Author: Himantar

हिमालय की धरोहर को समेटने का लघु प्रयास
सिन्धु सभ्यता के ‘धौलवीरा’ और ‘लोथल’ का जल प्रबंधन

सिन्धु सभ्यता के ‘धौलवीरा’ और ‘लोथल’ का जल प्रबंधन

जल-विज्ञान
भारत की जल संस्कृति-10डॉ. मोहन चन्द तिवारीधौलवीरा का जल प्रबन्धन सन् 1960 में भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग ने सिन्धु सभ्यता से सम्बद्ध एक प्राचीन आवासीय बस्ती धौलवीरा का उत्खनन किया तो पता चला कि यह सभ्यता 3000 ई.पू. की एक उन्नत नगर सभ्यता थी. खदिर द्वीप के उत्तर-पश्चिम की ओर वर्तमान गुजरात में स्थित इस प्राचीन नगर का मास्टर प्लान अत्यन्त सुनियोजित था. वैदिक कालीन जलविज्ञान की मान्यताओं के अनुरूप इस नगर में जलप्रबन्धन और जलसंचयन प्रणालियों की व्यवस्था की गई थी. धौलवीरा नगर मनहर और मनसर नामक दो नदियों के मध्य में बसा है. वहां के नागरिकों ने बरसात के मौसम में बढ़े हुए जल का सदुपयोग करने के उद्देश्य से इन बरसाती नदियों के मध्य में एक बड़े बांध का निर्माण किया तथा उस बांध में संचयित जल को ईंटों से बनाई हुई नालियों द्वारा जलाशयों और कुओं तक पहुंचाने की व्यवस्था की.पुरातत्त...
बाबिल की घास सिर्फ घास नहीं है

बाबिल की घास सिर्फ घास नहीं है

संस्मरण
प्रकाश उप्रेती मूलत: उत्तराखंड के कुमाऊँ से हैं. पहाड़ों में इनका बचपन गुजरा है, उसके बाद पढ़ाई पूरी करने व करियर बनाने की दौड़ में शामिल होने दिल्ली जैसे महानगर की ओर रुख़ करते हैं. पहाड़ से निकलते जरूर हैं लेकिन पहाड़ इनमें हमेशा बसा रहता है। शहरों की भाग-दौड़ और कोलाहल के बीच इनमें ठेठ पहाड़ी पन व मन बरकरार है. यायावर प्रवृति के प्रकाश उप्रेती वर्तमान में दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं। कोरोना महामारी के कारण because हुए ‘लॉक डाउन’ ने सभी को ‘वर्क फ्राम होम’ के लिए विवश किया। इस दौरान कई पाँव अपने गांवों की तरफ चल दिए तो कुछ काम की वजह से महानगरों में ही रह गए. ऐसे ही प्रकाश उप्रेती जब गांव नहीं जा पाए तो स्मृतियों के सहारे पहाड़ के तजुर्बों को शब्द चित्र का रूप दे रहे हैं। इनकी स्मृतियों का पहाड़ #मेरे #हिस्से #और #किस्से #का #पहाड़ नाम से पूरी एक सीरीज में दर्ज़ है। श्रृंखला, पहाड़ और वहाँ क...
यादों में एक शहर

यादों में एक शहर

संस्मरण
डॉ विजया सती दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दू कॉलेज से हाल में ही सेवानिवृत्त हुई हैं. इससे पहले आप विज़िटिंग प्रोफ़ेसर हिन्दी–ऐलते विश्वविद्यालय, बुदापैश्त, हंगरी में तथा प्रोफ़ेसर हिन्दी – हान्कुक यूनिवर्सिटी ऑफ़ फ़ॉरन स्टडीज़, सिओल, दक्षिण कोरिया में कार्यरत रहीं. साथ ही महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं, पुस्तक समीक्षा, संस्मरण, आलेख निरंतर प्रकाशित होते रहे हैं. विजया सती जी अब ‘हिमांतर’ के लिए ‘देश-परदेश’ नाम से कॉलम लिखने जा रही हैं. इस कॉलम के जरिए आप घर बैठे परदेश की यात्रा का अनुभव करेंगे.बुदापैश्त डायरी-7डॉ. विजया सतीआज उस शहर की बात जहां रहकर हम हिन्दी पढ़ा रहे थे .... विश्व की सबसे हरी-भरी राजधानियों में एक नाम बुदापैश्त भी है. दुना नदी का बहाव इसे विशेष आकर्षण प्रदान करता है. छोटी-छोटी पहाड़ियों के उतार-चढ़ाव पर बने लाल छत वाले मकान इसकी खूबसूरती को बढ़ाते हैं...
हुकम दास के हुक्म पर अंग्रेज घाम में खड़ा रहा

हुकम दास के हुक्म पर अंग्रेज घाम में खड़ा रहा

साहित्‍य-संस्कृति
गंधर्व गाथा -1पुष्कर सिंह रावतउत्तरकाशी में भागीरथी तट पर एक आश्रम है शंकर मठ. ये छोटा सा आश्रम हमारे जेपी दा (जयप्रकाश राणा) का रियाज करने का ठिकाना हुआ करता था. बता दूं कि जेपी दा खुद भी तबले में प्रभाकर हैं और लोक कलाकारों की पहचान करने में उन्हें महारथ है. करीब दस साल पहले की बात है, उस दिन जेपी दा एक युवक को गाने का रियाज करवा रहे थे. इसी बीच मैं और रवीश काला भी वहां पहुंचे. गाते हुए युवा गलती करता तो जेपी दा आंखें तरेर देते, उसका सुर गड़बड़ा जाता. तभी उनकी नजर आश्रम के नीचे से गुजर रहे एक उम्रदराज लेकिन शारीरिक रूप से सुडौल शख्स पर पड़ी. उन्होंने उसे बुलाया और पास बिठा लिया. बड़े वीनीत भाव से उसने जेपी दा की बात सुनी और जीतू बगड्वाल का पंवाड़ा गाना शुरू कर दिया. हमारे रोंगटे खड़े हो गए. नए दौर का युवा गायक अवाक था. जिस गायन में उसे मशक्क त करनी पड़ रही है, उसे वो बूढ़ा बड़े...
ग्रेटा थनबर्ग: पर्यारण के लिए चिंतित एक आवाज

ग्रेटा थनबर्ग: पर्यारण के लिए चिंतित एक आवाज

पर्यावरण
कमलेश चंद्र जोशी“My name is Greta Thunberg. I am sixteen years old. I come from Sweden and speak on behalf of future generations. I know many of you don’t want to listen to us. You say we are just children. But we are only repeating the message of the united climate science.” सोलह साल की ग्रेटा थनबर्ग लंदन की संसद में इस संबोधन के साथ अपने भाषण की शुरुआत करती है. उसकी किताब “No one is too small to make a difference” अलग-अलग मंचों से दिये गए उसके भाषणों का संग्रह है जो उसकी पर्यावरण को लेकर बुलंद की गई आवाज को दर्शाती है. स्कूली हड़ताल से शुरूआत करती हुई ग्रेटा स्वीडन की संसद के सामने हड़ताल के बाद दुनिया की नजर में आती है और उन तमाम बच्चों के लिए प्रेरणा बन जाती है जो अपने भविष्य और पर्यावरण को बचाने के लिए दुनिया भर की सरकारों से सवाल पूछने लगते हैं.हमारा घर यानी की पृथ्वी पर्य...
भड्डू और उसमें बनने वाली दाल के स्वाद से अपरिचित है युवा पीढ़ी

भड्डू और उसमें बनने वाली दाल के स्वाद से अपरिचित है युवा पीढ़ी

साहित्‍य-संस्कृति
आशिता डोभालपहाड़ की संस्कृति और रीति—रिवाज अपने आप में सम्पन्न, अनूठी और अद्भुत है. यह अपने में कई चीजों का समाए हुए है, पहाड़ की संस्कृति और रीति—रिवाज हमेशा एक कौतूहल और शोध का विषय रहा है. हमारी संस्कृति पर कुछेक शोध जरूर हुए हैं लेकिन वह ना के बराबर. हमारी प्राचीन संस्कृति पर अभी भी गहन अध्ययन, चिंतन और शोध की जरूरत है. क्योंकि आज हम जिस समाज और भाग दौड़ की दुनिया में एक दिखावे की सी जिंदगी जी रहे हैं, उसमे हमारी आने वाली पीढ़ी पहाड़ों की कई ऐसी चीजों से अनभिज्ञ रहने वाली है. इसका कारण कोई और नहीं हम ही हैं. क्योंकि आज हम अपनी संस्कृति से विमुख होते जा रहे हैं. आज मैं बात कर रही हूं एक ऐसे बर्तन की, जो हमारे रीति—रिवाज और संस्कृति का कभी अभिन्न अंग हुआ करता था. मैं जिस बर्तन की बात कर रही हूं उसका नाम भड्डू है. भड्डू को बनाने में बहुत चिंतन—मनन करना पड़ा होगा. ऐसी धातुओं का मिश्रण...
बरसात के मौसम में करें फल पौधों का रोपण

बरसात के मौसम में करें फल पौधों का रोपण

समसामयिक
डॉ. राजेंद्र कुकसालबरसात के मौसम में मुख्यत: आम, अमरूद, अनार, आंवला, लीची, कटहल,अंगूर तथा नीम्बू वर्गीय फल पौधों का रोपण किया जाता है. उद्यान लगाने से पहले कुछ बातों को ध्यान में रखा जाना आवश्यक हैं. स्थल का चुनाव-वर्षाकालीन फलदार पौधों के बगीचे समुद्रतल से 1500 मी॰ ऊंचाई तक लगाये जा सकते हैं ढाल का भी ध्यान रखें पूर्व व उत्तरी ढाल वाले स्थान पश्चमी व दक्षिणी ठाल वाले स्थानौ से ज्यादा ठंडे होते हैं जो क्षेत्र हिमालय के पास हैं वहां पर आम, अमरूद, लीची के पौधों का रोपण व्यवसायिक दृष्टि से लाभकर नहीं रहते हैं, ऐसे स्थानों पर नींबू वर्गीय फलदार पौधों से उद्यान लगाने चाहिए. उद्यान लगाने से पूर्व यह भी ध्यान रखना चाहिए कि जिस फल की ज्यादा मांग हो उसी फल के उद्यान लगाये जायें. उद्यान सडक के पास होना चाहिये यदि यह सम्भव न हो तो यह आवश्यक है कि उद्यान में पहुंचने के लिए रास्ता सु...
हम छुं पहाड़ि

हम छुं पहाड़ि

साहित्यिक-हलचल
कुमाऊनी कविता अमृता पांडेहम पहाड़िनाक काथे-काथ् खाणपिणे की नि कौ बात् ठुल्ल गिलास में भरि चाहा कत्तु गज्जब हुनि हम पहाड़ी आहा, कप में चाहा पि जै नि लागें गिलास में मांगनूं चुड़कन चाहा ककड़ी को रैत, झलमल राई लूण,हल्द,मिर्च लै मिलायी पूरी ,आलू टमाटर सब्जी़ दगड़ खाई मस्तमौला भयां हम पहाड़ी. मिल-बांटि बैर खांण वाले भयिं.   परुलि इजा चाहा बणायि माया आलुक गुटुक लै आयि बसंती लै कै चना-चबैना पोटलि में धर लाई , घास काटि,पुला बणायिं बीच में थोड़ा टाइम निकालि झटपट आलु खायिं, चाहा पिवायि फिर अपुण काम में लग गयिं. आजाल है रे छि धान रोपाई गोपालदा खेतम बे पाणि चुरायि है गयिं वि आगबबूला दि हालि वयिं बे द्वि-चार गायि माया, बसन्ती वयिं रे गयि् परुलि सरपट घरहुं भाजि आइ. (हल्द्वानी नैनीताल, देवभूमि उत्तराखंड)...
“सिन्धु सभ्यता के ‘हड़प्पा’ और ‘मोहन जोदड़ो’ नगरों  का जलप्रबंधन”

“सिन्धु सभ्यता के ‘हड़प्पा’ और ‘मोहन जोदड़ो’ नगरों  का जलप्रबंधन”

जल-विज्ञान
डॉ. मोहन चन्द तिवारी दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज से एसोसिएट प्रोफेसर के पद से सेवानिवृत्त हैं। वैदिक ज्ञान-विज्ञान के गहन अध्येता, प्रो.तिवारी कई वर्षों से जल संकट को लेकर लिखते रहे हैं। जल-विज्ञान को वह वैदिक ज्ञान-विज्ञान के जरिए समझने और समझाने की कोशिश करते हैं। उनकी चिंता का केंद्र पहाड़ों में सूखते खाव, धार, नोह और गध्यर रहे हैं। हमारे पाठकों के लिए यह हर्ष का विषय है कि प्रो. तिवारी जल-विज्ञान के संदर्भ में ‘हिमांतर’ पर कॉलम लिखने जा रहे हैं। प्रस्तुत है उनके कॉलम ‘भारत की जल संस्कृति’ की 9वीं कड़ी...भारत की जल संस्कृति-9डॉ. मोहन चन्द तिवारी(12मार्च, 2014 को ‘उत्तराखंड संस्कृत अकादमी’, हरिद्वार द्वारा ‘आईआईटी’ रुडकी में आयोजित विज्ञान से जुड़े छात्रों और जलविज्ञान के अनुसंधानकर्ता विद्वानों के समक्ष मेरे द्वारा दिए गए वक्तव्य ‘प्राचीन भारत में जलविज्ञान‚ जल...
“शहीदों की निशानियों पर बदहाली की धूल”

“शहीदों की निशानियों पर बदहाली की धूल”

ट्रैवलॉग
विजय भट्टजब कफस से लाश निकली उस बुलबुले नाशाद की. इस कदर रोये कि हिचकी बंध गयी सैयाद की.  कमसिनी में खेल खेल नाम ले लेकर तेरे. हाथ से तुर्बत बनायी, पैर से बबार्द की. शाम का वक्त है, कबरों को न ठुकराते चलो.  जाने किस हालत में हो मैयत किसी नाशाद की. भारत में अंग्रेजों की हुकूमत थी. ये दौर था वर्ष 1930 के अगस्त माह के दूसरे सप्ताह का. जब चंद्रशेखर "आजाद", हजारीलाल, रामचंद्र, छैलबिहारी लाल, विश्वम्भरदयाल और दुगड्डा निवासी उनके साथी क्रांतिकारी भवानी सिंह रावत दिल्ली से गढ़वाल की ओर चल पड़े. यह सभी भवनी सिंह रावत के दुगड्डा के पास नाथूपुर गांव जा रहे थे. कोटद्वार में रेल से उतर कर सभी दुगड्डा के लिए प्रस्थान करते हैं. दिन का तीसरा प्रहर बीत रहा था. शाम के समय सीला नदी पार कर जंगल के रास्ते सभी आगे बढ़ रहे थे. सुहाने मौसम में पकड़ंडी पर चलते हुए आजाद अपने प्रिय उक्त गीत को गुनगुना रहे ...