Author: Himantar

हिमालय की धरोहर को समेटने का लघु प्रयास
बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ!

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ!

कविताएं
सुधा भारद्वाज “निराकृति”अबोधभूली बाल स्वभाव वह... बहती थी सरिता सम वह... क्या सोच उसे समाज की... कुछ अजब रूढ़ी रिवाज की...परिणाम छूटी शि क्षा उसकी... नही हुई पूरी कोई आस उसकी... सपने देखे बहुत बड़े-बड़े थे... रिश्ते तब सब आन अड़े थे...छूट गयी सभी सखी सहेली... जीवन बना था एक पहेली... जिस उम्र में सखियाँ करती क्रीड़ा... वह झेल रही थी प्रसव पीड़ा...अबोध अशिक्षित अज्ञानी वह... क्या देगी बालक को शिक्षा... जीवन के हर कठिन मोड़ पर... काम तो आती है शिक्षा...परिस्थितियां विपरित भले हो... कार्य यदि हो सभी समय पर... नही उठाना पड़ता जोख़िम... हाथ बँटाती है शिक्षा...(विकासनगर उत्तराखण्ड)...
मिट्टी में बीज की तरह रोपे गए हैं कविता में शब्दों के बीज

मिट्टी में बीज की तरह रोपे गए हैं कविता में शब्दों के बीज

पुस्तक-समीक्षा
डॉ. शशि मंगलप्रकृति से अत्यंत प्रेम becauseकरने वाली डॉ. कविता पनिया शिक्षिका भी हैं और कवयित्री भी जहाँ वह अपने विद्यार्थियों को बहुत कुछ सिखाती हैं वहीं प्रकृति से बहुत कुछ सीखती हैं अपने विद्यार्थियों को पढ़ाने के लिए उन्हें गढ़ने  के लिए जहाँ पढ़ती हैं वहीं अपने जीवन को गढ़ने के लिए प्रकृति को पढ़ने का प्रयास करती हैं और उसके अनेकानेक रूपों से अपने मन को तथा रचनाओं को गढ़ती हैं. कविता पनिया का becauseकाव्य संग्रह “कविमित्रा” राजमंगल प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है यह संग्रह संपूर्ण प्रकृति को समर्पित है. जिसमें कविता पनिया ने प्रकृति का मानवीकरण बखूबी किया है और प्रकृति से संवाद भी खूब किया हैं संवाद से रची इस कविता की पंक्तियों को देखिए –            अरे टहनी जरा becauseबताओ तो            हर वसंत तुम इतना becauseक्यों संवरती हो            फूलों के भार से हवाओं संग because कितना लचकती हो ...
उत्तराखंड में वनों की कटाई से गहराता जलस्रोतों का संकट

उत्तराखंड में वनों की कटाई से गहराता जलस्रोतों का संकट

जल-विज्ञान
भारत की जल संस्कृति-31डॉ. मोहन चंद तिवारीउत्तराखण्ड में जल-प्रबन्धन-2 प्राकृतिक जल संसाधनों because जैसे तालाब, पोखर, गधेरे, नदी, नहर, को जल से भरपूर बनाए रखने में जंगल और वृक्षों की अहम भूमिका रहती है.जलवायु की प्राकृतिक  पारिस्थितिकी का संतुलन बनाए रखने और वर्तमान ग्लोबल वार्मिंग के प्रकोप को शांत करके आकाशगत जल because और भूमिगत जल के नियामक भी वृक्ष और जंगल हैं. इसलिए   जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग के कारण उत्पन्न जलसंकट से उबरने और स्वस्थ पर्यावरण के लिए वनों  की सुरक्षा करना परम आवश्यक है.वानिकी उत्तराखण्ड के अधिकांश वानिकी क्षेत्र नदियों के संवेदनशील प्रवाह क्षेत्र की सीमा के अन्तर्गत स्थित हैं. ये वानिकी क्षेत्र न केवल उत्तराखण्ड हिमालय की जैव-विविधता because (बायो-डाइवरसिटी) का संवर्धन करते हैं बल्कि समूचे उत्तराखण्ड की पर्यावरण पारिस्थितिकी, जलवायु परिवर्तन ...
समूचे विश्व को सम्मोहित किया है गीता के मानवतावादी चिंतन ने

समूचे विश्व को सम्मोहित किया है गीता के मानवतावादी चिंतन ने

अध्यात्म
गीता जयंती पर विशेषडॉ. मोहन चंद तिवारी    भारतीय कालगणना के because अनुसार मार्गशीष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को प्रतिवर्ष गीता जयंती का पर्व मनाया जाता है. इस बार अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार गीता जयंती की 5157वीं वर्षगांठ 25 दिसंबर 2020 को मनाई जा रही है. ब्रह्मपुराण के अनुसार, द्वापर युग में मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी को भगवान् श्रीकृष्ण ने इसी दिन गीता का उपदेश दिया था. गीता का उपदेश मोह का क्षय करने के लिए है, इसीलिए because गीता जयंती के दिन पड़ने वाली एकादशी को मोक्षदा एकादशी भी कहा गया है. यह भी दुर्लभ संयोग ही है कि आज ईसा मसीह के जन्म की खुशी में मनाया जाने वाला क्रिसमस पर्व का बड़ा दिन भी है. आज के दिन 'श्रीमद्भगवद्गीता' की सुगन्धित पुष्पों द्वारा पूजा अर्चना कर गीता का पाठ करना चाहिए.गीता का पाठ आरंभ करने से पूर्व निम्न श्लोक को भावार्थ सहित पढ़कर श्रीहरिविष्णु का ध्यान क...
गीता का संदेश…

गीता का संदेश…

अध्यात्म
गीता जयंती  (25 दिसम्बर) पर विशेषप्रो. गिरीश्वर मिश्रआज के दौर में चिंता, अवसाद और तनाव निरन्तर बढ रहे हैं. बढती इछाओं की पूर्ति न होने पर क्षोभ और कुंठा होती है. तब आक्रोश और हिंसा  का तांडव शुरू होने लगता है. because दुखद बात तो यह है कि सहिष्णुता और धैर्य कमजोर पड़ने लगे हैं. आपसी रिश्ते, भरोसा और पारस्परिकता की डोर टूटती सी दिख रही है. धन सम्पदा भी बढ रही है, शायद ज्यादा तेजी से और अधिक मात्रा में. पर हर कोई बेचैन सा दिख रहा है. किसी के मन को शांति नहीं है, चैन नहीं है. इसकी खोज में लोग दौड़ लगा रहे हैं. वे पहाड़ों  पर जाते हैं, सिद्ध और संत महात्मा की खोज में लगे रहते हैं, नशा करते हैं, मदिरा का सेवन करते हैं और किस्म किस्म के व्यसन में जुट जाते हैं. अच्छे जीवन की तलाश जारी है पर प्रसन्नता दूर ही भागती रहती है. त्तृप्ति नहीं मिलती. कुछ और पाने की दौड़ लगी रहती है और संतुष्टि नही...
उत्तराखंड आंदोलन के जननायक इन्द्रमणि बडोनी   

उत्तराखंड आंदोलन के जननायक इन्द्रमणि बडोनी   

स्मृति-शेष
जन्मजयंती पर विशेषडॉ. मोहन चंद तिवारीआज 24 दिसम्बर उत्तराखंड राज्य आंदोलन because के जननायक श्री इन्द्रमणि बडोनी जी की जन्मजयंती है.उत्तराखंड राज्य आंदोलन के इतिहास में बडोनी जी ‘पहाड के गांधी’ के नाम से भी प्रसिद्ध हैं. उत्तराखंड मगर दुःख के साथ कहना पड़ता है कि इस जननायक की जन्मजयंती पर जिस कृतज्ञतापूर्ण हार्दिक संवेदनाओं के साथ उत्तराखंड की जनता के द्वारा इस महानायक को याद किया जाना चाहिए था but उस तरह की जनभावनाओं का उत्तराखंड समाज में अभाव ही नजर आता है. इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि उत्तराखंड की राजनीति आज किस प्रकार की वैचारिक शून्यता और अवसरवाद के दौर से गुजर रही है? because इतिहास साक्षी है कि जो कौम या देश अपने स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान को भुला देता है वह ज्यादा दिनों तक अपनी स्वतंत्रता की रक्षा नहीं कर सकता. नदीउत्तराखंड की सम्पूर्ण जनता अपने because इस मह...
विकास की बाट जोहते सुदूर के गाँव…

विकास की बाट जोहते सुदूर के गाँव…

पिथौरागढ़
उतकै-उतकै नहीं!डॉ. गिरिजा किशोर पाठक  उत्तराखंड का राज्य पक्षी यद्यपि हिमालयन मोनाल है लेकिन जनमानस का सबसे लोकप्रिय पक्षी है घूघूती. घूघूती पर यहाँ के सैकड़ों गाने, कथाएं, किवदंतियाँ है. घूघूती के बोल “के करू पोथी उतकै-उतकै” (क्या करू बेटा बस इतना सा ही और इतना ही है) यह एक कहानी से भी जुड़ा है. उतकै-उतकै माने जिसमें परिवर्तन/बृद्धि नहीं हुई है परिश्रम के वाबजूद. घूघूती के ये बोल उतकै-उतकै, उत्तराखंड के सुदूर सीमांत गांवों के विकास की यात्रा पर फिट बैठते हैं. इस बार एक लंबे अंतराल के बाद सुदूर हिमालय की तलहटी में बसे अपने सीमांत गाँव डौणू, बेरीनाग, जिला पिथौरागढ़ 1 माह के प्रवास की तैयारी के साथ पहुच गया. सोच था जिन संस्थानों और संस्थाओं को वेब स्पीच देनी होगी वहीं से दे दूंगा. कुछ जाड़े के अहसास के साथ जीने का आनंद भी आ जाएगा. 1982 की फरवरी में मेरी छोटी बहिन का ब्याह हुआ था तब जाड़...
अमलावा नदी में दो तैरती मछलियां

अमलावा नदी में दो तैरती मछलियां

संस्मरण
स्मृतियों के उस पार...सुनीता भट्ट पैन्यूलीपहाड़, नदी because और खेत पहाड़ी लोग और उनके जीवन के बीच बना हुआ अनंत  सेतु है जिस पर आवाजाही किये बिना पहाड़ी लोग जीवन की जटिलता को भोगकर स्वयं के लिए सुगम रास्ता नहीं बना सकते. कहना ग़लत न होगा पहाड़, नदी, और खेत तप-स्थल हैं because पहाड़ियों के अभ्यास करने के जिनके इर्द-गिर्द उनके स्वप्न, उनकी उम्मीदें उनके जीवन के उद्देश्य धीरे-धीरे अंगड़ाई लेते हैं फिर पूरे वेग के साथ कुलांचे मारते हैं.नदी पहाड़ ने बहुत कुछ दिया है मैदान को, because पहाड़ ने स्वच्छ हवा दी है, स्वच्छ पानी दिया है, ताजा अनाज, फल और सब्जियां दी हैं  साथ ही समृद्धि  भी दी है. यही नहीं पहाड़ के प्रति हमें कृतार्थ होना चाहिए क्योंकि पहाड़ ने  देश व समाज को नई-नई प्रतिभायें  भी दी हैं.नदी आप यदि बस में बैठकर शहर से गांवों की because ओर जा रहे हैं तो आपको शहर और गा...
पुस्तक ‘रवाँई क्षेत्र के देवालय एवं देवगाथाएं’ लोकार्पित

पुस्तक ‘रवाँई क्षेत्र के देवालय एवं देवगाथाएं’ लोकार्पित

साहित्यिक-हलचल
पुस्तक लोकार्पणहिमांतर ब्‍यूरो, उत्तरकाशीसामाजिक एवं पर्यावरणीय कल्याण समिति (सेवा) के तत्वाधान में देवभूमि उत्तराखण्ड के पश्चिमोत्तर रवाँई क्षेत्र में होने वाले प्रमुख लोकोत्सव देवलांग because के अवसर पर ‘देवडोखरी’ (बनाल) में because अवस्थित रा.उ.मा.विद्यालय के सभागार में दिनेश रावत की पुस्तक ‘रवाँई के देवालय एवं देवगाथाएँ’ का  लोकार्पण उत्‍तरकाशी जनपद के मुख्य शिक्षा अधिकारी विनोद प्रसाद सिमल्टी, साहित्यकार महाबीर रवांल्टा, पं. महीशरण सेमवाल, सुखदेव रावत, पं. शांति प्रसाद सेमवाल, पूर्व ब्लाक प्रमुख रचना बहुगुणा, पूर्व जिला पंचायत because सदस्य नानई चंदी पोखरियाल, इ. चन्द्र लाल भारती एवं समिति के शशि मोहन रावत की उपस्थिति में किया गया. कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्जवलन के साथ किया गया.सामाजिक कार्यक्रम के दौरान सुखदेव रावत ने because उपस्थितजनों का स्वागत संबोधन किया तो b...
सौ साल के इस टूटते हुए ‘दुर्गाभवन’ की स्मृतियां

सौ साल के इस टूटते हुए ‘दुर्गाभवन’ की स्मृतियां

संस्मरण
हर परिवर्तन के साक्षी बने हुए हैं हिमाच्छादित हिमालय शिव स्वरूपनीलम पांडेय ‘नील’काफी समय बाद बस से यात्रा की. because यात्रा देहरादून से रानीखेत की थी. मैदान से पहाड़ों की बसों में बजाए जाने  वाले गीत कुछ इस प्रकार होते हैं, एक उदाहरण के तौर पर जैसे देहरादून से हरिद्वार तक देशी छैल छबीले गीत, हरिद्वार से नजीबाबाद तक निरपट धार्मिक गीत, नजीबाबाद से हल्द्वानी तक 80 के दशक के रोमांटिक गीत और हल्द्वानी से रानीखेत तक सिर्फ पहाड़ी गीत. पूरी रात, मैं इन गीतों से लगभग ऊब चुकी थी because और अब पूरी रात की यात्रा के बाद बस पहुंचने वाली ही थी.पूरी रातबहुत पहले यहां रात्रि को because चौकीदार घुमा करता था. ‘जागते रहो-जागते रहो’ की आवाज सुनाई देती थी, लेकिन शायद अब ऐसा कुछ नहीं है.  मुझे लगा साढ़े पांच बजे के बाद शायद कुछ लोग सुबह की सैर पर निकलते तो होंगे, लेकिन  कोई प्राणी सड़क पर दिख...