Author: Himantar

हिमालय की धरोहर को समेटने का लघु प्रयास
मातृभाषा का सवाल भाषा से ज्यादा लिपि और माध्यम का सवाल है

मातृभाषा का सवाल भाषा से ज्यादा लिपि और माध्यम का सवाल है

दिल्ली-एनसीआर
मेहर, निशा, आकांक्षा एवं राज, नई दिल्लीअंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के उपलक्ष्य पर रामजस महाविद्यालय, एक सप्ताह का 'मातृभाषा अमृतोत्सव' आयोजित करने जा रहा है. 21 फरवरी, 2023 से 28 फरवरी तक चलने वाले इस मातृभाषा अमृतोत्सव में भारत की सभी भाषाओं पर भाषाविदों के साथ मातृभाषा में शिक्षा एवं शिक्षण की चुनौतियों और संभावनाओं पर विचार विमर्श होगा.  इस वैचारिक मंथन का शुभारंभ अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस यानि 21 फरवरी को रामजस महाविद्यालय के सभागार में हुआ. रामजस कॉलेज के सभागार में आयोजित इस संगोष्ठी की अध्यक्षता रामजस महाविद्यालय के हिंदी विभाग के वरिष्ठ प्राध्यापक डॉ. प्रीतम शर्मा ने की और वक्ता के रूप में डॉ. राकेश सिंह (पूर्व सलाहकार, भारतीय भाषा समिति) एवं प्रो. चौडुरी उपेंद्र राव (पूर्व अध्यक्ष, संस्कृत एवं प्राच्यविद्या अध्ययन केंद्र, जेएनयू) ने अपने विचार रखे.कार्यक्रम का आरम्भ प्रा...
अनोज सिंह ‘बनाली’ की रवांल्टी कविता संग्रह ‘दुई आखर’ का लोकार्पण

अनोज सिंह ‘बनाली’ की रवांल्टी कविता संग्रह ‘दुई आखर’ का लोकार्पण

उत्तरकाशी
हिमांतर ब्यूरो, बड़कोट, उत्तरकाशीरवांल्टी भाषा में कविता लेखन का सिलसिला निरंतर जारी है. इसी कढ़ी में अनोज सिंह 'बनाली' का हालिया प्रकाशित रवांल्टी कविता संग्रह 'दुई आखर' का लोकार्पण लब्ध प्रतिष्ठित साहित्यकार एवं उत्तराखण्ड भाषा संस्थान के सदस्य महावीर रवांल्टा के मुख्य आतिथ्य तथा सेवानिवृत्त अध्यापक एवं गहन अध्येता रूकम सिंह रावत व जिला सहकारी बैंक के पूर्व चेयरमैन जयेन्द्र सिंह रावत के विशिष्ट आतिथ्य में नगर पालिका परिषद् बड़कोट की अध्यक्ष अनुपमा रावत की अध्यक्षता में हिमांतर प्रकाशन के मुखिया शशिमोहन रावत 'रवांल्टा', शैलेश मटियानी पुस्कार से सम्मानित शिक्षक व 'पछ्याण' और  'रवांल्टी अखाण कोश' के लेखक ध्यान सिंह रावत 'ध्यानी', सामाजिक सक्रियता के लिए चर्चित असिता डोभाल व नरेश नौटियाल सहित सामाजिक एवं सा​हित्यिक—सांस्कृतिक गतिविधियों में सक्रियता निभाने वाले बलवंत सिंह पंवार (पूर्व प्र...
टैपिओका: गरीबों का भोजन!

टैपिओका: गरीबों का भोजन!

हिमालयन अरोमा
हिमालयन अरोमा भाग-3मंजू कालायदि किसी पहाड़ी से यह पूछा जाय की उनकी माँ, काकी, बडी,  उपवास के दिन कौन से फल को खाकर पूरा दिन निराहारः रहतीं थीं तो सबका  यही उत्तर होगा की “तेडू़”,  यानी के टैपिओका (Tapioca).  हमारे पहाड़ में शिवरात्रि के अवसर पर तैडू़- और पके हुए कद्दू को  उबालकर  खाने की परंपरा रही है. गढ़वाल हिमालय में शिवरात्री के दिन शाकाहारी आहार और प्रसाद के तौर पर इसे विशेष रूप से ग्रहण किया जाता है.  अच्छा वर पाने के लिए पहाड़ी बनिताएं तरूड़ का फल भोले बाबा को अर्पण करती  हैं.  तरूड़ (तल्ड) एक तरह का कंद है, जिससे पहाड़ में सूखी तरकारी बनाई जाती है,  रसे वाला साग  बनता है, स्वाले बनाये जाते हैं,  रैत बनाया जाता है,  पकौड़े  बनाये जाते हैं, स्नैक्स के तौर पर भी  इसका आनंद पहाड़ी लोक के द्वारा उठाया जाता है. जंगलों में घसियारी महिलाओं के द्वारा इस फल को बोनस के रूप में घास...
शिवरात्रि विशेष  : भारत में प्रेम का प्रतीक हैं अर्धनारीश्वर शिव!

शिवरात्रि विशेष : भारत में प्रेम का प्रतीक हैं अर्धनारीश्वर शिव!

ट्रैवलॉग
अरूप में रूप:  शिव-  सौंदर्यम मंजू दिल से… भाग-27मंजू कालाखेले मसाने में होरी चिदंबर खेले मसाने में होरी भूत- पिशाच बटोरे दिगंबर खेले मसाने में होरी! शिव का नाद करने से पहले मै एक विचत्र होली का वर्णन करना चाहती हूँ! वह विचित्र होली है जिसे भगवान शिव खेलते हैं, वो भी काशी के मणिकर्णिका घाट पर! रंग एकादशी के दूसरे दिन काशी में स्थित श्मशान पर  चिताओं की भस्मी के साथ होली खेलने की एक अनूठी परंपरा है। पौराणिक कथाओं के अनुसार इस परंपरा की शुरुआत शंकरजी से ही मानी जाती है। मान्यताओं के अनुसार- जब भगवान शिव, पार्वती का गौना कराने के लिए आये थे तो उनके साथ भूत, प्रेत, पिशाच, यक्ष गन्धर्व, किन्नर जीव जंतु आदि  थे,  और  उन्होंने वहीं मणिकर्णिका पर होलिकोत्सव - श्मशान पर चिताओं की भस्मी से  खेल कर मनाया! लखि सुंदर फागुनी छटा के मन से रंग-गुलाल हटा के चिता, भस्म भर झोरी दिगंबर...
मुख्य सचिव ने पिरूल से निर्मित उत्पादों और उपयोगों के लिए मांगे सुझाव

मुख्य सचिव ने पिरूल से निर्मित उत्पादों और उपयोगों के लिए मांगे सुझाव

देहरादून
देहरादून. मुख्य सचिव डॉ. एस.एस. संधु ने गुरूवार को सचिवालय में पिरूल से आजीविका सृजन, वैकल्पिक ईंधन आदि के क्षेत्र में कार्य करने के इच्छुक विभिन्न उद्यमियों के साथ विचार विमर्श किया. becauseमुख्य सचिव ने पिरूल से निर्मित अन्य उत्पादों और उपयोगों के लिए सुझाव भी मांगे.ज्योतिष मुख्य सचिव ने वन विभाग को पिरूल कलेक्शन कर रहे स्वयं सहायता समूहों को नियमित भुगतान के लिए व्यवस्था सुनिश्चित किए जाते हुए एक कॉर्पस फंड बनाए जाने के निर्देश दिए, ताकि स्वयं सहायता समूहों के भुगतान में देरी न हो. उन्होंने कहा कि उद्यमियों को शुरुआती सहायता प्रदान किए जाने हेतु पहले 5 सालों में उद्यमियों द्वारा दिए जाने वाले जीएसटी का 70 प्रतिशत सब्सिडी दिए जाने के भी निर्देश दिए. because साथ ही कहा कि इस दिशा में विभिन्न पर्वतीय प्रदेशों में प्रयोग हो रही बेस्ट प्रेक्टिसेज को भी प्रदेश में अपनाया जाए. उन्होंने कह...
न्याय के देवता महासू महाराज

न्याय के देवता महासू महाराज

धर्मस्थल
फकीरा सिंह चौहान स्नेही महासू देवता को जौनसार-बावर में ही नहीं अपितु पूरे उत्तराखंड  हिमाचल में न्याय के देवता के रूप में पूजा जाता है. महासु  किसी एक देवता का नाम नहीं बल्कि चार भाइयों के नाम से महासु बंधु विख्यात है. इनका मुख्य मंदिर देहरादून से 190 किलोमीटर दूर तमसा नदी के पूर्वी तट पर जौनसार बावर क्षेत्र के हनोल नामक स्थान पर प्राचीन काल से ही स्थापित है. मंगोल नागर शैली से मिश्रित स्थापत्य यह मंदिर अद्भुत काष्ट कला एवं पथरो से निर्मित है. समुद्र तल से 1250 मीटर की ऊंचाई पर बने वर्तमान मंदिर का निर्माण नवीं शताब्दी के आसपास का बताया जाता है जबकि, एएसआइ (पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग) के रिकार्ड में मंदिर का निर्माण 11वीं व 12वीं सदी का होने का जिक्र है. वर्तमान मे इसका संरक्षण भी एएसआइ ही कर रहा है. हनोल शब्द की उत्पत्ति यहां के एक ब्रह्मण हुणाभाट के नाम से मानी जाती है. जिसके सात पुत्रों...
गोपाल गोस्वामी : कालिदास जैसे विरह गीतों के रचनाकार

गोपाल गोस्वामी : कालिदास जैसे विरह गीतों के रचनाकार

स्मृति-शेष
 गोपाल बाबू गोस्वामी  के जन्मदिन (2 फरवरी) पर विशेषडॉ. मोहन चंद तिवारीआज 2 फरवरी को देशभक्ति और नारी संवेदनाओं को हृदयस्पर्शी समवेत स्वर देने वाले उत्तराखंड सुर सम्राट स्वर्गीय गोपाल बाबू गोस्वामी का जन्मदिन है. उत्तराखंड गौरव गोपाल बाबू भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं परंतु पहाड़ से पलायन के इस दौर में उनके द्वारा गाए हुए ‘घुघुती ना बांसा’, 'कैले बाजे मुरूली' जैसे गीतों की याद से बरबस पहाड़ से बिछड़ने की वेदनाएं मार्मिक रूप से उभरने लगती हैं. because गायक गोपाल बाबू गोस्वामी की कला साधना उत्तराखण्ड की महान धरोहर है. उनके द्वारा गाए गीतों में पहाड़ की लोक संस्कृति और उससे उभरी समस्याओं की असली लोकपीड़ा भी अभिव्यक्त हुई है. पर्वतीय जनजीवन में पहाड़, नदी, पेड़, पौधे और घुघुती आदि उनके सुख दुःख के पर्यावरण मित्र हैं. ये ही वे पांच तत्त्व हैं जिनसे किसी कविता या गीत की आत्मा बनती है,जिसे हम...
‘प्रकृति को पूजने और पर्यावरण सुरक्षा की प्रेरणा देता है उत्तरायणी पर्व’

‘प्रकृति को पूजने और पर्यावरण सुरक्षा की प्रेरणा देता है उत्तरायणी पर्व’

लोक पर्व-त्योहार
पर्वतीय लोकविकास समिति द्वारा 19 वें उत्तरायणी महोत्सव का आयोजनहिमांतर ब्यूरोदक्षिण दिल्ली के पालम क्षेत्र के डीडीए ग्राउंड साध नगर में पर्वतीय लोकविकास समिति द्वारा राष्ट्रीय उतरायणी अभियान के अंतर्गत 19 वें उत्तरायणी महोत्सव का आयोजन किया गया.आचार्य महावीर नैनवाल और पं. ओम नारायण शुक्ला द्वारा सर्वप्रथम प्रकृति के सम्मान,पर्यावरण चेतना और विश्व शांति के लिए सृष्टि रक्षा महायज्ञ किया गया. समारोह का उद्घाटन करते हुए दक्षिण दिल्ली के सांसद श्री रमेश विधूड़ी ने कहा कि उत्तरायणी पर्व हमें प्रकृति को पूजने और पर्यावरण सुरक्षा की प्रेरणा देता है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विश्व को भारत के इस संदेश और प्रतिबद्धता को धरातल पर उतारते हुए 2030 तक कार्बन उत्सर्जन से मुक्त करने का लक्ष्य रखा है.इस अवसर पर आयोजित गोष्ठी के मुख्य वक्ता चार्टर्ड अकाउंटेंट राजेश्वर पैन्यूली ने कहा कि उत्तरा...
गणतंत्र दिवस परेड: उत्तराखंड की झांकी ‘मानसखंड’ को मिला पहला पुरस्कार

गणतंत्र दिवस परेड: उत्तराखंड की झांकी ‘मानसखंड’ को मिला पहला पुरस्कार

देहरादून
टीम लीडर केएस चौहान की मेहनत रंग लाई, अब कर चुके हैं 13 झांकियों का नेतृत्व  देहरादून. गणतंत्र दिवस की परेड में कर्तव्य पथ पर शामिल उत्तराखंड की मानसखंड झांकी को पहला पुरस्कार मिला है. मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस उपलब्धि के लिए प्रदेशवासियों को बधाई देते हुए कहा कि यह उपलब्धि हम सबके लिए गौरवशाली पल है. मुख्यमंत्री ने कहा कि पुराणों में गढ़वाल का केदारखंड और कुमाऊं का मानसखंड के रूप में वर्णन किया गया है. स्कंदपुराण में मानसखंड के बारे में बताया गया है. जागेश्वर मंदिर की बहुत धार्मिक मान्यता है. गणतंत्र दिवस परेड को अभी तक राजपथ के नाम से जाना जाता था, किंतु इस वर्ष उसका नाम बदलकर कर्तव्य पथ रखा गया है. नाम बदलने के बाद कर्तव्य पथ पर गणतंत्र दिवस की यह. पहली परेड थी, जिसमे उत्तराखंड की झांकी मानसखंड को देश मे प्रथम स्थान मिलने से इतिहास में उत्तराखंड राज्य का नाम दर्ज हो गया है....
अवैज्ञानिक और अनियोजित विकासकार्यों का नतीजा है जोशीमठ भू-धसाव

अवैज्ञानिक और अनियोजित विकासकार्यों का नतीजा है जोशीमठ भू-धसाव

चमोली
उत्तराखंड के जनपद चमोली के सीमांत विकासखंड जोशीमठ में लगातार हो रहे भू-धसाव और भूस्खलन की प्रक्रिया से जन-जीवन अस्त-व्यस्त हो गया है. जोशीमठ नगर भारत सुदूर उत्तर में चीन से सीमा से लगा सबसे पुराना नगर है, जिसका 1500 वर्ष पुराना क्रोनोलॉजिकल इतिहास है. यह नगर भारत की आजादी के बाद के वर्ष 1975 से क्रीपिंग मूवमेंट के साथ ऑली से लेकर अलकनंदा नदी तट के पास स्थित सेमा-कमद गांव के साथ-साथ प्रति वर्ष कुछ सेंटीमीटर अलकनदां में समा रहा है. इस क्षेत्र का 1996-97 से लेकर वर्तमान तक विभिन्न भूगर्भीय एवं पर्यावरणीय अध्ययनों पर कार्य कर रहे जे.पी. मैठाणी, हिमांतर के माध्यम से  जोशीमठ भू-धसाव की कहानी बयां कर रहे हैं- प्रस्तुत है जोशीमठ भू-धसाव पहली कड़ी. फोटोग्राफ- अनुज नंबूदरी, नितिन सेमवाल और जयदीप किशोर. देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी ने उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को दूरभाष पर ...