पुस्तक-समीक्षा

भारतीय हिमालय क्षेत्र से मानवीय पलायन के बहुआयामों पर सार्थक चर्चा करती पुस्तक

भारतीय हिमालय क्षेत्र से मानवीय पलायन के बहुआयामों पर सार्थक चर्चा करती पुस्तक

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डॉ. अरुण कुकसालअपने गांव चामी की धार चमधार में बैठकर मित्र प्रो. अतुल जोशी के संपादन में प्रकाशित पुस्तक ‘भारतीय हिमालय क्षेत्र से पलायन: चुनौतियां एवं समाधान- Migration from Indian Himalaya Region: Challenges and Strategies' का अध्ययन मेरे लिए आनंददायी रहा है. इस किताब के because बहाने कुछ बातें साझा करना उचित लगा इसलिए आपकी की ओर मुख़ातिब हूं.उत्तराखंड ‘मेरी उन्नति अपने ग्राम और इलाके की उन्नति के साथ नहीं हुई है, उससे कटकर हुई है. जो राष्ट्रीय उन्नति स्थानीय उन्नति को खोने की कीमत पर होती है, वह कभी स्थाई नहीं because हो सकती. उत्तराखंड के बुद्धिजीवियों का देश की उन्नति में कितना ही बड़ा योगदान हो, उत्तराखंड की समस्याओं से अलगाव और उन्नति में योगदान से उदासीनता उनके जीवन की बड़ी अपूर्णता है. यह राष्ट्र की भी बड़ी त्रासदी है.’ वरिष्ठ सामाजिक चिंतक और अर्थशास्त्री प्रो. पी. सी. जोशी...
गढ़वाली भाषा और साहित्य को समर्पित बहुआयामी व्यक्तित्व- संदीप रावत

गढ़वाली भाषा और साहित्य को समर्पित बहुआयामी व्यक्तित्व- संदीप रावत

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डॉ. अरुण कुकसालप्रायः यह कहा जाता है कि जो समाज में प्रचलित और घटित हो रहा है, वह उसके समसामयिक साहित्य में स्वतः प्रकट हो जाता है. परन्तु इस धारणा के विपरीत यह भी कहा जा सकता है कि जो सामाजिक प्रचलन में अप्रासंगिक हो रहा है, ठीक उसी समय उसकी अभिव्यक्ति उसके साहित्य और संगीत में प्रमुखता से होने लगती है. लोक भाषायें और संगीत सामाजिक जीवन व्यवहार से हट रही हैं, परन्तु लोकभाषा और संगीत रचने का शोर चहुंओर है. गढ़वाळि भाषा-संगीत के विकास की बात करने वाले आये दिन और मुखर हो रहे हैं, पर उसको सामाजिक व्यवहार में लाने में उनमें से अधिकांश के प्रयास बस किताबी ही हैं.शरद लोक साहित्यकार संदीप रावत जैसे विरले ही हैं जो गढ़वाळि भाषा को पूरे समर्पण भाव से जवान हो रही पीढ़ी की मुख्य जुबान बनाने का प्रयास कर रहे हैं. गढ़वाळि साहित्य की प्रत्येक विधा में पारंगत उनकी लेखनी में कमाल का आकर्षण है. गढ़वाळि...
कुमाऊंनी महाकाव्य ‘न्यायमूर्ति गोरल’

कुमाऊंनी महाकाव्य ‘न्यायमूर्ति गोरल’

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डॉ. कीर्तिवल्लभ शक्टा रचित ग्वेल देवता महाकाव्य की समीक्षाडॉ. मोहन चंद तिवारीग्वेल देवता की लोकगाथा को आधार बनाकर अब तक दुदबोली कुमाऊंनी भाषा के स्थानीय लेखकों के द्वारा अनेक कविताएं, लघुकाव्य, खंडकाव्य, चालीसा तथा महाकाव्य विधा में साहित्यिक रचनाएं लिखी गई हैं और निरंतर रूप से आज भी लिखी जा रही हैं. किन्तु इन सबके बारे में एक व्यवस्थित जानकारी का अभाव-सा है. अब तक गोरिल देवता के सम्बन्ध में जो रचनाएं मेरे संज्ञान में आई हैं, उनमें गोलू देवता पर रचित काव्यों में कविवर जुगल किशोर पेटशाली रचित 'जय बाला गोरिया' और कुमाऊंनी लोक संस्कृति के रंगकर्मी त्रिभुवन गिरी महाराज द्वारा रचित 'गोरिल' महाकाव्य लोकविश्रुत रचनाएं हैं. इनके अलावा केशव दत्त जोशी द्वारा रचित 'ग्वल्ल देवता की जागर', कृष्ण सिंह भाकुनी विरचित 'श्री गोल्ज्यू काथ सौती राग', मथुरा दत्त बेलवाल रचित 'जै उत्तराखंड जै ग्वेल देव...
‘लोक में पर्व और परम्परा’

‘लोक में पर्व और परम्परा’

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‘जी रया जागि रया, यो दिन यो मास भेंटने रया, दुब जस पनपी जाया’अरुण कुकसालहिमालयी क्षेत्र एवं समाज के जानकार लेखक चन्द्रशेखर तिवारी की नवीन पुस्तक ‘लोक में पर्व और परम्परा’ कुमाऊं अंचल के सन्दर्भ में एक सामाजिक, सांस्कृतिक so और पर्यावरणीय विवेचन प्रस्तुत करती है. कुमाऊंनी जनजीवन के जीवन-मूल्यों एवं जीवंतता को यह पुस्तक खूबसूरती से बताती है. कुमाऊं अंचल के पर्व, परम्परा और संवाहक खंडों के फैलाव में 8 अध्यायों की यह पुस्तक है. पर्व खंड में- हरेला, सातूं-आठूं और गंगा दशहरा, परम्परा खंड में- कुमांऊ के विवाह संस्कार, नौल-धार और कुमाऊं के वस्त्राभूषण तथा संवाहक खंड में- लोकगायिका नईमा खान उप्रेती और कबूतरी because देवी के बारे में इस किताब में बेहतरीन जानकारी है. किताब में समाज वैज्ञानिक के बतौर चन्द्रशेखर तिवारी ने अपनी लेखकीय दृष्टि को पूरी तरह से शोधपरख रखा है. किताब का प्रकाशन...
लंबे अंतराल तक जेहन में प्रभाव छोड़ती डॉ कुसुम जोशी के लघुकथा संग्रह की कहानियां

लंबे अंतराल तक जेहन में प्रभाव छोड़ती डॉ कुसुम जोशी के लघुकथा संग्रह की कहानियां

पुस्तक-समीक्षा
डॉक्टर कुसुम जोशी का पहला लघुकथा संग्रह है 'उसके हिस्से का चांद'। इस संग्रह की लघुकथाएं बेहद सधी हुई हैं, जो कि लेखन की परिपक्वता, गहन अध्ययन और अनुभव की बारीकी से उपजी हैं। हर लघुकथा खत्म होने के लंबे अंतराल तक ज़ेहन में अपना प्रभाव छोड़ती हैं और हर कहानी का शीर्षक बेहद प्रभावशाली तरीके से उसका प्रतिनिधित्व करता है। इन लघु कथाओं को पढ़ते वक्त ऐसा महसूस होता है कि इनके पाठ और पुर्नपाठ की न सिर्फ आवश्यकता है बल्कि, इनको लेकर गहन विमर्श और शोध की भी जरूरत है। ये लघुकथाएं विषय विविधता, सोच की गहराई और अपने शिल्प व संवाद से न सिर्फ पाठकों को संतुष्ट करती हैं, बल्कि प्रभावित करते हुए समाधान भी दे जाती हैं।संवेदनात्मक स्तर पर ये लघु कथाएं जितने भीतर तक उद्वेलित करती हैं, उतना ही वैचारिक सवाल भी खड़ा करती हैं। नैतिकता का पाठ पढ़ाती हैं, तो विचारधारा का ढकोसलनापन भी उजागर करती हैं। इन लघु कथाओ...
मिट्टी में बीज की तरह रोपे गए हैं कविता में शब्दों के बीज

मिट्टी में बीज की तरह रोपे गए हैं कविता में शब्दों के बीज

पुस्तक-समीक्षा
डॉ. शशि मंगलप्रकृति से अत्यंत प्रेम becauseकरने वाली डॉ. कविता पनिया शिक्षिका भी हैं और कवयित्री भी जहाँ वह अपने विद्यार्थियों को बहुत कुछ सिखाती हैं वहीं प्रकृति से बहुत कुछ सीखती हैं अपने विद्यार्थियों को पढ़ाने के लिए उन्हें गढ़ने  के लिए जहाँ पढ़ती हैं वहीं अपने जीवन को गढ़ने के लिए प्रकृति को पढ़ने का प्रयास करती हैं और उसके अनेकानेक रूपों से अपने मन को तथा रचनाओं को गढ़ती हैं. कविता पनिया का becauseकाव्य संग्रह “कविमित्रा” राजमंगल प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है यह संग्रह संपूर्ण प्रकृति को समर्पित है. जिसमें कविता पनिया ने प्रकृति का मानवीकरण बखूबी किया है और प्रकृति से संवाद भी खूब किया हैं संवाद से रची इस कविता की पंक्तियों को देखिए –            अरे टहनी जरा becauseबताओ तो            हर वसंत तुम इतना becauseक्यों संवरती हो            फूलों के भार से हवाओं संग because कितना लचकती हो ...
सुभाष जिनके जीवन से जुड़ी हैं ना जाने कितनी रहस्य की परतें

सुभाष जिनके जीवन से जुड़ी हैं ना जाने कितनी रहस्य की परतें

पुस्तक-समीक्षा
रत्ना श्रीवास्तवआजादी की लड़ाई के becauseदौरान देश के शीर्ष नेताओं में थे नेताजी सुभाष चंद्र बोस. 18 अगस्त 1945 को विमान हादसे में उनके निधन की खबर आई. लेकिन इसके बाद लगातार ये खबरें भी आती रहीं कि वो जिंदा हैं. ये दावे 80 के दशक तक होते रहे. ऐसा लगता है कि नेताजी का जीवन ना जाने कितनी ही रहस्य की परतों में लिपटा हुआ है. आजादी अलग-अलग देशों की आला soखुफिया एजेंसियों ने अपने तरीकों से इस तारीख से जुड़ी सच्चाई को खंगालने की कोशिश की. कुछ स्वतंत्र जांच भी हुई. कई देशों में हजारों पेजों की गोपनीय फाइलें बनीं. तमाम किताबें लिखीं गईं. रहस्य ऐसा जो सुलझा भी लगता है और अनसुलझा भी. butदरअसल जापान से ये खबर आई कि 18 अगस्त 1945 को दोपहर ढाई बजे ताइवान में एक दुखद हवाई हादसे में नेताजी नहीं रहे. हालांकि हादसे के समय, दिन, हकीकत और दस्तावेजों को लेकर तमाम तर्क-वितर्क, दावे और अविश्वास जारी हैं. ...
दमखम से भरी, सुलगती कविताओं का झुंड है “कविता पर मुकदमा”

दमखम से भरी, सुलगती कविताओं का झुंड है “कविता पर मुकदमा”

पुस्तक-समीक्षा
सुनीता भट्ट पैन्यूलीएक बेहद ख़ूबसूरत, मासूम-सी कविता जहां मुन्नी गुप्ता के कविता संग्रह “कविता पर मुकदमा” का संपूर्ण सार छुपा हुआ है आप सभी  पाठक भी पढिय़े न..! अपने फैसले के साथ जीना चांद होना है गर तुम जी सको चांद बनकर तो सारा आकाश तुम्हारा है… आकाश “कविता पर मुकदमा” संग्रह  सामान्य दैनिक जीवन की ऊहापोह और संघर्ष की अनूभूतियों का संग्रह ही नहीं हैं अपितु धुंआ निकालती, दमखम से भरी हुई, सुलगती कविताओं का झुंड है’,so जिनकी आंच की ज़द में आकर शायद समाज में कहीं बदलाव की किरण महसूस की जा सके या नये जाग्रत समाज का उन्नयन हो. उपरोक्त वर्णित कविता संदेश दे रही है कि अपने फैसलों और अपने सिद्धांतों पर अडिग रहना ही ओजस्वी और  सफल होना है अथार्त किसी भी चुनौती का सामना करने के लिए निर्भीक चरित्र और  जीवन मुल्य के सिद्धांतो पर अडिगता अपरिहार्य है. यदि आप डटे रहते हैं अपने जीवन के सिद्धांत...
चकाचौंध से भरी दुनिया में उसके भीतर का अंधेरा

चकाचौंध से भरी दुनिया में उसके भीतर का अंधेरा

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"पति आमतौर पर सबसे अच्छे प्रेमी तब होते हैं, जब वे अपनी पत्नियों को धोखा दे रहे होते हैं"- मर्लिन मनरोप्रकाश उप्रेतीमर्लिन के इस कथन को पूर्णतः सत्य because नहीं माना जा सकता लेकिन झुठलाया भी नहीं जा सकता है. पितृसत्ता का अभ्यास और स्त्री को भोग की वस्तु समझे जाने वाली मानसिकता की बारीक नस को यह वाक्य पकड़ता है.मर्लिन इस किताब को बहुत पहले 'गोरख पाण्डेय' हॉस्टल के कमरा नम्बर 45 में, पढ़ा था. तब किताब किसी फिल्म की भांति चल रही थी. हर अध्याय क्लाइमेक्स की उत्सुकता को बढ़ा देता था. इधर इसे दोबारा पढ़ा तो पाठ ही बदल गया. किसी भी रचना को समय, काल but और परिस्थितियों से काट कर नहीं देखा जा सकता है. तकरीबन एक दशक बाद जब इस किताब को दोबारा पढ़ा तो स्वाभाविक ही पाठ बदला था. अर्थ की कई छवियाँ और निर्मित हो गई थीं.  "सिर्फ 36 वर्ष की उम्र... और कितना लंबा जीवन! इतना लंबा कि वह उससे थक चली ...
इतिहास की दहलीज पर रोशनियों की दस्तक!

इतिहास की दहलीज पर रोशनियों की दस्तक!

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सुनीता भट्ट पैन्यूलीकिसी किताब की सरसता,रोचकता,कौतुहलवर्धता उस किताब के मूलतत्व अथार्त विषय, तथ्य, भाषा, प्रमाण कथ्य,उद्देश्य पर निर्भर करती है।अपनी “हाशिये पर रौशनी" ध्रुव गुप्त जी द्वारा because लिखे गये एतिहासिक, पौराणिक, अध्यात्मिक, संगीत, साहित्य, कला, पर्यावरण से संबद्ध छब्बीस आलेखों के महत्वपूर्ण दस्तावेज हैं जो पाठकों के मष्तिष्क में जिज्ञासा पैदा करने हेतु उपरोक्त मापदंड पर खरी उतरती है।परिवेश इसमें विभिन्न रंग, परिवेश because और अपनी-अपनी लियाकत की कहानी बयां करती चित्रों की विथिका या अंधेरी गुफाओं में रौशनी के पुंज से सराबोर विभिन्न व्यक्तियों के जीवन चरित्र पर आधारित चित्रावली एक दम नया अहसास, अनोखी अनुभूति है।विलुप्तकिताब में इतिहास की because दहलीज पर रोशनियों की दस्तक है, उन हाशिये पर पड़ी महानतम आत्माओं पर जिनके अमुल्य व अतुलनीय योगदान व उनके महान व्यक्...