उत्तराखंड हलचल

विलुप्ति की कगार पर पहाड़ की पारंपरिक आभूषण संस्कृति: ‘बुलाक’ से ‘खगाली’ तक खोती विरासत

विलुप्ति की कगार पर पहाड़ की पारंपरिक आभूषण संस्कृति: ‘बुलाक’ से ‘खगाली’ तक खोती विरासत

उत्तरकाशी, साहित्‍य-संस्कृति
नीरजउत्तराखंडी, पुरोला, उत्तरकाशीहिमालयी क्षेत्रों- विशेषकर उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के पहाड़ी इलाकों की पारंपरिक आभूषण संस्कृति आज धीरे-धीरे विलुप्ति की कगार पर पहुंचती जा रही है. कभी महिलाओं की पहचान और सामाजिक स्थिति का प्रतीक रहे ये आभूषण अब आधुनिकता की चकाचौंध में अपनी चमक खोते नजर आ रहे हैं. परंपरा में बसती थी पहचान पहाड़ों में आभूषण केवल सजावट नहीं, बल्कि संस्कृति, परंपरा और सामाजिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं. ‘बुलाक’ (नाक का आभूषण), ‘मुर्की’ (कानों का छोटा गहना), ‘लाबी’ और ‘खगाली’ जैसे आभूषण पीढ़ी-दर-पीढ़ी विरासत के रूप में संजोए जाते थे. इन गहनों का संबंध केवल सौंदर्य से ही नहीं, बल्कि जीवन के विभिन्न संस्कारों—जैसे विवाह, त्योहार और पारिवारिक आयोजनों से भी गहराई से जुड़ा रहा है. कई आभूषण वैवाहिक स्थिति और आर्थिक सम्पन्नता के प्रतीक माने जाते थे.‘बुलाक’ से ‘मु...
कुटज (इंद्र जौ) की खेती: कम लागत में लाखों की आय देने वाला आयुर्वेदिक खजाना

कुटज (इंद्र जौ) की खेती: कम लागत में लाखों की आय देने वाला आयुर्वेदिक खजाना

खेती-बाड़ी, देहरादून
 जे. पी. मैठाणी आज हम आपको आयुर्वेद की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण पौधे कुटज के बारे में जानकारी दे रहे हैं ... कुटज को आम बोल चाल की भाषा में इंद्र जौ या कूड़ा भी कहते हैं. देहरादून में रायपुर थानों रोड से सड़क के किनारे इसके पेड़ दिखने शुरू हो जात एहेन और आजकल इन पेड़ों पर गुच्छों में सफ़ेद फूल खिले हुए हैं . भारत में इस पेड़ को कुछ स्थानों पर दूधि भी कहते हैं .कुटज के पौधे भी दो प्रकार के होते हैं एक मीठा कुटज और एक कडुवा कुटज - दोनों के वानस्पतिक नाम अलग अलग है , जैसे - मीठा इंद्र जौ- Wrightia tinctoria  और कडुवा इंद्र जौ- Holorrhena dysentrica. मीठा इंद्र जौ के पौधे बहुत कम पाए जाते हैं यहां तक की देहरादून और इसके आस पास इसके बहुत कम पौधे हैं,जबकि रानीपोखरी से नटराज चौक ऋषिकेश के बीच सात मोड़ और लच्छीवाला  के जंगलों में इंद्र जौ  के काफी सारे पेड़ आपको आसानी से दिख जायेंगे. कुटज भ...
सौरभ बहुगुणा बने उत्तरकाशी के प्रभारी मंत्री, विकास कार्यों को मिलेगी नई दिशा

सौरभ बहुगुणा बने उत्तरकाशी के प्रभारी मंत्री, विकास कार्यों को मिलेगी नई दिशा

उत्तराखंड हलचल
हिमांतर ब्यूरो, उत्तरकाशी  प्रदेश सरकार ने जनपद उत्तरकाशी के लिए नई जिम्मेदारी तय करते हुए सौरभ बहुगुणा को प्रभारी मंत्री नियुक्त किया है। उनके इस मनोनयन से जनपद में विकास कार्यों को नई गति मिलने की उम्मीद जताई जा रही है। राजनीतिक और प्रशासनिक अनुभव से समृद्ध सौरभ बहुगुणा के नेतृत्व में उत्तरकाशी में आधारभूत सुविधाओं, पर्यटन, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की संभावना है। स्थानीय जनप्रतिनिधियों और नागरिकों ने विश्वास व्यक्त किया है कि उनके मार्गदर्शन में जिले की विकास योजनाएं अधिक प्रभावी ढंग से लागू होंगी। जनपदवासियों का मानना है कि प्रभारी मंत्री के रूप में उनकी सक्रियता से चारधाम यात्रा, सड़क संपर्क, आपदा प्रबंधन और ग्रामीण विकास जैसे अहम क्षेत्रों में ठोस सुधार देखने को मिलेंगे। साथ ही युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर सृजित करने पर भी विशेष ध्यान दिए जान...
राम नवमी : आइए श्रीराम को जीवन में स्थापित करें!

राम नवमी : आइए श्रीराम को जीवन में स्थापित करें!

उत्तराखंड हलचल
  राम नवमी पर विशेषप्रो. गिरीश्वर मिश्र शिक्षाविद् एवं पूर्व कुलपति, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा   शाश्वत मूल्य बोध के विग्रह स्वरूप श्रीराम भारतीय संस्कृति के एक ऐसे लोक-विश्रुत मानवीय उत्कर्ष हैं जो पढ़े-लिखे और अनपढ़ समाज के हर वर्ग के लिए युगों-युगों से प्रेरणा के स्रोत बने हुए हैं । साहित्य जगत राम-कथा में कल्पना और रस का अजस्र स्रोत ढूंढा है और पिछली पीढ़ियों के कवियों और लेखकों ने अपने सृजन का आधार बनाया । साहित्य की यह परम्परा आज भी अप्रतिहत रूप से चल रही है। इस परंपरा का स्पष्ट संदेश है कि पृथ्वी पर श्रीराम का आविर्भाव और अवतरण मात्र लोक कल्याण के हित हुआ था। उनको अयोध्या के राजा के पुत्र दशरथनंदन के व्याज से मानुष भाव में प्रतिष्ठित करते हुए भारतीय मनीषा मनुष्यता की चुनौतियों, उसके द्वन्द्वों, संघर्षों और उपलब्धियों से परिचित कराते हैं। महर्...
न्याय विभाग से साहित्य तक: अनोज सिंह बनाली को मिलेगा ‘उत्तराखंड साहित्य गौरव सम्मान’

न्याय विभाग से साहित्य तक: अनोज सिंह बनाली को मिलेगा ‘उत्तराखंड साहित्य गौरव सम्मान’

उत्तरकाशी
इला चंद्र जोशी पुरस्कार के तहत ₹50,000 नगद, सम्मान-पत्र, स्मृति-चिन्ह और अंगवस्त्र से होगा सम्मानितहिमांतर ब्यूरो, नौगांव-बड़कोटसीमांत जनपद उत्तरकाशी ग्राम बिरगाड़ी से निकली एक सशक्त आवाज़ आज पूरे उत्तराखंड में गूंज रही है। अनोज सिंह ‘बनाली’, जो वर्तमान में उत्तराखंड के न्याय विभाग में कार्यरत हैं, को वर्ष 2025 के प्रतिष्ठित उत्तराखंड साहित्य गौरव सम्मान (इला चंद्र जोशी पुरस्कार) के लिए चयनित किया गया है। यह सम्मान उनके साहित्यिक योगदान के साथ-साथ उनके सामाजिक सरोकारों की भी बड़ी पहचान है।कविताओं में जीवंत होता गांव और समाज अनोज सिंह ‘बनाली’ की कविताएं केवल साहित्यिक रचनाएं नहीं, बल्कि गांव और समाज का जीवंत दस्तावेज़ हैं। उनके शब्दों में सास-बहू के रिश्तों की जटिलता, बेटी-बेटे की भावनाएं, माता-पिता की उम्मीदें, जनप्रतिनिधियों की भूमिका और सरकारी सेवकों की जिम्मेदारियां- सभी ...
विलुप्त होती परंपरा: जांदरा-घराट अब बन रहे यादों का हिस्सा

विलुप्त होती परंपरा: जांदरा-घराट अब बन रहे यादों का हिस्सा

उत्तरकाशी
  ग्रामीण जीवन की पहचान रही हस्तचालित चक्की और पनचक्की पर संकटनीरज उत्तराखंडीपहाड़ के गांवों में कभी हर घर की धड़कन रही हस्तचालित चक्की (जांदरा/जांजो) और जलधारा से संचालित पनचक्की (घराट) आज विलुप्ति की कगार पर हैं। आधुनिक तकनीक, बदलती जीवनशैली और तेजी से हो रहे पलायन के बीच ये पारंपरिक साधन अब बुजुर्गों की यादों और पुराने घरों के कोनों तक सीमित होकर रह गए हैं।संस्कृति और सामूहिक जीवन का केंद्रग्रामीण क्षेत्रों में जांदरा केवल अनाज पीसने का साधन नहीं था, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का अहम हिस्सा हुआ करता था। महिलाएं सुबह-शाम जांदरे पर काम करते हुए लोकगीत गाती थीं, जिससे न केवल श्रम सहज होता था बल्कि आपसी जुड़ाव भी मजबूत होता था।वहीं घराट, पहाड़ों की नदियों और गाड़-गदेरों के पानी से चलने वाली पर्यावरण अनुकूल तकनीक का उत्कृष्ट उदाहरण था। बिना बिजली के आटा पीसन...
मोरी उत्तरकाशी में आकाशीय बिजली का कहर: एक दर्जन से अधिक भेड़-बकरियों की मौत

मोरी उत्तरकाशी में आकाशीय बिजली का कहर: एक दर्जन से अधिक भेड़-बकरियों की मौत

उत्तरकाशी
 नीरज उत्तराखंडी, मोरी (उत्तरकाशी)विकासखण्ड मोरी के सला गांव के जंगलों में शनिवार को आकाशीय बिजली गिरने से बड़ा हादसा हो गया। इस प्राकृतिक आपदा में एक दर्जन से अधिक भेड़-बकरियों की मौत हो गई, जिससे स्थानीय पशुपालकों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा है। प्राप्त जानकारी के अनुसार, शनिवार को क्षेत्र में अचानक मौसम ने करवट ली और तेज बारिश के साथ आकाशीय बिजली गिरने लगी। उसी दौरान ग्राम कासला के पशुपालक—चैन सिंह (पुत्र जोत सिंह), संदीप (पुत्र चैन सिंह), नारायण सिंह (पुत्र चैन सिंह) और विक्रम सिंह (पुत्र जोत सिंह)—की भेड़-बकरियां सला गांव के जंगलों में चर रही थीं। अचानक गिरी बिजली की चपेट में आने से मौके पर ही एक दर्जन से अधिक पशुओं की मौत हो गई। बताया जा रहा है कि इन दिनों कासला गांव के पशुपालक अपने मवेशियों को चरान-चुगान के लिए मोरी क्षेत्र के सला गांव के जंगलों में ले जाते हैं...
मोरी के फिताड़ी गांव में भीषण अग्निकांड: 8 परिवार बेघर, 4 मकान जलकर राख, जनहानि टली

मोरी के फिताड़ी गांव में भीषण अग्निकांड: 8 परिवार बेघर, 4 मकान जलकर राख, जनहानि टली

उत्तराखंड हलचल
 ग्राउंड रिपोर्ट | मोरी (उत्तरकाशी) से नीरज उत्तराखंडीउत्तरकाशी जिले की मोरी तहसील के दूरस्थ गांव फिताड़ी में सोमवार देर रात एक भीषण अग्निकांड ने पूरे इलाके को दहशत में डाल दिया। रात करीब 11 बजे ग्राम प्रधान द्वारा आग लगने की सूचना मिलते ही प्रशासन हरकत में आया और फायर सर्विस मोरी व पुरोला, एसडीआरएफ, पुलिस, राजस्व और स्वास्थ्य विभाग की संयुक्त टीमें तुरंत मौके के लिए रवाना हुईं।फिताड़ी गांव, मोरी बाजार से करीब 35 किलोमीटर दूर दुर्गम क्षेत्र में स्थित है, जहां पहुंचना चुनौतीपूर्ण माना जाता है। ऐसे में शुरुआती राहत और बचाव का जिम्मा स्थानीय ग्रामीणों ने ही संभाला। ग्रामीणों की तत्परता और एकजुट प्रयासों से आग पर काबू पाया जा सका, जिससे एक बड़ा हादसा टल गया।हालांकि, आग की लपटों ने कई परिवारों की वर्षों की मेहनत को राख में बदल दिया। राजस्व उप निरीक्षक के अनुसार, आग लगने क...
विलुप्त होती परंपरा: खत्म होने की कगार पर ‘घुत्तू’ से कपड़े धोने की संस्कृति

विलुप्त होती परंपरा: खत्म होने की कगार पर ‘घुत्तू’ से कपड़े धोने की संस्कृति

उत्तरकाशी
  रीठा और क्वार पात थे कभी पहाड़ का प्राकृतिक सर्फ, आधुनिकता की दौड़ में गुम होती विरासतनीरज उत्तराखंडीपहाड़ों की पारंपरिक जीवनशैली आत्मनिर्भरता और प्रकृति के साथ संतुलन की अनूठी मिसाल रही है. इसी जीवन पद्धति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था ‘घुत्तू’—कपड़े धोने का एक देसी और पर्यावरण अनुकूल तरीका, जो आज आधुनिक वाशिंग मशीनों और रासायनिक डिटर्जेंट के बीच धीरे-धीरे विलुप्ति की कगार पर पहुंच गया है.क्या होता था ‘घुत्तू’?‘घुत्तू’ लकड़ी या पत्थर से बना एक पारंपरिक उपकरण होता था, जिसमें कपड़ों को पानी में भिगोकर डंडों या हाथों से पीट-पीटकर साफ किया जाता था. यह तरीका न केवल प्रभावी था, बल्कि पूरी तरह पर्यावरण के अनुकूल भी माना जाता था.रीठा और क्वार पात: प्राकृतिक सर्फआज जहां बाजार में केमिकल डिटर्जेंट का बोलबाला है, वहीं पहले कपड़े धोने के लिए प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेम...
ओलावृष्टि से उत्तरकाशी की यमुना घाटी में फसलों को भारी नुकसान, गंगोत्री-हर्षिल में बर्फबारी

ओलावृष्टि से उत्तरकाशी की यमुना घाटी में फसलों को भारी नुकसान, गंगोत्री-हर्षिल में बर्फबारी

उत्तरकाशी
 नीरज उत्तराखंडी, नौगांव, उत्तरकाशीजनपद उत्तरकाशी में सोमवार शाम मौसम ने अचानक करवट ले ली. तेज बारिश के साथ हुई ओलावृष्टि ने यमुना घाटी के कई क्षेत्रों में किसानों की मेहनत पर पानी फेर दिया. आराकोट, मोरी, नौगांव, पुरोला और बड़कोट क्षेत्र में करीब आधे घंटे तक हुई तेज ओलावृष्टि से नकदी फसलों को भारी नुकसान पहुंचा है. वहीं ऊंचाई वाले इलाकों में ठंड बढ़ गई है और गंगोत्री व हर्षिल घाटी में हल्की बर्फबारी दर्ज की गई. यमुना घाटी के नौगांव क्षेत्र की स्योंरी फल पट्टी, पुरोला के भंकोली और बड़कोट के धारी-कलोगी, मोरी के आराकोट बंगाण क्षेत्र सहित कई गांवों में अचानक ओले गिरने से खेतों में खड़ी मटर, गेहूं और सब्जियों की फसलें प्रभावित हुई हैं. ओलों की मार से खासकर मटर की फसल को सबसे अधिक नुकसान हुआ है. कई जगहों पर मटर की बेलें टूट गईं और तैयार फसल खेतों में बिछ गई. किसानों के अनुसार टम...