Author: Himantar

हिमालय की धरोहर को समेटने का लघु प्रयास
मृगया की शौकीन गुजरी रानी “मृगनयनी”

मृगया की शौकीन गुजरी रानी “मृगनयनी”

ट्रैवलॉग
मंजू दिल से… भाग-6मंजू कालायदि आप ग्वालियर जाऐगा because तो ग्वालियर दुर्ग के भूतल भाग में  स्थित गुजरी महल को जरूर देखिएगा! तोमर वंश के यशस्वी राजा मानसिंह तोमर गुर्जर ने अपनी प्रियतमा गूजरी रानी मृगनयनी के लिये सन् 1486-1516 ई. में यह महल बनवाया था. गूजरी महल 71 मीटर लम्बा because एवं 60 मीटर चैड़ा आयताकार भवन है, जिसके आन्तरिक भाग में एक विशाल आंगन है. गूजरी महल का बाहरी रूप आज भी प्रायः पूरी तरह से सुरक्षित है. महल के प्रस्तर खण्डों पर खोदकर बनाई गई कलातम्क आकृतियों में हाथी, मयूर, झरोखे आदि एवं बाह्य भाग में गुम्बदाकार छत्रियों की अपनी ही विशेषता है तथा मुख्य द्वार पर निर्माण संबंधी फारसी शिलालेख लगा हुआ है! प्यारे पढ़ें— बज उठेंगी हरे कांच की चूडियाँ…! सम्पूर्ण महल को रंगीन because टाइलों से अलंकृत किया गया..है! कहीं-कहीं प्रस्तर पर बड़ी कलात्मक नयनाभिराम पच्चीकारी भी...
… मेरे नहीं कहने पर बिन्दी की ओर ईशारा कर कहता है- “ओ हिन्दी”

… मेरे नहीं कहने पर बिन्दी की ओर ईशारा कर कहता है- “ओ हिन्दी”

संस्मरण
भारतीय शहीद सैनिक विद्यालय नैनीताल की संस्थापक प्रधानाचार्य स्व. कला बिष्ट ने वर्ष 1992 में ऑल इण्डिया वीमेन्स कान्फ्रेंस की सचिव की हैसियत से देश की 8 महिलाओं के साथ राष्ट्रीय अध्यक्ष श्रीमती शोभना रानाडे के नेतृत्व में एथेन्स (यूनान) में प्रतिभाग किया. so अवसर था ’इन्टरनेशनल एलाइन्स ऑफ वीमेन्स’ की 29वीं कांग्रेस का अधिवेशन. स्व. कला बिष्ट को ही नैनीताल में सर्वप्रथम ऑल इण्डिया वीमेन्स कान्फ्रेंस की शुरुआत का श्रेय जाता है. 04 अक्टूबर से 13 अक्टूबर 1992 तक की यूनान यात्रा का स्व. कला बिष्ट का रोचक यात्रा-वृतान्त कान्फ्रेंस की पत्रिका ’’साक्षी’’ के 1994 के अंक में प्रकाशित हो चुका है. एथेन्स की धरती पर उनके क्या खट्टे-मीठे अनुभव रहे, उनके उस यात्रा वृतान्त को शब्दशः हिमांतर में प्रकाशित किया जा रहा है, प्रस्तु​त है उनकी पहली किस्तस्व. कला बिष्ट की एथेंस (यूनान) यात्रा का रोचक वृत...
‘देवोत्थान’ एकादशी देवों के जागने का पर्व

‘देवोत्थान’ एकादशी देवों के जागने का पर्व

लोक पर्व-त्योहार
ऋतुविज्ञान का भी पर्वडॉ. मोहन चंद तिवारी"उत्तिष्ठोत्तिष्ठ गोविंद त्यज निद्रां जगत्पते. त्वयि सुप्ते जगन्नाथ जगत सुप्तं भवेदिदम्." अर्थात् हे गोविंद, निद्रा को छोड़कर जागिए. प्रभो! यदि because आप ही सोए रहेंगे, तो इस संसार को कौन जगाएगा? यह संसार भी सोया ही रहेगा.सरकारी आज 25 नवंबर 2020, को कार्तिक so मास शुक्ल पक्ष की 'देवोत्थान' एकादशी है.आज के दिन श्रीहरि भगवान् विष्णु चतुर्मास की निद्रा से जागते हैं. पौराणिक मान्यता के अनुसार,भगवान् विष्णु साल के चार माह शेषनाग की शैय्या पर सोने के लिये क्षीरसागर में शयन करने चले जाते हैं तथा कार्तिक शुक्ल एकादशी को वे उठ जाते हैं. इसलिए इसे देवोत्थान, देवउठनी या देवप्रबोधिनी एकादशी कहा जाता है. इस दिन से ही सनातन हिन्दू धर्म में विवाह आदि मांगलिक कार्य शुरू हो जाते हैं.एकादशी'देवोत्थान' but एकादशी के दिन ही भगवान् विष्णु के स्व...
सहारनपुर जाने वाली बसों की हड़ताल सुनकर…

सहारनपुर जाने वाली बसों की हड़ताल सुनकर…

संस्मरण
जवाबदेही की अविस्मरणीय यात्रा - भाग-5सुनीता भट्ट पैन्यूलीमेरे माथा ठनकने को पतिदेव ने तनिक भी विश्राम न करने दिया कार में बैठे और आईएसबीटी से कार सहारनपुर रोड की ओर घुमा दी मेरे यह पूछने पर कि यह because आप क्या कर रहे हो? कहने लगे तुम्हें कालेज पहुंचाने जा रहा हूं और यह कहकर कार की गति और बढ़ा दी. मैंने कहा अरे आप ऐसे कैसे? नाईट सूट में ही मुझे सहारनपुर परीक्षा दिलवाने ले जायेंगे? उनके यह कहने पर कि यह समय तर्क-वितर्क का नहीं है but बस तुम चुपचाप बैठी रहो क्योंकि सीमित समय में मुझे सहारनपुर पहुंचाने का तनाव पतिदेव के माथे पर साफ़ नज़र आ रहा था. परिस्तिथि ऐसी बन पड़ी थी कि so मेरे पास तर्क करने की कोई वजह भी नहीं थी. समय कम था अत: कालेज समय से पहुंचने के दबाव में बिना एक-दूसरे से बात किये हम सहारनपुर की ओर चले जा रहे थे रास्ता आज और दिन की अपेक्षा बहुत लंबा महसूस हो रहा था. सत्...
कोरोना काल में स्वास्थ्य की चुनौती के निजी और सार्वजनिक आयाम 

कोरोना काल में स्वास्थ्य की चुनौती के निजी और सार्वजनिक आयाम 

समसामयिक
प्रो. गिरीश्वर मिश्रआजकल  का समय  स्वास्थ्य की दृष्टि से एक  घनी चुनौती बनता जा रहा है जब पूरे विश्व में में मानवता के ऊपर एक ऐसी अबूझ महामारी का असर पड़ रहा है जिसके आगे अमीर गरीब सभी देशों ने हाथ खड़े कर दिए हैं.  सभी परेशान है और उसका कोई हल दृष्टि में नहीं आ रहा है. इस अभूतपूर्व कठिन घड़ी का एक व्यापक वैश्विक परिदृश्य है जहाँ पर  किसी दूर बाहर के देश से पहुंच कर एक विषाणु  चारों ओर संक्रमण  फैला रहा है और जान को जोखिम में डाल रहा because है और  उस पर काबू पाने की कोई हिकमत कारगर नहीं हो रही है. पूरे विश्व में हाहाकार मचा हुआ है. ऐसे में हम अपने को कैसे स्वस्थ रखें यह  बड़ी चुनौती  बन रही है. पर जब हम विचार करते हैं तो यह प्रश्न खड़ा होता है कि हम अपने स्वास्थ्य की रक्षा के लिए कितने तत्पर हैं? यह सही है कि स्वास्थ्य केवल अपने ऊपर ही नहीं बल्कि व्यक्ति और परिवेश इन दोनों की पारस्परिक अंत...
चक्रपाणि मिश्र के अनुसार जलाशयों के विविध प्रकार

चक्रपाणि मिश्र के अनुसार जलाशयों के विविध प्रकार

जल-विज्ञान
भारत की जल संस्कृति-27डॉ. मोहन चंद तिवारीचक्रपाणि मिश्र ने ‘विश्वल्लभवृक्षायुर्वेद’ नामक अपने ग्रन्थ में कूप,वापी,सरोवर, तालाब‚ कुण्ड‚ महातड़ाग आदि अनेक जलाश्रय निकायों की निर्माण पद्धति तथा उनके विविध प्रकारों का वर्णन किया है,जो वर्त्तमान सन्दर्भ में परंपरागत जलनिकायों के जलवैज्ञानिक स्वरूप को जानने और समझने की दृष्टि से भी बहुत उपयोगी है. यहां बताना चाहेंगे कि राजस्थान की मरुभूमि के इतिहास पुरुष और 16वीं शताब्दी में हुए महाराणा प्रताप के समकालीन पं.चक्रपाणि मिश्र ने अपने अनुभवों और प्राचीन भारत के जलविज्ञान के ग्रन्थों का अवगाहन करके अपनी कृति ‘विश्वल्लभवृक्षायुर्वेद’ में हजारों वर्षों से चलन में आ रहे परंपरागत जलाश्रयों के बारे में अपना सैद्धांतिक विवेचन प्रस्तुत किया है. जलविज्ञान इसलिए प्राचीन भारतीय परम्परागत जलविज्ञान के संदर्भ में चक्रपाणि मिश्र द्वारा रचित यह ‘विश्ववल्...
बहा जननि ज्योतिर्मय निर्झर!

बहा जननि ज्योतिर्मय निर्झर!

लोक पर्व-त्योहार
दीपावली पर विशेषप्रो. गिरीश्वर मिश्रकहते हैं ‘भारत ’ यह नाम भरत नामक अग्नि के उपासकों के because समुदाय से जुड़ा है. वेदों के व्याख्याकार यास्क ने ‘भारत’ का अर्थ ‘आदित्य’ किया है. ब्राह्मण ग्रंथों में ‘अग्निर्वै भारत:’ ऐसा उल्लेख मिलता है. ‘भारती’ इस शब्द की व्याख्या करते हुए यास्क ‘भारत आदित्य तस्य भा: ‘ भारती वाक् और उससे जुड़े जन भी भारत हुए. ऋग्वेद में स्पष्ट उल्लेख आता है : ‘विश्वामित्रस्य रक्षति ब्रह्मेदं भारतं जनं’. इन सबको देखते हुए प्रकाश के प्रति आकर्षण भारतीय परम्परा में आरम्भ से ही एक प्रमुख आधार प्रतीत होता है. प्रकाश के प्रमुख स्रोत  अग्नि देवता है. गौरतलब है कि अग्नि सबको पवित्र करने वाला ‘पावक’ है और शरीर के भीतर so (जठराग्नि!) और बाहर की दुनिया में बहुत सारे कार्य उसी की बदौलत चलते हैं. यहाँ तक की जल में भी वाड़वाग्नि होती है. आजकल के सुनामी इसे स्पष्टत: प्रदर्शित...
आओ! ऐसे दीये जलायें 

आओ! ऐसे दीये जलायें 

कविताएं
भुवन चन्द्र पन्तआओ ! ऐसे दीये जलायें गहन तिमिर की घुप्प निशा में तन-मन की माटी से निर्मित गढ़ कर दीया मात्र परहित में परदुख कातरता से चिन्तित स्नेह दया का तेल मिलायें आओ! ऐसा दीया जलायेंदीवाली के दीये से केवल होता है बाहर ही जगमग गर अन्तर के दीप जला लो ज्योर्तिमय होगा अन्तरजग खुशी सौ गुनी करनी हो तो खुद जलकर बाती बन जायें आओ ! ऐसा दीये जलायेंबन असक्त की शक्ति कभी हम उसके अन्तर्मन को झांकें सीने पर भी हाथ लगाकर निजमन की खुशियों को आंकें अगर जरूरत पड़े अपर को अन्धे की लाठी बन जायें आओ ! ऐसा दीये जलायेंदीपालोकित अपना घर हो बाजू घर ना चूल्हा जलता श्रम तुमसे दुगना करता वह क्या तुमको ये सब नहीं खलता? क्यों न पड़ोसी के घर को भी मानवता का हाथ बढा़यें आओ ! ऐसे दीये जलायेंएक ही माटी के सब पुतले वो धुंधले हैं और तुम क्यों उजले? तकदीरों का खेल तमाशा निराधार ...
दीपावली : मन के अंधेरे कमरों की खिड़कियों में आशा और उजाले का एक दीप जलाना

दीपावली : मन के अंधेरे कमरों की खिड़कियों में आशा और उजाले का एक दीप जलाना

लोक पर्व-त्योहार
 सुनीता भट्ट पैन्यूलीसभ्यता के विकास में आग का अविष्कार शायद मानव की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के अतिरिक्त मानव मष्तिष्क और हृदय में क़ाबिज अंधेरों पर रोशनी से काबू पा लेना होगा तभी कालांतर से आज तक सौंधी-सौंधी मिट्टी गूंथी जाती है ,चाक घूमता रहता है अपनी संस्कृति को जीवित रखने और रोशनी को अपने अथक प्रयास से लपकने का संदेश देने के लिए. एक अदना दीया गोल गोल घूमकर आकार लेता है  जब चाक पर सूरज और चांद के साथ कदम से कदम मिलाकर इस जगत में  प्रकाश बिखेरने के लिये तो क्यों न हम सभी एक दीये से दूसरे दीये के साथ जुड़कर दीपमालाएं बन जायें  स्वस्थ समाज के निर्माण में रोशनी बनकर..जलता दीया मुंडेर पर एक अदना सी ज्योत तमाम उजालों में  देदीप्यमान होकर अपना अलग ही अस्तित्व कायम करती है इंसानी हाथों का एक खूबसूरत सृजन, हमारी सभ्यताओं की अमिट छाप हमारे हाथों पर, अंधेरों से लड़कर उजालो...
दीपावली सामाजिक समरसता व राष्ट्र की खुशहाली का पर्व

दीपावली सामाजिक समरसता व राष्ट्र की खुशहाली का पर्व

लोक पर्व-त्योहार
डॉ.  मोहन चंद तिवारीदीपावली का because पर्व पूरे देश में लगातार पांच दिनों तक हर्षोल्लास से मनाया जाने वाला राष्ट्रीय लोकपर्व है.शारदीय नवरात्र में प्रकृति देवी के नौ रूपों से शक्ति और ऊर्जा ग्रहण करने के बाद भारत का कृषक समाज धन और धान्य की देवी लक्ष्मी के भव्य स्वागत में जुट जाता है. घर‚ खेत‚ खलिहान के चारों ओर सफाई का अभियान चलाया जाता है तथा नई फसल से बनवाए गए पकवानों से धान्य-लक्ष्मी की पूजा-अर्चना की जाती है.दीपावलीदीपावली का पर्व धनतेरस because से शुरू होकर भाई दूज पर समाप्त होता है.लेकिन दीपावली की तैयारी बहुत पहले से शुरू हो जाती है. लोग अपने घरों, दुकानों आदि की सफाई करते हैं. दीपावली से पहले घर, मोहल्ले, बाजार आदि सब साफ सुथरे और सजे हुए दिखाई देते हैं.दीपावली कृष्णपक्ष अन्धकार का प्रतीक है because और शुक्लपक्ष प्रकाश का. इन दो पक्षों की संक्रान्तियों में गतिशील...