November 25, 2020
अभिनव पहल

भवाली के जगदीश नेगी के प्रयासों ने दिलवाया शिप्रा नदी को पुनः जीवनदान

  • भुवन चन्द्र पन्त

इन्सान भी कितना अहसान फरामोश है कि जिन नदियों के किनारे कभी मानव सभ्यता का विकास हुआ, उन्हीं नदियों को इन्सान ने अपने क्षुद्र स्वार्थों के लिए कूड़े कचरे के ढेरों में तब्दील करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. कुछ लोग यदि जागरूक हुए भी तो समाज की इस तरह की घिनौनी करतूतों के तमाशबीन बनकर रह जाते हैं. कुछ इसके लिए समयाभाव का रोना रोते हैं तो दूसरे कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो संबंध खराब होने की गरज से लफड़े में पड़ने से कन्नी काट जाते हैं. ऐसे बिरले लोग होते हैं जो “लोग क्या कहेंगे’’ की परवाह किये बिना निकल पड़ते हैं, समाजहित के लिए और आने वाली पीढ़ी के सुखद भविष्य का सपना संजोये अपनी राह पर. फिर व्यक्तिगत संबंध समाजहित के सामने गौण हो जाते हैं. ऐसे जुनूनी शख्स समाज की परवाह किये बिना जब निकल पड़ते हैं लक्ष्य की ओर, तो मुड़कर नहीं देखते. यह समाज की मानसिकता है कि जब भी समाजहित में कोई काम के लिए आगे बढ़ता है तो उसे सहयोग कम, उलाहना ज्यादा मिलती हैं. उसे इस तरह उपहास का पात्र बना दिया जाता है कि आगे वह अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने का साहस ही नही जुटा पाता.

नदी की लगभग 25 किमी की यात्रा में 100 वर्ष पुराना भवाली का देवी मन्दिर, कैंची धाम जैसे धार्मिक स्थल हैं और इसी नदी के किनारे हैं और भवाली का श्मशान घाट भी इसी उत्तरवाहिनी नदी के तट पर हैं. इस कारण इस नदी को लोगों की धार्मिक आस्था से जोड़ा जाता है. यह वही उत्तरवाहिनी नदी हैं, जिसके पानी से कभी कैंची धाम में बाबा नीमकरौली ने भण्डारे में घी खत्म होने पर नदी के जल को अपनी आध्यात्मिक शक्ति से घी में परिवर्तित कर दिया था.

यदि लक्ष्य अडिग हो, निस्वार्थ हो और समाज की टीका टिप्पणियों की परवाह न हो, तब लक्ष्य प्राप्ति के लिए सफलता के द्वार खुद ब खुद खुलते जाते हैं. शिप्रा नदी की सफाई का जुनून समेटे भवाली के जगदीश नेगी ने जब 11 अक्टूबर 2015 को भवाली में शिप्रा नदी की सफाई का अभियान शुरू किया तो कोई सोच भी नहीं सकता था, कि जगदीश नेगी का जुंनून उसे लक्ष्य के इतने करीब पहुंचा देगा. समाज की उलाहना व तानों के बीच कोई शख्स यदि अकेले नदी के किनारे गैंडी- फावड़ा लेकर कूड़ा कचरा उठा रहा हो, उसे या तो लोग पागल करार देंगे अथवा उसकी नादानी पर तरस खायेंगे. क्योंकि एक आदमी के बलबूते नदी साफ हो पायेगी, सोचना थोड़ा अव्यावहारिक लगता जरूर है. लेकिन जगदीश नेगी इसे एक सांकेतिक पहल मानकर लोगों को जागरूक कर रहे हैं, यह सारे लोगों के समझ में नहीं आया. परोक्ष रूप से इसका असर ये हुआ कि जहां लोगों ने सहयोग के लिए हाथ बढ़ाया, वहीं नदी में कूड़ा फेंकने वालों का हाथ भी अवश्य रूका होगा, इस मुहिम की शुरूआत से.

दो-तीन दशक पूर्व तक सदानीरा रहने वाली शिप्रा नदी, इन्सानी लापरवाही और उपेक्षा का शिकार होकर अपना वजूद खोने के कगार पर पहुंच चुकी थी. श्याम खेत के नानतिन बाबा आश्रम के अपने उद्गम स्थल से खैरना तक यह भवाली शहर से होते हुए निगलाट, कैंची धाम, रातीघाट, रामगाढ़ तथा गरमपानी होते हुए अन्ततः खैरना में कोसी नदी में मिल जाती है. नदी की लगभग 25 किमी की यात्रा में 100 वर्ष पुराना भवाली का देवी मन्दिर, कैंची धाम जैसे धार्मिक स्थल हैं और इसी नदी के किनारे हैं और भवाली का श्मशान घाट भी इसी उत्तरवाहिनी नदी के तट पर हैं. इस कारण इस नदी को लोगों की धार्मिक आस्था से जोड़ा जाता है. यह वही उत्तरवाहिनी नदी हैं, जिसके पानी से कभी कैंची धाम में बाबा नीमकरौली ने भण्डारे में घी खत्म होने पर नदी के जल को अपनी आध्यात्मिक शक्ति से घी में परिवर्तित कर दिया था. इसके साथ ही शिप्रा नदी अपनी 25 किमी की यात्रा में नदी के किनारे बसे गांवों को सिचांई का जल उपलब्ध कराकर किसानों की आर्थिकी का भी आधार रही है. सिंचाई के लिए पानी के उपयोग के बावजूद भी नदी किनारे बारहों मास घराट (पनचक्कियां) चला करते थे. लेकिन आबादी के बढ़ते दबाव व कंक्रीट के जंगल उगने से उद्गम स्थल से ही इसका वजूद अन्तिम सांसे गिनने लगा. लोगों ने नदी को एक कूड़ा फेंकने का स्थान मानकर न केवल घरों का कूड़ा बल्कि भवाली मन्दिर के पास तो घर के सीवर के पाइन लाइन भी शिप्रा नदी में छोड़ दिये थे, जिससे भवाली श्मशान घाट और कैंची धाम सहित पूरी नदी प्रदूषित हो चुकी थी.

वर्ष 2015 में जगदीश नेगी शिप्रा सफाई अभियान का बीड़ा उठाया ही था, कि कुछ ही समय के बाद उनके भाई हीरा सिंह नेगी की असामयिक मौत हो गयी, जो शिप्रा सफाई अभियान में उनके साथ कन्धे से कन्धा लगाकर जुटे थे. इस हृदयविदारक दुर्घटना ने उन्हें अन्दर तक झकझोर दिया लेकिन वे अपने अभियान को आगे बढ़ाने में इससे टूटे नहीं, बल्कि दुगुने उत्साह से जुट गये.

वर्ष 2015 में जगदीश नेगी शिप्रा सफाई अभियान का बीड़ा उठाया ही था, कि कुछ ही समय के बाद उनके भाई हीरा सिंह नेगी की असामयिक मौत हो गयी, जो शिप्रा सफाई अभियान में उनके साथ कन्धे से कन्धा लगाकर जुटे थे. इस हृदयविदारक दुर्घटना ने उन्हें अन्दर तक झकझोर दिया लेकिन वे अपने अभियान को आगे बढ़ाने में इससे टूटे नहीं, बल्कि दुगुने उत्साह से जुट गये. एक संक्षिप्त बातचीत में उन्होंने बताया कि इस दु:खद घटना से संसार की नश्वरता का अहसास हुआ और मैं चाहता हूँ कि अपने जीते जी समाज के लिए कुछ कर के जाऊँ. वे बताते हैं कि मुझे कोई चुनाव नहीं लड़ना है कि मैं समाजहित की अनदेखी कर गलत कार्य का विरोध करने से चूकूँ, मुझे व्यष्टि नहीं समष्टि हित के लिए कार्य करना है. जनहित के कार्य में, मैं किसी से डरता नहीं, लोग बोलते रहें. इसी दृढ़ संकल्पशक्ति के बूते वे लक्ष्य तक कामयाबी की ओर निरन्तर अग्रसर हैं.

एक कुमांउनी लोकोक्ति है – “आँखों बटि आँसु उनि, घुना बे जै के ऊंनी’’ आशय अपनों को ही दर्द होता है, पराये को नहीं. भवाली के पास नगारीगांव में जन्मे जगदीश नेगी यहीं पले बढ़े, यहीं से शिक्षा ली और यहीं बिल्डर के रूप में व्यवसाय शुरू किया, लेकिन शिप्रा नदी जो कभी बलखाती, इठलाती देखी थी, आज वह बरसाती नदीं बनकर रह गयी थी. यों हाथ पर हाथ धरे बैठना जगदीश नेगी को नागवार गुजरा और शुरू कर दिया शिप्रा सफाई का अभियान ‘एकला चलो रे’ की तर्ज पर. कुछ युवाओं को इस कार्य में जोड़ा साथ में परिवार के ही भाई हीरा नेगी व पीयूष नेगी का सहयोग भी मिला. शहर के कुछ प्रबुद्ध लोगों का समर्थन हासिल किया, साथ में नगरपालिका भवाली से भी सहयोग की अपील की. प्रारम्भ में नगरपालिका का सहयोग भी मिला, युवकों ने भी हर रविवार अभियान में साथ देकर हाथ बंटाया, लेकिन लोगों को लगने लगा कि इस सबसे कुछ होने वाला नहीं हैं, और किनारे होते गये. कई दिन ऐसे भी रहे, जब जगदीश नेगी अकेले ही गैंडी और फावड़ा लेकर तथा पैंरो में बूट और हाथ में दस्ताने लगाकर नदी सफाई करते दिखे . भवाली बाजार से लेकर श्मशान घाट तक सफाई का सिलसिला चलता रहा, दूसरी ओर कूड़ा फैंकने वालों की पुरानी आदतें बदस्तूर जारी रही. यहीं नहीं भवाली देवी मन्दिर के पास तो कई घरों का सीवर का पाइप सीधे सीवर में गिर रहा था. जगदीश नेगी ने अपने व्यक्तिगत् संबंधों को ताक में रखकर समाज हित में लोगों से सीवर न डालने पर दुश्मनी तक मोल ले ली. जब बार-बार समझाने पर भी सीवर डालने वाले परिवार बाज नहीं आये तो जिला प्रशासन से सहयोग की अपील की और जिला प्रशासन के हस्तक्षेप के बाद संबंधित परिवारों को सीवर पिट बनाने का आदेश हुआ और शिप्रा नदीं में सीवर गिरना बन्द हुआ.

कभी पवित्र व पतितपावनी मानी जाने वाली उत्तरवाहिनी के तट पर बटुकों का उपनयन संस्कार हुआ करता था, लेकिन शिप्रा के बढ़ते प्रदूषण के चलते अब यह पवित्रता खो चुकी थी. सफाई के बाद नदी को इस योग्य बना दिया गया कि पुनः इसके तट पर भवाली में जगदीश नेगी द्वारा वर्ष 2016 में बसन्त पंचमी के पर्व पर अपने खर्चें पर जनेऊ संस्कार करवाये जाने लगे.

भवाली नगर का कूड़ा भवाली से लगभग 3 किमी रानीखेत रोड पर डाकरौली नामक स्थान पर फैंका जाता था, यहीं नहीं जब तक भवाली में शौचालयों के लिए पिट नहीं बने थे, तो भवाली नगर का मल भी शौचालयों से उठाकर बम पुलिस द्वारा डाकरौली में डम्प किया जाता, जहाँ से बदबू से गुजरना दूभर हो जाता और बरसात के समय यहीं मल सीधे बहकर शिप्रा नदी में जाता. जगदीश नेगी ने डाकरौली में कूड़ा फैंकने का पुरजोर विरोध किया, अन्ततः प्रशासन को यहाँ कूड़ा न डालने को मजबूर किया और आज प्रशासन के आदेश के बाद भवाली नगर का कूड़ा हल्द्वानी के ट्रंचिंग ग्राउण्ड में डम्प किया जाने लगा है. जगदीश नेगी बताते हैं कि अपने इस अभियान के तहत व 100 ट्रक कूड़ा शिप्रा नदी से निकालकर निस्तारण हेतु नगरपालिका को सुपुर्द कर चुके हैं.

कभी पवित्र व पतितपावनी मानी जाने वाली उत्तरवाहिनी के तट पर बटुकों का उपनयन संस्कार हुआ करता था, लेकिन शिप्रा के बढ़ते प्रदूषण के चलते अब यह पवित्रता खो चुकी थी. सफाई के बाद नदी को इस योग्य बना दिया गया कि पुनः इसके तट पर भवाली में जगदीश नेगी द्वारा वर्ष 2016 में बसन्त पंचमी के पर्व पर अपने खर्चें पर जनेऊ संस्कार करवाये जाने लगे.

अपनी इसी मुहिम को धार देने के लिए 2017 में जगदीश नेगी ने शिप्रा कल्याण समिति नाम से संस्था का गठन किया. भवाली के साथ ही कैंची धाम में भी शिप्रा नदी को साफ किया, जब हरिद्वार गये तो वहाँ के घाटों पर भी सफाई अभियान चलाया, चित्रशिला घाट रानीबाग में हल्द्वानी की संस्थाओं को सहयोग दिया तथा बागेश्वर में भी घाट की सफाई में योगदान दिया. नैनीताल नगर के नालों की सफाई में वहाँ के युवा समाजसेवी कुंवर मनोज साह जगाती के अभियान में सहयोग दिया. 2017 के आते-आते जगदीश नेगी मीडिया की सुर्खियों में आने लगे और 2017 में ही जोशीमठ में उन्हें मठ सम्मान से सम्मानित किया गया इसके अलावा भी कई समाजसेवी व धार्मिक संगठनों द्वारा उनके इस कार्य को सराहते हुए पुरस्कृत किया गया.

बहुसंख्यक लोगों द्वारा जगदीश नेगी के इस निस्वार्थ समाजसेवा के कार्य को जहाँ सराहा जा रहा था, वहीं जब सोशल मीडिया के माध्यम से इस मुहिम में जन सहयोग की अपील करते थे तो ऐसे कटाक्ष करने वाले लोगों की भी कमी नहीं थी , जो कमेंट कर कभी उनको कूड़ा उठानेवाला मानकर “मेरे घर पर भी कूड़ा पड़ा है, कब आ रहे हो उठाने?’’ जैसी टिप्पणिंया देने से भी नहीं चूके. लेकिन जगदीश नेगी ऐसी टिप्पणियों से तनिक भी विचलित नहीं हुए.

वर्तमान में जगदीश नेगी शिप्रा नदी के उद्गम स्थल पर जल संग्रहण के लिए चाल खाल बनाने में जुटे हुए हैं, जिनमें कृषि विभाग के सेवानिवृत्त कृषि अधिकारी लाल सिंह चैहान के दिशा निर्देशों के अनुरूप जगदीश नेगी अपने सहयोगी लोकेश पालीवाल, नीरज जोशी, पारस रावत तथा छात्र शुभांकर एवं वरूणप्रकाश का श्रम सहयोग इस कार्य में मिल रहा है.

यह जगदीश नेगी के भगीरथ प्रयास व जनचेतना का परिणाम था कि शासन व प्रशासन तक शिप्रा नदी को पुनर्जीवित करने की बात पहुंची और शासन हरकत में आया. सेन्टर फॉर एक्सीलेंस आफॅ नेचुरल रिसोर्स डेटाबेस मैंनेजमेंट सिस्टम उत्तराखण्ड के निदेशक डॉ. जे.एस. रावत को कार्ययोजना की जिम्मेदारी सौंपी गयी, जिसके जिलाधिकारी अध्यक्ष तथा मुख्य विकास अधिकारी को नोडल अधिकारी की जिम्मेदारी सौंपी गयी. अन्ततः शिप्रा नदी को पुनर्जीवित करने के लिए 13 करोड़ 45 लाख की योजना तैयार की गयी है, जिस पर निकट भविष्य में काम होने की आशा जगी है.

वर्तमान में जगदीश नेगी शिप्रा नदी के उद्गम स्थल पर जल संग्रहण के लिए चाल खाल बनाने में जुटे हुए हैं, जिनमें कृषि विभाग के सेवानिवृत्त कृषि अधिकारी लाल सिंह चैहान के दिशा निर्देशों के अनुरूप जगदीश नेगी अपने सहयोगी लोकेश पालीवाल, नीरज जोशी, पारस रावत तथा छात्र शुभांकर एवं वरूणप्रकाश का श्रम सहयोग इस कार्य में मिल रहा है.

प्राकृतिक जल स्रोतों के संरक्षण के लिए संकल्पित जगदीश नेगी द्वारा  बीते माह ही शिप्रा नदी के उद्गम स्थल श्यामखेत में नानतिन बाबा आश्रम के समीप एक ऐतिहासिक नौले का जीर्णोंद्धार किया भी है.

घोड़ाखाल में गोलज्यू मन्दिर के मुख्य गेट पर जहाँ शौचालय की व्यवस्था नहीं थी, जगदीश नेगी ने अपने खर्च पर कम्पोस्ट यूरिनल, जो पूर्णतः दुर्गन्धमुक्त है, इसी महीने लगवाया है. इसी माह भवाली क्षेत्र में रेहड़ के रास्ते पर ऐतिहासिक जमुनाधारा का जीर्णोंद्धार कर पुनः उसे जीवन्त किया है. 1932 में ब्रिटिश काल में बना जमुनाधारा कभी भवाली कस्बे के लोगों की पेयजल की आपूर्ति का मुख्यस्रोत हुआ करता था. इसकी उपयोगिता को देखते हुए वर्ष 1962-63 में तत्कालीन टाउन एरिया कमेटी भवाली ने इसका जीर्णोंद्धार कराया था. तब से स्थानीय लोगों के बेरूखी के चलते व रेहड़ क्षेत्र में अन्धाधुन्ध भवन निर्माण से यह अपना वजूद खो चुका था. बताया जाता है कि इस धारे का गन्धकयुक्त जल चर्म रोगों के लिए बहुत उपयोगी था. कोरोनाकाल में ही इसी माह जगदीश नेगी ने अपने खर्च पर दबे पडे़ जमुना धारे का मलवा हटाकर तथा इसके पीछे बने टैंक की सफाई के बाद उसमें फर्श डालकर धारे को पुनः जीवनदान दिया है.

अस्पताल में भर्ती किसी मरीज को रक्त की आवश्यकता हो तो जगदीश नेगी ऐसा नाम है, जो लोगों से सम्पर्क कर उसके लिए रक्त जुटाने में जुट जाते हैं. किसी गरीब अथवा उसके बच्चों की गम्भीर बीमारियों में लोगों से सहयोग जुटाकर सदैव आगे रहने वाले जगदीश नेगी भवाली शहर के लिए कोई अपरिचित चेहरा नहीं हैं.

जगदीश नेगी ने अपने कार्य को शिप्रा सफाई अभियान तक सीमित न रखते हुए नगर के स्वच्छता अभियान में भी बढ़चढ़ कर भाग लेना शुरू कर दिया. नगर के विभिन्न नालों में पड़े कूड़े को उठाने से लेकर स्वयं घर पर रंग के पुराने कनिस्तर को कूड़ेदान बनाने के लिए पेंट कर शहर के दुकानदारों को निःशुल्क वितरित किया. ताकि शहर का दुकानों का कूड़ा भी इधर उधर बिखरा न रहे. बरसात के मौसम में अपनी नर्सरी में पौध विकसित कर लोगों में वितरित किये तथा स्वयं भी गड्ढे खोदकर जगह जगह वृक्षारोपण किया. वनाग्नि से जंगलों से होने वाले नुकशान से जनता में जागरूकता फैलाने के साथ ही वनाग्नि को रोकने के लिए स्वयं अपने  सहयोगियों के साथ मुस्तैदी से खड़े रहे.

उनके कार्य पर्यावरण के क्षेत्र तक ही सीमित न होकर समाज  हित के हर कार्य में अग्रणी भूमिका रही है. आज जब पूरा विश्व कोरोना महामारी की चपेट में है, तो जगदीश नेगी अपने क्षेत्र में बखूबी अपने कर्तव्य का निर्वहन कर रहे हैं. लॉकडाउन शुरू होने के दिन से ही प्रतिदिन उन्होंने भवाली नगर तथा उससे सटे गांवों में जाकर जरूरतमन्दों को मुफ्त में राशन किट वितरण का अभियान शुरू किया है जो निर्बाध रूप से आज भी जारी है. वे गांव के गरीब घरों में मुफ्त में राशन व आवश्यक खाद्य सामग्री वितरित कर गरीब व निराश्रय लोगों का सहारा बन कर खड़े हुए हैं. खुद कोरोना वारियर्स के रूप में अपना योगदान देते हुए भी, जिन्होंने कोरोना काल में बढ़चढ़कर भागीदारी की उन्हें अपनी संस्था शिप्रा कल्याण समिति से कोरोना वॉरियर्स के रूप में सम्मानित कर प्रोत्साहित भी कर रहे हैं.

बिना किसी पद, पुरस्कार अथवा राजनैतिक लाभ के जगदीश नेगी निस्वार्थ भाव से समाज की जो सेवा कर रहे हैं उसका श्रेय भी वे स्वयं न लेकर बाबा नीमकरौली महाराज की कृपा मानते हैं.

न केवल स्वयं समाजसेवा में स्वयं शारीरिक श्रम में जुटे रहते हैं बल्कि अपनी आय का एक बड़ा हिस्सा जनहित के कार्यों में लगाना उनका शौक बन चुका है. हर सामाजिक कार्य में वे क्षेत्र के युवाओं से सहयोग का आव्हान करते हैं और युवा भी निस्वार्थ भाव से उन्हें अपना सहयोग व समर्थन देते रहे हैं. जब आवश्यकता महसूस हुई तो 5-6 मजदूरों को अपने खर्च पर भी लगा लिया करते हैं. बिना किसी पद, पुरस्कार अथवा राजनैतिक लाभ के जगदीश नेगी निस्वार्थ भाव से समाज की जो सेवा कर रहे हैं उसका श्रेय भी वे स्वयं न लेकर बाबा नीमकरौली महाराज की कृपा मानते हैं. जगदीश नेगी को देखकर लगता है, कि दशरथ मांझी और राजेन्द्र सिंह जल पुरूष के पग चिन्हों पर चलने वाली शख्सियतें हमारे बीच भी हैं.

(लेखक भारतीय शहीद सैनिक विद्यालय नैनीताल से सेवानिवृत्त हैं तथा  प्रेरणास्पद व्यक्तित्वों, लोकसंस्कृति, लोकपरम्परा, लोकभाषा तथा अन्य सामयिक विषयों पर स्वतंत्र लेखन के अलावा कविता लेखन में भी रूचि. 24 वर्ष की उम्र में 1978 से आकाशवाणी नजीबाबाद, लखनऊ, रामपुर तथा अल्मोड़ा केन्द्रों से वार्ताओं तथा कविताओं का प्रसारण.)

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