Author: Himantar

हिमालय की धरोहर को समेटने का लघु प्रयास
मुआवजा

मुआवजा

किस्से-कहानियां
एम. जोशी हिमानीभादों के पन्द्रह दिन बीत गये हैं बारिश है कि रूकने का नाम ही नहीं ले रही है, जयंती अपने छज्जे से चारों तरफ देखने की असफल कोशिश करती है। उसके घर की तीनों तरफ की पहाड़ियां घने सफेद कोहरे से पूरी तरह से ढकी हैं, समझ में नहीं आ रहा कहां तक कोहरा जा रहा है कहां से बादलों की सीमा रेखा शुरू हो रही है, धरती आसमान सब एक से लग रहे हैं। जयंती एक अनजाने भय से रात भर सो नहीं पाती उसे लगता है इतनी ही बारिश यदि होती रही तो यह भी हो सकता है कि उसके घर के पीछे की पहाड़ी किसी दिन नीचे खिसक आये और वह यह धुंधली कोहरे भरी सुबह भी न देख पाये। पहाड़ों से भगवान भी इधर कई वर्षों से बुरी तरह नाराज चल रहे हैं इसीलिए तो वे हर बरसात में जिस तरह से बरसते हैं लगता है कि वे पूरे पहाड़ों को ढहाकर नीचे मैदानों के साथ मिला देंगे। पिछली बरसात की अमावस की रात जयंती को अभी भी बुरी तरह से खौफजदा कर देती है पल्ली...
पप्पू कार्की: सुरीली आवाज का जादूगर

पप्पू कार्की: सुरीली आवाज का जादूगर

संस्मरण
चारु तिवारीहम लोग उन दिनों राजधानी गैरसैंण आंदोलन के लिये जन संपर्क करने पहाड़ के हर हिस्से में जा रहे थे. हमारी एक महत्वपूर्ण बैठक हल्द्वानी में थी. बहुत सारे साथी जुटे. कुमाऊं क्षेत्र के तो थे ही गढ़वाल के दूरस्थ क्षेत्रों से भी कई साथी आये थे. हमारे हल्द्वानी के साथी सीए सरोज आनंद जोशी ने कहा कि बैठक शुरू होने से पहले कुछ गीत गा लेंगे. हम अपने कार्यक्रमों को जनगीतों से ही शुरू भी करते हैं. उन्होंने कहा कि मैं कुछ अच्छे गाने वालों से बात करता हूं. बैठक शुरू होने से पहले हारमोनियम के साथ गीत बजा- ‘पहाडा ठंडो पांणी, सुण कसि मीठी वाणी छोड़न नी लागनी... हाय... छोड़न नी लागनी.’वह पूरी तरह गीत में डूब कर. लय, सुर, मिठास और भाव-भंगिमा के साथ गाया गीत आज भी स्मृतियों में ज्यों का त्यों है. लगता है कहीं आसपास गीत गा रहा है पप्पू. उसमें शालीनता प्रकृति प्रदत्त थी. बहुत कोमल और बहुत उन्...
याद करना लोक-संस्कृति के अध्येता को

याद करना लोक-संस्कृति के अध्येता को

उत्तराखंड हलचल
डॉ. गोविन्द चातक की पुण्यतिथि (9 जून, 2007) पर विशेषचारु तिवारी‘‘सदानीरा अलकनंदा की तरल तरंगों ने राग और स्वर देकर, उत्तुंग देवदारु के विटपों ने सुगंधिमय स्वाभिमान देकर और हिमवन्त की सौंदर्यमयी प्रकृति ने अनुभूतियां प्रदान कर गोविन्द चातक की तरुणाई का संस्कार किया है. इसलिये चातक प्रकृत कवि, कोमल भावों के उपासक, लोक जीवनके गायक और शब्द शिल्पी बने हुये हैं.’’ (सम्मेलन पत्रिकाः लोक संस्कृति अंक)गढ़वाल की लोकविधाओं के संरक्षण और प्रचार-प्रसार में ही उन्होंने अपना जीवन लगा दिया. एक गहन अध्येता, संवेदनशील लेखक, प्रतिबद्ध शिक्षक, कुशल नाटककार, गूढ़ भाषाविद, प्रबुद्ध आलोचक, लोक विधाओं के शोधकर्ता के रूप में उनका योगदान हमेशा याद किया जायेगा. गढ़वाली भाषा और साहित्य के एक ज्ञानकोश के रूप में हम सब उन्हें जानते हैं.वे अपने आप में एक पहाड़ थे. लोक साहित्य और लोकभाषा के. लोक वि...
पेट पालते पेड़ और पहाड़ 

पेट पालते पेड़ और पहाड़ 

संस्मरण
मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—19प्रकाश उप्रेतीआज बात उस पहाड़ की जो आपको भूखे नहीं रहने देता था. तस्वीर में आपको- तिमिल और कोराय के पेड़ नज़र आ रहे हैं. तिमिल की हमारे यहां बड़ी मान्यता थी. गाँव में तिमिल के तकरीबन 10-12 पेड़ थे. कहने को वो गाँव के अलग-अलग लोगों के थे लेकिन होते वो सबके थे. एक तरह से तिमिल साझी विरासत का पेड़ था. तिमिल के पत्ते बहुत चौड़े होते थे. उन पत्तों का इस्तेमाल शादी-ब्याह में पत्तल और पूड (दोने) के तौर पर होता था. साथी ही 'सज्ञान' (कोई भी लोक पर्व या उत्सव) के दिन गाँव में तिमिल के पत्तों में रखकर ही 'लघड़' (पूरी) बांटते थे. ईजा 'कौअ बाई' (कौए के लिए पूरी) निकालने के लिए भी तिमिल के पत्तों का उपयोग करती थीं. इसलिए पेड़ किसी का भी हो अधिकार सबका होता था.सज्ञान के दिन ईजा हमको सुबह-सुबह नहलाकर, पिठ्या लगाकर कहती थीं कि "च्यला जरा तिमिलेक पतेल ली हा". हम ...
कालेकावा और उतरैंणि कौतिक

कालेकावा और उतरैंणि कौतिक

संस्मरण
‘बाटुइ’ लगाता है पहाड़, भाग—10रेखा उप्रेतीमाघ की पहली भोर, पहाड़ों पर कड़कड़ाता जाड़े का कहर, सूरज भी रजाई छोड़ बाहर आने से कतरा रहा है, पर छोटे-छोटे बच्चे माँ की पहली पुकार पर उठ गए हैं. आज न जाड़े की परवाह है न अलसाने का लालच. झट से सबने अपनी ‘घुगुती माला’ गले में डाल ली है और छज्जे से बाहर झाँककर एक स्वर में गाने लगे हैं… काले कावा काले घुगुती मावा खाले… पहाड़ छूटे चालीस बरस हो चुके हैं, पर मकर-संक्रांति पर मनाये जाने वाले ‘घुगुती-त्यार’ के दृश्य अब भी आँखों में तिरते हैं…. एक शाम पहले गुड़ के पाग में गूँथे आटे से विभिन्न आकृतियों के घुगुत बनाए जा रहे हैं.  लोई को हथेलियों से पतले लम्बे रोल में बदल, उसे ट्विस्ट कर घुगुत का आकार दिया जा रहा है. बच्चे परात को घेर कर बैठे हैं. सबके हाथों में आटे की लोइयाँ हैं. कलाकारी दिखाने का अवसर है. ‘देखो, मैंने दाड़िम का फूल बनाया..’ एक कहता ‘और...
गढ़वाल की सैन्य परंपरा का प्रारम्भिक महानायक

गढ़वाल की सैन्य परंपरा का प्रारम्भिक महानायक

इतिहास
लाट सूबेदार बलभद्र सिंह नेगी (सन् 1829 - 1896)डॉ. अरुण कुकसाल‘जिस अंचल में बलभद्र सिंह जैसे वीरों का जन्म होता है, उसकी अपनी अलग रेजीमेंट होनी ही चाहिए.’ कमान्डर इन चीफ, पी. रोबर्टस ने सन् 1884 में तत्कालीन गर्वनर जनरल लार्ड डफरिन को गढ़वालियों की एक स्वतंत्र बटालियन के गठन के प्रस्ताव की भूमिका में ये महत्वपूर्ण तथ्य लिखा था. तत्कालीन बिट्रिश सरकार ने सन् 1887 में अल्मोड़ा में तैनात गोरखा राईफल में भर्ती गढ़वाली एवं अन्य सैनिकों को मिलाकर ‘गढ़वाल राईफल’ का गठन करके उसका मुख्यालय ‘कळों का डांडा’ (लैंसडौन) में स्थापित किया था. इससे पूर्व गढ़वाल के युवा गोरखा राईफल में ही भर्ती हो पाते थे.सैनिक सेवाओं के दौरान उन्हें दो बार ‘ऑडर ऑफ मेरिट’ का अवार्ड दिया गया. सन् 1887 में सेना से अवकाश ग्रहण करने के बाद बिट्रिश सरकार ने उनकी सराहनीय सैनिक सेवाओं का सम्मान करते हुए घोसीखाता (कोटद्व...
औरत कोई देवी नहीं

औरत कोई देवी नहीं

आधी आबादी
डॉ. दीपशिखानहीं वो कोई देवी नहीं,  इंसान है बस. उसको केवल कन्या-पूजन में मत पूजो. ताकि वो ज़िंदगी भर देवत्व के भ्रम-बोझ में बंध-दब अपनी ज़िंदगी खुल के ना जी पाए. जैसे आप कोई देवता नहीं इंसान हैं. जैसे आप को होता है दर्द. आप से होती हैं ग़लतियां. वैसी ही हैं वो भी. वो कोई देवी नहीं.हां, ये भी सच है कि केवल लड़की को जाना पड़ता है अपना घर-परिवार छोड़कर शादी के बाद. केवल इतना मत सोचिए-बोलिए कि दोनों में से एक को तो ये करना ही पड़ेगा. उनका सम्मान कीजिए. उनके दोनों घरों में.आपको श्रद्धा है यदि उनके गुणों के प्रति तो आप करिए उनका सम्मान. दीजिए उनका साथ. जीवन के हर उस मोड़ पर जब उसे सहनशील, सुशील, कर्मठ, अबला, जगत्-जननी समझ छोड़ दिया जाता है अपनी लड़ाई लड़ने को अकेले.हां ये सच है कि हर महीने पीरियड्स केवल लड़कियों को ही हो सकते हैं. आप कुछ बदल नहीं सकते. बस साथ दीजिए उनका जब वो इ...
जागर, आस्था और सांस्कृतिक पहचान की परंपरा

जागर, आस्था और सांस्कृतिक पहचान की परंपरा

संस्मरण
मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—18प्रकाश उप्रेतीआज बात बुबू (दादा) और हुडुक की. पहाड़ की आस्था जड़- चेतन दोनों में होती है . बुबू भी दोनों में विश्वास करते थे. बुबू 'जागेरी' (जागरी), 'मड़-मसाण', 'छाव' पूजते थे और किसान आदमी थे. उनके रहते घर में एक जोड़ी भाबेरी बल्द होते ही थे. खेती और पूजा उनकी आजीविका का साधन था. उनका व्यक्तित्व बड़ा आकर्षक था. तकरीबन 5 फुट 8 इंच का कद, ललाट पर चंदन, कानों में सोने के कुंडल, हाथ में चांदी के कड़े, सर पर सफेद टोपी जिसमें एक फूल, बदन पर कुर्ता- भोटु और धोती, हाथ में लाठी जिसमें ऊपर की तरफ एक छोटा सा घुँघरू रहता व नीचे लोहे का 'सम'(लोहे की नुकीली चीज) और आवाज इतनी कड़क की गाँव गूँजता था. इलाके भर में उनको सब जानते थे. जब भी जागेरी लगाने जाते थे तो कंधे पर एक झोला होता था जिसमें हुडुक, लाल वाला तौलिया, मुरली (बाँसुरी), 'थकुल बजेणी आंटु' (थाली बजाने वाल...
कोरोना जनित संकट: मजदूरों को झेलनी पड़ी सबसे अधिक मुसीबत और बेरोजगारी

कोरोना जनित संकट: मजदूरों को झेलनी पड़ी सबसे अधिक मुसीबत और बेरोजगारी

समसामयिक
अनीता मैठाणीसुख हो, दुख हो, आपद हो, विपद हो बच्चे जब तक माता-पिता के छत्र-छाया में होते हैं सब झेल जाते हैं. क्योंकि माता-पिता अपनी जान पर खेलकर भी अपने नन्हें-मुन्नों को आंच नहीं आने देते. यदि विचार करें तो जनता के लिए सरकारें भी माता-पिता की भूमिका में होते हैं यदि वे इसे स्वीकारें और दायित्व निभाएं तो. परंतु यहाँ होता कुछ और है चुनाव के वक्त सरकारें जनता को माई-बाप कहने को तैयार रहती हैं और चुनाव जीतते ही सारे वादों को भुलाकर अधिष्ठाता बन बैठती है. देश में कोरोना की शुरुआत से पहले ही सरकार ये दावा कर चुकी थी कि हमारी तैयारी पर्याप्त है और यूं भी हमारे देशवासियों को घबराने की बिल्कुल भी आवश्यकता नहीं है. वैसे भी ये जो कोरोना वायरस है इससे लड़ने की क्षमता हममें अधिक है क्यूंकि हम जिन परिस्थितियों में रहते हैं उससे हमारी रोग-प्रतिरोधक क्षमता इतनी मजबूत हो चुकी है कि हमें ऐसे छोटे-मोटे ...
रूढ़िवादी परंपराओं को तोड़ती महिलाएं

रूढ़िवादी परंपराओं को तोड़ती महिलाएं

साहित्‍य-संस्कृति
अशिता डोभालपुराने समय में एक कहावत थी कि यदि कोई व्यक्ति थका हुआ सा दिखता था तो कहा जाता था कि तुम कौन सा "हल चला कर आए हो या हल लगाकर आए हो". वर्तमान समय में कोरोना वायरस के प्रकोप से सभी लोग अपने—अपने घरों में कैद होकर रह गए हैं. सभी अपना समय अपने तरीके से व्यतीत कर रहे हैं. कोई पेंटिंग, बागवानी, नगदी फसल उगाकर कर रहे तो कोई खाने पीने की चीजों पर अपना हाथ आजमा रहे हैं. मैंने भी शुरुआत में रवांई घाटी के परम्परागत व्यंजनों पर अपना हाथ आजमाया, फिर कभी—कभार ऑफिस के छोटे—मोटे काम करके समय का पता नहीं चलता था पर लॉकडॉउन में एक अनुभव लेने का मौका मेरे हाथों में आ गया, वो था हल चलाना. पिछले कुछ समय से मेरे दिमाग में एक बात रह रहकर आ रही थी कि जिंदगी में लगभग सारे कामों में हाथ आजमाया है, एक बार हल पकड़ने का मौका मिल जाए तो मानो सारा जहां मिल जाए. रोज शाम को हम टहलने के लिए निकलते हैं, कभी क...