January 28, 2021
समाज/संस्कृति

नदी कभी वापस नहीं लौटती…

पुरातन वर्ष एक दस्तावेज़ भी है हमारे अनुभव हमारी स्मृतियों का जिसमें अनगिनत अनगढा, अनसुलझा, so कुछ तुर्श, कुछ सड़ा-गला, कुछ थोड़ा बहुत उपयोगी भी है यह हमें तय करना है कि नवीनता की ड्योढी पर हमें क्या-क्या साथ लेकर पांव रखना है.

  • सुनीता भट्ट पैन्यूली

समय धारा प्रवाह बहती because अविरल नदी है जिसकी नियति बहना है, जो किसी के लिए नहीं ठहरती, हां विभिन्न कालखंडों में विभाजित विविध घाटों के पड़ावों से टकराकर अपने होने का आभास कराती हुई जा पहुंचती है उस भवसागर में  जिसका प्रारब्ध उस अदृश्य शक्ति ने या विधि के विधान ने सुनिश्चित किया है. जहां न अंत है, न आरंभ है, न अफसोस की गुंजाइश है, न हर्ष का पारावार, न किंतु-परंतु, न सवाल-जवाब, न उल्लसिता की कोई परिभाषा. because सब कुछ छुटता चला जाता है. साथ बहकर चली आती हैं उस नदी के साथ तो वह हैं स्मृति खंड जिसके दांये-बांये से होकर समय रूपी नदी ताज़िदगी बहती है. नदीरुपी समय की ख़ासियत है कि वह बहते हुए लौटकर वापस मुड़कर तो देखती है किंतु  वह कभी पीछे नहीं लौटती है.

भवसागर

दरअसल because सौंदर्यबोध हमारे अंतर्निहित विचारों में है, नव वर्ष कोई मूर्त रूप नहीं है जिसके हाथ, मुंह, नाक, कान हैं वरन विचारों के गठजोड़ या बनने-बिगड़ने का ही तो प्रतिफल है.

भवसागर

समयरूपी सरिता because नव वर्ष और पुरातन वर्ष के संधि स्थल पर स्थिर हो जाती है कभी, शीतकाल में हिम नदी की मानिंद. नव वर्ष तो वह नहीं जानती क्या है किंतु रिक्तता में अनूकूलता को बिठाते हुए नव चेतना, नव उल्लास, उत्सव, प्रहसन से हष्ट-पुष्ट समय की प्रतीक्षा में नव और पुरातन के मध्य से क्षणिक सौंदर्य को निहार रही होती है. because दरअसल सौंदर्यबोध हमारे अंतर्निहित विचारों में है, नव वर्ष कोई मूर्त रूप नहीं है जिसके हाथ, मुंह, नाक, कान हैं वरन विचारों के गठजोड़ या बनने-बिगड़ने का ही तो प्रतिफल है.

भवसागर

मैं भी समय का ही प्रतिरूप because अत्यंत आशावादी नदी हूं जो निहार रही है प्रकृति का प्रतिबिंब अपनी ही चंचल धारा में, अथाह सृजन के खेत हैं यहां, जहां नीड़ है मेरा, कर्मठता और कल्पनाशीलता के बीज बोना बाकी है यहां उस पल्लवित और आह्लादित जीवन के लिए मेरे हिसाब से तो यही  नवीनता का आगमन है, जहां गन्ने के खेतों के बीच से दौड़कर गुज़रता रक्ताभ सूरज मेरी बालकनी के ठीक सामने सीधे मुझे हाथ हिलाकर धरती के क्रोड में समा जाता है कहीं. so तब मुझे जाकर ज्ञात होता है कि शाम के पांच बजे गये हैं अब बिस्तर छोड़ देना चाहिए सांध्यकालीन अर्चना के लिए, नियमबद्ध होना यानी समय की धुरी में घूर्णन करने का आभास यही तो  है नव-बेला का आरंभ.

भवसागर

समय का लिबास बदलता है उसकी केवल फितरत नहीं बदलती है पुराना अमूर्त रूप का समागम कहीं न कहीं नये के साथ होने का ही परिणाम है because कि हमारे अवचेतन में असंख्य विचार संकरित होकर अर्धचेतना में ख्वाबों का संसार रच डालते हैं.

भवसागर

हतप्रभ-सी हो जाती हूं मैं because जब वही डूबता सूरज फिर भोर की छटा बनकर बालकनी को फांदकर, दरीचे से भीतर घुसकर कब मेरी आंखों में नव स्वप्न की रूप-रेखा बनाकर  मेरे जीवन में सकारात्मकता का संचार करता है. कहना मुनासिब होगा समय का लिबास बदलता है उसकी केवल फितरत नहीं बदलती है पुराना अमूर्त रूप का समागम कहीं न because कहीं नये के साथ होने का ही परिणाम है  कि हमारे अवचेतन में असंख्य विचार संकरित होकर अर्धचेतना में ख्वाबों का संसार रच डालते हैं. यह नवीन और पुरातन की जुगत से उत्पन्न हुआ क्षणिक सुखद, सकारात्मक अहसास और आशा ही तो नये समय की पदचाप है.

भवसागर

मेरे नीड़ में भोर का because सूरज कभी कुहासे में नदारद भी रहता है किंतु उस पल कुहासे में धुंधले से दिखते गन्ने के खेत और उस पर मासूम सा एक निर्जन घर यक़ीनन एकाकीपन नहीं झेल रहा है, उसे तो इल्म ही नहीं  कि वह प्रेरणा श्रोत है किसी सृजनशील मन के लिए. मेरे अनुसार पल-पल को जीना ही नवारंभ, नवयौवन है ज़िंदगी का, जहां because संवेदना है, विचारों का प्रबल प्रवाह है, कल्पनाशीलता है, प्रकृति है, पक्षी हैं, जानवर हैं मनुष्यता को  कम से कम प्रेम और निष्कपटता रहित जीवन जीने का ढब सिखाने के लिए.

भवसागर

मेरे घर में चिड़ियायें because चीख-चीख कर घर के हाते या सेहन को सर पर उठा लेती हैं बाजरे के  इंतज़ार में, दो कुत्ते गेट से पीठ टिकाये  गेट खुलने  का और रोटी का इंतज़ार कर रहे होते हैं और रोटी मिलने because पर पूंछ हिलाकर कृतज्ञता और स्नेह प्रर्दशित करते हैं यही मूक संवेदन भाषा को सीखना ही समय के नवखंड और ज़िंदगी के पायदान में आदमियत का नवीन कदम पड़ना है.

भवसागर

समय सर्वदा अभिजात because नहीं होता है किंतु उसके साथ अनुकूलता बिठाने के लिए विशुद्ध दृष्टि और जीवन दर्शन की खोज नितांत ज़रूरी है.

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नवचेतना एक दिन की because नहीं सतत है यह सोच पर निर्भर है, नवचेतना का श्रोत भौतिकता व मानवीय रिश्ते हों अवश्यांभी नहीं. नवचेतना का श्रोत रात भर ओस में भीगी हुई गुलाब की पंखुड़ियां, हरे-भरे खेतों में परवाज़ भरते पाखीयों की पंक्तियां भी हो सकती हैं, परस्पर आलिंगन किये हुए दो पेड़ भी हो सकते हैं, कमल की पत्तियों में अटकी हुई ओस because की बूंद भी हो सकती है कहने का तात्पर्य है यह केवल मन की सोच है जो जिंदगी को कभी धूमिल और कभी उजली देखती है. पुरानेपन को नई दृष्टि व नयी योजनाओं के साथ देखना भी जीवन में नूतनता का प्रवेश करना है.

भवसागर

यह जीजिविषा, because आरंभ अच्छा होने की, अच्छा करने की भ्रम है मनुष्यता का मन हमारा स्थिर है, वहीं का वहीं टिका है जहां हम वर्षों पहले थे, नव वर्ष का आगमन तभी है जब जीवन को आंकने के because लिए हमारे पास नव दृष्टि है, अविष्कार है, योजनाएं हैं, नहीं तो बस साल गुज़र रहा है हमारी मान्यता, हमारी सोच वहीं बद्धमूल हैं पुराने  समय से.

भवसागर

नव वर्ष और पुरातन वर्ष के because संधिस्थल पर एक  स्मृति स्तंभ हैं जहां हम सभी खड़े होते हैं पुराने वर्ष के कुछ अच्छे अंश के बीज लेकर भविष्य की ज़मीन पर बोने के लिए.

पुरातन हम क्यों साथ लेकर because पदार्पण नहीं करना चाहते नव वर्ष की शुभ्र ड्योढी पर? पुरातन की अपनी उपयोगिता है.

भवसागर

प्राचीन ही हमें प्रेरित करता है because नव आरंभ के लिए अथार्त कुछ तिक्त कुछ बेतरतीब आधार ज़रूरी है जीवन में कुछ नया बुनने के लिए.

यह जीजिविषा, because आरंभ अच्छा होने की, अच्छा करने की भ्रम है मनुष्यता का मन हमारा स्थिर है, वहीं का वहीं टिका है जहां हम वर्षों पहले थे, नव वर्ष का आगमन तभी है जब जीवन को आंकने के लिए हमारे पास नव because दृष्टि है, अविष्कार है, योजनाएं हैं, नहीं तो बस साल गुज़र रहा है हमारी मान्यता, हमारी सोच वहीं बद्धमूल हैं पुराने  समय से.

भवसागर

अंधकार और रोशनी के because केंद्रबिंदु पर स्थित एक अदना-सा प्रतीक है इंसान जिसकी धुरी चांद और सूरज जैसी ज़िंदगी के इर्द-गिर्द घूमती रहती है क्योंकि  अपनी ज़िंदगी पर वह शोध नहीं करना चाहता because इसलिए प्रसन्न भी नहीं है, वह नहीं जानता क्योंकि बाहर से भीतर की ओर एक मंगल द्वार है जो मनुष्यता के होने के लिए उसका मार्ग दर्शन करने को आतुर है.

भवसागर

एक becauseअवस्था है आने वाले समय के लिए तैयार करने के लिए, एक दृष्टिकोण है बदलाव लाने का बाह्य व भीतरी रूप से जिसके लिए पुराना ज़िम्मेदार नहीं नवीनता के लिए संकल्पता व दृढनिश्चयता है किसी अप्रिय से निपटने के लिए.

भवसागर

नव वर्ष न आरंभ है because किसी सुभीते का न अंत है किसी दुर्योग का, मन का उत्साह व उदासी भर है. एक अवस्था है आने वाले समय के लिए तैयार करने के लिए, एक दृष्टिकोण है बदलाव लाने का बाह्य व भीतरी रूप से जिसके लिए पुराना ज़िम्मेदार नहीं नवीनता के लिए संकल्पता व दृढनिश्चयता है किसी अप्रिय से निपटने के लिए.

भवसागर

पुरातन वर्ष एक दस्तावेज़ because भी है हमारे अनुभव हमारी स्मृतियों का जिसमें अनगिनत अनगढा, अनसुलझा, कुछ तुर्श, कुछ सड़ा-गला, कुछ थोड़ा बहुत उपयोगी भी है यह हमें तय करना है कि नवीनता की ड्योढी पर हमें क्या-क्या साथ लेकर पांव रखना है. पुरातन में ही नवीनता का रहस्य छिपा हुआ है और नूतनता में ही उन्नति के गुर.

भवसागर

इसी नवीन और पुरातन के समागम में  हम सभी के जीवन में कुछ विशिष्ट घटने की आशा लिए.

नव वर्ष हम सभी के लिए मंगलमय हो.

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