Author: Himantar

हिमालय की धरोहर को समेटने का लघु प्रयास
अर्थ और सौंदर्य से ही स्‍त्री जीवन में आता है नयापन!

अर्थ और सौंदर्य से ही स्‍त्री जीवन में आता है नयापन!

संस्मरण
जवाबदेही की अविस्मरणीय यात्रा भाग-1सुनीता भट्ट पैन्यूलीवर्तमान की मंजूषा में सहेजकर रखी गयी स्मृतियां अगर उघाड़ी जायें तो वे पुनरावृत्ति हैं उन अनुभवों को but तराशने हेतु जो तुर्श भी हो सकती हैं, मीठी भी या फिर दोनों… यक़ीनन कुछ न कुछ because हासिल हो ही जाता है इन स्मृतियों के सफ़र के दौरान कुछ खोने के बावजूद भी, चाहे उस यात्रा का हासिल आत्मविश्वासी बनना हो, निर्भीक हो जाना हो या स्वयं के अस्तित्व को खोजना हो या फिर लौह हो जाना हो वक्त के हथौड़े से चोट खाकर.प्रेमस्त्री जीवन में कुछ अर्थ और सौंदर्य हों so तभी उसके जीवन में एक उत्साह और नयापन बना रहता है. सौंदर्य से अभिप्राय आत्ममुग्धता या भौतिकवादिता नहीं वरन कुछ उसके मन का गुप-चुप कुलांचे मारता रूहानी संगीत है जिसकी धुन व लय पर उसके पैर थिरकें या एक नीला विस्तीर्ण नीरभ्र आकाश जिस पर वह सिर्फ़  अपने अन्वेषण और हुनर की कूं...
जब एक रानी ने अपने सतीत्व की रक्षा के लिए धर लिया था शिला रूप!

जब एक रानी ने अपने सतीत्व की रक्षा के लिए धर लिया था शिला रूप!

साहित्‍य-संस्कृति
देश ही नहीं विदेशों में भी धमाल मचा रही है रंगीली पिछौड़ी...आशिता डोभालउत्तराखंड में दोनों मंडल गढ़वाल so और कुमाऊं अपनी—अपनी संस्कृति के लिए जाने जाते हैं. हम जब बात करते हैं अपने पारंपरिक परिधानों की तो हर जिले और हर विकासखंड का या यूं कहें कि हर एक क्षेत्र में थोड़ा भिन्नता मिलेगी पर कहीं न कहीं कुछ चीजें ऐसी भी हैं, जो एक समान होती हैं. जैसे— कुमाऊं की 'रंगीली पिछौड़ी' है, जो पूरे कुमाऊं मंडल का एक विशेष तरह का परिधान है, अंगवस्त्र है, इज्जत है और इसे पवित्र परिधान की संज्ञा Because भी दी जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी. इस परिधान का इतिहास बेहद रूचिपूर्ण है. राजे—रजवाड़े और सम्पन्न घरानों से पैदा हुआ ये परिधान स्वयं घरों में तैयार किया जाता था, बल्कि मंजू जी से प्राप्त जानकारी के अनुसार कुमाऊं की रानी 'जियारानी' से इसका इतिहास जुड़ा हुआ बताती हैं.परिधानएक दिन जैसे...
जोयूं उत्तराखंड में मातृपूजा की वैदिक परम्परा

जोयूं उत्तराखंड में मातृपूजा की वैदिक परम्परा

लोक पर्व-त्योहार
डॉ. मोहन चंद तिवारीसमूचे देश में शारदीय नवरात्र का पर्व बड़े धूमधाम से मनाया जाता है. दुर्गा सप्तशती में इसे वार्षिक देवी पूजा की संज्ञा दी गई है.उत्तराखंड के द्वाराहाट क्षेत्र में जालली के निकट स्थित so जोयूं ग्राम आदिकालीन मातृ उपासकों का एक ऐसा ग्राम है,जहां आज भी शारदीय नवरात्र में प्रतिवर्ष मां जगदम्बा की सामूहिक रूप से अखंड जोत जलती है और अष्टमी एवं दशमी की वार्षिक पूजा का पर्व विशेष रूप से मनाने की परंपरा भी रही है.पलायन हालांकि यह ग्राम भी पलायन के अभिशाप के कारण उत्तराखंड के अन्य ग्रामों की भांति बदहाली के दौर से गुजर रहा है.  पिछले तीन चार सालों में सड़क चौड़ीकरण के दौरान पीडब्‍ल्‍यूडी so विभाग ने जोयूं मार्ग में पड़ने वाले वन वृक्षों को नष्ट कर दिया है और गांव में जाने के लिए पुश्तैनी मार्ग भी बेरहमी से तोड़ दिए हैं. ग्रामसभा की उपेक्षा के कारण नागरिक सुविधाओं का यहां सर्वथा...
हीर की फुलकारी…

हीर की फुलकारी…

ट्रैवलॉग
‘फुलकारी पुलाव’ पंजाब की लुप्‍त होती जा रही एक रेसीपी है…मंजू दिल से… भाग-3मंजू कालासोहने फुल्लां विच्चों फुल गुलाब नी सखि सोहणे देशां विच्चों देश पंजाब नी सखियों बगदी रावी ते झेलम चनाय नी सखियों देंदा भुख्या ने रोटी पंजाब दी सखियों... पंजाब यानी जिसके ह्रदय स्थल पर पांच नदियां- झेलम, चिनाब, रावी, सतलुज, व्यास नामक जलधाराऐं अठखेलियां करती हैं. इस प्रदेश के बारे में दावा किया जाता है कि यही वो धरती है because जहाँ वोल्गा से विहार करती हुई आर्य सभ्यता ने सिंधु नदी के तट को अपना आशियाना बनाया.प्यारे पंजाब की माटी का परिचय उसकी जीवन को स्फूर्ति और गति देने वाली सभ्यता में छिपा है. सरिताओं के स्वच्छ जल से सिंचित लहलहाते अन्न की बालियों से हरे-भरे खेत, गिद्दा और भांगड़ा so की ताल पर थिरकते “मुटियार” और लहलहाती फसलें, दूध और दही की नदियों के साथ फिजाओं में तैरती “बुल्ले शाह...
यतो धर्मस्ततो  जय: 

यतो धर्मस्ततो  जय: 

लोक पर्व-त्योहार
विजया दशमी पर विशेषप्रो. गिरीश्वर मिश्रमर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम भारतीय लोक-जीवन में गहरे पैठे हुए हैं और उनकी कथा आश्चर्यजनक रूप से हजारों वर्षों से विभिन्न रूपों में आम जनों के सामने न केवल आदर्श प्रस्तुत करती so रही है बल्कि उसे जीवन के संघर्षों के बीच खड़े रहने के लिए सम्बल भी देती आ रही है. विजयादशमी की तिथि श्री राम की कथा का एक चरम बिंदु है जब वे आततायी रावण से धरती को मुक्त करते हैं और ऐसे राम राज्य की स्थापना करते हैं so जिसमें जन जीवन संतुष्ट और प्रसन्न है. उसे दैहिक, दैविक या भौतिक किसी तरह  का ताप  नहीं है. राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने भी स्वराज के रूप में राम राज्य की कल्पना की थी . पर इस कल्पना को साकार करने के मार्ग में हम अभी भी बहुत दूर खड़े हैं. रामश्रीराम की कथा आज भी अत्यंत so लोकप्रिय है. अब दशहरा के पूर्व धूम धाम से दुर्गा पूजा का उत्सव भी जुड़ गया है. द...
दमखम से भरी, सुलगती कविताओं का झुंड है “कविता पर मुकदमा”

दमखम से भरी, सुलगती कविताओं का झुंड है “कविता पर मुकदमा”

पुस्तक-समीक्षा
सुनीता भट्ट पैन्यूलीएक बेहद ख़ूबसूरत, मासूम-सी कविता जहां मुन्नी गुप्ता के कविता संग्रह “कविता पर मुकदमा” का संपूर्ण सार छुपा हुआ है आप सभी  पाठक भी पढिय़े न..! अपने फैसले के साथ जीना चांद होना है गर तुम जी सको चांद बनकर तो सारा आकाश तुम्हारा है… आकाश “कविता पर मुकदमा” संग्रह  सामान्य दैनिक जीवन की ऊहापोह और संघर्ष की अनूभूतियों का संग्रह ही नहीं हैं अपितु धुंआ निकालती, दमखम से भरी हुई, सुलगती कविताओं का झुंड है’,so जिनकी आंच की ज़द में आकर शायद समाज में कहीं बदलाव की किरण महसूस की जा सके या नये जाग्रत समाज का उन्नयन हो. उपरोक्त वर्णित कविता संदेश दे रही है कि अपने फैसलों और अपने सिद्धांतों पर अडिग रहना ही ओजस्वी और  सफल होना है अथार्त किसी भी चुनौती का सामना करने के लिए निर्भीक चरित्र और  जीवन मुल्य के सिद्धांतो पर अडिगता अपरिहार्य है. यदि आप डटे रहते हैं अपने जीवन के सिद्धांत...
मौलिकता की पहचान

मौलिकता की पहचान

कला-रंगमंच
लोकजीवन का चेहरा भी प्रस्तुत कर रहे हैं जगमोहन बंगाणीअतुल शर्माजगमोहन बंगाणी ने अपनी पहचान बनाई है. जब हम यह कहते हैं तो उसके पीछे पूरा एक संघर्षशील समय सामने आ जाता है. कहां से कला और कलाकार की यात्रा आरम्भ हुई इसके बारे मे जान because लेना ज़रुरी है. पहाड़ की ज़मीन से जुड़कर दुनियां को महसूस करने की यात्रा है प्रसिद्ध चित्रकार जगमोहन बंगाणी की. रंगो और शिल्प के साथ सार्वभौमिक मानव मूल्यों के प्रति सचेत है बंगाणी की विलक्षण कला. तो इसे शुरु से ही शुरु करते हैं.पहाड़ पहाड़ के मनोभावों से मिलते जुलते रंग संयोजन के प्रतिबिंब बंगाणी की चित्रकला मे नजर आते हैं. बने बनाये चौखटों को तोड़ा है और अन्तरंग रचनात्मक यात्रा के प्रतिबद्ध रहे हैं. नये रास्तो की अन्वेषणात्मक खोज और मनो भावों और संघर्ष की अनुभूति देते चेहरे पहाड़ से बहुत करीबी  रिश्ता बनाते हैं. बहुत ही शुरुआती चित्रों में ...
रिसाले- मसालों के…

रिसाले- मसालों के…

ट्रैवलॉग
मंजू दिल से… भाग-2मंजू कालाजब भी मैं पहाडों पर भ्रमण करती हूँ, तो अक्सर महिलाओं को सिल बट्टे पर मसाले रगड़ते हुए गीत गाते देखकर एक कथानक की अविस्मरणीय पात्र को याद करती हूँ, जो because “मिस्ट्रेस ऑफ स्पाइसेज” की नायिका है और वह मसालों की जादुई शक्तियों को जानती है. वह अपनी दुकान पर  बैठकर कुछ  अजीबो-गरीब  धुन  फुस-फुसाते हुए आने वाले ग्राहकों की समस्याओं को दूर करने हेतु सही मसाला चुनकर अपनी प्रार्थना के बल पर उसमें छिपी शक्तियों को बाहर लाती है.फंतासी कथा… फंतासी के माध्यम से अपनी बात कहता है, मगर मसालों में छिपी शक्तियां कोई फंतासी नहीं. आज हम मसालों को भोजन का अनिवार्य अंग भर मानते हैं. आयुर्वेद के जानकार because इनमें मौजूद औषधीय गुणों के बारे में बताएंगे. मगर एक जमाना था जब इन्हीं मसालों ने इतिहास की धारा बदली थी, साम्राज्य बनाए और तोड़े थे, भूगोल को नया आकार दिया था. ...
लकड़ी जो लकड़ी को “फोड़ने” में सहारा देती

लकड़ी जो लकड़ी को “फोड़ने” में सहारा देती

संस्मरण
मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—57प्रकाश उप्रेतीपहाड़ की संरचना में लकड़ी कई रूपों में उपस्थित है. वहाँ लकड़ी सिर्फ लकड़ी नहीं रहती. उसके कई रूप, नाम और प्रयोग हो जाते हैं. इसलिए जंगलों पर निर्भरता पर्यावरण के कारण नहीं बल्कि जीवन के कारण होती है. because जंगल, जमीन, जल, सबका संबंध जीवन से है. जीवन, जीव और जंगलातों के बीच अन्योश्रित संबंध होता है. इन्हें अलग-अलग करके पहाड़ को नहीं समझा जा सकता. इन सबसे ही पहाड़ और वहाँ का जीवन बनता है.पहाड़ आज बात उस लकड़ी की जो लकड़ी को ही 'फोड़ने' (फाड़ने) में सहारा देती थी. इसके बिना घर पर आप लकड़ी फोड़ ही नहीं सकते थे. इसका मसला वैसे ही था जैसा कबीर कहते हैं न- “अंदर हाथ सहार दे, बाहर बाहै चोट”. ईजा तो इसे कभी 'गोठ' (घर के नीचे वाला हिस्सा) तो कभी “छन” (जहां गाय-भैंस बाँधी जाती) के अंदर संभाल कर because रखती थीं. इसका काम सिर्फ लकड़ी को सहारा देने ...
थानो के जंगल को बचाने के लिए एकजुट हुए दूनघाटी के लोग

थानो के जंगल को बचाने के लिए एकजुट हुए दूनघाटी के लोग

समसामयिक
पर्यावरण बचाओ संदेशों के साथ घर—घर से युवा स्वयं अपनी तख्तियां बनाकर आए थेहिमांतर ब्यूरो, देहरादूनदेहरादून जौलीग्रांट के हवाई अड्डे के because विस्तार प्रक्रिया के दौरान थानो के रिजर्व वन क्षेत्र से लगभग 10 हजार पेड़ काटे जाएंगे. उत्तराखंड सरकार की मंशा यहां अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा बनाने की है. जबकि राज्य में पूर्व से ही गौचर, पिथौरागढ़, पंतनगर के अलावा चिन्यालीसौड़ में हवाई प​ट्टियां हैं, इनमें से पिथौरागढ़ की हवाई पट्टी को मध्यम आकार के विमानों के लिए सही नहीं माना गया है. क्योंकि इसमें कुछ तकनीकी खामियां बताई गई थी.देहरादूनइनसे इतर, उत्तराखंड की सरकार थानो वन because क्षेत्र की तरफ हवाई अड्डे का विस्तार करना चाहती है. इसके लिए सरकार ने पहले ही अनापत्ति दे दी है. लगभग 217 एकड़ की वन भूमि जिस पर 10 हजारे से अधिक हरे वृक्ष हैं, उस भूमि का अधिग्रहण किया जाना प्रस्तावित है...