साहित्‍य-संस्कृति

जीवन में क्यों आवश्यक है सत्संग…

राधा कांत पाण्डेय

श्रीमद्भागवत के माहात्म्य में अजामिल प्रसंग का बहुत सुंदर वर्णन किया गया है- अजामिल पूर्व में बड़ा ही शास्त्रज्ञ शीलवान, सदाचारी व सदगुण संपन्न था. किंतु जीवन में सैद्धांतिक निष्ठा के अभाव के कारण वह पथभ्रष्ट और कामवासना के गहरे दलदल में चला गया. जब व्यक्ति के जीवन में विचार,साधना, अध्ययन, अभ्यास और चिंतन का लोप होता है तो प्रायः व्यक्ति की स्थिति अजामिल के जैसी हो जाती है. जीवन पथ पर तनिक भी सावधानी हटी तो दुर्घटना घटने के  योग प्रबल हो जाते हैं.

इसीलिए जीवन को साधने के लिए अभ्यास और अनुशासन की आवश्यकता होती है. इंद्रियों का संयम जरूरी होता है. जो  आध्यात्मिक गुरु एवं श्रेष्ठ साधकों की निकटता और आशीष से ही प्राप्त हो सकता है.

चूँकि भगवान की माया बहुत प्रबल है उसकी कसौटी पर कोई बिरला ही खरा उतर सकता है. भगवान पहले तो अपने भक्तों की कठिन परीक्षा लेते हैं लेकिन जैसे ही भक्त के जीवन में भटकाव आना प्रारम्भ होता है, परम कृपालु परमेश्वर तत्काल जीवन को बसंत बनाने के लिए साधु के वेश में स्वयं तारणहार बनकर  प्रकट हो जाते हैं.

 88 वर्ष की कठिन परीक्षा के बाद ईश्वर ने अजामिल के जीवन में संत भेजा. उनकी कृपा से अजामिल ने छोटे पुत्र का नाम नारायण रखा. मोह और भय में फंसे अजामिल ने मृत्यु के समय नारायण शब्द का बार-बार उच्चारण किया, जिसके परिणामस्वरूप वैष्णव मंत्र सक्रिय हुआ एवं अजामिल को परम पद प्राप्त हुआ.

अगर इस कथा के दर्शन पक्ष में हम अपने जीवन को देखें तो हम सभी के अंदर एक अजामिल बैठा हुआ है, जिसमें अच्छाईयाँ और बुराइयाँ दोनों हैं. सत्संग और सतर्कता के अभाव में हम कुसंग का चयन करके विषय वासना को ही जीवन समझ लेते हैं.  उस समय ज्ञान चक्षुओं को अज्ञानता का पर्दा इस तरह ढक लेता है कि हम न चाहते हुए भी बुराई के दलदल में आकण्ठ डूब जाते हैं.

लेकिन जैसे ही सत्पुरुष रूपी प्रकाश का आगमन हमारे जीवन में होता है ठीक उसी क्षण से कुसंग से जन्मे पाप और विषय वासना रूपी अंधकार स्वतः नष्ट हो जाते हैं और ईश्वरीय सत्ता का परम प्रसाद प्राप्त होता है.

श्रीमद्भागवत महापुराण के अजामिल प्रसंग से प्रेरणा लेते हुए आइए हम सब दृढ़ प्रण करें कि जीवन में कुसंग से यथासंभव बचकर रहेंगे और सत्पुरुषों का अधिक से अधिक सानिध्य प्राप्त करेंगे और सच मानें तो यही जीवन सिद्धि का मूलमंत्र है. अन्यथा हमारे अन्तस में विद्यमान रज और तमोगुण हमारे अंदर के सतोगुण को नष्ट करके सन्मार्ग से भटके हुए अजामिल बना कर रख देंगे जहां से वापस सन्मार्ग की ओर लौटने में एक लंबी यात्रा और ईश्वरीय अनुग्रह की आवश्यकता पड़ेगी. इतनी लंबी अवधि से अच्छा यही है कि हम पथभ्रष्ट होने की जगह सदैव नारायण नाम के संकीर्तन के सहारे जीवन रूपी वैतरणी को सहजता और आनंद के साथ पार करें.

 वैसे भी राम से अधिक शास्त्रों ने राम नाम की महिमा गाई है. ईश्वर के नाम का स्मरण मात्र सभी दुःख, भय एवं चिंताओं से मुक्ति दिलाने वाला है. इसका आशय लेने वाले प्राणी को भगवान की माया अर्थात सांसारिक प्रपंच भी परेशान नहीं करता.

शास्त्रों में कहा गया है- यत्फलं नास्ति तपसा न योगे न समाधिना. तत्फलं लभते सम्यक् कलौ केशव कीर्तनात्..”

अर्थात जो फल तप, यज्ञ अथवा समाधि से भी प्राप्त नहीं होता, वह फल कलियुग में भगवान के गुणगान या कीर्तन मात्र से प्राप्त हो जाता है.  श्रीमद्भागवत महापुराण के अंतिम श्लोक में भगवान वेदव्यास ने नाम संकीर्तन की महिमा बताते हुए लिखा भी है. नाम संकीर्तनं यस्य सर्व पाप प्रणाशनम्, प्रणामो दु:ख शमनस्तं नमामि हरिं परम्..

यही नहीं  तमाम धर्म ग्रंथ, उपनिषद, पुराण भगवान के नाम की महिमा का उचित बखान करने में स्वयं को असमर्थ पाते हैं.

रामचरित मानस में बाबा तुलसी कहते हैं.

अपतु अजामिलु गजु गनिकाऊ. भए मुकुत हरिनाम प्रभाऊ..
कहौं कहौं लगि नाम बड़ाई. रामु न सकहिं नाम गुन गाई..”

इसीलिए अगर सांसारिक प्रपंच रूपी इस अजामिल देह को हम परम पद तक ले जाना चाहें तो हमें किसी भी स्थिति में भगवन्नाम का संकीर्तन नहीं छोड़ना चाहिए!

(पिछले डेढ़ दशक से सामाजिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक एवं आध्यात्मिक क्षेत्र में सक्रिय भूमिका का निर्वहन करने वाले राधाकान्त पाण्डेय हिन्दी वाचिक परम्परा के सुप्रसिद्ध कवि हैं. संस्कृत साहित्य से स्नातक एवं पत्रकारिता से स्नातकोत्तर करने वाले राधाकान्त पाण्डेय  एक श्रेष्ठ ज्योतिषविद एवं शास्त्रों के मर्मज्ञ हैं. देश के शीर्षस्थ संतों के कृपापात्र राधाकान्त अनेक टीवी चैनलों पर अपने ओजस्वी एवं जीवनोपयोगी विचारों के लिए प्रसिद्ध हैं. जिनके समय-समय पर अनेक पत्र-पत्रिकाओं में भी आलेख छपते रहे हैं.)

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