Author: Himantar

हिमालय की धरोहर को समेटने का लघु प्रयास
उड़ान

उड़ान

कविताएं
डॉ. दीपशिखावो भी उड़ना चाहती है. बचपन से ही चिड़िया, तितली और परिंदे उसे आकर्षित करते. वो बना माँ की ओढ़नी को पंख, मारा करती कूद ऊँचाई से. उसे पता था वो ऐसे उड़ नहीं पायेगी फिर भी रोज़ करती रही प्रयास.एक ही खेल बार-बार. उसने उम्मीद ना छोड़ी, एक पल नहीं, कभी नहीं. उम्मीद उसे आज भी है, बहुत है मगर अब वो ऐसे असफल प्रयास नहीं करती. लगाती है दिमाग़ कि सफल हो जाए अबकी बार और फिर हर बार.फिर भी आज भी वो उड़ नहीं पाती, बोझ बहुत है उस पर जिसे हल्का नहीं कर पाती. समाज, परिवार, रिश्ते, नाते, रीति-रिवाजों और मर्यादाओं का भारी बोझ.तोड़ देता है उसके कंधे. और सबसे बड़ा बोझ उसके लड़की, औरत और माँ होने का. किसी पेपर वेट की तरह उसके मन को हवा में हिलोरें मारने ना देता. कभी-कभी भावनाओं की बारिश में भीग भी जाते हैं उसके पंख.उसके नए-नए उगे पंख. जो उसने कई सालों की मेहनत के बाद उगा...
मिलिए, उत्तराखंड के उस शख्स से जिनका पीएम मोदी ने ‘मन की बात’ में लिया नाम

मिलिए, उत्तराखंड के उस शख्स से जिनका पीएम मोदी ने ‘मन की बात’ में लिया नाम

बागेश्‍वर
ललित फुलाराप्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को 'मन की बात' कार्यक्रम में उत्तराखंड के बागेश्वर निवासी जगदीश कुन्याल के पर्यावरण संरक्षण और जल संकट से निजात दिलाने वाले because कार्यों की सराहना की. पीएम मोदी ने कहा कि उनका यह कार्य बहुत कुछ सीखाता है. उनका गांव और आसपास का क्षेत्र पानी की जरूरत को पूरा करने के लिए एक प्राकृतिक जल स्त्रोत पर निर्भर था. जो काफी साल पहले सूख गया था. so जिसकी वजह से पूरे इलाके में पानी का संकट गहरा गया. जगदीश ने इस संकट का हल वृक्षारोपण के जरिए करने की ठानी. उन्होंने गांव के लोगों के साथ मिलकर हजारों की संख्या में पेड़ लगाए और सूख चुका गधेरा फिर से पानी से भर गया.कौन हैं जगदीश कुन्याल दरअसल, जगदीश कुन्याल पर्यावरण प्रेमी हैं और उन्होंने अपनी निजी प्रयास से इलाके में हजारों की संख्या में वृक्षारोपण किया जिसकी वजह से सूख चुके पानी के गधेरे में जल bec...
दर्द में डूबी नज्म

दर्द में डूबी नज्म

स्मृति-शेष
डॉ. कुसुम जोशीनन्ही-सी हेमसुन्दरी  के समझ में नही आ रहा था कि घर में ये गहमागहमी, इतना झमेला, भारी कामदार रंगबिरंगी साड़ियों की सरसराहट, श्रृगांर.  घर में भीड़ भीड़, because उलूक ध्वनि, अभी तो उसे पढ़ना था. जब भी बाबा, दादा, काका मिलते बड़ी-बड़ी बातें होती, बाल विवाह का विरोध. स्त्री शिक्षा की अनिवार्यता पर बातें होती, विधवा विवाह, सति प्रथा व धर्म की अव्यवहारिक परम्परा का विरोध. पर मेरी उम्र भी नही देखी, मुझे तो अभी पढ़ना था. so और मुखर्जी बाबू का बेटा जदुनंदन मुखर्जी भी तो अभी ज्यादा बड़ा नही, अभी तो पढ़ रहा है? कितने प्रश्न थे हेम के मन में. हेमसुन्दरी के पिता ने प्रेम विवाह किसी पारसी थियेटर  (क्या हेमसुन्दरी के पिता ने प्रेम but विवाह किसी पारसी थियेटर में काम करने वाली सुन्दरी से किया था? जो उनका परिवार उनकी बेटी का विवाह आनन फानन में कर देना चाहता था.) विरोध दर्ज करवाया था उ...
पिता की ‘छतरी’ के साथ चलने का सुख

पिता की ‘छतरी’ के साथ चलने का सुख

संस्मरण
बाबू की पुण्यतिथि (27 फरवरी, 2015) पर स्मरण चारु तिवारीपिता के सफर में जरूरी हिस्सा थी छतरी दुःख-सुख की साथी सावन की बूंदाबादी में जीवन की अंतिम यात्रा में मरघट तक so विदा करते पिता को एक तरफ कोने में बैठी सुबकती रही मेरे साथ रस्म-पगड़ी के बाद मेरे साथ but आई सड़क तक पिता का हाथ थामे चुपचाप रास्ते भर so सींचकर मस्तिष्क की भुरभुरी मिट्टी अंकुरित करती रही स्मृतियों के अनगिनत बीज भादो की तेज because बारिश में छोटे बच्चे-सा so दुबका लेती है गोदी में फिर भी पसीज जाता है मन छत पर अतरती सीलन-सा तपती धूप में बैठकर but मेरे कंधे पर चिढ़ाती है अंगूठा दिखाकर तमतमाते so सूरज का मुंह जब होता हूं आहत दुनियादारी के दुःखों से अनेक पैबन्द because लगीं पिता की छतरी रखती है मेरे सिर पर आशीर्वाद भरे हाथ करवट बदलते मौसम में उत्तराखंड मौसम पहचानता है जिस तरह पतझड़ के बाद...
ऋषिगंगा आपदा : 12 दिन में 3000 लोगों को कराया भोजन

ऋषिगंगा आपदा : 12 दिन में 3000 लोगों को कराया भोजन

चमोली
हिमांतर ब्यूरो, देहरादून7 फरवरी 2021 को जनपद चमोली के धौली गंगा, तपोवन, ऋषिगंगा घाटी में ग्लेशियर टूटने की वजह से आयी बाढ़ के कारण भीषण तबाही हुई थी. इस आपदा में 205 से so अधिक लोगों के अकाल मृत्यु का आंकलन है. इस प्राकृतिक आपदा से पैंग, मुरूंडा, जुग्जु, जुवाग्वाड़ के अलावा चिपको की जननी गौरा देवी के गांव वल्ला रैणी और पल्ला रैणी में 5 लोगों की मृत्यु हुई, स्थानीय स्तर पर अभी तक 28 लोगों के शव बरामद हुए हैं.आपदा15 फरवरी से 26 फरवरी तक कुल 12 दिन तक रैस्क्यू और बचाव के कार्यों में लगे एन.डी.आर.एफ., एस.डी.आर.एफ., भारत तिब्बत सीमा पुलिस but और उत्तराखण्ड पुलिस के जवानों के साथ-साथ सड़क और पुल निर्माण में लगे सीमा सड़क संगठन के कर्मचारियों और मजदूरों को नियमित रूप से दोपहर का भोजन कराते रहे.आपदा इस प्राकृतिक आपदा के तुरंत बाद प्रभावित क्षेत्र में राहत और बचाव के कार्य प्रारंभ हुए ...
जनपद पौड़ी में लोकपाल पद पर नियुक्त हुए डॉ. अरुण कुकसाल

जनपद पौड़ी में लोकपाल पद पर नियुक्त हुए डॉ. अरुण कुकसाल

सोशल-मीडिया
वरिष्ठ समाज विज्ञानी, प्रशिक्षक, लेखक एवं घुमक्कड़ डॉ. अरुण कुकसाल को भारत सरकार के महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना यानी 'मनरेगा' से सम्बद्ध so शिकायतों के निवारण एवं उनके अनुश्रवण के लिए जनपद पौड़ी में लोकपाल के पद पर नियुक्त होने पर सभी क्षेत्रवासियों में खुशी की लहर है. ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना उत्‍तराखंड गढ़वाल के चामी गांव (असवालस्यूं) में 8 अक्टूबर, 1959 को जन्मे डॉ. अरुण कुकसाल ने उत्तर because प्रदेश एवं उत्तराखंड में विभिन्न विभागों में अपनी सेवाएं दी हैं. अर्थशास्त्र में पीएच.डी. डॉ. कुकसाल हिमालयी समाज के सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक मुद्दों के गहन जानकार हैं. वे विगत कई वर्षों से पत्र-पत्रिकाओं तथा because सोशियल मीडिया में नियमित रूप से लेखन में सक्रिय हैं. उद्यमिता विकास, यात्रा, साहित्य तथा सांस्कृतिक विषयों पर उनकी 7 पुस्तकें प्रका...
‘कस्तूरबा’ से ‘बा’ तक का गुमनाम सफर

‘कस्तूरबा’ से ‘बा’ तक का गुमनाम सफर

साहित्‍य-संस्कृति
भावना मासीवाल22 फरवरी को ‘बा’ की पुण्यतिथि थी. उन पर न कोई आयोजन था न ही कोई चर्चा-परिचर्चा. हर तरफ थी तो सिर्फ ख़ामोशी. जबकि ‘बा’ इतिहास के पन्नों में दफन कस्तूरबा गाँधी का नाम है. यह नाम आज़ादी की लड़ाई में अपनी पूरी निष्ठा व बलिदान के साथ मौजूद था. यह नाम दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद की नीति व भारतीयों के साथ गैर बराबरी पूर्ण व्यवहार के खिलाफ़ न केवल अहिंसा आंदोलन में खड़ा था बल्कि आंदोलन में जेल भी गया था. दक्षिण अफ्रीका में जब ईसाई धर्म के अनुसार क़ानूनी रूप से पंजीकृत विवाह को वैध और अन्य को अवैध बनाया गया. उस समय वहाँ इसके खिलाफ सत्याग्रह आंदोलन किया गया और सभी सत्याग्रहियों को जेल में डाला गया था. इसमें ‘बा’ कस्तूरबा गाँधी भी थी. विरोध का यह वही नाम था जो दक्षिण अफ्रीका के बीमार मजदूरों की निष्ठा व श्रद्धा भाव से सेवा करता है. जिसने अपने संपूर्ण परिवार पति, बच्चों को समाज व देश सेवा के ...
पुत्र तर्क-वितर्कों में मस्त, मां एक कोने में बेबस!

पुत्र तर्क-वितर्कों में मस्त, मां एक कोने में बेबस!

समसामयिक
नरेन्द्र कठैतमातृभाषा दिवस अर्थात 21 फरवरी नियत तिथि! किंतु कैसे भूल सकते हैं नियति की वह परिणति जो इसी माह की सातवीं तिथि को ऋषिगंगा घाटी में ग्लेशियर टूटने के बाद because घटित हुई. और...... रैणी तपोवन में  हमारे हिस्से में आंसूओं का न थमने वाला सैलाब छोड़ गई. किसी ने पुत्र खोया- किसी ने पति - किसी ने सगा भाई ! किंतु थे तो वे सभी मां के लाल ही!! और हां! वे पालतू मवेशी भी जिनपर कई परिवारों because की रोजी रोटी टिकी हुई थी उनको भी विपदा लील गई. हर बार विपदा में हमें ढांढस बंधाने वाले यही कहते है कि ‘हिम्मत रखिए!! पहाड़ विकट परिस्थितियों में भी नहीं झुकते!!’ लेकिन ये कौन कहे कि मां का हृदय पत्थर का नहीं है. मित्र यह तिथि को जो पर्वप्रिय मित्र पर्व के रूप में मना रहे हैं वे बधाई स्वीकार करें!  किंतु सत्य कहें हम आज की तिथि में इसे पर्व के रूप में मनाने की स्थिति में कदापि नहीं हैं. क्योंक...
भैया! क्या कोई नरक आश्रम भी है…

भैया! क्या कोई नरक आश्रम भी है…

संस्मरण
पसंद आ गया न, कुछ पैसे दे तो बाकी जब शिफ्ट करोगे तब दे देना, स्वर्ग आश्रम से अच्छा तुमको कहीं मिलेगा भी नहीं...प्रकाश उप्रेती  अतीत में... बात 2012 की है. कॉलेज की जिंदगी निपटने में बस एक बसंत ही बाकी था. उसी बसंत में उत्तरप्रदेश पीसीएस का फॉर्म भर दिया था क्योंकि तब अपने इर्दगिर्द यूपीएससी वालों का जमावड़ा था. because कोई तैयारी कर रहा था, किसी के भैया कर चुके थे, किसी का दोस्त इलाहाबाद से दिल्ली तैयारी के लिए आ रहा था, किसी के सीनियर का हो गया था, कोई बाबा बन चुका था और कोचिंग सेंटर चलाने लग गया था. because इस माहौल में भला हम कैसे किनारे पर खड़े रहते. हमने भी उस 'कोसी' में डुबकी लगा ही ली.अब मसला तैरने का था तो उसके लिए सबसे पहले कोसी के तट यानि मुखर्जीनगर के आसपास कमरे की तलाश शुरू कर दी थी.यूपीएससीनॉर्थ कैंपस में रहते हुए because दाढ़ी निकल आई थी लेकिन इस कॉलोनी के ...