Author: Himantar

हिमालय की धरोहर को समेटने का लघु प्रयास
टिहरी रियासत के विरुद्ध जन-संघर्षों का अग्रणी व्यक्तित्व

टिहरी रियासत के विरुद्ध जन-संघर्षों का अग्रणी व्यक्तित्व

उत्तराखंड हलचल
दादा दौलतराम खुगशाल (मार्च, 1891- 3 फरवरी, 1960)डॉ. अरुण कुकसाल‘‘आज तक राजा ने हमको पढ़ने-लिखने का अवसर नहीं दिया जिससे हम बायां अंगूठा लगाने को मजबूऱ हैं, लेकिन अब अगर राजा के कर्मचारी ‘कर’ आदि वसूलने आयें तो हमें उन्हें अपना दायां अंगूठा दिखाना चाहिए और हम दिखायेंगे भी.’’                                                                                                                                    - दादा दौलतराम खुगशाल प्रजामंडल के टिहरी सम्मेलन (25-27 मई, 1947) में दादा दौलतराम ने अपने भाषण में उक्त वक्तव्य देकर राजशाही को खुली चुनौती दे थी. टिहरी रियासत के विरुद्ध हुये निर्णायक आंदोलनों में 3 नाम प्रमुख रूप में सामने आते हैं. अमर शहीद श्रीदेव सुमन, दादा दौलतराम खुगशाल और नागेन्द्र सकलानी. श्रीदेव सुमन टिहरी रियासत के आत्याचारों के खिलाफ स्थानीय जनता की आवाज को देश के राष...
पूर्वजों की आस्था का केन्द्र : कटारमल सूर्य मंदिर

पूर्वजों की आस्था का केन्द्र : कटारमल सूर्य मंदिर

धर्मस्थल
शशि मोहन रावत ‘रवांल्‍टा’जैसा कि हम सभी जानते हैं कि कोणार्क का सूर्य मंदिर अपनी बेजोड़ वास्तुकला के लिए भारत ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण विश्व में प्रसिद्ध है. भारत के ओड़िसा राज्य में स्थित यह पहला सूर्य मंदिर है जिसे भगवान सूर्य की आस्था का प्रतीक माना जाता है. ऐसा ही एक दूसरा सूर्य मंदिर उत्तराखण्ड राज्य के कुमांऊ मण्डल के अल्मोड़ा जिले के कटारमल गांव में है. यह मंदिर 800 वर्ष पुराना एवं अल्मोड़ा नगर से लगभग 17 किमी की दूरी पर पश्चिम की ओर स्थित उत्तराखण्ड शैली का है. अल्मोड़ा-कौसानी मोटर मार्ग पर कोसी से ऊपर की ओर कटारमल गांव में यह मंदिर स्थित है.महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने इस मन्दिर की भूरि-भूरि प्रशंसा की. उनका मानना है कि यहाँ पर समस्त हिमालय के देवतागण एकत्र होकर पूजा-अर्चना करते रहे हैं. उन्होंने यहाँ की दीवारों पर उकेरी गई मूर्तियों एवं कला की प्रशंसा की है. यह मंदिर...
सौण कम न भादौ

सौण कम न भादौ

संस्मरण
मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—24प्रकाश उप्रेतीआज बात- बरसात, रात, सूखा, 'गोल्देराणी' पूजना और पहाड़ की. पहाड़ में बरसात के दिन किसी आफ़त से और रातें आपदा से कम नहीं होती थीं. चौमास में 'झड़' (कई दिनों तक लगातार बारिश का होना) पड़ जाते थे तो वहीं बे-मौसम बारिश सबकुछ बहा ले जाती थी. ईजा कहती थीं कि- "सौण कम न भादौ". बारिश होना, न होना दोनों पहाड़ की नियति में है और दोनों के अपने उपाय भी... ईजा बारिश के दिनों में परेशान हो जाती थीं. एक तो 'गुठ्यार में कच्यार' (गाय-भैंस को बांधने वाली जगह में कीचड़) और दूसरा 'भ्योव' (जंगल) 'खसखस' (फिसलन भरे) हो जाते थे. दिनभर घर पर बैठना भी ईजा को ठीक नहीं लगता था. हम सब तो अंगीठी में 'मुन' (पेड़ों की जड़) लगाकर आग 'तापते' रहते थे. आग से फुर्सत मिलते ही रजाई ओढ़ के बैठ जाते और कुछ न कुछ खेलना या अम्मा से किस्से सुनते रहते थे. ईजा कभी भैंस, कभी पानी, कभी ...
वीरान होती छानियां

वीरान होती छानियां

उत्तराखंड हलचल
आशिता डोभालडांडा छानी (गौशाला)- पहाड़ों में हर मौसम के अनुसार और खेती-बाड़ी के अनुसार लोगों ने छानियां बनाई हुई रहती थी जिससे उन्हें अपनी खेती—बाड़ी के काम और चारा—पत्ती लाने में किसी भी तरह की परेशानियों का सामना न करना पड़े, इससे उनका समय भी बचता था और समय पर उनका काम भी निपटता था. उनकी समय सीमा भी निर्धारित रहती थी कि किस समय और किस मौसम में वो कौन—सी जगह की छानी में उनको रहने जाना है, उस हिसाब से फसल बोना और अपनी जरूरत का सामान जुटाकर जाना होता था. मार्च माह के मध्य में मैं और मेरे साथ मेरे गांव के दो चार लोग हम बुरांश लेने अपने गांव की डांडा छानी गए बल्कि जाना तो उससे भी ऊपर था और गए भी. सच कहूं तो बुरांश लेने जाना तो एक बहाना था मुझे तो उन छानियों को देखना था, जो कभी पशुओं और इंसानों से गुलजार हुआ करती थी, आज वो बिल्कुल निर्जन जंगल भी कहूं तो अतिश्योक्ति नहीं होगी. छानियां बिल्क...
जबही महाराजा देस में आए …

जबही महाराजा देस में आए …

संस्मरण
‘बाटुइ’ लगाता है पहाड़, भाग—12रेखा उप्रेती“बारात आ गयी !!” यह वाक्य हमारे भीतर वैसा ही उत्साह जगाता जैसे ओलंपिक्स में स्वर्ण-पदक जीतने की सूचना … उत्साह का बीज तो किसी बुआ या दीदी का ‘ब्याह ठहरते’ ही अँखुआ जाता. घर की लिपाई-पुताई, ऐपण, रंग्वाली पिछौड़, सुआल-पथाई, धुलिअर्घ की चौकी जैसे कई काज घर और गाँव की महिलाओं की हका-हाक लगाए रखते और हम बच्चों के लिए ‘कौतिक’ जैसा माहौल बनाते… हमारे हिस्से कुछ काम आते, जिनमें सबसे महत्वपूर्ण था- ओलंपिक की मशाल लेकर भागने जैसा गौरव-पूर्ण दायित्व-गाँव-भर में सबको न्यूतना…किस घर को कैसे न्यौतना है यह अच्छी तरह समझना होता. लड़की वाले की हैसियत के हिसाब से न्यौते का स्वरूप अलग-अलग होता. बड़ा गाँव था हमारा… ऐसा कम ही होता कि लड़की की शादी में पूरे गाँव को “च्युल-न्यूत” मिले.यूँ तो लड़की चाहे किसी घर की हो, उसके विदा होने तक सारा गाँव एक परिवार...
माँ तुम झूठी हो!

माँ तुम झूठी हो!

आधी आबादी
डॉक्टर दीपशिखा जोशीमाँ तुम ने विदाई के समय गले लगा बोला था, जा बिटिया वहाँ तुझे मिलेगी दूसरी माँ. मुझ में और उन में कभी अंतर ना करना. जा बिट्टो तुझे कभी ना खलेगी मेरी कमी, ना आएगी याद! कुछ समय लगेगा ज़रूर, मगर तू निभा लेगी मुझे पता है. मैं भी एक दिन ऐसे ही आयी थी तेरी नानी के घर से. यही रिवाज है बिटिया! हमेशा ख़ुश रहना कह तूने अपने आंसू पोंछे थे. मुझे तो रोना आया ही नहीं माँ उस दिन. मुझे लगा तू सच बोलती होगी! मैं तो ख़ुशी-ख़ुशी तेरे दिखाए सपने देख हवा में उड़ी जा रही थी. जैसे तू मुझे हमेशा परियों की कहानियां सुनाती, जैसे दिखाती थी मंगल ग्रह पर कैसे होता होगा जीवन, बताती थी बहुत काल्पनिक किस्से मुझे प्रेरणा देने को. माँ मैंने सब सच माना. तेरी हर सीख मेरे जीवन के उसूल बन गयी. तू मेरी माँ, बहन, सहेली सबकुछ थी! जब तक थी मैं तेरे आँचल के नीचे मुझे कभी ज़िम्मेदारियों, समस्याओं, डर और वास्तव...
ट्यूलिप के फूल

ट्यूलिप के फूल

किस्से-कहानियां
कहानीएम. जोशी हिमानीआज दिसम्बर की 26 तारीख हो गई है. ठंड अपने चरम पर पहुंच चुकी है. मौसम के मिजाज से लग रहा है एकाध दिन में यहां अच्छी बरफ गिरेगी. गंगा खुश है कि बरफ अच्छी गिरेगी तो उसकी क्यारियों में ट्यूलिप भी बहुत अच्छे फूल देंगे तथा बगीचे में लगे सेबों की मिठास भी बढ़ जायेगी गंगा ऊनी टोपी तथा मफलर से अपने कानों को अच्छी तरह ढक लेती है. साड़ी उससे अब पहनी नहीं जाती. ऊनी गाउन के नीचे ऊनी लैगिंस, ऊपर से गरम ओवर कोट डाले, होंठों में मौसम के अनुकूल लिपस्टिक, चेहरे से टपकते अभिजात्य को देखकर पहली नजर में गंगा को हर कोई अंग्रेज मैम समझता था. मुक्तेश्वर के टाप में बना उसके दादा के जमाने का वह घर, जिसमें गर्मियों में परिवार के एकाध सदस्य अपने नौकरों के साथ जानवरों को लेकर आकर रहते थे यहां पर चार महीने तथा अगले 6-8 महीने के लिए जानवरों तथा जलावन के लिए सूखी लकड़ियों का ढेर कमरों के भीतर...
घास और थुपुड का पहाड़

घास और थुपुड का पहाड़

संस्मरण
मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—23प्रकाश उप्रेतीहम इसे- 'घा थुपुड' कहते हैं. यह एक तरह से सूखी घास को लंबे समय तक धूप-बरसात से बचाकर सुरक्षित रखने का तरीका है. जब जंगलों में आग लग जाती थी और घास नहीं मिलती थी तो इसी घास से काम चलता था. पहाड़ अपनी परिस्थितियों के अनुकूल साधन तैयार कर लेता है. बाहरी दुनिया पर उसकी निर्भरता बहुत ही कम होती है. 'असोज' के महीने में पूरा गाँव घास काटने पर टूटा रहता था. ईजा 'दाथुल' (दरांती) पैनी कर सुबह-सुबह पानी की कमण्डली लेकर घास काटने चली जाती थीं. हम बाद में उनके लिए खाना लेकर जाते थे. भयंकर धूप में ईजा घास काटने पर लगी रहती थीं. हमारे जाने पर ईजा थोड़ा 'स्योव' (छाया) बैठतीं, खाना खातीं. हम भी ईजा के साथ बैठकर मंडुवे की रोटी में तिल की चटनी और कद्दू की सब्जी खाते थे. जब भी ईजा के लिए खाना लेकर जाते तो खुद घर से खाकर नहीं जाते थे. 'भ्योव' में 'स्य...
रिश्ते बचाने का सफल सूत्र

रिश्ते बचाने का सफल सूत्र

साहित्‍य-संस्कृति
भूपेंद्र शुक्लेश योगी"किसी के साथ आप जबरदस्ती करके, ताने या उलाहने मार कर अथवा उसे किसी अन्य प्रकार से कष्ट देकर उसका शरीर तो पा सकते हैं, उसके शरीर को गुलाम बना सकते हैं लेकिन आप उसको कभी नहीं पा सकते हैं, उसके मन को कभी नहीं जीत सकते हैं." यदि आप चाहते हैं कि कोई आपको सुने, आपसे मित्रता करे अथवा आप पर ध्यान दे तो आप उसे पकड़ने की कोशिश कभी मत करें बल्कि स्वयं को अच्छा, सक्षम एवं प्राकृतिक सौंदर्य से युक्त करें. अपने गुणों को इतना बढ़ा लें, स्वयं की ऊर्जा को वाइव्स को इतना सकारात्मक कर लें कि कोई भी आपके ओरा में आते ही शांति का, प्रेम का, मैत्री और करुणा का अनुभव करे.ऐसा करके आप पाएंगे कि जो व्यक्ति आप पर ध्यान नहीं देता था अथवा आप से मैत्री नहीं रखना चाहता था वह आपकी ओर आने लगा है, वह स्वयं प्रयास करके आपसे मैत्री करने कि कोशिश करने लेगा है. परन्तु लोग ऐसा नहीं करते हैं, लोग धैर...
ऑनलाइन शिक्षण-स्वप्न व जागरण के बीच का यथार्थ

ऑनलाइन शिक्षण-स्वप्न व जागरण के बीच का यथार्थ

शिक्षा
(उत्तराखण्ड के विशेष संदर्भ में)डॉ. अमिता प्रकाशकाफी समय से यह मुद्दा और इससे संबधित कई विचार मेरे दिमाग में निरतंर उमड़-घुमड़ रहे थे, कई बार लिखने को उद्यत भी हुई, लेकिन फिर अनगिनत कारणों की वजह से इस विषय पर लेखन टलता रहा. लेकिन आज सुबह जब केरल की एक छात्रा द्वारा इंटरनेट की सुविधा के अभाव में ऑनलाइन शिक्षण से वंचित रहने के फ्रस्टेशन में आत्महत्या की खबर पढ़ी तो विचार स्वयं ही साक्षात् रूप में कागज पर उतरते चले गए. इन दो ढाई महीनों ने, अर्थात् जब से कोरोना संक्रमण की दहशत से मनुष्य अपने घरों में रहने को विवश हुआ है, और सरकार को स्वयं को 'कल्याणकारी सरकार' के दिखावे के दबाव में लॉकडाउन घोषित करना पड़ा, जीवन में परिस्थितियों ने कई परिवर्तनों को जन्म दिया. अब लगभग ढाई माह बाद जब अनलॉक 1 की शुरुआत हो चुकी है तब भी एक आम मध्यमवर्गीय इंसान, जिसके सामने रोजी-रोटी का बहुत बड़ा संकट नहीं है,...