November 27, 2020
समाज/संस्कृति

उत्तराखंड के पहाड़ों से शुरू होता है वैदिक जल प्रबंधन व कृषि प्रबन्धन का स्वर्णिम इतिहास

भारत की जल संस्कृति-6

  • डॉ. मोहन चन्द तिवारी

मैंने अपने पिछले लेख में वैदिक जलविज्ञान के प्राचीन इतिहास के बारे में बताया है कि वेदों के मंत्रद्रष्टा ऋषियों में ‘सिन्धुद्वीप’ सबसे पहले जलविज्ञान के आविष्कारक ऋषि हुए हैं, जिन्होंने जल के प्रकृति वैज्ञानिक‚ औषधि वैज्ञानिक, मानसून वैज्ञानिक और कृषिवैज्ञानिक महत्त्व को वैदिक संहिताओं के काल में ही उजागर कर दिया था. इस लेख में उत्तराखंड के पहाड़ों से शुरू हुए वैदिक कालीन कृषिमूलक जलप्रबंधन और ‘वाटर हारवेस्टिंग’ प्रणाली के बारे में जानकारी दी गई है.

पहाड़ के बारे में वर्त्तमान में एक मिथ्या भ्रांति फैली हुई है कि “पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी पहाड़ के काम नहीं आनी.” इसी जुमले से नेता लोग चुनाव भी लड़ते हैं और पहाड़ के घर घर में नल पहुंचाने और यहां के नौजवानों को रोजगार देने का वायदा भी करते हैं. पर उत्तराखंड के पहाड़ों का सच यह है कि जलसंकट दिन प्रतिदिन गहराता जा रहा है और पहाड़ के नौजवान रोजगार के अभाव में पलायन के लिए मजबूर हैं. अभी ज्यादा वक्त नहीं बीता कोई बीस पच्चीस वर्ष पहले तक मैंने अपने चाचा जी के साथ जालली घाटी के धान के सेरों (खेतों) में हुड़की बॉल के साथ सामूहिक धान की रोपाई को कई बार अपनी आंखों से देखा था. मेरे पैतृक गांव जोयूं,सुरेग्वेल से करीब चार कि.मी. ऊपर ‘दाणू थान’ (दानव स्थान) की सफेद डांसी वाले उन पहाड़ियों की वीडियो भी मैंने बनाई है, जहां के बारे में यह जनश्रुति प्रचलित है कि पुराकाल में यहां एक ऐसा दर्दनाक हादसा हुआ था कि अचानक बारिस हो जाने से ‘बार बीसी बारात’ यानी 240 लोगों की बारात पानी में डूब गई और ब्योली (दुल्हन) भी उस हादसे में डोली सहित डूब गई.हमारे द्वाराहाट क्षेत्र में इस दुर्घटना को लेकर एक झोड़ा भी प्रसिद्ध है-

“बार बीसी बर्याता डूबी
ब्योलि डूबी स्यों डोलि सुति”

दरअसल, ‘दाणू थान’ के ये सफेद डांसि के पहाड़ वर्त्तमान भूवैज्ञानिक दृष्टि से पुराकाल में वे पहाड़ी चट्टानों के लबालब पानी से भरे तालाब (ऐक्वफ़र) हुआ करते थे जहां से नीचे जालली घाटी में पानी के गधेरे बहते थे जिससे वैदिक युग में एक बहुत बड़े भूभाग 20-25 कि.मी.दूर सिलोर महादेव तक सामूहिक रूप से धान की खेती उगाई जाती थी. यह ‘दाणू थान’ का स्थान पहले देवों और दानवों की सीमावर्ती भूमि रही थी, जिसके एक ओर ‘सुर’ यानी देवजाति के लोग और दूसरी ओर असुर जाति के लोग बसे हुए थे जिनकी वजह से यह स्थान ‘दाणूथान'(संस्कृत में ‘दानव स्थान’) और ‘सुरेखेत’ (संस्कृत में सुरक्षेत्र) के रूप में आज भी प्रसिद्ध है.

मैंने 2015 में अपनी शोध योजना के दौरान इस स्थान की पहचान वैदिक आर्यों की धान उत्पादक आवासीय बस्ती के रूप में की है.क्योंकि यहां से बहुत अधिक मात्रा में हजारों वर्ष पुराने शवागरों के अवशेष मिले हैं, और पुरातनकाल की मेगलिथिक कपमार्क ओखलियां भी मिली हैं, जिनका प्रयोग आर्य किसान धान कूटने के लिए किया करते थे. मेरी इस शोधपूर्ण योजना की रिपोर्ट द्वाराहाट के वरिष्ठ पत्रकार जगत रौतेला ने “जालली घाटी और दाणुथान में दबा रहस्य” शीर्षक से 7 मई, 2015 को दैनिक जागरण में प्रकाशित भी की है.

भारतीय इतिहास और संस्कृति का अध्येता और शोधकर्त्ता होने के नाते मैं इस लेख के माध्यम से  बताना यह चाहता हूं कि जो पहाड़ आज पारंपरिक जलस्रोतों के सूख जाने के कारण पानी की एक एक बूंद के लिए तरस रहा है और समुचित जलप्रबंधन के अभाव में धन धान्य बरसाने वाली जिस पहाड़ की उपजाऊ भूमि अधिकांश रूप से बंजर हो चुकी है, और राज्य की ओर से कृषिप्रबन्धन की लापरवाही के कारण यहां के नौजवान आज आजीविका हेतु पलायन के लिए मजबूर हैं तो वही उत्तराखण्ड हिमालय का पहाड़ पुरातनकाल में अपनी उन्नत धान की खेती, उत्कृष्ट कृषिप्रबंधन के साथ साथ जल प्रबंधन और ‘वाटर हारवेस्टिंग का भी पुरस्कर्त्ता क्षेत्र बना हुआ था.

देवराज इंद्र ने इसी सरस्वती नदी के तट पर सर्वप्रथम कृषि का नियोक्ता बनकर और मरुद्गणों ने काश्तकार बनकर कृषि सभ्यता का आविष्कार किया था. उन्होंने ही सबसे पहले सरस्वती नदी के प्रवाह क्षेत्र में ‘यव’ अर्थात् जौ की खेती की बुवाई की और उसके बाद धान की खेती का भी आविष्कार किया.

भारत की प्राचीनतम कृषि सभ्यता का उद्भव व विकास सिन्धु-सरस्वती और गंगा-यमुना की नदी-घाटियों में हुआ था. वैदिक काल की भौगोलिक पृष्ठभूमि का यदि अवलोकन करें तो उत्तराखंड हिमालय से ही सरस्वती नदी का उद्गम होता है वर्त्तमान हरियाणा, पंजाब और राजस्थान की अधिकांश तटवर्ती भूमियों को यह नदी उर्वर और उपजाऊ बनाती थी. अथर्ववेद के एक मन्त्र (6.30.1) में उल्लेख आया है कि देवराज इंद्र ने इसी सरस्वती नदी के तट पर सर्वप्रथम कृषि का नियोक्ता बनकर और मरुद्गणों ने काश्तकार बनकर कृषि सभ्यता का आविष्कार किया था. उन्होंने ही सबसे पहले सरस्वती नदी के प्रवाह क्षेत्र में ‘यव’ अर्थात् जौ की खेती की बुवाई की और उसके बाद धान की खेती का भी आविष्कार किया. इस तरह भारतीय कृषि सभ्यता में सर्वाधिक पवित्र माना जाने वाला पहला कृषि अनाज जौ था, जो मनुष्यों द्वारा नहीं, बल्कि देवताओं द्वारा उगाया गया था-

“देवा इमं मधुना संयुतं यवं
सरस्वत्यामधि मणावचर्कृषुः.
इन्द्र आसीत्सीरपतिः शतक्रतुः
कीनाशा आसन् मरुतः सुदानवः॥”
                      -अथर्ववेद,6.30.1

भारत वैदिक काल से ही कृषिप्रधान देश रहा है.कृषि की आवश्यकताओं को देखते हुए ही यहां  वृष्टिविज्ञान, मेघविज्ञान और मौसमविज्ञान की मान्यताओं का भी वैज्ञानिक धरातल पर समानान्तर रूप से विकास हुआ. सिंधुघाटी की सभ्यता, जो अब वैदिक आर्यों की सारस्वत सभ्यता के रूप पहचानी जाती है,विश्व की सबसे प्राचीन कृषि सभ्यता थी. इसी सिंधु सभ्यता के किसान गर्मियों और जाड़ों के मानसूनी वर्षा पर निर्भर हो कर साल में दो बार खरीफ और रबी की फसल उगाते थे. पर ध्यान देने की बात यह है कि हजारों सालों के बाद आज भी भारत के किसान वैदिक काल और हड़प्पा काल की कृषि परम्पराओं का अनुसरण करते हुए ही साल में दो बार खरीफ और रबी की फसल पैदा करते हैं. इसका मुख्य कारण यह है कि भारत की कृषि व्यवस्था हजारों वर्षों से  साल में दो बार आने वाले मानसूनों – ‘दक्षिण पश्चिमी मानसूनों’ और ‘उत्तर पूर्वी’ मानसूनों’ की वर्षा पर निर्भर होकर ही अपने कृषि सम्बन्धी कार्य करती आई है.

वैदिक काल में भी लोग आज की तरह  विभिन्न जनसमुदायों (जन) में विभाजित थे,जिनके लिए ऋग्वेद में ‘पंचजना:’ का प्रयोग आया है और वहीं काश्तकार किसानों के लिए अथर्ववेद (12.1.42) में ‘पंचकृष्टया’ का उल्लेख मिलता है.अथर्ववेद के ‘भूमि सूक्त’ में सारस्वत प्रदेशों की कृषिभूमि को ही ‘पंचकृष्टया’ भूमि की संज्ञा दी गई है,जिसमें मेघों द्वारा निश्चित समय पर वर्षा होने के कारण जौ चावल आदि अन्न प्रचुर मात्रा में उत्पन्न होते थे.इसलिए उस भूमि को ‘पर्जन्य पत्नी’ यानी मेघपत्नी के रूप में भी नमस्कार किया गया है-

“यस्यामन्नं व्रीहियवौ यत्रेमा: पञ्च कृष्टयः.
भूम्यै पर्जन्यपत्न्यै नमोस्तु वर्षमेदसे॥”
                         -अथर्ववेद,12.1.42

अर्थात् जिस भूमि में धान और जौ आदि विभिन्न अन्न उत्पन्न होते हैं,मेघ जिसका पालन करते हैं और वर्षाजल से जिसे तृप्त करते हैं,जिस भूमि के हम निवासी हैं,उस मातृभूमि को हमारा नमस्कार है.

वैदिक काल के जलप्रबन्धक आर्य किसान चाहे वे उत्तराखंड हिमालय के ग्रामों में बसे थे या सिंधु घाटी की सभ्यता के हड़प्पा कालीन शहरों में, वे अपने प्राकृतिक जल संसाधनों का कृषि की दृष्टि से सदुपयोग करने में सिद्धहस्त थे.

यजुर्वेद व अथर्ववेद में अनेक अन्नों के नाम आए हैं. किन्तु जौ और चावल का नामोल्लेख सबसे ज्यादा हुआ है. इस सन्दर्भ में मैंने अपने एक शोधलेख (उत्तरांचल पत्रिका,सितंबर ,2002 ) के द्वारा उत्तराखंड हिमालय की धानसंस्कृति और उससे जुड़े पुरातात्त्विक साक्ष्यों के बारे में यह बताने का प्रयास किया है कि उत्तराखंड की रामगंगा घाटी, जालली घाटी और गगास घाटी के धान के सेरे (खेत) वैदिक काल में कृषि व्यवस्था के सर्वाधिक पानी वाले ‘सिमार’ यानी धान उत्पादक उपजाऊ खेत थे जहां सर्वप्रथम धान की खेती का आविष्कार हुआ था.मगर ये स्थान अब नदियों और गाड़ गधेरों के सूख जाने के कारण अधिकांश रूप से बंजर हो गए हैं.

वैदिक काल के जलप्रबन्धक आर्य किसान चाहे वे उत्तराखंड हिमालय के ग्रामों में बसे थे या सिंधु घाटी की सभ्यता के हड़प्पा कालीन शहरों में, वे अपने प्राकृतिक जल संसाधनों का कृषि की दृष्टि से सदुपयोग करने में सिद्धहस्त थे. हड़प्पा सभ्यता के जलप्रबंधन की चर्चा मैं आगे विस्तार से करुंगा. यहां वैदिक कालीन कृषि से सम्बंधित जल प्रबंधन के सम्बन्ध में खासतौर से बताना चाहुंगा कि हिमालय की गिरि कंदराओं में बसी हुई कृषि व्यवस्था मुख्य रूप से दो वर्गों में विभाजित थी-1.वर्ष्य- वर्षा के जल पर निर्भर रहने वाली कृषि और 2.अवर्ष्य – वर्षा पर निर्भर न रहने वाली अर्थात् कूप, तालाब, नहर आदि सिंचाई के साधनों पर निर्भर कृषि. कालांतर में इन्हीं दो प्रकार की कृषि व्यवस्थाओं को क्रमशः ‘देवमातृक’  और ‘अदेवमातृक’ नाम से भी जाना जाने लगा.

वैदिक काल में ज्यादातर कृषि तो मानसूनी वर्षा पर ही निर्भर करती थी. वैदिक संहिताओं में इसी लिए पर्जन्य आदि देवताओं से वर्षा ऋतु में आने वाली वर्षा के लिए बार बार प्रार्थना के स्वर सुनाई देते हैं-

“भूमिं पर्जन्य पयसा समङ्धि.” -अथर्ववेद,4.15.6

हे बादल ! आओ! इस कृषिभूमि को पानी बरसाकर  सींचो!

“वर्षस्य सर्गा महयन्तु भूमिम्” -अथर्ववेद,4.15.2 – अर्थात् साल भर में आने वाली मानसूनी वर्षा हमारी इस भूमि को महिमामयी बना दें.

“वाश्रा आपः पृथिवीं तर्पयन्तु” -अथर्ववेद,4.15.1 – अर्थात् ये वार्षिक मानसून हमारी भूमि को तृप्त कर दें.

इन वैदिक ऋचाओं के उद्धरणों से एक बात तो स्पष्ट हो जाती है कि वैदिक काल की मौसम वैज्ञानिक इकोलॉजी और हिमालय का नदी विज्ञान और वहां के ग्लेशियरों से निकलने वाली जल धाराओं के कारण ही समूचा उत्तराखंड क्षेत्र उर्वर और उपजाऊ बना हुआ था, जिसका मुख्य कारण था वैदिक जलवैज्ञानिकों का वृष्टिजल का कृषिपरक सदुपयोग और सिंचाई के साधनों का समुचित जलप्रबंधन. यही कारण है कि वहां धान और जौ का प्रभूत मात्रा में उत्पादन इसलिए भी सम्भव हो सका कि सालाना मानसूनों की वर्षा के साथ साथ वहां के आर्य किसानों द्वारा प्रयोग किए जाने वाले कृत्रिम सिंचाई के साधन और  ‘वाटर हार्वेस्टिंग’ सिस्टम भी उच्च कोटि का रहा था.

वैदिककाल में वर्षा के अभाव में किसान कृत्रिम सिंचाई के साधनों के रूप में कूप ,नहर, तालाब और जलाशयों के जल का भी उपयोग करते थे. ऋग्वेद में ‘वाटर हार्वेस्टिंग’ की विधियों से खेतों की सिंचाई करने के अनेक उल्लेख मिलते हैं, जिन्हें मुख्य रूप से पांच वर्गों में विभाजित किया जा सकता है- 1. वर्षा द्वारा सिंचाई, 2. ‘कुल्या’ यानी नहरों से सिंचाई 3. नदियों से सिंचाई, 4. तालाबों आदि से सिंचाई और 5. कुएँ के जल से सिंचाई.

भारत में जलविज्ञान और उससे सम्बन्धित जल-संग्रहण अथवा ‘वाटर हारवेस्टिंग’ का प्राचीन इतिहास बताता है कि वैदिक काल में नदियों के बहते जल को नियंत्रित करके छोटे छोटे बांध बनाने की तकनीक का पूर्णतः विकास हो चुका था.

ऐसे कृत्रिम बांधों से निकाली जाने वाली नहरों या नालियों को ऋग्वेद में ‘कुल्या’ की संज्ञा दी गई है

‘इन्द्रं कुल्या इव हृदम्  (ऋ-‚10-43-7)‚
‘हृदं कुल्या इवाशत’  (ऋ-‚3-45-3)

जलस्रोतों से खेतों तक पानी पहुंचाने के लिए नहरों के समान बड़ी-बड़ी नालियां बनाई जाती थीं, उन्हें भी ‘कुल्या’ कहा गया है-

“गम्भीराँ उदधीँरिव क्रतुं पुष्यसि गा इव.
प्र सुगोपा यवसं धेनवो यथा ह्रदं कुल्या इवाशत॥”
                                               -ऋग्वेद, 3.45.3

यहां वेदभाष्यकार सायणाचार्य ने ‘कुल्या’ को किसी बहुत बड़े जलाशय से निकाली गई कृत्रिम नहर के रूप में परिभाषित किया है- “ते च सोमाः’कुल्याइव कृत्रिमसरितः ह्रदं महाजलाशयं यथा प्राप्नुवन्ति तद्वत् त्वाम् ‘प्र’ आशत व्याप्नुवन्ति.”

उत्तराखंड के इलाकों में इसी वैदिक ‘कुल्या’ को ‘कुल गाड़ण’ कहते हैं जो वैदिक शब्द ‘कुल्या’ और ‘गाद’ से बना है और आज गाड़,गधेरा के रूप में केवल उत्तराखंड की बोलियों कुमाऊंनी और गढ़वाली में सुरक्षित है.

‘वाटर हारवेस्टिंग’ सिस्टम के इतिहास की दृष्टि से ऋग्वेद के ‘गोतम राहुगण’ नामक सूक्त में वैदिक कालीन जलविज्ञान और उससे सम्बद्ध ‘वाटर हारवेस्टिंग’ तकनीक का एक महत्त्वपूर्ण दृष्टान्त मिलता है. इस सूक्त के अनुसार सर्वप्रथम वर्षा के देवता इन्द्र अवर्षण रूपी वृत्र राक्षस का संहार करके भूमि पर नदियों के जल स्रोतों को प्रवाहित करते हैं.उसके बाद मरुद्गण सामूहिक रूप से मिलकर उस बहते हुए जल का सदुपयोग करने के उद्देश्य से उन जल स्रोतों को एक ऊँचे स्थान पर खोद कर बनाए गए जलाशय में संचयित करते हैं और साथ ही इन जल स्रोतों के मार्ग में रुकावट डालने वाले पर्वत खंडों को काटकर नहर का रास्ता भी बनाते हैं. मरुद्गण उस जलाशय के जल को टेढी-तिरछी नालियों और झरनों के माध्यम से गोतम ऋषि के आश्रम तक पहुंचाने में सफल हो जाते हैं.वैदिक काल में कृत्रिम बांध बनाने अथवा ‘वाटर हारवेस्टिंग’ से सम्बंधित ऋग्वेद के ये मंत्र आज भी विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण हैं-

“धत्त इन्द्रो नर्यपांसि कर्तवेऽहन्वृत्रं
निरपामौब्जदर्णवम्.”
“ऊर्ध्वं नुनुदेऽवतं त ओजसा दादृहाणं  
चिद्विभिदुर्वि पर्वतम्.”
“जिह्मंनुनुदेऽवतं तया दिशासिञ्चन्नुत्सं
गोतमाय तृष्णजे.” -ऋग्वेद,1.85.9-11
“जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी.”

भारतवासियों के लिए एक अत्यंत ही संवेदनशील राष्ट्रवादी विचार है.जननी और जन्मभूमि के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन के और भी अनेक भावनात्मक विचारप्रकट किए जाते हैं,जैसे कि आजकल ‘वन्दे मातरम्’ और ‘भारत माता की जय’ के उद्घोष द्वारा हम अपनी राष्ट्रीयता की सोच को अभिव्यक्त करते हैं. पर यह राष्ट्रवादी विचार भी हमें वैदिक कालीन अथर्ववेद के ‘भूमिसूक्त’ से ही मिला है. अथर्ववेद का मन्त्रद्रष्टा ऋषि भूमि को माता तथा स्वयं को उसका पुत्र बताने में गौरव का अनुभव करता है-

“माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः”
               -अथर्ववेद‚ 12.1.12

ऐतिहासिक दृष्टि से देखा जाए तो हिमालय की गिरि कंदराओं में रहने वाले वैदिक आर्य सरस्वती द्वारा सिंचित देवभूमि को अपनी माता मानते थे. ऋग्वेद के मंत्रों में ‘पृथिवी माता’ का यह विचार बार बार दोहराया गया है-

“बन्धुर्मे माता पृथिवी महीयम्”
           -ऋग्वेद‚ 1.164.33

उसी प्रकार ‘ऋग्वेद के नदीसूक्त’ में भी हिमालय के भूभाग में बहने वाली नदियों के प्रति भी वैदिक ऋषि के मन में अगाध श्रद्धा और मातृतुल्य आत्मीयता  की भावना प्रकट हुई है-

“इमं मे गंगे यमुने सरस्वति
शुतुद्रि स्तोमै सचता परूष्ण्या.
असिवक्न्या मरूद्वृधे वितस्त-
यार्जीकीये श्रणुह्या सुषोमया..”
               -ऋग्वेद,10.75.5

ऋग्वेद के ‘नदीसूक्त’ और अथर्ववेद के ‘भूमिसूक्त’ के ये कालजयी मंत्र वस्तुतः, प्रत्येक युग में यह संदेश देते आए हैं कि भूमिपुत्र की अवधारणा महज कोरी राष्ट्रवादी अवधारणा नहीं बल्कि इसका मुख्य आधार यह है कि भूमि और नदियां हमारे लिए अन्नदायिनी और जलप्रदायनी होने के कारण माता के रूप में सदा ही वंदनीय हैं. क्योंकि माता के रूप में ये दोनों ही अपने समस्त धरती पुत्रों का अन्न धन्न उपजाकर भरण पोषण करती हैं. हम केवल नारों से ही अपनी जन्मभूमि की जय जयकार करते रहें और अपने प्रकृति विरोधी दुष्कृत्यों से इस अन्नमयी,धनमयी भूमि को बंजर बना कर रख दें, और पुण्यसलिला नदियों को अपनी अवांछित गतिविधियों से प्रदूषित करते हुए उन्हें सूखने की स्थिति में ला दें,तो जननी जन्मभूमि के प्रति किया गया इससे बड़ा और कोई अपराध हो नहीं सकता. इसलिए वर्त्तमान जलसंकट के दौर में वैदिक जल प्रबंधकों से शिक्षा लेने की बहुत जरूरत है,ताकि हम अपने देश की परम्परागत जल प्रबंधन को अपनाकर बंजर होती कृषिभूमि को पुनः ‘सस्यश्यामला’ और उपजाऊ बना सकें.

उत्तराखंड राज्य बनने के बाद यहां पलायन सबसे ज्यादा हुआ है.उसका एक मुख्य कारण है राज्य सरकारों द्वारा जल, जमीन से जुड़े कृषि के संसाधनों के प्रति घोर उपेक्षाभाव रखना.

वैदिक कालीन कृषि व्यवस्था के धरातल पर प्राचीन भारतीय जलप्रबंधन से जुड़ी मान्यताएं और सिद्धान्त वर्त्तमान काल में भी अव्यवहारिक नहीं बल्कि पहले से भी ज्यादा प्रासंगिक और उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं. क्योंकि यहां पारंपरिक खेती आज भी वैदिक कालीन भौगोलिक परिवेश में ही की जाती है. खाद और बीज के मामले में नई कृषि तकनीकें भले ही सामने आई हैं किंतु सिंचाई के स्रोत तो वही पुराने हैं,जो लगातार सूखते जा रहे हैं.इसके अलावा साल में दो बार आने वाला मानसूनों का सम्वत्सर चक्र भी वही है,खरीफ और रबी की फसल भी हजारों साल पहले की तरह आज भी उसी प्रकार बोई और काटी जाती है.अनाज तथा खेती से उगाई जाने वाली धान, गेहूं, अनाज, दलहन, तिलहन की फसलें भी लगभग वही हैं. गंगा,यमुना, सिंधु,सरयू आदि नदियों का जलविज्ञान भी वही है तथा उनसे सिंचाई किए जाने वाले परम्परागत जलस्रोत भी लगभग वही हैं. पर आज केवल बदली है तो जल प्रबंधन के बारे में हमारी राष्ट्रीय उपभोक्तावादी सोच जो अंग्रेजों के जमाने से ज्यों की त्यों चली आ रही है. जल के प्रति एक उपभोक्तावादी सोच रखने के कारण ही हमारी पतित पावनी और पुण्यसलिला नदियां सूखती जा रही हैं और अन्धविकासवादी योजनाओं से भूमिगत जल संकट भी विकट होता जा रहा है. आज जल को एक प्राकृतिक संसाधन मान कर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी का दुरुपयोग करते हुए ट्यूबवैल और हैंडपंप के जरिए भूमिगत जल का जिस निर्ममता से शोषण किया जा रहा है,इस पर्यावरण विरोधी जल दोहन के कारण भी आज हमारी नदियों,जलधाराओं,जलाशयों, कूप-तालाबों और नौलों, खालों का भूमिगत जल लगातार घटने और समाप्त होने के कगार पर है. इसे वर्त्तमान जलप्रबंधन की विफलता ही मानी जानी चाहिए कि आज पेयजल की समस्या तो विकट होती ही जा रही है साथ ही परम्परागत कृषि और उसके सिंचाई के साधनों में भी निरन्तर रूप से कमी आ रही है.

दरअसल, भूमि को माता मानने के विचार का सर्वप्रथम जन्म देवभूमि हिमालय की गिरि कन्दराओं में ही हुआ था, जिसका प्रयोजन मातृभूमि के पर्यावरण की रक्षा करना और यहां की नदियों,जलस्रोतों और वृक्ष आदि वनसंपदा का मातृभाव की भावना से संरक्षण करना था.किंतु आज उत्तराखंड हिमालय की इस देवभूमि में जिस प्रकार अन्धविकासवाद की योजनाओं द्वारा प्राकृतिक संसाधनों का निर्ममता से दोहन हो रहा है और पहाड़ों को विस्फोटकों से तोड़ा फोड़ा जा रहा है उससे पर्यावरण के रक्षक जल, जंगल और जमीन खतरे में हैं. इस विकासवादी तोड़ फोड़ का सर्वाधिक ख़ामियाज़ा भी यहां रहने वाले पहाड़ के लोगों को ही भुगतना पड़ा है. विकासवाद की मृगतृष्णा से यहां गांव के गांव उजड़ गए हैं और देखते ही देखते यहां गाड़ गधेरे सूखते गए, धान उत्पादक सेरे बंजर होते गए और यहां का नौजवान आजीविका की खोज में पलायन के लिए मजबूर होता गया. उत्तराखंड राज्य बनने के बाद यहां पलायन सबसे ज्यादा हुआ है.उसका एक मुख्य कारण है राज्य सरकारों द्वारा जल, जमीन से जुड़े कृषि के संसाधनों के प्रति घोर उपेक्षाभाव रखना. लोक कवि स्व.हीरासिंह राणा ने पहाड़ के पलायन की इस जनपीड़ा को अपने गीतों में इस प्रकार  बयां किया है-

“कैकणी सुणानू पहाड़ै डाड़,
काट्यी ग्यीं जंगल सुकिगे गाड़.
सब्ब ज्वान नान् यां बटि न्है गई टाड़..
क्वे सुणों पहाड़कि दुःखों कहाणी,
जै शिव शंकर जै हो भवानी॥”

शुक्ल यजुर्वेद में प्रतिपादित राष्ट्र विषयक परिकल्पना में सर्वाधिक चिन्ता देश के प्राकृतिक पर्यावरण के प्रति प्रकट की गई है जिसमें कहा गया है कि हमारे राष्ट्र में समय समय पर आवश्यकता के अनुसार मेघों की वर्षा होती रहे. हमारा राष्ट्र फल‚औषधि एवं अन्न से भरपूर होकर ‘योगक्षेम’ अर्थात् खुशहाली देता रहे –

“निकामे निकामे नः पर्जन्यो वर्षतु
फलवत्यो नः ओषधयः पच्यन्तां
योगक्षेमो नः कल्पताम्”
                      -यजुर्वेद‚ 22.22

अंत में कहना चाहुंगा कि वैदिक कालीन पर्यावरणमूलक जलविज्ञान की उपलब्धियों को ही यह श्रेय जाता है,जिसके कारण जल प्रबन्धन‚ जल संवर्धन तथा ‘वाटर हारवेस्टिंग’ की दृष्टि से प्राचीन भारतीय सभ्यता का विभिन्न युगों में उत्तरोत्तर विकास होता रहा,जिसकी विस्तृत चर्चा भी हम आगामी लेखों में करेंगे.

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज से एसोसिएट प्रोफेसर के पद से सेवानिवृत्त हैं. एवं विभिन्न पुरस्कार व सम्मानों से सम्मानित हैं. जिनमें 1994 में ‘संस्कृत शिक्षक पुरस्कार’, 1986 में ‘विद्या रत्न सम्मान’ और 1989 में उपराष्ट्रपति डा. शंकर दयाल शर्मा द्वारा ‘आचार्यरत्न देशभूषण सम्मान’ से अलंकृत. साथ ही विभिन्न सामाजिक संगठनों से जुड़े हुए हैं और देश के तमाम पत्र—पत्रिकाओं में दर्जनों लेख प्रकाशित।)

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