Author: Himantar

हिमालय की धरोहर को समेटने का लघु प्रयास
किसानों के लिए वरदान साबित हो सकती है कुटकी

किसानों के लिए वरदान साबित हो सकती है कुटकी

खेती-बाड़ी
बेहद कड़वी, लेकिन जीवनरक्षक है कुटकीजे. पी. मैठाणीमध्य हिमालय क्षेत्र में भारत, पाकिस्तान, नेपाल, भूटान, अफगानिस्तान के हिमालयी क्षेत्रों में बुग्यालों में जमीन पर रेंगने वाली गाढ़े हरे रंग की वनस्पति है कुटकी. उत्तराखण्ड के हिमालयी क्षेत्र जो अधिकतर 2000 मीटर यानी 6600 फीट से ऊपर अवस्थित हैं उन बुग्यालों में कुटकी पायी जाती हैं. इसका वैज्ञानिक नाम पिक्रोराइज़ा कुरूआ है. यह वनस्पति गुच्छे में उगती है और इसकी जड़ें काली भुरभुरी उपजाऊ भूमि में दूब घास की जड़ों की तरह फैलती है. पौधे की ऊँचाई 8 से 10 इंच तक ही होती है. पत्तियां किनारों पर कटी हुई और फूल सफेद-हल्के बैंगनी गुच्छे में लगते हैं. बीज बेहद बारीक होते हैं. इसलिए बीजों का संग्रहण काफी कठिन होता है. बीज बनने पर स्वतः झड़ जाते हैं और उनसे बसंत ऋतु के साथ-साथ नई पौध तैयार हो जाती है. कुटकी को एक बार रोपित कर देने के बाद उसी पौध से कई...
तर्पण

तर्पण

किस्से-कहानियां
कहानीएम. जोशी हिमानीतप्त कुण्ड के गर्म जल में स्नान करके मोहन की सारी थकान चली गयी थी और वह अब अपने को काफी स्वस्थ महसूस करने लगा था. तप्त कुण्ड के नीचे अलकनन्दा अत्यंत शांत एवं मंथर गति से अपने गन्तव्य की ओर बढ़ रही थी. पहाड़ों में बहने वाली नदियां वैसे तो किसी अल्हण किशोरी सी चहकती, फुदकती, बलखाती अपनी मंजिल की तरफ दौड़ लगाती हैं परन्तु बद्रीनाथ धाम में बहने वाली अलकनन्दा का यह रूप मनुष्य को अपने प्राणवान होने का अहसास कराना चाहती थी शायद. अलकनन्दा को मालूम था उसके शोर-शराबे तथा उच्छृंखलता से भगवान नारायण की तपस्या में खलल पड़ सकता है. बद्रीनाथ में आकर मनुष्य भले ही अपना संयम भूल जाये परन्तु अलकनन्दा अनादिकाल से अपनी मर्यादा तथा संयम को नहीं भूली थी.जोशीमठ से बद्रीनाथ की 40 किलोमीटर की यात्रा ने मोहन को बीमार कर दिया था. वह सोचता है उसे रात्रि विश्राम जोशीमठ में करना चाहि...
पहाड़ की माटी की सुगंध से उपजा कलाकार : वंशीधर पाठक ‘जिज्ञासु’   

पहाड़ की माटी की सुगंध से उपजा कलाकार : वंशीधर पाठक ‘जिज्ञासु’   

स्मृति-शेष
पुण्यतिथि (8 जुलाई) पर विशेषडॉ. मोहन चन्द तिवारीआज उत्तराखंड की लोक संस्कृति के पुरोधा वंशीधर पाठक जिज्ञासु जी की पुण्यतिथि है. जिज्ञासु जी ने कुमाऊं और गढ़वाल के लोक गायकों, लोक कवियों और साहित्यकारों को आकाशवाणी के मंच से जोड़ कर उन्हें प्रोत्साहित करने का जो महत्त्वपूर्ण कार्य किया और आकाशवाणी से प्रसारित होने वाले अपने लोकप्रिय कार्यक्रम 'उत्तरायण' के माध्यम से देशभर में पहाड़ की संस्कृति का लंबे समय तक प्रचार-प्रसार किया,उसके लिए उन्हें उत्तराखंड के लोग सदा याद रखेंगे.जिज्ञासु जी को प्रारम्भ से ही कविताएं और कहानियां लिखने का बहुत शौक था. इसलिए इनकी रचनाएं पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगी. वर्ष 1962 में उनके मित्र जयदेव शर्मा ‘कमल’ ने उन्हें आकाशवाणी में विभागीय कलाकार के रूप में आवेदन करने को कहा. उस समय 1962 में चीनी हमले के बाद भारत सरकार ने उत्तर प्रदेश के सीमां...
कोरोना काल में चर्चा में आईं मनरेगा 

कोरोना काल में चर्चा में आईं मनरेगा 

समसामयिक
डॉ. राजेंद्र कुकसालआजकल सोशल मीडिया पर मनरेगा चर्चाओं में हैं,  हासिये पर चल रही यह योजना अचानक सुर्खियों में आगयी क्योंकि हुक्मरानों को इस योजना के माध्यम से वेरोजगार प्रवासियों के लिए रोजगार की संभावनाएं दिखाई देने लगी. समय-समय पर मैं मनरेगा योजना से जुड़ा रहा. राज्य में चल रही मनरेगा योजना पर अपना व्यक्तिगत अनुभव साझा कर रहा हूं. महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना,  जिसे भारत सरकार ने सितंबर  2005 को पार्लियामेंट से पास करा कर कानूनी दर्जा दिया गया.यह योजना दो फरवरी, 2006 को देश के 200 जिलों में शुरू की गयी  अगले बर्ष यानी 2007 में इसे और 130 जिलों में विस्तारित किया गया. वर्ष 2008-09 में पहली अप्रैल से यह देश के सभी 593 जिलों में लागू की गयी. महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) एक कानून है, जो शासन को इस बात के लिए बाध्य करता है कि ...
दीमक, मिट्टी और म्यर पहाड़

दीमक, मिट्टी और म्यर पहाड़

संस्मरण
मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—30प्रकाश उप्रेतीआज बात- 'धुड़कोटि माटेक'. मतलब दीमक के द्वारा तैयार मिट्टी की. पहाड़ में बहुत सी जगहों पर दीमक मिट्टी का ढेर लगा देते हैं. एक तरह से वह दीमक का घर होता है लेकिन दीमक उसे बनाने के बाद बहुत समय तक उसमें नहीं रहते हैं. बनाने के बाद फिर नया घर बनाने चल देते हैं. वह मिट्टी बहुत ही ठोस और मुलायम होती थी. कुछ ही ऐसी जगहें होती थीं जहां दीमक मिट्टी का ढेर लगाते थे. अमूमन वो जगहें वहाँ होती थीं, जहाँ धूप कम पड़ती हो, सीलन हो या कटे हुए पेड़ की जड़ों के आस-पास. हमारे गाँव में आसानी से 'धुड़कोटि माट' नहीं मिलता था. ईजा बहुत दूर 'भ्योव' (जंगल) के पास एक 'तप्पड' (थोड़ा समतल बंजर खेत) से 'धुड़कोटि माट' लाती थीं.घर 'लीपने' (पोतना) के लिए मिट्टी चाहिए होती थी. ईजा महीने दो महीने में एक बार गोठ, भतेर लीपती थीं. 'देहे' (देहरी) चूल्हा,  और 'उखोअ' (ओ...
दो देशों की साझा प्रतिनिधि थीं कबूतरी देवी

दो देशों की साझा प्रतिनिधि थीं कबूतरी देवी

संस्मरण
पुण्यतिथि पर (7 जुलाई) विशेषहेम पन्तनेपाल-भारत की सीमा के पास लगभग 1945 में पैदा हुई कबूतरी दी को संगीत की शिक्षा पुश्तैनी रूप में हस्तांतरित हुई. परम्परागत लोकसंगीत को उनके पुरखे अगली पीढ़ियों को सौंपते हुए आगे बढ़ाते गए. शादी के बाद कबूतरी देवी अपने ससुराल पिथौरागढ़ जिले के दूरस्थ गांव क्वीतड़ (ब्लॉक मूनाकोट) आईं. उनके पति दीवानी राम सामाजिक रूप से सक्रिय थे और अपने इलाके में 'नेताजी' के नाम से जाने जाते थे. नेताजी ने अपनी निरक्षर पत्नी की प्रतिभा को निखारने और उन्हें मंच पर ले जाने का अनूठा काम किया. आज भी चूल्हे-चौके और खेती-बाड़ी के काम में उलझकर पहाड़ की न जाने कितनी महिलाओं की प्रतिभाएं दम तोड़ रही होंगी. लेकिन दीवानी राम जी निश्चय ही प्रगतिशील विचारधारा के मनुष्य रहे होंगे, जिन्होंने अपनी 70 के दशक में अपनी पत्नी में संगीत की रुचि को न केवल बढ़ावा दिया बल्कि उनको खुद लेकर आकाशवाण...
तीजन बाई या बेगम अख्तर नहीं कबूतरी देवी थी वो

तीजन बाई या बेगम अख्तर नहीं कबूतरी देवी थी वो

संस्मरण
पुण्यतिथि (7 जुलाई) पर विशेषमीना पाण्डेयकबूतरी देवी तीजन बाई नहीं है, न ही बेगम अख्तर. हो ही नहीं सकती. ना विधा में, न शैली में. उनकी विशेष खनकदार आवाज उत्तराखंड की विरासत है. अपनी विभूतियों को इस तरह की उपमाओं से नवाजा जाना हमारे समाज की उस हीनता ग्रंथि को प्रर्दशित करता है जो अपनी अनूठी विरासत को किसी अन्य नाम से तुलना कर फूले नहीं समाते. तीजनबाई और बेगम अख्तर अपनी-अपनी विधाओं में विशिष्ट रहीं हैं. उसी तरह कबूतरी देवी का अपना एक सशक्त परिचय है. हमें समझना होगा कि यह पहचान दिलाने का उपक्रम है या बनी बनाई पहचान को धूमिल करने का? मीडिया ऐसे कार्यों में सिद्धहस्त है. कम से कम संस्कृति कर्मियों और कला प्रेमियों को इन सब से बचना चाहिए.सन 2002 में नवोदय पर्वतीय कला मंच ने पिथौरागढ़ में आयोजित होने वाले छलिया महोत्सव में उन्हें मंच प्रदान कर उनकी दूसरी पारी की शुरुआत की. इसके ...
भवाली के जगदीश नेगी के प्रयासों ने दिलवाया शिप्रा नदी को पुनः जीवनदान

भवाली के जगदीश नेगी के प्रयासों ने दिलवाया शिप्रा नदी को पुनः जीवनदान

अभिनव पहल
भुवन चन्द्र पन्तइन्सान भी कितना अहसान फरामोश है कि जिन नदियों के किनारे कभी मानव सभ्यता का विकास हुआ, उन्हीं नदियों को इन्सान ने अपने क्षुद्र स्वार्थों के लिए कूड़े कचरे के ढेरों में तब्दील करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. कुछ लोग यदि जागरूक हुए भी तो समाज की इस तरह की घिनौनी करतूतों के तमाशबीन बनकर रह जाते हैं. कुछ इसके लिए समयाभाव का रोना रोते हैं तो दूसरे कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो संबंध खराब होने की गरज से लफड़े में पड़ने से कन्नी काट जाते हैं. ऐसे बिरले लोग होते हैं जो “लोग क्या कहेंगे’’ की परवाह किये बिना निकल पड़ते हैं, समाजहित के लिए और आने वाली पीढ़ी के सुखद भविष्य का सपना संजोये अपनी राह पर. फिर व्यक्तिगत संबंध समाजहित के सामने गौण हो जाते हैं. ऐसे जुनूनी शख्स समाज की परवाह किये बिना जब निकल पड़ते हैं लक्ष्य की ओर, तो मुड़कर नहीं देखते. यह समाज की मानसिकता है कि जब भी समाजहित में कोई काम के ...
शिक्षक ‘ज्ञानदीप’ है जो जीवनभर ‘दिशा’ देता है

शिक्षक ‘ज्ञानदीप’ है जो जीवनभर ‘दिशा’ देता है

समसामयिक
गुरु पूर्णिमा पर विशेषडॉ. अरुण कुकसालबचपन की यादों की गठरी में यह याद है कि किसी विशेष दिन घर पर दादाजी ने चौकी पर फैली महीन लाल मिट्टी में मेरी दायें करांगुली (तर्जनी) घुमाकर विद्या अध्ययन का श्रीगणेश किया था. स्कूल जाने से पहले घर पर होने वाली इस पढ़ाई को घुलेटा (आज का प्ले ग्रुप) कहा जाता था. संयोग देखिये कि जिस ऊंगली से हम दूसरों की कमियों की ओर इशारा या उनसे तकरार करते हैं, उसी से हम ज्ञान का पहला अक्षर सीखते हैं. कुछ दिनों बाद 'आधारिक विद्यालय, कण्डारपाणी' असवालस्यूं (पौड़ी गढ़वाल) में भर्ती हुए तो रोज पढ़ने से पहले बच्चे बोलते...... ‘आगे-पीछे बाजे ढोल, सरस्वती माता विद्या बोल’. घर से स्कूल जाने से पहले सभी बच्चे तमाम कामों में घरवालों का हाथ बांटते. गांव का सयाना जिसकी उस दिन बच्चों को स्कूल छोड़ने की बारी होती वो जोर से धै लगाता ‘तैयार ह्ववे जावा रे’. बस थोड़ी ही देर में ...
हिसालू की जात बड़ी रिसालू, जाँ जाँ जाँछ उधेड़ि खाँछ

हिसालू की जात बड़ी रिसालू, जाँ जाँ जाँछ उधेड़ि खाँछ

उत्तराखंड हलचल
डॉ. मोहन चन्द तिवारीकुमाउंनी के आदिकवि गुमानी पंत की एक लोकप्रिय उक्ति है - "हिसालू की जात बड़ी रिसालू, जाँ जाँ जाँछ उधेड़ि खाँछ. यो बात को क्वे गटो नी माननो, दुद्याल की लात सौणी पड़ंछ." अर्थात् हिसालू की प्रजाति बड़ी गुसैल किस्म की होती है, जहां-जहां इसका पौधा जाता है, बुरी तरह उधेड़ देता है, तो भी कोई इस बात का बुरा नहीं मानता, क्योंकि दूध देने वाली गाय की लातें भी खानी ही पड़ती हैं. हिसालू होता ही इतना रसीला है कि उसके आगे सारे फल फीके ही लगते हैं. इसीलिए गुमानी ने हिसालू की तुलना अमृत फल से की है- "छनाई छन मेवा रत्न सगला पर्वतन में, हिसालू का तोपा छन बहुत तोफा जनन में, पहर चौथा ठंडा बखत जनरौ स्वाद लिंण में, अहो में समझछुं, अमृत लग वस्तु क्या हुनलो ?" अर्थात् पहाड़ों में तरह-तरह के अनेक रत्न हैं, हिसालू के फल भी ऐसे ही बहुमूल्य तोहफे हैं,चौथे पहर में ठंड के समय हिसालू खाएं त...