Author: Himantar

हिमालय की धरोहर को समेटने का लघु प्रयास
राग-बसंत बहार  और बावरा बैजू

राग-बसंत बहार  और बावरा बैजू

ट्रैवलॉग
मंजू काला मूलतः उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल से ताल्लुक रखती हैं. इनका बचपन प्रकृति के आंगन में गुजरा. पिता और पति दोनों महकमा-ए-जंगलात से जुड़े होने के कारण, पेड़—पौधों, पशु—पक्षियों में आपकी गहन रूची है. आप हिंदी एवं अंग्रेजी दोनों भाषाओं में लेखन करती हैं. आप ओडिसी की नृतयांगना होने के साथ रेडियो-टेलीविजन की वार्ताकार भी हैं. लोकगंगा पत्रिका की संयुक्त संपादक होने के साथ—साथ आप फूड ब्लागर, बर्ड लोरर, टी-टेलर, बच्चों की स्टोरी टेलर, ट्रेकर भी हैं.  नेचर फोटोग्राफी में आपकी खासी दिलचस्‍पी और उस दायित्व को बखूबी निभा रही हैं. आपका लेखन मुख्‍यत: भारत की संस्कृति, कला, खान-पान, लोकगाथाओं, रिति-रिवाजों पर केंद्रित है. इनकी लेखक की विभिन्न विधाओं को हम हिमांतर के माध्यम से ‘मंजू दिल से…’ नामक एक पूरी सीरिज अपने पाठकों तक पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं. पेश है मंजू दिल से… की 26वीं किस्त…म...
हिमांतर के नए अंक ‘हिमालयी लोक समाज व संस्कृति’ का विमोचन

हिमांतर के नए अंक ‘हिमालयी लोक समाज व संस्कृति’ का विमोचन

साहित्‍य-संस्कृति
हिमांतर ब्यूरो, हरिद्वार-देहरादूनहिमांतर का नया अंक आ गया है. हर बार की तरह यह अंक भी कुछ खास और अलग है. हिमांतर केवल एक पत्रिका नहीं, बल्कि हिमालयी सरोकारों, संस्कृति और लोक जीवन का दर्पण बनती जा रही है. अब तक के जितने भी अंक प्रकाशित हुए हैं. हर अंक ने अपनी अलग छाप छोड़ी है. इस बार का अंक भी पहले के अंकों से अलग है. लेकिन, हर अंक की तरह ही इसकी आत्मा भी हिमालयी लोक समाज में बसती है. खास बात यह है कि इस बार के अंक नाम भी हिमालयी लोक समाज व संस्कृति रखा गया है. हरिद्वार में आयोजित रवांल्टा सम्मलेन में हिमांतर के नए अंक का विमोचन किया गया. हिमांतर की खास बात यह है कि इसमें हिमालयी सरोकारों और हिमालयी समाज को केवल छूया भर नहीं जाता, बल्कि गंभीरता से हर पहलू को सामने लाया जाता है. इस बार के अंक के अतिथि संपादक रचनात्मकता के लिए पहचाने जाने वाले राष्ट्रीय युवा पुरस्कार विजेता शिक्षक और साह...
पिंक प्लाजो नहीं, परंपरागत परिधान में दिखी महिलाएं

पिंक प्लाजो नहीं, परंपरागत परिधान में दिखी महिलाएं

हरिद्वार
हिमांतर ब्यूरो, हरिद्वारजब अपने गांव से दूर दूसरे शहर में रहते हैं, तो हम अपने बार-त्योहार और संस्कृति से भी दूर हो जाते हैं. हालांकि, किसी ना किसी रूप में हम गांव से जुड़े तो रहते हैं. लेकिन, शहरों में नौकरी की मजबूरी और दो वक्त की रोटी के लिए अक्सर व्यस्त रहते हैं और इस व्यस्तता के बीच यह भी भूल जाते हैं कि जिस शहर में हम रह रहे हैं, वहां मेरे गांव, गांव के पास के दूसरे गांव के लोग भी रहते हैं.इनमें कुछ नौकरी में साथ हैं. कुछ दूसरे विभागों में तैनात हैं. कुछ का रोज मिलना हो जाता है, जबकि कुछ चाहकर भी एक-दूसरे से मिल पाते हैं. इसी दूरी को मिटाने के लिए हरिद्वार में रह रहे राष्ट्रीय युवा पुरस्कार विजेता उत्तरकारी जिले के नौगांव ब्लॉक की बनाल पट्टी के रचनात्मक शिक्षक दिनेश रावत भी शिक्षा विभाग में तैनात हैं. उनकी पत्नी भी यहीं पुलिस विभाग में कार्यरत हैं. दिनेश रावत ने हमेशा की तरह ...
रोचकता आद्यान्त बनाये रखता है उपन्यास, अपनी तरफ खिंचती है इसकी भाषा शैली

रोचकता आद्यान्त बनाये रखता है उपन्यास, अपनी तरफ खिंचती है इसकी भाषा शैली

पुस्तक-समीक्षा
हिमांतर ब्यूरो, नई दिल्लीराष्ट्रवाक् पत्रिका के फेसबुक पेज पर पिछले दिनों ललित फुलारा के पहले उपन्यास ‘घासी: लाल कैंपस का भगवाधारी’ पर ऑनलाइन परिचर्चा हुई. यह उपन्यास साल 2022 में प्रकाशित हुआ और साल के अंत तक इस उपन्यास को साहित्य आज तक ने वर्ष के युवा लेखकों की शीर्ष 10 पुस्तकों में शामिल किया. यह उपन्यास यश पब्लिकेशंस से प्रकाशित हुआ और इसने पाठकों का वृहद ध्यान अपनी तरफ खिंचा है. कैंपस केंद्रित इस उपन्यास को अच्छी खासी पाठकीय प्रशंसा मिली है. उपन्यास के छपने के सालभर बाद पहली बार इस पर ऑनलाइन परिचर्चा रखी गई थी. जिसमें इंडियाडॉटकॉम के संपादक और वरिष्ठ पत्रकार सुनील सीरीज, चर्चित लेखक, आईटीबीपी में डिप्टी कमांडेंट, एवं राष्ट्रवाक् पत्रिका के संपादक कमलेश कमल  व शिक्षाविद् एवं दिल्ली सरकार में उप शिक्षा निदेशक डॉक्टर राजेश्वरी कापड़ी ने इसके कथानक, भाषा शैली और शिल्प पर अपने विचार र...
‘पूष क त्यार’: एक नहीं अनेक आयाम

‘पूष क त्यार’: एक नहीं अनेक आयाम

लोक पर्व-त्योहार
दिनेश रावत देवभूमि उत्तराखण्ड के सीमांत उत्तरकाशी का पश्चिमोत्तर रवाँई अपनी सामाजिक—सांस्कृतिक विशिष्टता के लिए सदैव ही विख्यात रहा है. इस लोकांचल में होने वाले पर्व—त्योहारों की श्रृंखला जितनी विस्तृत है, सामाजिक—सांस्कृतिक दृष्टि से उतनी ही समृद्ध है. पर्व—त्योहारों के आयोजन में प्रकृति व संस्कृति, ऋतु व फसल चक्र की गहरी छाप दिखती है. फिर चाहे वह आयोजन के तौर—तरीके हों या इन अवसरों पर बनने वाले विशेष भोजन, सभी मौसमानुकूल ही बनते हैं. इस दौरान जो रंग दिखते हैं वह बहुत ही न्यारे और प्यारे हैं. 'पूष क त्यार' यानी 'पौष के त्योहार' इस लोकांचल में होने वाले पर्व—त्योहारों में प्रमुखता से शामिल हैं. माघ माह तक इनकी रंगत बनी रहने पर इन्हें 'माघी मघोज' या 'मरोज' भी कहते हैं. पौष माह में इस अंचल की अधिकांश पर्वत श्रृंखला बर्फ की चादर ओढ़ लेती हैं. कई बार बर्फ की वहीं श्वेद चादर घाटी या तलहटी में...
कौओं को विशेष व्यंजन खिलाने का अनोखा त्यौहार

कौओं को विशेष व्यंजन खिलाने का अनोखा त्यौहार

लोक पर्व-त्योहार
नीलम पांडेय नील, देहरादून आ कौवा आ, घुघुती कौ बड़ खै जा मैकेणी म्येर इजैकी की खबर दी जा. आ कौवा आ, घुघुती कौ बड़ ली जा मैकेणी म्येर घर गौं की खबर दी जा. आ कौवा,अपण दगड़ी और लै पंछी ल्या, सबुकैं घुघुती त्यारै की खबर दी आ. इस बार घुघुती के प्रचलित गीत को एक नए सुर में गाना चाहती हूं, मेरी उम्र के असंख्य बच्चे जो आज खाने कमाने की दौड़ में बड़े - बड़े महानगरों में व्यस्त हो गए हैं, और व्यस्क होकर जीवन की ढलान में बढ़ रहे हैं, वे इन त्योहारों की आहट पर अपने देश, गांव लौट जाना चाहते हैं. जैसे पक्षी लौट आते हैं दूरदराज से वापस अपने देश. घुघुती के त्योहार के दिन हम महानगरों में किसी चिड़िया को खोजने लगते हैं.  कौवे को बुलाने की कोशिश करते हैं....पर वे नही दिख रहे हैं. जब हम छोटे थे ....आज के दिन असंख्य कौवे घर के आसपास घूमने लगते थे और घर की मुंडेर, आंगन में घुघुती बड़े रखते ही फुर्र से उठ...
सिलपाटा से सियाचिन तक प्रमाणिक जीवन की अनुभूति का यात्रा- वृत्तांत

सिलपाटा से सियाचिन तक प्रमाणिक जीवन की अनुभूति का यात्रा- वृत्तांत

साहित्‍य-संस्कृति
हिमांतर ब्यूरो, नई दिल्लीयात्रा, भूगोल की दूरी को नापना भर नहीं है बल्कि भूगोल के भीतर की विविधता को ठहर कर महसूस करना और समझना है. यही स्वानुभूति  यात्रा- वृत्तांत का आत्मा और रस तत्व होता है. इसी स्वानुभूति की प्रमाणिकता को आत्मसात करने वाली पुस्तक है, 'सिलपाटा से सियाचिन तक'. हिमांतर प्रकाशन द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक का 13 जनवरी, 2023 को दिल्ली में संस्कृत अकादमी के सभागार में लोकार्पण हुआ. इस कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रसिद्ध विज्ञान कथा लेखक, घुमक्कड़ और साहित्यकार व इस पुस्तक की भूमिका लिखने वाले देवेन्द्र मेवाड़ी ने की, उन्होंने इस पुस्तक की प्रमाणिकता और फौजी जीवन के बीच बंदूक के साथ कलम हाथ में थामने वाले लेखक द्वारा पुस्तक में चित्रित सूक्ष्म विवरणों की ओर सबका ध्यान दिलाया. साथ ही उन्होंने कहा कि- यह यात्रा वृत्तांत सिर्फ विवरण भर नहीं है बल्कि इसके जरिए आप फ़ौजी जीवन के विविध आय...
मकर संक्रांति : सूर्यवंशी वैदिक आर्यों का राष्ट्रीय पर्व 

मकर संक्रांति : सूर्यवंशी वैदिक आर्यों का राष्ट्रीय पर्व 

लोक पर्व-त्योहार
डॉ. मोहन चंद तिवारीइस वर्ष मकर संक्रांति का पर्व 15 जनवरी, 2023 को मनाया जा रहा है. पंचांग गणना के अनुसार इस बार 14 जनवरी दोपहर 1.55 से सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करेंगे.ब्रह्म योग का विशेष शुभ मुहूर्त पंचांग के अनुसार हर साल सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने पर मकर संक्रांति का त्योहार मनाया जाता है. इस बार सूर्य धनु राशि की अपनी यात्रा को विराम देते हुए 14 जनवरी की रात को 08 बजकर 20 मिनट पर मकर राशि में प्रवेश करेंगे. साल 2023 में मकर संक्रांति का पुण्य काल का शुभ मुहूर्त 15 जनवरी को सुबह 06 बजकर 48 मिनट से शुरू होगा और समापन शाम 05 बजकर 41 मिनट पर होगा. ऐसे में उदया तिथि के अनुसार इस बार मकर संक्रांति 15 जनवरी को मनाई जाएगी. ज्योतिशाचार्यों के अनुसार, इस साल 2023 में मकर संक्रांति पर रोहिणी नक्षत्र का खास संयोग बनेगा. इस दिन रोहिणी नक्षत्र शाम 8:18 मिनट तक रहेगा. रो...
2024 तक दिल्ली के हर घर में होगा बजरंगी: विश्व हिंदू परिषद

2024 तक दिल्ली के हर घर में होगा बजरंगी: विश्व हिंदू परिषद

दिल्ली-एनसीआर
हिमांतर ब्यूरो, नई दिल्लीविश्व हिंदू परिषद, दिल्ली प्रांत द्वारा प्रांतीय बैठक का आयोजन दिल्ली के मयूर विहार स्थित उत्तरा गुरुवायुरप्पन मंदिर में 7 व 8 जनवरी 2022 को किया गया. इस बैठक में बड़ी संख्या में दिल्ली विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ताओं ने शिरकत की और इस बैठक को सफल बनाया.  2024 तक दिल्ली के हर घर में एक बजरंगी हो, यह संकल्प विश्व हिंदू परिषद दिल्ली की इस दो दिवसीय अर्धवार्षिक बैठक में लिया गया. इस बैठक में विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय संयुक्त महामंत्री डॉ सुरेंद्र जैन ने खचाखच भरे हॉल में कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा कि हिंदुओं ने प्रभु श्री राम की जन्मभूमि के लिए बलिदान दिया, इसी की परिणति है कि आज अयोध्या में भव्य राम मंदिर बन रहा है. दिल्ली का कोई भी हिंदू अपने आप को अकेला महसूस ना करें. एक बड़ा तबका हिंदुओं के खिलाफ गलत नैरेटिव बनाने के लिए कार्य करता है. टु...
दादी के कैनवास से शुरू हुई पेटिंग की शुरुआत…

दादी के कैनवास से शुरू हुई पेटिंग की शुरुआत…

उत्तरकाशी
आशिता डोभाल उत्तराखंड देवभूमि ऋषिमुनियों की तपस्थली होने के साथ साथ मां गंगा-यमुना का उद्गम स्थल ही नही बल्कि कुछ ऐसे साधकों की जन्मभूमि और कर्मभूमि भी है जो आज इक्कसवीं सदी में भी अपनी थाती माटी प्रेम से ओत प्रोत होकर सिर्फ यहां को संस्कृति और कला को देश दुनिया में पहचान दिला रहे हैं, उन साधकों में एक नाम है मुकुल बडोनी, जो मूल रूप से कांदला बड़ेथी चिन्यालीसौड़ के एक साधारण परिवार में जन्मे हैं, जिनके पिता एक निजी स्कूल में प्रधानाचार्य हैं और माताजी कुशल गृहणी. विद्यार्थी जीवन में अव्वल रहने वाला मुकुल हमेशा अध्यापकों के चहेते विद्यार्थियों में रहता था. स्नातकोत्तर चित्रकला से करने के बाद बीएड किया व तत्पश्चात पिट्स बीएड कॉलेज उत्तरकाशी में चित्रकला प्रशिक्षक के रूप में तैनात हैं.मुकुल बताते हैं कि अपनी थाती और माटी से जो उन्हे लगाव हुआ उसमे उनके परिवार का विशेष सहयोग रहा. घर मे...