
‘सरूली’ जो अब नहीं रही
मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—48प्रकाश उप्रेतीअविष्कार, आवश्यकता की उपज है. इस उपज का इस्तेमाल मनुष्य पर निर्भर करता है. पहाड़ के लोगों की निर्भरता उनके संसाधनों पर है. आज अविष्कार और आवश्यकता की उपज “थेऊ” because और “सरूली” की बात. 'थेऊ' पहाड़ के जीवन का अनिवार्य हिस्सा है. खासकर गाय-भैंस पालने वाले लोगों के लिए तो इसका जीवनदायिनी महत्व है. ईजा के 'छन' का तो यह, महत्वपूर्ण सदस्य था.
ज्योतिष
'थेऊ' मतलब लकड़ी का एक ऐसा because प्याऊ जिसके जरिए नवजात बछड़े और 'थोरी' (भैंस की बच्ची) को दूध व तेल पिलाया जाता था. बांस की लकड़ी का बना यह प्याऊ अपनी लंबाई और गहराई में छोटा-बड़ा होता था. अंदर से खोखला और आगे से तराश कर पतला व थोड़ा समतल बनाया जाता था ताकि तेल- दूध गिरे भी न और थोरी के मुँह में भी आ जाए.
ज्योतिषईजा का 'गुठयार' (गाय-भैंस बांधने वाली जगह) भैंस के बिना कभी नहीं रहा. ईज...









