
स्मृतियों के उस पार…एक थी सुरेखा…
अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेषसुनीता भट्ट पैन्यूलीवर्तमान के वक्ष पर यदि मैं किसी ऐसी स्मृति का शिलालेख दर्ज़ करूं जहां किसी स्त्री का दर्द है,संघर्ष है परिवार और समाज के साथ विरोध है ,एकाकीपन है,आंसू हैं और सबसे अहम अपने मान-सम्मान के संरक्षण हेतु दु:साहस है सामाजिक परंपराओं को तोड़ने का, साथ ही पूरे दलगत समाज से टक्कर लेने का तो मुझे यह गुमान बना रहेगा कि मैंने हाशिये पर पड़ी उस स्त्री के स्याह पक्ष को उभारा है जिस की स्थिर सोच ने सहसा गतिमान होकर ठान ली स्त्री स्वायत्ता, आत्मगौरव और जीवन जीने की स्वैच्छिकता को सामाजिक पायदान पर स्वीकार्यता दिलाने की।
एक स्त्री का आदर्श आचरण परिवार और समाज की उन्नति का आधार है किंतु यदि स्त्री समाज और परिवार के विकास की धूरी है तो समाज और परिवार को भी स्त्री मन और उसके स्वभाव की तह तक पहुंच कर उसके अस्तित्व को अंगीकार करना होगा।
आज अंतरर...









