December 3, 2020
इतिहास

गढ़वाल उत्तराखंड की लक्ष्मी बाई तीलू रौतेली

वीरांगना तीलू रौतेली की जन्मजयंती पर विशेष

  • डॉ. मोहन चंद तिवारी

आज 8 अगस्त को गढ़वाल उत्तराखंड की लक्ष्मी बाई के नाम से प्रसिद्ध तीलू रौतेली की जन्मजयंती है. इतिहास के पन्नों में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई दिल्ली की रजिया सुल्ताना, बीजापुर की चांदबीबी,मराठा महारानी ताराबाई,चंदेल की रानी दुर्गावती आदि वीरांगनाओं के बारे में बहुत कुछ लिखा गया है किंतु गढ़वाल उत्तराखंड की वीरांगना तीलू रौतेली के बारे में बहुत कम लोगों को ही यह जानकारी है कि केवल 15 वर्ष की अल्पायु में ही वह वीरबाला रणभूमि में कूद पड़ी थी और सात साल तक उसने अपनी बहादुरी से लड़ते हुए अपने दुश्मनों को छठी का दूध याद दिला दिया था.

तीलू रौतेली का जन्म कब हुआ? निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता है. किन्तु गढ़वाल में आठ अगस्त को ही उनकी जन्म जयंती मनायी जाती है और यह माना जाता है कि उनका जन्म आठ अगस्त, 1661 को हुआ था. उस समय गढ़वाल में पृथ्वीशाह का राज था. कैंत्यूरी राजा धाम शाही की सेना के साथ तीलू रौतेली ने युद्ध किया था.इसी धाम शाही ने गढ़वाल के राजा मानशाह पर आक्रमण किया था जिसके कारण तीलू रौतेली के पिता, भाइयों और मंगेतर को जान गंवानी पड़ी थी.

अपूर्व शौर्य, दृढ संकल्प और अदम्यसाहस की प्रतिमूर्ति इस वीरांगना तीलू रौतेली को गढ़वाल के इतिहास में ‘गढ़वाल की लक्ष्मीबाई’ के नाम से इसलिए भी याद किया जाता है क्योंकि15 से 20 वर्ष की आयु के मध्य सात युद्ध लड़ने वाली विश्व की शायद यह पहली महिला वीरांगना है, जिसने युद्धभूमि में अद्वितीय बहादुरी और साहसपूर्ण रणकौशल का उदाहरण पेश करते हुए अपने देश की सीमाओं की रक्षा हेतु अपने प्राण न्योछावर कर दिए.

तीलू रौतेली का जन्म कब हुआ? निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता है. किन्तु गढ़वाल में आठ अगस्त को ही उनकी जन्म जयंती मनायी जाती है और यह माना जाता है कि उनका जन्म आठ अगस्त, 1661 को हुआ था. उस समय गढ़वाल में पृथ्वीशाह का राज था. कैंत्यूरी राजा धाम शाही की सेना के साथ तीलू रौतेली ने युद्ध किया था.इसी धाम शाही ने गढ़वाल के राजा मानशाह पर आक्रमण किया था जिसके कारण तीलू रौतेली के पिता, भाइयों और मंगेतर को जान गंवानी पड़ी थी. पंडित हरिकृष्ण रतूड़ी ने ‘गढ़वाल का इतिहास’ नामक अपनी  पुस्तक में लिखा है कि राजा मानशाह 1591 से 1610 तक गढ़वाल के राजा रहे और 19 साल राज करने के बाद 34 साल की उम्र में वे स्वर्ग सिधार गये थे.इस आधार पर कहा जा सकता है कि तीलू रौतेली का जन्म ईस्वी सन 1600 के बाद हुआ था.

सत्रहवीं शताब्दी के उतरार्ध में गुराड़ गांव व परगना चौंदकोट गढ़वाल में जन्मी तीलू गोर्ला रौत थोकदार और गढ़वाल रियासत के राजा फतेहशाह के सेनापति भूप्पू रावत की बेटी थी. इनकी माता का नाम मैनावती था.

15 वर्ष की आयु में तीलू रौतेली की मंगनी इडा गांव (पट्टी मोंदाडस्यु) के भुप्पा नेगी के पुत्र के साथ हो गयी थी. तीलू के दो बड़े भाई थे पत्वा और भक्तू. तीलू बचपन से ही तलवार ढाल के साथ खेलकर बड़ी हुई थी. बचपन में ही तीलू ने अपने लिए सबसे सुंदर घोड़ी ‘बिंदुली’ का चयन कर लिया था.15 वर्ष की होते-होते गुरु शिबू पोखरियाल ने तीलू को घुड़सवारी और तलवारबाजी के सारे गुर सिखा दिए थे.

दुर्भाग्य का ऐसा कुचक्र चला कि तीलू के पिता, मंगेतर और दोनों भाई लड़ते लड़ते युद्ध भूमि में ही शहीद हो गए. तब प्रतिशोध की अग्नि से उत्प्रेरित होकर वीरबाला तीलू रौतेली शत्रु सेना से बदला लेने के लिए अपनी दो सहेलियों बेल्लु और देवली तथा ‘बिंदुली’ नाम की घोड़ी को साथ लेकर युद्ध के मैदान में कूद पड़ी.सात वर्ष तक लगातार युद्ध लड़ते हुए वीरांगना तीलू रौतेली ने खैरागढ, टिकोली खाल,उमटागढ़ी, सल्ट महादेव, भिलण भौण, ज्युन्दालु, चौखुटिया, सराईखेत,कालिंका खाल आदि स्थानों के युद्ध जीतकर इतिहास के स्वर्णाक्षरों में अपना नाम अंकित कर दिया. युद्धों के दौरान तीलू रौतेली के अपने कई प्रियजनों और सहेलियों ने भी प्राण न्योछावर किए. ‘भिलण भौण’ के युद्ध में तीलू की दो सहेलियों ने अपने प्राण न्योछावर किए और ‘सराई खेत’ के युद्ध में तीलू की घोड़ी ‘बिंदुली’ शत्रु सेना का निशाना बनी. एक दिन जब तीलू रौतेली तल्ला कांडा के समीप पूर्वी नयार नदी में स्नान कर रही थी तब शत्रु के एक सैनिक ने पीछे से तलवार के घातक प्रहार से दिनांक 15 मई 1683 को इस बीरबाला का धोखे से प्राणान्त कर दिया.

तीलू जहां भी गयी स्थानीय लोगों और वहां के समुदाय प्रमुखों का उसे भरपूर समर्थन मिलता था.असल में धाम शाही एक क्रूर राजा था और वह जनता पर अनाप शनाप कर लगाता रहता था.इससे जनता बहुत त्रस्त थी और उन्हें तीलू के रूप में नया सहारा मिल गया था. तीलू रौतेली का शौर्यपूर्ण इतिहास वृत्त आज गढवाली लोक साहित्य की गौरवशाली वीरगाथा का रूप धारण कर चुका है.अनेक गढवाली कवियों ने तीलू रौतेली के वीरता पूर्ण चरित्र पर वीर रस की कविताएं लिखी हैं.इसी संदर्भ में प्रस्तुत हैं विमल साहित्यरत्न विरचित वीर रसीय गढ़वाली कविता ‘तीलू रौतेली-धकी धै धै’ के कुछ अंश-
“आ तीलू को डंका बजीगे मरदो
ओ तीलू को झंडा फहरैगे मरदो.
रण भेरी मारू बाजीगे मरदो
ढोल दमौऊं गाजीगे मरदो. 
घिमंडु की हुड़की कड़कीगे मरदो
बल्लू की डौरी भड़कीगे मरदो  
शूर शार्दूल ऐ गैने मरदो.”

तीलू रौतेली की याद में आज भी कांडा ग्राम व बीरोंखाल क्षेत्र के निवासी हर वर्ष कौथीग (मेला) आयोजित करते हैं और ढ़ोल-दमाऊ तथा निशाण के साथ तीलू रौतेली की प्रतिमा का पूजन किया जाता है. तीलू रौतेली की स्मृति में गढ़वाल मंडल के कई गाँव में ‘थड्या’ गीत गाये जाते हैं- ओ कांडा का कौथिग उर्यो ओ तिलू कौथिग बोला धकीं धै धै तिलू रौतेली धकीं धै धै.”

“जब तीलू रौतेली नचाई जाती है तो अन्य बीरों  के रणभूत जैसे शिब्बू पोखरियाल, घिमंडू हुडक्या, बेलु-पत्तू सखियाँ, नेगी सरदार आदि के पश्वाओं को भी नचाया जाता है. सबके सब पश्वा मंडांण में युद्ध नृत्य के साथ नाचते हैं.”

जय सिंह रावत ‘जसकोटी’ ने भी अपनी स्वरचित कविता में तीलू रौतेली के वीरता पूर्ण चरित्र के माध्यम से गढ़ की नारी शक्ति का साहसी,पराक्रमी और मर्दानगी भरा चरित्र अंकित किया है. कविता की निम्नलिखित पंक्तियां दर्शनीय हैं –
“धन धन छै तु गढ़ की नारी
जै जै हवेली तेरी तीलू रौतेली
गवे दीन्द तेरी बीरता मर्दानी
ग्वला रौतुंकी छाई तु निर्भीक सैलाणी
गढ़ म तेरी अलग च मिसाल
लड़ाई लाड़ तिन बिन हथयार
मन म राई तेरी येकी ठान
कैन्तुरा राजा क जैड मिटाण ”

तीलू रौतेली की याद में गढ़वाल में रणभूत भी नचाया जाता है. डा. शिवानंद नौटियाल ने अपनी पुस्तक ‘गढ़वाल के लोकनृत्य’ में लिखा है कि ”जब तीलू रौतेली नचाई जाती है तो अन्य बीरों  के रणभूत जैसे शिब्बू पोखरियाल, घिमंडू हुडक्या, बेलु-पत्तू सखियाँ, नेगी सरदार आदि के पश्वाओं को भी नचाया जाता है. सबके सब पश्वा मंडांण में युद्ध नृत्य के साथ नाचते हैं.” पौड़ी गढ़वाल के ब्लाक बीरोखाल में वीरांगना तीलू रौतेली की याद में बनाई गई प्रतिमा मन में देशभक्ति का जोश भर देती है.उत्तराखंड गढ़वाल की इस महान वीरांगना तीलू रौतेली को आज जन्म जयंती के अवसर पर शत शत नमन!

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज से एसोसिएट प्रोफेसर के पद से सेवानिवृत्त हैं. एवं विभिन्न पुरस्कार व सम्मानों से सम्मानित हैं. जिनमें 1994 में ‘संस्कृत शिक्षक पुरस्कार’, 1986 में ‘विद्या रत्न सम्मान’ और 1989 में उपराष्ट्रपति डा. शंकर दयाल शर्मा द्वारा ‘आचार्यरत्न देशभूषण सम्मान’ से अलंकृत. साथ ही विभिन्न सामाजिक संगठनों से जुड़े हुए हैं और देश के तमाम पत्र—पत्रिकाओं में दर्जनों लेख प्रकाशित।)

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