

आशिता डोभाल
“गिर गए हैं सफर में तो फिर उठ जाएंगे,
कदम अब रुकेंगे नहीं भले ही हम मिट जाएंगे…”
— शशि कुड़ियाल “चंद्रभा”
लिखना केवल शब्दों को कागज़ पर उतार देना नहीं होता, यह अपनी ही बिखरी हुई कड़ियों को जोड़ने का एक मौन अनुष्ठान है। यह स्वयं को खाली करने की नहीं, बल्कि स्वयं को नए सिरे से भरने की प्रक्रिया है। लिखने की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि हम अपनी सोच, अपने एकांत और अपनी पीड़ाओं को एक चेहरा दे पाते हैं।
कई बार पंक्तियाँ किसी सोचे-समझे प्रयास से नहीं जन्म लेतीं; वे मन के किसी अनदेखे कोने से स्वतः बह निकलती हैं। धीरे-धीरे वे शब्द आकार लेते हैं, पंक्तियों में ढलते हैं और उन्हीं से कविता, ग़ज़ल, नज़्म, किस्से और कहानियाँ जन्म लेती हैं। शायद इसी भावभूमि से जन्मा है शशि कुड़ियाल जी का पहला काव्य-संग्रह “दिल से दिल तक”।
यह संग्रह केवल कविताओं का संकलन नहीं, बल्कि अनुभवों, रिश्तों, स्मृतियों, संघर्षों और संवेदनाओं का जीवंत दस्तावेज़ है। इसे पढ़ते हुए बार-बार यह अनुभव हुआ कि हर कविता अपने भीतर कोई कहानी, कोई परिस्थिति और कोई गहरा भाव समेटे हुए है। संभवतः इसका एक कारण यह भी रहा कि जब-जब शशि दी से संवाद हुआ, उन्होंने हर कविता के पीछे छिपी परिस्थिति और उस समय की अपनी मनःस्थिति साझा की। परिणामस्वरूप उन कविताओं को केवल पढ़ा नहीं गया, बल्कि महसूस किया गया।
आज जब कविता के क्षेत्र में कई बार शिल्प, छंद और अलंकार की प्रतिस्पर्धा भावों पर भारी पड़ती दिखाई देती है, ऐसे समय में यह संग्रह अपनी सरल भाषा और सहज अभिव्यक्ति से अलग पहचान बनाता है। यहाँ कविता का केंद्र रस, संवेदना और जीवनानुभव हैं।
संग्रह की अध्यक्षीय टिप्पणी में अनिल लढ़ा जी ने उल्लेख किया है कि नवोदित रचनाकार होने के बावजूद शशि कुड़ियाल जी ने कम समय में अपनी कविताओं में प्रेरणा, स्पष्टता और संवेदनशील अभिव्यक्ति को स्थान दिया है। वहीं संपर्क संस्थान और उससे जुड़े लोगों की प्रेरणा ने उनकी लेखन-यात्रा को दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इस संग्रह का सबसे मार्मिक पक्ष वह निजी संघर्ष है, जिसका उल्लेख स्वयं लेखिका ने किया है। वर्ष 2019–2020 में माता-पिता के निधन के बाद जीवन के अत्यंत कठिन दौर से गुजरते हुए उन्होंने कलम और कागज़ को अपना साथी बनाया। परिवार के सहयोग और भीतर की टूटन को शब्दों में ढालने की प्रक्रिया ने उन्हें अभिव्यक्ति का एक नया संसार दिया। यही भाव आगे चलकर इस पुस्तक के रूप में हमारे सामने उपस्थित हुआ।
संग्रह की कविताएँ विविध विषयों को समेटती हैं- रिश्ते, स्त्री जीवन, परिवार, स्मृतियाँ, समाज, बदलता समय, प्रकृति और मानवीय संवेदनाएँ।
“फोन के बिना जीवन” आधुनिक जीवन की निर्भरता को सामने लाती है।
“बचपन जी लेने दो” बचपन की सहजता और खोती संवेदनाओं को छूती है।
“बेटा हमारा फौज में है” कल्पना होते हुए भी इतनी जीवंत है कि पाठक भावनात्मक रूप से उससे जुड़ जाता है—
“तेरी पसंद के कोई पकवान अब घर में नहीं बनते हैं,
बन भी जाएँ तो बिन तेरे गले से नहीं उतरते हैं…”
इसी प्रकार “मुझे बेटा तेरा बनना है”, “बालमन निर्मल होता है”, “उड़ान अभी जारी है”, “दुआएँ कमाते हैं”, “पहाड़ों की वेदना”, “बदलाव होकर रहेगा” जैसी कविताएँ अपने-अपने विषयों को संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत करती हैं।
पूरे संग्रह में जिस कविता ने सबसे अधिक प्रभावित किया, वह थी — “उसकी शांति का दीप न बुझाओ”। इसकी पंक्तियाँ भीतर तक उतर जाती हैं—
“दुनिया से जो चला गया अब तुम उसको जाने दो,
उससे तुम प्रीत न लगाओ।
आँसू तुम्हारे उसे अशांत करते हैं,
अपने अश्रुओं से उसकी शांति का दीप न बुझाओ…”
यह कविता केवल शोक नहीं, बल्कि स्वीकार और आत्मिक शांति का संदेश देती है।
इस पुस्तक को पढ़ने में अपेक्षा से अधिक समय लगा — इसलिए नहीं कि यह कठिन थी, बल्कि इसलिए कि इसके कई पन्ने बार-बार पढ़े गए। धीरे-धीरे लगा कि इसके पात्र और भाव पुस्तक से निकलकर आँखों के सामने उपस्थित होने लगे हैं। यह पुस्तक किसी गरम चाय या कॉफ़ी की धीमी चुस्कियों की तरह मन के भीतर उतरती जाती है — जिसमें थोड़ा अपनापन है, थोड़ा कसैलापन, और बहुत सारा जीवन।
शशि दी, आपकी इस पुस्तक को पढ़ते हुए बार-बार यह लगा कि यदि लेखन की इस आत्मीयता की थोड़ी सी छाया भी किसी पाठक पर पड़ जाए, तो वह स्वयं को समृद्ध महसूस करेगा।
आपका हार्दिक धन्यवाद, आभार और साधुवाद।
अब प्रतीक्षा रहेगी — “दिल से दिल तक – भाग 2” की।
