November 29, 2020
पर्यावरण

प्रदूषित गंगा और हम!

  • कमलेश चंद्र जोशी

कहते हैं प्रकृति हर चीज का संतुलन बनाकर रखती है. लेकिन अधिकतर देखने में यह आया है कि जहां-जहां मनुष्य ने अपना हाथ डाला वहां-वहां असंतुलन या फिर समस्याएं पैदा हुई हैं. इन समस्याओं का सीधा संबंध मनुष्य की आस्था, श्रद्धा, स्वार्थ या तथाकथित प्रेम से रहा है. गंगा को हमने मॉं कहा और गंगा के प्रति हमारे प्रेम ने उसको उस मुहाने पर लाकर छोड़ दिया जहां उसकी सफ़ाई को लेकर हर दिन हो-हल्ला होता है लेकिन न तो हमारे कानों में जूं रेंगती है और न ही सरकार के. गंगा को हमने उसके प्राकृतिक स्वरूप में प्रकृति की गोद में बहने के लिए छोड़ दिया होता और उसके पानी का इस्तेमाल सिर्फ अपनी जरूरतों की पूर्ति के लिए किया होता तो आज गंगा इस दशा में न होती कि उसकी सफाई के लिए प्रोजेक्ट चलाने पड़ते. ये सिर्फ इसलिए हुआ क्योंकि गंगा को हमने अपनी अंधी आस्था और स्वार्थसिद्धी का विषय बनाकर उसका दोहन करना शुरू कर दिया.

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की एक रिपोर्ट के अनुसार उत्तर प्रदेश व पश्चिम बंगाल में गंगा का पानी न सिर्फ पीने के लिए बल्कि नहाने तक के लिए उपयुक्त नहीं रह गया है. उत्तराखंड में गंगोत्री, रुद्रप्रयाग, देवप्रयाग, ऋषिकेश, रायवाला तथा बंगाल में डाइमंड हार्बर ही मात्र 6 जगह ऐसी हैं जहां कीटाणुशोधन के बाद आप गंगा का पानी पी सकते हैं. पीने योग्य पानी के इन 6 स्थानों के अलावा ही कुछ और जगहें हैं जहां गंगा के पानी में डुबकी लगाई जा सकती है.

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की एक रिपोर्ट के अनुसार उत्तर प्रदेश व पश्चिम बंगाल में गंगा का पानी न सिर्फ पीने के लिए बल्कि नहाने तक के लिए उपयुक्त नहीं रह गया है. उत्तराखंड में गंगोत्री, रुद्रप्रयाग, देवप्रयाग, ऋषिकेश, रायवाला तथा बंगाल में डाइमंड हार्बर ही मात्र 6 जगह ऐसी हैं जहां कीटाणुशोधन के बाद आप गंगा का पानी पी सकते हैं. पीने योग्य पानी के इन 6 स्थानों के अलावा ही कुछ और जगहें हैं जहां गंगा के पानी में डुबकी लगाई जा सकती है. 1100 से ज्यादा औद्योगिक इकाइयाँ गंगा के किनारे स्थापित हैं जिनमें से अधिकतर का गंदा पानी बिना किसी शुद्धीकरण के सीधे गंगा में प्रवाहित होता है. जिस गंगा का पानी वर्षों रखने के बाद भी खराब नहीं होता था आज उसी में कार्बन मोनो आक्साइड, सल्फर डाइआक्साइड और नाइट्रोजन डाइआक्साइड के सैंपल मिलने लगे हैं. विभिन्न रसायनों व कीटनाशकों से भरा हुआ खेतों से निकला जहरीला पानी भी गंगा की निर्मलता को मलिन करता है. उसके ऊपर हमारे कर्मकांडों और अंधविश्वासों का बोझ गंगा अलग से ढोती है.

अक्टूबर 2016 में ‘नेशनल गंगा काउंसिल’ का गठन व प्रधानमंत्री को उसका मुखिया बनाया जाना गंगा सफाई की तरफ एक अहम कदम था. प्रधानमंत्री के अलावा गंगा के किनारे पड़ने वाले पॉंच राज्यों (उत्तराखंड, उत्तरप्रदेश, बिहार, झारखंड व पश्चिम बंगाल) के मुख्यमंत्रियों को भी नेशनल गंगा काउंसिल के बोर्ड में सम्मिलित किया गया जिसकी साल में एक बार मीटिंग होना तय थी. सरकार ने यह भी तय किया कि पंचायती राज संस्थाओं व शहरी स्थानीय निकायों को भी गंगा सफाई के इस अभियान में शामिल किया जाएगा. राज्यों में गंगा कमेटी स्थापित की गई जिसका काम गंगा सफाई के कार्यों को धरातल पर क्रियान्वित करवाना था. देश के सात प्रसिद्ध भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों से गंगा सफाई के सुझाव मॉंगे गए. लेकिन इन तमाम कोशिशों के बावजूद कहीं न कहीं समन्वय की कमी व गंगा सफाई के प्रति केन्द्र व राज्य सरकारों तथा अन्य मंत्रालयों की उदासीनता ने गंगा को नुकसान ही पहुँचाया है.

गंगा एक्शन प्लान-I और II के बाद भारत सरकार की महत्वाकांक्षी परियोजना ‘नमामि गंगे’ भी सिर्फ एक उद्घोष बनकर रह गई है. गंगा सफाई को लेकर एक अलग मंत्रालय तक गठित किया गया लेकिन जब असल में गंगा की सफाई की बात आई तो गंगा साफ न होने पर उसमें समाधिस्थ हो जाने की कसमें खाने वाली मंत्री ने ही वह मंत्रालय छोड़ दिया.

2020 तक गंगा को साफ करने का लक्ष्य रखा गया और आज हम 2020 की समाप्ति की ओर बढ़ रहे हैं लेकिन गंगा के साफ होने की खबर तो दूर उसके और अधिक मलिन होने की खबरें सुनाई देने लगी हैं. गंगा एक्शन प्लान-I और II के बाद भारत सरकार की महत्वाकांक्षी परियोजना ‘नमामि गंगे’ भी सिर्फ एक उद्घोष बनकर रह गई है. गंगा सफाई को लेकर एक अलग मंत्रालय तक गठित किया गया लेकिन जब असल में गंगा की सफाई की बात आई तो गंगा साफ न होने पर उसमें समाधिस्थ हो जाने की कसमें खाने वाली मंत्री ने ही वह मंत्रालय छोड़ दिया. गंगा एक्शन प्लान-I (1986) से लेकर 2014 तक भारत सरकार ने गंगा सफाई के नाम पर 4000 करोड़ रूपए खर्च किये लेकिन परिणाम नकारात्मक ही रहा. मोदी सरकार ने एक नई उम्मीद के तहत लगभग 20000 करोड़ रूपए गंगा सफाई के लिए मंजूर किये लेकिन सफाई की डेडलाइन बढ़ाने से ज्यादा अब तक कुछ सकारात्मक हाथ नहीं लगा है.

प्रोफेसर जीडी अग्रवाल (स्वामी ज्ञान स्वरूप सानंद) ने गंगा की सफाई को लेकर 111 दिन तक उपवास किया. उपवास से पहले गंगा को प्रदूषण मुक्त करने के लिए उन्होंने दो पत्र प्रधानमंत्री मोदी को लिखे और एक अंतिम पत्र अपने उपवास के समय लिखा लेकिन न तो प्रधानमंत्री की तरफ से और न उनके कार्यालय से इन पत्रों का कोई जवाब आया. गंगा सफाई को लेकर प्रधानमंत्री द्वारा अपने भाषणों में दिखाई गई प्रतिबद्धता की याद दिलाते हुए प्रोफेसर अग्रवाल अपने पत्र में लिखते हैं कि आपसे उम्मीद करता हूँ पिछली सरकारों से लगभग दो कदम आगे बढ़कर आप गंगा की सफाई पर विशेष ध्यान देंगे. पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी ने गंगोत्री से लेकर उत्तरकाशी तक ‘इको सेंसिटिव जोन’ घोषित किया था ताकि गंगा जी को कम से कम नुकसान हो. आपकी गंगा के प्रति गंभीरता को देखते हुए उम्मीद करता हूँ कि आप उनसे बेहतर कदम उठाएँगे और मेरे पत्र का जवाब देंगे. अंत में पत्र का जवाब न मिलने की स्थिति में वो अपना उपवास प्रारंभ करते हैं और 11 अक्टूबर, 2018 को गंगा की शुद्धता के लिए अपनी देह त्याग देते हैं. ऐसी तमाम बातों को ध्यान में रखते हुए कुछ समय पूर्व एक कविता लिखी थी मैंने जो धरातल पर गंगा के विकृत होते रूप को दर्शाने की कोशिश करती है:

स्वार्थ सिद्धी को निश-दिन,
प्रबल आयाम दिया हमने.
खुद की शुद्धि की चाहत में,
गंगा को मलिन किया हमने.
कारख़ानों का दूषित जल,
जीवों का विरक्त मांसल,
कूड़े कचरे का विशाल ढेर,
भागीरथी में प्रवाह किया हमने.
खुद की शुद्धि की चाहत में,
गंगा को मलिन किया हमने.

गंगा अक्षुणता की ख़ातिर,
अन्न-जल भी त्याग दिया,
सानंद सरीखे संतों ने,
निज जीवन का बलिदान दिया,
उनके बलिदान को व्यर्थ धता,
राजनीतिक लाभ लिया हमने.
खुद की शुद्धि की चाहत में,
गंगा को मलिन किया हमने.

सरकारों का अगाध निर्मोह,
नमामि-गंगे सिर्फ़ एक शोर,
जल-समाधि की क़समें खाकर,
जाह्नवी को समाधिस्थ किया हमने.
खुद की शुद्धि की चाहत में,
गंगा को मलिन किया हमने.

आस्था और अंधविश्वास के नाम पर गंगा को मलिन होने से रोकने के लिए कड़े नियम बनाने होंगे. लोगों के जीवन में गंगा के महत्व और उसके इस तरह प्रदूषित होने के दूरगामी परिणामों को पहुंचाना होगा अन्यथा पाप मुक्ति दायिनी और मां कह कर संबोधित की जाने वाली गंगा को हम आखिर में इतना जहर से भर देंगे कि वो अपने वास्तविक स्वरूप को हमेशा के लिए खो बैठेगी.

कोरोना काल में हरिद्वार जैसी कुछ जगहों से गंगा के पानी के साफ होने की सुखद खबरें मिलने लगी हैं लेकिन लगभग 2525 किलोमीटर लंबी गंगा की सफाई कोई आसान काम नहीं है. सिर्फ सरकार का कोई एक्शन प्लान गंगा को साफ कर देगा यह कहना भी ठीक नहीं है. इसके लिए न सिर्फ राज्य सरकारों की बल्कि लोगों की सहभागिता भी नितांत आवश्यक है. बनाए गए एक्शन प्लान का धरातल पर क्या असर है और इसकी जवाबदेही किसकी होगी यह सब सरकारों को तय करना होगा. गंगा सफाई को लेकर औद्योगिक जगत के साथ लगातार मिलकर फैक्ट्रियों से निकलने वाले गंदे पानी के निस्तारण पर बात करनी होगी. घरों से निकलने वाले सीवेज का गंगा में सीधा प्रवाह रोकना होगा और जगह जगह दूषित जल उपचार संयंत्र लगाने होंगे. गंगा सफाई के नाम पर खर्च होने वाले बजट व उसके क्रियान्वयन का हिसाब लेना होगा. आस्था और अंधविश्वास के नाम पर गंगा को मलिन होने से रोकने के लिए कड़े नियम बनाने होंगे. लोगों के जीवन में गंगा के महत्व और उसके इस तरह प्रदूषित होने के दूरगामी परिणामों को पहुंचाना होगा अन्यथा पाप मुक्ति दायिनी और मां कह कर संबोधित की जाने वाली गंगा को हम आखिर में इतना जहर से भर देंगे कि वो अपने वास्तविक स्वरूप को हमेशा के लिए खो बैठेगी.

(लेखक एचएनबी गढ़वाल विश्वविद्यालय में शोधार्थी है)

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    कमलेश जोशी जी…. बहुत सुन्दर लेख के साथ रचना भी….!! सरकार के सरकारी घोषणा 20000 करोड़ का नमामि गंगे योजना सिर्फ कागजों पर दिखती है, कितना खर्च गंगा की सफाई एवं संवर्धन पर किया गया है जग जाहिर है, हालात बता रहे हैं |
    जरूरत है जनमानस के मां गंगा की साथ खिलवाड़ और ओछी आस्था को त्यागने की… |

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