September 19, 2020
साहित्यिक हलचल

इजा! नि थामि तेरी कईकई, सब जगां रई तेरी नराई

(शम्भूदत्त सती का व्यक्तित्व व कृतित्व-3)

  • डॉ. मोहन चंद तिवारी

कुमाऊं के यशस्वी साहित्यकार शम्भूदत्त सती की रचनाधर्मिता से पहाड़ के स्थानीय लोग प्रायः कम ही परिचित हैं किन्तु पिछले तीन दशकों से हिंदी साहित्य के क्षेत्र में एक आंचलिक कुमाऊंनी साहित्यकार के रूप में सती जी ने अपनी एक खास पहचान बनाई है. शम्भूदत्त सती साहित्य की सभी विधाओं में लिखते रहे हैं. कविता, कहानी, उपन्यास, निबंध, नाटक और यहां तक की रेखाचित्र विधाओं में भी. पिछले 27 वर्षों से विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में इनकी रचनाएं प्रकाशित होती रही हैं.इनकी सभी कृतियों में पहाड़ के भोगे हुए संघर्षपूर्ण जीवन का यथार्थ चित्रण हुआ है. वहां की लोक संस्कृति, पर्व-उत्सव, लोकगीत, ग्रामीण जीवन, विवाह गीत, झाड़- फूंक के मंत्र, और कुमाऊंनी शब्द सम्पदा आदि का वर्णन अत्यंत रोचक और मनोहारी शैली में किया गया है.

पहाड़ की लोकसंस्कृति के संस्कार शम्भूदत्त के मन और मस्तिष्क में बचपन से ही रच और बस गए थे. गांव में या कहीं दूसरे गांव में कहीं जागर लगती थी तो बिना बुलाए भी रात के अंधेरे में वहां चले जाते और ध्यान से जगरिए द्वारा सुनाई जा रही कथा और देवताओं के आह्वान के शब्दों को सुनते. फिर अपने घर में एक डिब्बे में पानी भरकर उसे बजाते हुए उसी कंथ, बिरकांथ को दोहराते थे. जहां भी तब हुड़की बौल होता था तो वहां भी शम्भूदत्त पहुंच जाते और ‘हुड़की बौल’ के शब्दों को कंठस्थ करने की कोशिश करते.

शम्भूदत्त सती का जन्म 12 दिसम्बर,1967 को उत्तराखंड के द्वाराहाट क्षेत्र के एक छोटे से गांव भासी,जिला अल्मोड़ा में हुआ. इनकी माता का नाम मालती देवी और पिता का नाम बचीराम सती था. शम्भूदत्त सती की प्राथमिक शिक्षा कक्षा पांच तक अपने ही गांव ‘भासी’ की प्राइमरी पाठशाला जाली खान में हुई. उसके बाद छठी कक्षा से 12वीं तक की शिक्षा राजकीय इंटर कालेज उत्तमसांणी से हुई. परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होने के कारण शम्भूदत्त को आठवीं पास करने के बाद ही अपनी स्कूली शिक्षा के दौरान कई प्रकार की दिक्कतों का सामना करना पड़ा. इन्होंने नवीं दसवीं तक की शिक्षा विज्ञान विषयों के साथ पास की. लेकिन उन दिनों उत्तमसांणी स्कूल में विज्ञान विषय की शिक्षा दसवीं तक ही दी जाती थी इसलिए ग्यारहवीं-बारहवीं में विज्ञान विषय पढ़ने के लिए घर से बहुत दूर पाली जाना होता था.किन्तु वहां खाने और रहने की बोर्डिंग व्यवस्था न हो पाने के कारण शम्भूदत्त ने मजबूरी में अपनी बारहवीं तक की परीक्षा आर्ट विषयों के साथ उत्तमसांणी स्कूल से ही उत्तीर्ण की. अपनी स्कूली शिक्षा की जरूरतों को पूरा करने के लिए छात्र शम्भूदत्त को मेहनत मजदूरी भी करनी पड़ी. उन दिनों वन विभाग के द्वारा बरसात के मौसम में जंगलों में गढ्ढे खोदने और वृक्षारोपण आदि मजदूरी का काम मिल जाया करता था.आत्म स्वावलंबी शम्भूदत्त ने इस वनविभाग के वृक्षारोपण अभियान के तहत गढ्ढे खोदने और पौध रोपण की मजदूरी करके अपनी शिक्षा जारी रखी.तदनन्तर उन्होंने दौला पाली आई टी आई से एक साल का डिप्लोमा भी किया.

पहाड़ की लोकसंस्कृति के संस्कार शम्भूदत्त के मन और मस्तिष्क में बचपन से ही रच और बस गए थे. गांव में या कहीं दूसरे गांव में कहीं जागर लगती थी तो बिना बुलाए भी रात के अंधेरे में वहां चले जाते और ध्यान से जगरिए द्वारा सुनाई जा रही कथा और देवताओं के आह्वान के शब्दों को सुनते. फिर अपने घर में एक डिब्बे में पानी भरकर उसे बजाते हुए उसी कंथ, बिरकांथ को दोहराते थे. जहां भी तब हुड़की बौल होता था तो वहां भी शम्भूदत्त पहुंच जाते और ‘हुड़की बौल’ के शब्दों को कंठस्थ करने की कोशिश करते. शम्भूदत्त को बचपन से ही संगीत और गायन में भी विशेष रूचि थी. इनका स्वर सुरीला था और अनेक प्रकार के वाद्ययंत्रों को भी बजा लेते थे. इन्हें बचपन में रामलीलाओं में अभिनय करने का भी शौक था और दिल्ली में भी इन्होंने कई रामलीलाओं में अभिनय किया.असल में, शम्भूदत्त की एक चाह थी सफल जगरिया,गीतकार और संगीतकार बनने की लेकिन विधि के विधान से ये बन गए लेखक और साहित्यकार.

पहाड़ में बारहवीं तक की शिक्षा प्राप्त करने के बाद आर्थिक समस्याओं के कारण शम्भूदत्त पहाड़ छोड़कर नौकरी की तलाश में दिल्ली आ गए. संयोग से यहां इनकी मुलाकात जाने माने पत्रकार देवेंद्र उपाध्याय से हुई. देवेंद्र उपाध्याय सल्ट क्रांति के स्वतंत्रता सेनानी पुरुषोतम उपाध्याय के पौत्र और रघुवर उपाध्याय के पुत्र थे. स्वनामधन्य वरिष्ठ पत्रकार देवेंद्र उपाध्याय कई उपन्यास, कहानी संग्रह,कविता संग्रह आदि लगभग 50 पुस्तकों के लेखक रहे थे. उन्हीं के मार्ग-दर्शन में शम्भूदत्त को दिल्ली में कई छोटी-बड़ी पत्रिकाओं और अखबारों में काम करने का मौका मिला और साहित्य सृजन की एक नई दिशा भी मिली.कहते हैं मनुष्य में इच्छा शक्ति हो तो राह अपने आप मिल जाती है.मेधावी प्रतिभा के धनी सती जी के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. देवेंद्र उपाध्याय ने शम्भूदत्त का परिचय सुप्रसिद्ध साहित्यकार मनोहर श्याम जोशी जी से कराया और जोशी जी ने बतौर टाइपिस्ट उन्हें अपने साथ रख लिया. जोशी जी के सानिध्य में शम्भूदत्त को मुंबई चेन्नई आदि स्थानों पर बतौर सहायक के रूप में काम करने का मौका मिला. इस प्रकार समय के साथ साथ साहित्य,कला और गीत-संगीत के उनके बचपन के संस्कार भी उनकी रचनाओं में पल्लवित और पुष्पित होने लगे.

इसी बीच शम्भूदत्त ने अपनी आगे की पढ़ाई भी जारी रखी और द्वाराहाट डिग्री कालेज से स्नातक (बी.ए.)की परीक्षा पास की और कुमाऊं विश्वविद्यालय से व्यक्तिगत छात्र के रूप में हिंदी साहित्य में एम.ए.की उपाधि  प्राप्त की. कुछ समय बाद उन्होंने पत्रकारिता में भी एम.ए.की परीक्षा भी उत्तीर्ण की.

पुस्तक के रूप में शम्भूदत्त सती का पहला कविता संग्रह ‘जब सांझ ढले’ सन् 2005 में ‘हिंदी अकादमी’, दिल्ली से प्रकाशित हुआ है.

यह कविता संग्रह चार खंडों में विभाजित है.खंडों के नाम हैं- 1.तुम्हारे लिए, 2.प्रकृति, 3.जीवन और 4.मृत्यु. ‘जब सांझ ढले’ इस पुस्तक की कविताएं इतनी सीधी सरल और निष्कपट हैं कि सहज विस्मय के साथ साथ जीवन के आरोह-अवरोह का ऐसा व्योम उकेर देती हैं, जिन्हें पढ़ते हुए सुखद अनुभूति ही होती है. ये कविताएं प्रेम और प्रकृति तथा जीवन मृत्यु के इर्द-गिर्द रची गई हैं.

सन् 2008 में शम्भूदत्त सती का कुमाऊंनी मिश्रित हिंदी में लिखा गया पहला उपन्यास ‘ओ इजा’ भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित हुआ. इस उपन्यास में पहाड़ के गांवों की जीवनचर्या का एक हूबहू जीता जागता अंकन हुआ है. पहाड़ की एक विधवा असहाय और भोली भाली नारी को नियम और कानून का भय दिखा कर समाज के दबंग पटवारी जैसे ताकतवर लोग उसकी मजबूरी का किस तरह फायदा उठाते हैं,इस कारुणिक नारी विवशता का मार्मिक चित्रण इस उपन्यास में किया गया है. भाषा और बोली के धरातल पर भी कुमाऊंनी शब्द सम्पदा और वहां की लोक संस्कृति को उजागर करने वाली यह बेजोड़ कृति है. इस उपन्यास पर 2010 में शम्भू दत्त सती को “अम्बिका प्रसाद दिव्य पुरस्कार” का राष्ट्रीय सम्मान भी प्राप्त हुआ है. भारतीय ज्ञान पीठ जैसे लब्धप्रतिष्ठ प्रतिष्ठान से इस उपन्यास के दो संस्करण अब तक प्रकाशित हो चुके हैं, जो इसकी  लोकप्रियता का परिचायक है.

शम्भूदत्त सती ने अपनी दो कृतियों के अलावा अनेक कुमाऊंनी कविताओं का  हिंदी में अनुवाद कर भाषा सेतु बंधन को भी मजबूत करने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया है.उनकी ये रचनाएं देश की श्रेष्ठ पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं. ‘रंगायन’ पत्रिका में एक लंबे समय तक सती जी द्वारा कुमाऊंनी गीतों का हिंदी अनुवाद लगातार छपता रहा.

रेखाचित्र के क्षेत्र में भी उनके लगभग दो सौ रेखा चित्र विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में अब तक प्रकाशित हो चुके हैं. सती जी ने कुमाऊंनी के अनेक परम्परागत लोकगीतों का भी उनके हिंदी अनुवाद सहित  संकलन किया है. स्व.हीरासिंह राणा जी की पुस्तक- ‘प्योली’ और ‘बुरांस’ का पूरा अनुवाद कर उन्होंने विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में छपवाया है.

शम्भूदत्त सती ने आठ साल तक महात्मा गांधी अन्तर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय की त्रैमासिक पत्रिका ‘बहुवचन’ में सम्पादकीय पद पर कार्य किया.इसी विश्वविद्यालय की अंग्रेजी त्रैमासिक पत्रिका ‘हिंदी डिस्कोर्स’ के चार अंकों में भी इन्होंने सम्पादन सहयोग किया.विश्वविद्यालय की पत्रिका ‘पुस्तक वार्ता’ के पांच अंकों में वे सम्पादकीय सहयोगी रहे और दो वर्ष ‘प्रतिपक्ष’ पत्रिका में भी सहायक रहे.श्री सती का बचपन से ही संगीत और रंगमंच के प्रति काफी लगाव रहा. उन्होंने अनेक नाटकों में भी अभिनय किया. प्रवासी बन जब वे दिल्ली पहुंचे तो सबसे पहले वे सुप्रसिद्ध साहित्यकार मनोहर श्याम जोशी के सम्पर्क में आए और पंद्रह साल तक जोशी जी के साथ धारावाहिक और फ़िल्म लेखन में सहायक के रूप में कार्य किया. इसी दौरान विद्यानिवास मिश्र और कमलेश्वर के सहयोगी के रूप में भी काम करने का इन्हें सुअवसर मिला. सती जी ने ‘जूम कम्युनिकेशन’ में टेलीविजन धारावाहिक का सम्पादन भी किया और फ़िल्म निर्माता, निदेशक रमेश सिप्पी के साथ ‘गाथा’ धारावाहिक में पटकथा लेखन में सहायक के रूप में कार्य किया. टेलीविजन और फ़िल्म लेखन के साथ साथ शम्भूदत्त सती ने सर्जनात्मक साहित्य लिखना भी शुरू किया, जो आज भी जारी है.उनके दो उपन्यास,दो कविता संग्रह, अनुवाद सहित प्रकाशित होने के लिए तैयार हैं. लेकिन समय के साथ परिस्थितियां भी बदलती रहीं. पिछले दिनों एक वर्ष में दो बार सड़क दुर्घटना में एक ही पांव का दो बार टूट जाना शम्भूदत्त के मन को कहीं न कहीं अंदर तक कचोट गया.लेखन के उत्साह में भी कमी आती गई.

… उनकी यादों में रचा-बसा विराट पहाड़ भी अपनी ममतामयी प्रकृति के साथ उनकी रचनाओं के माध्यम से सदा उनके साथ साथ घूमता रहा. चाहे उनका “ओ इजा” उपन्यास हो या फिर “जब साँझ ढले” की कविताएं उनके बचपन में जिए पहाड़ की अनुभूतियां या संस्मरण ही हैं, जिन्हें उन्होंने अपने काव्य कलेवर में ढालने का प्रयास किया है.

परन्तु पहाड़ के प्रति शम्भूदत्त सती की कसक हमेशा की तरह आज भी वही है. उनका परिवार सदा पहाड़ में रहा. आज भी पहाड़ में ही रह रहा है. वे स्वयं आजीवन आजीविका हेतु शहरों में ही घूमते रहे लेकिन घर परिवार और पहाड़ से बिछोह का दर्द उनकी रचनाओं में प्रवासी पीड़ा के रूप में उभर कर आया है. मगर उनकी यादों में रचा-बसा विराट पहाड़ भी अपनी ममतामयी प्रकृति के साथ उनकी रचनाओं के माध्यम से सदा उनके साथ साथ घूमता रहा. चाहे उनका “ओ इजा” उपन्यास हो या फिर “जब साँझ ढले” की कविताएं उनके बचपन में जिए पहाड़ की अनुभूतियां या संस्मरण ही हैं, जिन्हें उन्होंने अपने काव्य कलेवर में ढालने का प्रयास किया है. अब शम्भूदत्त सोच रहे हैं कि फिर से वहीं पहाड़ में अपने गांव के बाड़े में आडू़ और खुमानी का पेड़ लगाकर, घर के पटांगण की खोई में बैठकर, हुड़के की थाप पर गा सकूं- “इजा नि थामि तेरी कईकई,सब जगां रई तेरी नराई.”

जारी…

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज से एसोसिएट प्रोफेसर के पद से सेवानिवृत्त हैं. एवं विभिन्न पुरस्कार व सम्मानों से सम्मानित हैं. जिनमें 1994 में ‘संस्कृत शिक्षक पुरस्कार’, 1986 में ‘विद्या रत्न सम्मान’ और 1989 में उपराष्ट्रपति डॉ. शंकर दयाल शर्मा द्वारा ‘आचार्यरत्न देशभूषण सम्मान’ से अलंकृत. साथ ही विभिन्न सामाजिक संगठनों से जुड़े हुए हैं और देश के तमाम पत्र—पत्रिकाओं में दर्जनों लेख प्रकाशित.)

 

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