Author: Himantar

हिमालय की धरोहर को समेटने का लघु प्रयास
मूली की ‘थिचवानी’: एक स्वादिष्ट पहाड़ी व्यंजन 

मूली की ‘थिचवानी’: एक स्वादिष्ट पहाड़ी व्यंजन 

हिमालयन अरोमा, अल्‍मोड़ा
डॉ. मोहन चंद तिवारीअपने गांव जोयूं जब भी जाता हूँ तो मूली की थिच्वानी मुझे बहुत पसंद है. हमारे पड़ोस के गांव मंचौर की मूली की तो बात ही और है. दिल्ली जब आता हूं तो पहाड़ की मूली लाना कभी नहीं भूलता. सर्दियों में तो यह मूली की थिच्वानी स्वास्थ्य के लिए बहुत ही लाभकारी है. मूली तो मैदानों की भी बहुत लाभकारी है किंतु पहाड़ों की शलगमनुमा मूली की बात ही कुछ और है. इसमें हिमालय की वनौषधि के गुण समाविष्ट रहते हैं जो मैदानों में कैमिकल खाद से पैदा हुई मूली में नहीं मिलते. हमारे इलाके मंचौर की मूली इस दृष्टि से भी बहुत प्रसिद्ध है कि वहां की ताजी-ताजी मूली मिलती बड़ी मुश्किल से है क्योंकि पैदा ही बहुत कम होती है.आज मैं अपने इस लेख द्वारा पहाड़ी मूली से बनने वाली सब्जी 'थिचवानी' पर कुछ जानकारी शेयर करना चाहुंगा.कुमाऊं के स्थानीय व्यंजनों में एक स्थानीय कहावत है मनुवौ रवॉट, झुंगरौ भात, मुअकि थेच...
बसंत पंचमी: कला का सदुपयोग व आत्मनवीनीकरण…

बसंत पंचमी: कला का सदुपयोग व आत्मनवीनीकरण…

लोक पर्व-त्योहार
सुनीता भट्ट पैन्यूली एक साहित्यिक उक्ति के अनुसार,“प्राण तत्व ‘रस' से परिपूर्ण रचना ही कला है" इसी कला की प्रासंगिकता के परिप्रेक्ष्य में कहा जा सकता है कि सृष्टि की रचना, अनादिशक्ति ब्रहमा का अद्भुत चमत्कार है और उसमें अप्रतिम रंग,ध्वनि,वेग,स्पंदन व चेतना का स्फूरण मां सरस्वती की कलाकृति. यही कला का स्पर्श हमें उस चिरंतन ज्योतिर्मय यानि कि मां सरस्वती से एकाकार होने का अनुभूति प्रदान करता है. क्योंकि यही देवी सरस्वती ही ज्ञान, कला, विज्ञान, शब्द-सृजन, व संगीत की अधिष्ठात्री हैं.  सरस्वती मां को मूर्तरुप में ढूंढना उनकी व्यापकता को बहुत संकुचित करता है. दरअसल जहां-जहां कला अहैतुकि,नि:स्वार्थ एवं जगत कल्याण के लिए सजग व सक्रिय है सरस्वती का वहीं वास है. जहां सात्त्विक जीवन,कला के विभिन्न रूपों का अधिष्ठान, अध्यात्म, गहन चिंतन, विसंगति के वातावरण में रहकर भी आंतरिक विकास और ऊंचाई पर पहुंच...
गणतंत्र का आह्वान सुनें!

गणतंत्र का आह्वान सुनें!

देश—विदेश
26 जनवरी गणतंत्र दिवस पर विशेषप्रो. गिरीश्वर मिश्र  चौहत्तर साल पहले आज ही के दिन भारत की संसद ने देश की शासन व्यवस्था चलाने के लिए एक संविधान स्वीकार किया था जिसने भारत सरकार अधिनियम-1935 की जगह ली. इस संविधान का आरम्भ उसकी उद्देशिका (प्रिएम्बल) के साथ होता है और उद्देशिका का आरम्भ संविधान को लेकर कुछ आधारभूत स्थापनाओं के लिए भारतीय समाज की प्रतिश्रुति के साथ होता है. ये प्रतिश्रुतियाँ संविधान का आधार बनती है और उसके प्रयोग की सम्भावनाओं और सीमाओं को भी रेखांकित करती हैं. न्याय , स्वतंत्रता , समता  और बंधुत्व के चार मानवीय और सभ्यतामूलक लक्ष्यों को समर्पित ये प्रतिश्रुतियाँ भारतीय समाज की उन भावनाओं के सार तत्व को प्रतिबिम्बित करती हैं जो एक आधुनिक राष्ट्र की परिकल्पना को मूर्त आकार देती हैं. एक तरह से पूरा संविधान ही इन्हीं प्रतिश्रुतियों को व्यवहार में लाने की व्यवस्था का विस्तार ...
राग-बसंत बहार  और बावरा बैजू

राग-बसंत बहार  और बावरा बैजू

ट्रैवलॉग
मंजू काला मूलतः उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल से ताल्लुक रखती हैं. इनका बचपन प्रकृति के आंगन में गुजरा. पिता और पति दोनों महकमा-ए-जंगलात से जुड़े होने के कारण, पेड़—पौधों, पशु—पक्षियों में आपकी गहन रूची है. आप हिंदी एवं अंग्रेजी दोनों भाषाओं में लेखन करती हैं. आप ओडिसी की नृतयांगना होने के साथ रेडियो-टेलीविजन की वार्ताकार भी हैं. लोकगंगा पत्रिका की संयुक्त संपादक होने के साथ—साथ आप फूड ब्लागर, बर्ड लोरर, टी-टेलर, बच्चों की स्टोरी टेलर, ट्रेकर भी हैं.  नेचर फोटोग्राफी में आपकी खासी दिलचस्‍पी और उस दायित्व को बखूबी निभा रही हैं. आपका लेखन मुख्‍यत: भारत की संस्कृति, कला, खान-पान, लोकगाथाओं, रिति-रिवाजों पर केंद्रित है. इनकी लेखक की विभिन्न विधाओं को हम हिमांतर के माध्यम से ‘मंजू दिल से…’ नामक एक पूरी सीरिज अपने पाठकों तक पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं. पेश है मंजू दिल से… की 26वीं किस्त…म...
हिमांतर के नए अंक ‘हिमालयी लोक समाज व संस्कृति’ का विमोचन

हिमांतर के नए अंक ‘हिमालयी लोक समाज व संस्कृति’ का विमोचन

साहित्‍य-संस्कृति
हिमांतर ब्यूरो, हरिद्वार-देहरादूनहिमांतर का नया अंक आ गया है. हर बार की तरह यह अंक भी कुछ खास और अलग है. हिमांतर केवल एक पत्रिका नहीं, बल्कि हिमालयी सरोकारों, संस्कृति और लोक जीवन का दर्पण बनती जा रही है. अब तक के जितने भी अंक प्रकाशित हुए हैं. हर अंक ने अपनी अलग छाप छोड़ी है. इस बार का अंक भी पहले के अंकों से अलग है. लेकिन, हर अंक की तरह ही इसकी आत्मा भी हिमालयी लोक समाज में बसती है. खास बात यह है कि इस बार के अंक नाम भी हिमालयी लोक समाज व संस्कृति रखा गया है. हरिद्वार में आयोजित रवांल्टा सम्मलेन में हिमांतर के नए अंक का विमोचन किया गया. हिमांतर की खास बात यह है कि इसमें हिमालयी सरोकारों और हिमालयी समाज को केवल छूया भर नहीं जाता, बल्कि गंभीरता से हर पहलू को सामने लाया जाता है. इस बार के अंक के अतिथि संपादक रचनात्मकता के लिए पहचाने जाने वाले राष्ट्रीय युवा पुरस्कार विजेता शिक्षक और साह...
पिंक प्लाजो नहीं, परंपरागत परिधान में दिखी महिलाएं

पिंक प्लाजो नहीं, परंपरागत परिधान में दिखी महिलाएं

हरिद्वार
हिमांतर ब्यूरो, हरिद्वारजब अपने गांव से दूर दूसरे शहर में रहते हैं, तो हम अपने बार-त्योहार और संस्कृति से भी दूर हो जाते हैं. हालांकि, किसी ना किसी रूप में हम गांव से जुड़े तो रहते हैं. लेकिन, शहरों में नौकरी की मजबूरी और दो वक्त की रोटी के लिए अक्सर व्यस्त रहते हैं और इस व्यस्तता के बीच यह भी भूल जाते हैं कि जिस शहर में हम रह रहे हैं, वहां मेरे गांव, गांव के पास के दूसरे गांव के लोग भी रहते हैं.इनमें कुछ नौकरी में साथ हैं. कुछ दूसरे विभागों में तैनात हैं. कुछ का रोज मिलना हो जाता है, जबकि कुछ चाहकर भी एक-दूसरे से मिल पाते हैं. इसी दूरी को मिटाने के लिए हरिद्वार में रह रहे राष्ट्रीय युवा पुरस्कार विजेता उत्तरकारी जिले के नौगांव ब्लॉक की बनाल पट्टी के रचनात्मक शिक्षक दिनेश रावत भी शिक्षा विभाग में तैनात हैं. उनकी पत्नी भी यहीं पुलिस विभाग में कार्यरत हैं. दिनेश रावत ने हमेशा की तरह ...
रोचकता आद्यान्त बनाये रखता है उपन्यास, अपनी तरफ खिंचती है इसकी भाषा शैली

रोचकता आद्यान्त बनाये रखता है उपन्यास, अपनी तरफ खिंचती है इसकी भाषा शैली

पुस्तक-समीक्षा
हिमांतर ब्यूरो, नई दिल्लीराष्ट्रवाक् पत्रिका के फेसबुक पेज पर पिछले दिनों ललित फुलारा के पहले उपन्यास ‘घासी: लाल कैंपस का भगवाधारी’ पर ऑनलाइन परिचर्चा हुई. यह उपन्यास साल 2022 में प्रकाशित हुआ और साल के अंत तक इस उपन्यास को साहित्य आज तक ने वर्ष के युवा लेखकों की शीर्ष 10 पुस्तकों में शामिल किया. यह उपन्यास यश पब्लिकेशंस से प्रकाशित हुआ और इसने पाठकों का वृहद ध्यान अपनी तरफ खिंचा है. कैंपस केंद्रित इस उपन्यास को अच्छी खासी पाठकीय प्रशंसा मिली है. उपन्यास के छपने के सालभर बाद पहली बार इस पर ऑनलाइन परिचर्चा रखी गई थी. जिसमें इंडियाडॉटकॉम के संपादक और वरिष्ठ पत्रकार सुनील सीरीज, चर्चित लेखक, आईटीबीपी में डिप्टी कमांडेंट, एवं राष्ट्रवाक् पत्रिका के संपादक कमलेश कमल  व शिक्षाविद् एवं दिल्ली सरकार में उप शिक्षा निदेशक डॉक्टर राजेश्वरी कापड़ी ने इसके कथानक, भाषा शैली और शिल्प पर अपने विचार र...
‘पूष क त्यार’: एक नहीं अनेक आयाम

‘पूष क त्यार’: एक नहीं अनेक आयाम

लोक पर्व-त्योहार
दिनेश रावत देवभूमि उत्तराखण्ड के सीमांत उत्तरकाशी का पश्चिमोत्तर रवाँई अपनी सामाजिक—सांस्कृतिक विशिष्टता के लिए सदैव ही विख्यात रहा है. इस लोकांचल में होने वाले पर्व—त्योहारों की श्रृंखला जितनी विस्तृत है, सामाजिक—सांस्कृतिक दृष्टि से उतनी ही समृद्ध है. पर्व—त्योहारों के आयोजन में प्रकृति व संस्कृति, ऋतु व फसल चक्र की गहरी छाप दिखती है. फिर चाहे वह आयोजन के तौर—तरीके हों या इन अवसरों पर बनने वाले विशेष भोजन, सभी मौसमानुकूल ही बनते हैं. इस दौरान जो रंग दिखते हैं वह बहुत ही न्यारे और प्यारे हैं. 'पूष क त्यार' यानी 'पौष के त्योहार' इस लोकांचल में होने वाले पर्व—त्योहारों में प्रमुखता से शामिल हैं. माघ माह तक इनकी रंगत बनी रहने पर इन्हें 'माघी मघोज' या 'मरोज' भी कहते हैं. पौष माह में इस अंचल की अधिकांश पर्वत श्रृंखला बर्फ की चादर ओढ़ लेती हैं. कई बार बर्फ की वहीं श्वेद चादर घाटी या तलहटी में...
कौओं को विशेष व्यंजन खिलाने का अनोखा त्यौहार

कौओं को विशेष व्यंजन खिलाने का अनोखा त्यौहार

लोक पर्व-त्योहार
नीलम पांडेय नील, देहरादून आ कौवा आ, घुघुती कौ बड़ खै जा मैकेणी म्येर इजैकी की खबर दी जा. आ कौवा आ, घुघुती कौ बड़ ली जा मैकेणी म्येर घर गौं की खबर दी जा. आ कौवा,अपण दगड़ी और लै पंछी ल्या, सबुकैं घुघुती त्यारै की खबर दी आ. इस बार घुघुती के प्रचलित गीत को एक नए सुर में गाना चाहती हूं, मेरी उम्र के असंख्य बच्चे जो आज खाने कमाने की दौड़ में बड़े - बड़े महानगरों में व्यस्त हो गए हैं, और व्यस्क होकर जीवन की ढलान में बढ़ रहे हैं, वे इन त्योहारों की आहट पर अपने देश, गांव लौट जाना चाहते हैं. जैसे पक्षी लौट आते हैं दूरदराज से वापस अपने देश. घुघुती के त्योहार के दिन हम महानगरों में किसी चिड़िया को खोजने लगते हैं.  कौवे को बुलाने की कोशिश करते हैं....पर वे नही दिख रहे हैं. जब हम छोटे थे ....आज के दिन असंख्य कौवे घर के आसपास घूमने लगते थे और घर की मुंडेर, आंगन में घुघुती बड़े रखते ही फुर्र से उठ...
सिलपाटा से सियाचिन तक प्रमाणिक जीवन की अनुभूति का यात्रा- वृत्तांत

सिलपाटा से सियाचिन तक प्रमाणिक जीवन की अनुभूति का यात्रा- वृत्तांत

साहित्‍य-संस्कृति
हिमांतर ब्यूरो, नई दिल्लीयात्रा, भूगोल की दूरी को नापना भर नहीं है बल्कि भूगोल के भीतर की विविधता को ठहर कर महसूस करना और समझना है. यही स्वानुभूति  यात्रा- वृत्तांत का आत्मा और रस तत्व होता है. इसी स्वानुभूति की प्रमाणिकता को आत्मसात करने वाली पुस्तक है, 'सिलपाटा से सियाचिन तक'. हिमांतर प्रकाशन द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक का 13 जनवरी, 2023 को दिल्ली में संस्कृत अकादमी के सभागार में लोकार्पण हुआ. इस कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रसिद्ध विज्ञान कथा लेखक, घुमक्कड़ और साहित्यकार व इस पुस्तक की भूमिका लिखने वाले देवेन्द्र मेवाड़ी ने की, उन्होंने इस पुस्तक की प्रमाणिकता और फौजी जीवन के बीच बंदूक के साथ कलम हाथ में थामने वाले लेखक द्वारा पुस्तक में चित्रित सूक्ष्म विवरणों की ओर सबका ध्यान दिलाया. साथ ही उन्होंने कहा कि- यह यात्रा वृत्तांत सिर्फ विवरण भर नहीं है बल्कि इसके जरिए आप फ़ौजी जीवन के विविध आय...