उत्तराखंड हलचल

वीरान होती छानियां

वीरान होती छानियां

उत्तराखंड हलचल
आशिता डोभालडांडा छानी (गौशाला)- पहाड़ों में हर मौसम के अनुसार और खेती-बाड़ी के अनुसार लोगों ने छानियां बनाई हुई रहती थी जिससे उन्हें अपनी खेती—बाड़ी के काम और चारा—पत्ती लाने में किसी भी तरह की परेशानियों का सामना न करना पड़े, इससे उनका समय भी बचता था और समय पर उनका काम भी निपटता था. उनकी समय सीमा भी निर्धारित रहती थी कि किस समय और किस मौसम में वो कौन—सी जगह की छानी में उनको रहने जाना है, उस हिसाब से फसल बोना और अपनी जरूरत का सामान जुटाकर जाना होता था. मार्च माह के मध्य में मैं और मेरे साथ मेरे गांव के दो चार लोग हम बुरांश लेने अपने गांव की डांडा छानी गए बल्कि जाना तो उससे भी ऊपर था और गए भी. सच कहूं तो बुरांश लेने जाना तो एक बहाना था मुझे तो उन छानियों को देखना था, जो कभी पशुओं और इंसानों से गुलजार हुआ करती थी, आज वो बिल्कुल निर्जन जंगल भी कहूं तो अतिश्योक्ति नहीं होगी. छानियां बिल्क...
प्रकृति की गोद में बसा हरकीदून, बुग्याल और कई किस्म के फूलों की महक जीत लेती है दिल

प्रकृति की गोद में बसा हरकीदून, बुग्याल और कई किस्म के फूलों की महक जीत लेती है दिल

उत्तराखंड हलचल
शशि मोहन रावत ‘रवांल्‍टा’मानव प्रकृति प्रेमी है. प्रकृति से ही उसे आनंद की अनुभूति होती है. मानव का प्रकृति से प्रेम भी स्वाभाविक ही है, क्योंकि प्रकृति उसकी सभी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति करती है. इसी प्रकृति ने पर्वतराज हिमालय की गोद में अनेक पर्यटन स्थलों का निर्माण किया है. इन्हीं पर्यटन स्थलों में "हरकीदून" एक अत्यंत रमणीय स्थली है. हरकीदून सीमान्त जनपद उत्तरकाशी का एक पर्यटन स्थल है. जहां प्रतिवर्ष देश-विदेशों से प्रकृति प्रेमी प्रकृति का अनुपम सौंदर्य निहारने के लिए पहुंचते रहते हैं. यह गोविन्दबल्लभ पंत वन्य जीव विहार एवं राष्ट्रीय पार्क के लिए भी प्रसिद्ध है. भोजपत्र, बुरांस व देवदार के सघन वृक्षों के अलावा यहां अमूल्य जीवनदायिनी जड़ी-बूटियां, बुग्याल एवं प्राकृतिक फल-फूल देखे जा सकते हैं.यहां वृक्षों में सर्वाधकि भोजपत्र (बेटुला युटिलिस) तथा खर्सू (क्वेरकस) के वृक्ष प...
लोक संस्कृति में रंग भरने वाला पहाड़ का चितेरा  

लोक संस्कृति में रंग भरने वाला पहाड़ का चितेरा  

उत्तराखंड हलचल
ललित फुलाराभास्कर भौर्याल बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं. उम्र सिर्फ 22 साल है. पर दृष्टिकोण और विचार इतना परिपक्व कि आप उनकी चित्रकारी में समाहित लोक संस्कृति और आंचलिक परिवेश को भावविभोर होकर निहारते रह जाएंगे. उनके चटक रंग बरबस ही अपनी दुनिया में खोई हुई आपकी एकाग्रता, को अपनी तरफ खींच लेंगे. वो जो अंकित कर रहे हैं, अपनी जड़ों की तरफ ले जाने की खुशी से आपको भर देगा. भास्कर के तैलीय चित्र हृदय की गहराई में जितने उतरते हैं, उनकी कुमाऊंनी में प्रकृति के सौंदर्यबोध वाली कविताएं उजाड़ मन में पहाड़ प्रेम को उतना ही ज्यादा भर देती हैं.भास्कर अब तक 200 से ज्यादा चित्र बना चुके हैं, जिनमें ग्रामीण परिवेश की बारीकियां, पहाड़ की संस्कृति में अहम भूमिका निभाने वाले वाद्य यंत्र, उत्तराखंड की संस्कृति के प्रतीक लोकनृ­त्य झोड़ा और चांचरी, एवं कुमाऊंनी, गढ़वाली और जौनसारी वेशभूषा.... आदि के विविध...
बॅम्बूसा पॉलिमार्फा : एक बहुउपयोगी बांस

बॅम्बूसा पॉलिमार्फा : एक बहुउपयोगी बांस

उत्तराखंड हलचल
जे. पी. मैठाणीबांस के संसार में बांस की कुल प्रजातियों को वानस्पतिक वर्गीकरण के आधार पर दो प्रमुख भागों में बांटा गया है. प्रथम बॅम्बूसा प्रजातियां जैसे- बॅम्बूसा पॉलिमार्फा, बॅम्बूसा वल्गेरिस, बॅम्बूसा बैम्बूस, बॅम्बूसा टुल्डा, बॅम्बूसा बालकोआ, बॅम्बूसा मल्टिप्लैक्स आदि. डैन्ड्राकैलेमस की प्रजातियों में डैन्ड्राकैलेमस एस्पर, डैन्ड्राकैलेमस हैमल्टोनाई, डैन्ड्राकैलेमस हेटरोस्टैचिया, डैन्ड्राकैलेमस लॉन्गिंपैथस, डैन्ड्राकैलेमस सिक्किमेन्सिस आदि. यह एक बहुत ही रोचक बात है कि बांस की प्रजातियों का उद्भव पृथ्वी पर लगभग 30 मिलियन वर्ष पहले हुआ. डायनासोर के विलुप्ति के बाद ही पृथ्वी पर बांस प्रजातियां उत्पन्न हुई हैं. आज हम आपको मूलतः म्यांमार, थाइलैण्ड, बांग्लादेश में पाए जाने वाले एक विशिष्ट बांस बॅम्बूसा पॉलिमार्फा के बारे में जानकारी दे रहे हैं. यह जानकारी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आजकल...
ना जाने कहां खो गई पोई और चुल्लू की महक

ना जाने कहां खो गई पोई और चुल्लू की महक

उत्तराखंड हलचल
आशिता डोभालपहाड़ों में बहुत—सी चीजें हमारे बुजुर्गों ने हमें विरासत के रूप में सौंपी हैं पर आज आधुनिकता की चमक—दमक और भागदौड़ भरी जीवनशैली में हम इन चीजों से कोसों दूर जा चुके हैं. हम अपनी पुराने खान—पान की चीजों को सहेजना और समेटना लगभग भूल ही गए हैं. अपने खान—पान में हमने पुराने अनाजों, पकवानों को कहीं न कहीं बहुत पीछे छोड़ दिया है. आज लोग उस खान—पान को ज्यादा पसंद कर रहे हैं जिसमें पौष्टिकता बहुत कम मात्रा में होती है और शरीर को नुकसान अलग से होता है, जिससे हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी आ रही है. हमारा शरीर रोगों से लड़ने के लिए कमजोर होता जा रहा है. जिस खाने में नाममात्र की भी पौष्टिकता नहीं होती है बल्कि शरीर को मजबूत बनाना तो दूर, कमजोर ज्यादा बना रहा है, ऐसे खान—पान को हमने अपने आज खाने में शामिल किया हुआ है.रवांई घाटी एक ऐसी घाटी है जहां पर लोगों ने आज भी अपनी परम्पराओ...
याद करना लोक-संस्कृति के अध्येता को

याद करना लोक-संस्कृति के अध्येता को

उत्तराखंड हलचल
डॉ. गोविन्द चातक की पुण्यतिथि (9 जून, 2007) पर विशेषचारु तिवारी‘‘सदानीरा अलकनंदा की तरल तरंगों ने राग और स्वर देकर, उत्तुंग देवदारु के विटपों ने सुगंधिमय स्वाभिमान देकर और हिमवन्त की सौंदर्यमयी प्रकृति ने अनुभूतियां प्रदान कर गोविन्द चातक की तरुणाई का संस्कार किया है. इसलिये चातक प्रकृत कवि, कोमल भावों के उपासक, लोक जीवनके गायक और शब्द शिल्पी बने हुये हैं.’’ (सम्मेलन पत्रिकाः लोक संस्कृति अंक)गढ़वाल की लोकविधाओं के संरक्षण और प्रचार-प्रसार में ही उन्होंने अपना जीवन लगा दिया. एक गहन अध्येता, संवेदनशील लेखक, प्रतिबद्ध शिक्षक, कुशल नाटककार, गूढ़ भाषाविद, प्रबुद्ध आलोचक, लोक विधाओं के शोधकर्ता के रूप में उनका योगदान हमेशा याद किया जायेगा. गढ़वाली भाषा और साहित्य के एक ज्ञानकोश के रूप में हम सब उन्हें जानते हैं.वे अपने आप में एक पहाड़ थे. लोक साहित्य और लोकभाषा के. लोक वि...
ईजा के जीवन में ओखली

ईजा के जीवन में ओखली

संस्मरण, उत्तराखंड हलचल
मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—14प्रकाश उप्रेतीये है-उखो और मुसो. स्कूल की किताब में इसे ओखली और मूसल पढ़ा. मासाब ने जिस दिन यह पाठ पढ़ाया उसी दिन घर जाकर ईजा को बताने लगा कि ईजा उखो को ओखली और मुसो को मूसल कहते हैं. ईजा ने बिना किसी भाव के बोला जो तुम्हें बोलना है बोलो- हमुळे रोजे उखो और मुसो सुणी रहो... फिर हम कहते थे ईजा- ओखली में कूटो धान, औरत भारत की है शान... ईजा, जै हनल यो...अक्सर जब धान कूटना होता था तो ईजा गांव की कुछ और महिलाओं को आने के लिए बोल देती थीं. उखो में मुसो चलाना भी एक कला थी. लड़कियों को बाकायदा मुसो चलाना सिखाया जाता था.उखो एक बड़े पत्थर को छैनी से आकार देकर बनाया जाता था वहीं मुसो मोटी लकड़ी का होता था लेकिन उसके आगे 'लुअक' (लोहे का) 'साम' (लोहे के छोटा सा गोलाकार) लगा होता था. उखो वाले पत्थर को 'खो' (आंगन का एक अलग हिस्सा) में लगाया जाता था. मुस...
उत्तराखंड में उद्यानीकरण की हकीकत

उत्तराखंड में उद्यानीकरण की हकीकत

उत्तराखंड हलचल
पलायन ‘व्यक्तिजनित’ नहीं ‘नीतिजनित’ है भाग-3चारु तिवारी सरकार बार-बार कह रही है कि उद्यानीकरण को रोजगार का आधार बनायेगी. मुख्यमंत्री अपने हर संबोधन में बता रहे हैं कि वे फलोत्पादन और नकदी फसलों से लोगों की आमदनी बढ़ायेंगे, ताकि वे महानगरों की ओर न भागें. सरकार अगर इस तरह सोच रही है तो निश्चित रूप से उसने उद्यानीकरण पर अपना रोडमैप जरूर तैयार किया होगा. मुख्यमंत्री और सरकार की ओर से वही पुरानी बातें कही गई हैं, जो योजनाओं और कागजों तक सीमित रहती हैं. इनके धरातल में न उतरने की वजह से ही लोगों का फलोत्पादन से मोहभंग हुआ. परंपरागत रूप से फलोत्पादन हमारी अर्थव्यवस्था का आधार रही है. फल, सब्जियों, कृषि उपजों आदि से ही ग्रामीण अपना भरण-पोषण करते रहे हैं. पहाड़ में मनीआर्डर की अर्थव्यवस्था एक साजिश है. बहुत तरीके से लाई गई है. यह साबित कराने के लिये कि पहाड़ों में कुछ नहीं हो सकता. बाहर ...
तिलाड़ी के शहीदों को याद करने का मतलब

तिलाड़ी के शहीदों को याद करने का मतलब

इतिहास, उत्तराखंड हलचल
30 मई शहादत दिवस पर विशेषआज 30 मई है. तिलाड़ी के शहीदों को याद करने का दिन. टिहरी राजशाही के दमनकारी चरित्र के चलते इतिहास के उस काले अध्याय का प्रतिकार करने का दिन. उन सभी शहीदों को विनम्र श्रद्धांजलि, जिन्होंने हमें अपने हक-हकूकों के लिये लड़ना सिखाया.चारु तिवारी अरे ओ जलियां बाग रियासत टिहरी के अभिमान! रवांई के सीने के दाग, तिलाड़ी के खूनी मैदान! जगाई जब तूने विकराल, बगावत के गणों की ज्वाल. उठा तब विप्लव का भूचाल, झुका आकाश, हिला पाताल. मचा तब शोर भयानक शोर, हिला सब ओर, हिले सब छोर. तिड़ातड़ गोली की आवाज, वनों में गूंजी भीषण गाज. रुधिर गंगा में स्नान, लगे करने भूधर हिमवान. निशा की ओट हुई जिस ओर, प्रलय की चोट हुई उस ओर. निशाचर बढ़ आते जिस ओर, उधर तम छा जाता घन-घोर. कहीं से आती थी चीत्कार, सुकोमल बच्चों की सुकुमार. विलखती अबलायें भी हाय! भटकती फिरती थी ...
उत्तराखंड में ठोस भूमि कानून की जरूरत

उत्तराखंड में ठोस भूमि कानून की जरूरत

उत्तराखंड हलचल
पलायन ‘व्यक्तिजनित’ नहीं ‘नीतिजनित’ है भाग-2चारु तिवारी कोरोना के चलते पहाड़ वापस आ रहे कामगारों को यहीं रोजगार देने के लिये सरकार ने प्रयास करने की बात कही है. पहाड़ से पेट के लिये लगातार हो रहे पलायन को रोकने की नीति तो राज्य बनने से पहले या अब राज्यत् बनने के शुरुआती दौर से ही बन जानी चाहिये थी. जब सरकार ने ऐसी मंशा व्यक्त की तो आज तक के अनुभवों को देखते हुये मैंने एक सिरीज शुरू की थी- ‘पलायन ‘व्यक्तिजनित’ नहीं ‘नीतिजनित’ है. इसकी पहली कड़ी में राज्य में मौजूदा कृषि भूमि की स्थिति को रखा. आज दूसरी कड़ी लिखने बैठा तो प्रदेश के मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र रावत जी का टीवी चैनल में साक्षात्कार देखा. उसमें उन्होंने वही घिसी-पिटी बातें कहीं, जिनके चलते लोगों को सरकार की नीतियों से विश्वास उठता रहा है. मुख्यमंत्री ने अपने साक्षात्कार में 2018 में अपनी उसी विवादास्पद ‘इंवेस्टर्स समिट’ का ...