड़ में पड़ाव का बड़ा महत्व है. इस बात को हमसे ज्यादा वो समझते थे जिनकी समझ को हम नासमझ मानते हैं. हर रास्ते पर बैठने के लिए कुछ पड़ाव होते थे ताकि पथिक वहाँ  बैठकर सुस्ता सके. दुकान से आने वाले रास्ते से लेकर पानी, घास लाने वाले सभी रास्तों में कुछ जगहें ऐसी बना दी जाती थीं जहां पर थका हुआ इंसान because थोड़ा आराम कर सके. बुबू बताते थे कि जब वो रामनगर से पैदल सामान लेकर आते थे तो 5 दिन लगते और बीच में 12 पड़ाव पड़ते थे. वो इन पड़ावों के अलावा कहीं और नहीं बैठते थे.

पत्थर

अब हमारा बाजार केदार हो गया है. यह गाँव से चार एक किलोमीटर तो होगा ही. पहले इस बाजार में बड़ी रौनक रहती थी. मिठाई से लेकर किताब, कंचे, राशन, चक्की सभी की दुकानें थीं. सबसे ज्यादा तो चाय और सब्जी की दुकानें होती थीं. शाम के समय तो आस-पास के गांव वालों से पूरा बाजार पटा रहता था. so कोई चाय पी रहा होता, कोई ताश खेल रहा होता, कोई सब्जी का मोल-भाव कर रहा होता, कोई चक्की के बाहर आटा पिस जाने का इंतज़ार कर रहा होता, कोई टेलर के वहाँ कपड़े का नाप देने के लिए खड़ा होता था. हर कोई किसी न किसी काम में लगा होता था. हर किसी की अपनी प्राथमिकता भी होती थी कि उसे किसके वहाँ से सामान लेना है और कहाँ चाय पीनी है.

पत्थर

तब दुकान में जाओ और चाय न पियो ऐसा हो नहीं सकता था. बच्चे, जवान, बूढ़े सभी दुकान में जाकर चाय जरूर पीते थे. चाय के साथ ‘बिस्कुट'(बिस्कुट गोल और बड़े होते थे), ‘बंद’ (आजकल उसे बन कहा जाता है)और ‘समोसे’ (जिसे अब फैन कहा जाता है तब उसे because समोसा कहा जाता था) मिलते थे. अक्सर जो लोग दिल्ली से आए होते उनसे अपेक्षा होती थी कि वह दुकान में साथ जा रहे हैं तो चाय पिलाएँगे ही. अगर कोई चाय नहीं पिलाता तो कहते- “तलि होन बे आ रहा लेकिन दुकानुपन चाहा ले नि पिले वेल” (नीचे से यानि दिल्ली से आया है लेकिन उसने बाजार में चाय भी नहीं पिलाई). चाय तब सिर्फ चाय थी.

पत्थर

गाँव में साल में एक बार दुकान से तेल और गेहूँ भरा जाता था. इस सामूहिक कर्म में गाँव वालों की बारी लगती थी. आज सब मिलकर इनका लाएँगे तो कल उनका लाया जाएगा. because ईजा हमसे कहती थीं-“जा पारपन ब्याखुलि दुकानम बे सामान ली हैं कह हा” (सामने के घरों में शाम को बाजार से सामान लाने के लिए कह आ). हम दौड़े-दौड़े जाते थे और एक -एक घर में जाकर कह आते थे- “ओ ज्येठि, ईज कमें ब्याखुलि केदार बे हमर सामान ल्या दिया हां” (ताई जी मम्मी कह रही हैं कि शाम को केदार से हमारा सामान ला देना). वो भी हां.. हां.. कहते और हम दूसरे घर की तरफ बढ़ जाते थे.

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शाम को ईजा एक “धात” because (आवाज) लगातीं- “आवो रे दुकानम हैं” (बाजार के लिए आ जाओ) और कुछ खाली कट्टे एक झोले में रख कर निकल जाती थीं. कभी दुकान से सब्जी, चीनी या कुछ छोटा-मोटा सामान और लाना होता तो हमें भी साथ ले जाती थीं. हम तो वैसे भी दुकान में जाने के लिए हमेशा तैयार रहते थे. बस मौका मिल जाए. दुकान में जाने का लालच 4 टॉफियां, एक चाय और 2 बिस्कुट होते थे. यही लालच थकान भरी 8 किलोमीटर की यात्रा करा देता था.

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ईजा दुकान से किसी साल एक तो किसी साल दो बोरी गेहूं लेती थीं. कितना लेना है यह घर में हुई गेहूँ की because फसल पर निर्भर करता था. दुकान से गेहूँ लेने के बाद पहले ईजा उन्हें साफ़ करती और फिर घर से लाए कट्टों में 20-20 किलो भर देती थीं. मतलब एक इंसान के लिए 20 किलो का ‘बौज’ (बोझ) तैयार हो जाता था. थोड़ा आगे-पीछे सभी लोग गेहूँ लेने दुकान में पहुंच जाते थे. ईजा सबके लिए एक-एक चाय और जिसको बिस्कुट खाना है उसके लिए बिस्कुट, जिसको समोसा खाना है उसके लिए समोसा बोल देती थीं. पहले सब आराम से बैठकर चाय पीते थे.  उसके बाद ईजा एक-एक कर सबको “उच्या” (उठाकर सर में रखना) देती थीं. सब गेहूं के कट्टे सर में रख कर गांव को चल देते थे.

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केदार से गांव जाने में ‘ठाड़’ because (चढ़ाई) पड़ती थी. सब सधे कदमों से माठु-माठु बातचीत करते हुए चलते थे. जवान लोग थोड़ा तेज चलते लेकिन थोड़ी देर में ही हाँफने लग जाते थे जबकि 50 बसंत देख चुके लोग शुरू से एक ही चाल में चलते जाते थे. केदार से चलने के बाद जो पहला “बिसोंण” (सुस्ताने की जगह) का पड़ाव आता वो “ग्वेले थान” था. यह केदार से तकरीबन डेढ़ किलोमीटर ऊपर पड़ता था. केदार से आने वाला हर व्यक्ति थोड़ी देर यहाँ पर बैठता जरूर था. यहाँ पर हवा खाता फिर आगे का रास्ता तय करता था. ऊँचाई पर बने इस पड़ाव में हमेशा ठंडी हवा चलती रहती थी. यहाँ पर एक बड़ा सा ‘करूँझ’ का पेड़ था. उसके कारण हमेशा छाया रहती थी. इसलिए बहुत पहले से ही लोगों ने यहां पर चारों तरफ से पत्थर लगाकर बैठने वाला बना दिया था.

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यहाँ पहुंचकर लगता था कि अब because घर नजदीक ही है क्योंकि इसके बाद ठाड़ खत्म हो जाती थी. ईजा कहती थीं- “ग्वेले थान पन आ गयो तो समझो घर आय गोय” (इस पड़ाव पर आ गए तो समझो घर ही आ गए). यही और लोग भी  सोचते थे. तब से लेकर आज तक यह बैठने का पड़ाव ज्यों का त्यों है. कई पीढियां आई और गई लेकिन इसने बदस्तूर छाया औरहवा देना जारी रखा है.

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“चाहा को पि मों, because मौकेणी ठंड पिले दिया”. ईजा भी ‘झाग मारमों’ कहते-कहते चाय से कोल्ड ड्रिंक पर शिफ़्ट हो गई हैं. दुकान, गाँव और लोगों में बहुत कुछ है जो बदल गया है लेकिन जो नहीं बदला वह है, वो बिसोंण का पड़ाव और वहाँ चलने वाली ठंडी हवा.

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अब केदार के बाजार की रौनक because भी चली गई है. कुछ ही दुकानें रह गई हैं. चाय की जगह कोल्ड ड्रिंक जिसे लोग ठण्डा बोलते हैं उसने ले ली है. समोसे अब आलू वाले हो गए हैं. अब सामान लेने जाने वाले लोग पहले ही कह देते हैं- “चाहा को पि मों, मौकेणी ठंड पिले दिया” (चाय कौन पी रहा है, मुझे तो कोल्ड ड्रिंक पिला देना). ईजा भी ‘झाग मारमों’ कहते-कहते चाय से कोल्ड ड्रिंक पर शिफ़्ट हो गई हैं. दुकान, गाँव और लोगों में बहुत कुछ है जो बदल गया है लेकिन जो नहीं बदला वह है, वो बिसोंण का पड़ाव और वहाँ चलने वाली ठंडी हवा.

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(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं.पहाड़ के सवालों को लेकर मुखर रहते हैं.)

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