November 1, 2020
संस्मरण हिमाचल प्रदेश

किन्नौर का कायाकल्प करने वाला डिप्टी कमिश्नर

  • कुसुम रावत

मेरी मां कहती थी कि किसी की शक्ल देखकर आप उस ‘पंछी’ में छिपे गुणों का अंदाजा नहीं लगा सकते। यह बात टिहरी रियासत के दीवान परिवार के दून स्कूल से पढ़े मगर सामाजिक सरोकारों हेतु समर्पित प्रकृतिप्रेमी पर्वतारोही, पंडित नेहरू जैसी हस्तियों को हवाई सैर कराने वाले और एवरेस्ट की चोटी की तस्वीरें पहली बार दुनिया के सामने लाने वाले एअरफोर्स पायलट, किन्नौर की खुशहाली की कहानी लिखने वाले और देश में पर्यावरण के विकास का खाका खींचने वाले वाले दूरदर्शी नौकरशाह नलनी धर जयाल पर खरी बैठती है। देश के तीन प्रधानमंत्रियों के साथ काम करने वाले इस ताकतवर नौकरशाह ने हमेशा अपनी क्षमताओं से एक मील आगे चलने की हिम्मत दिखाई जिस वजह से वह भीड़ में दूर से दिखते हैं। जीवन मूल्यों के प्रति ईमानदारी, प्रतिबद्वता व संजीदगी से जीने का सलीका इस बेजोड़ 94 वर्षीय नौकरशाह की पहचान है। यह कहानी एक रोचक संस्मरण है कि कैसे दून स्कूल से शुरू हुआ बालक नलनी का सफर ताकतवर नौकरशाह एन.डी. जयाल बनकर सत्ता के गलियारों से गुजरा और कैसे उन्होंने हर जगह अपनी छाप छोड़कर जनहित में काम करने का जज्बा दिखाया? इस बहुआयामी खामोश यात्रा को देश के बच्चों, अध्यापकों, नौकरशाहों और सामाजिक कार्यकर्ताओं हेतु लिखने की मेरी यह कोशिश है कि कैसे माता-पिता की परवरिश, स्कूल के माहौल, समर्थ अध्यापकों के सानिध्य, दूरदर्शी मित्रों के मार्गदर्शन ने 11 माह में मां से बिछुड़े नलनी को देश का एक जिम्मेदार रचनाधर्मी प्रकृतिप्रेमी ध्वजवाहक बनाया।

आईए सुनें श्री जयाल की लीक से हटकर कहानी, उनकी ही जुबानी—

दून स्कूल मेरी प्रेरणा

 

मेरा जन्म सन् 1927 में हुआ। हम झांजर गांव पौड़ी के मूल निवासी हैं। मेरे चाचा चक्रधर जयाल टिहरी रियासत के दीवान थे। मेरे पिता चंद्रधर जुयाल अल्मोड़ा में डिप्टी कलक्टर थे। पिता का ट्रांसफ्रर लैसींडौन हुआ। रास्ते में हुए एक्सीडेंट में मेरी मां चल बसी। उस वक्त मैं 11 महीने का था। मेरी दीदी गोदाम्बरी ने मुझे पाला, जो 30 साल की उम्र में चल बसी। मैंने मां की कोई तस्वीर भी नहीं देखी। सन् 1936 में मुझे 9 साल की उम्र में अपने दो भाईयों के साथ दून स्कूल में धमाचैकड़ी का मौका मिला। मैं वहां साढ़े नौ साल रहा। मशहूर पक्षी विज्ञानी डा. सालिम अली हम बच्चों को ‘बर्ड वाचिंग’ कराते। हेडमास्टर हमको पहाड़ों पर ले जाते। हमारे हाऊस मास्टर प्रसिद्ध पर्वतारोही होल्डसवर्थ ने हम जयाल भाईयों को पर्वतारोहण के लिए उकसाया। यहीं से मेरा पर्वतारोहण व प्रकृति प्रेम शुरू हुआ। टाटा हाऊस का कैप्टेन बनकर मुझ में नेतृत्व क्षमता पैदा हुई। हमें स्कूल में समाज सेवा का पाठ पढ़ाया जाता। हमें नौकरों के बच्चों को पढ़ाने व सेवा काम के नंबर मिलते। जहां कहीं अकाल, बाढ़, चक्रवात, भूकम्प, प्राकृतिक आपदा होती हम वहां सेवा का पाठ पढ़ने जाते। मेरा मन 1942-43 के बंगाल के अकाल पीड़ितों, उड़ीसा के चक्रवात पीड़ितों, मलेरिया व डायरिया के रोगियों की टूटी बिखरी जिंदगियों की पीड़ा महसूस कर हिल गया था। मानवीय पीड़ा के अहसास ने मुझे आने वाले दिनों में किसी भी त्रासदी का मानवीय हल खोजने को परिपक्व बनाया। दिल दहलाने वाले अनुभवों ने मुझे सिखाया कि समाज सेवा के नाम पर दया दिखाना शर्म की बात है। मानव सेवा आपसी सहभागिता का सुंदर अहसास है जिसमें हमारे हाथ मानवीय कारणों से समाज में पैदा हुई असमानता व शोषण को खत्म करने की भावना के साथ उठें ना कि दया भाव से। मेरा मन इस बात पर आक्रोशित होता कि दु:ख—दर्द में डूबे लोगों के आंसू पोंछने के लिए हमारे हाथ क्यों नहीं उठते? क्यों हमारी आंखें उनकी पीड़ा में नम नहीं होती? केवल होठों से होने वाली यह कैसी समाज सेवा है? दून स्कूल के हेडमास्टर, हाऊस मास्टर और मास्टर श्री राय ने मेरे अंदर साहस व सौंदर्यबोध जगाया जिसने मेरी आत्मा को प्रकृति, पहाड़ों व संगीत के अतुलनीय आश्चर्यों की ओर मोड़ने में मदद की। दून घाटी के जंगलों की सैर ने मेरे अंदर हिमालय के सौंदर्य को महसूस करने और उसकी ऊंचाईयों को नापने की जिज्ञासा भरी।

पर्वतारोहण का शौक मुझे कामेट,  नंदादेवी, लाहौल त्रिकोण, नन-कुन समेत कई बर्फानी चोटियों व सैकड़ों दुर्गम ट्रैकिंग रास्तों पर ले गया जिसने मुझे जिंदगी में बड़े उद्देश्‍यों हेतु जोखिम उठाने को प्रेरित किया।

हम देहरादून के तुनवाला गांव में खुले आकाश के थियेटर के नीचे पेड़ लगाने, गुलाब के फूलों की कटाई-छंटाई करने, युद्ध के दिनों में अनाज का उत्पादन बढ़ाने हेतु आलू लगाकर उखाड़ने, सैनिक अस्पताल में घायल सैनिकों के घरों में चिठ्यिां भेजने और स्कूल आर्केस्ट्रा में सितार बजाने में मिले आनन्द ने मुझे अपने छोटे दायरे से उठकर समाज के बड़े हितों के लिए जीना सिखाया। स्कूली दिनों में औद्योगिक क्रांति के इतिहास ने मुझे समाज में वंचितों व शोषितों के हक में सामाजिक न्याय का ताना-बाना बुनने के लिए ट्रेड यूनियन आंदोलन की जरूरत समझाई। स्कूल के खुले माहौल में एल्डस हक्सले की ‘द एंडस एंड मीनस’ किताब ने मुझे भारतीय शास्त्रों का अद्भुत ज्ञान सिखाया कि भौतिकता की ओर दौड़ती दुनिया में अनाशक्ति का सिद्धांत कितना जरूरी है? मुझे भारतीय शास्त्रीय संगीत से लेकर पश्चिमी बीथोवन, मोत्सार्ट व बाॅक बहुत पंसद थे। श्री जयाल अपने जीवन में मौजूद संजीदगी व कलात्मकता का श्रेय दून स्कूल में उपजे संस्कारों को देते हैं। 1935 के ‘फाउंडर डे’ पर स्कूल के पहले हेडमास्टर आर्थर फुट के शब्दों “Truly, we mean that the boys should leave the Doon School as members of an aristocracy, of service inspired by ideals of unselfishness, not by one of privilege, wealth or position” ने मेरे जीवन में मशाल का काम किया। मैंने उसी रोशनी में आज तक अपना सफर तय किया। मेरे आश्चर्य का ठिकाना ना रहा जब श्री जयाल ने अपनी पाकेट डायरी निकालकर सन् 2016 में मेरे लिए यह लाइनें पढ़ीं थीं। श्री जयाल बताते हैं कि जब मैं 1945 में दून स्कूल से बाहर आया तो प्रकृति के प्रति सौंदर्यबोध, पर्वतारोहण, जोखिम उठाने की ताकत और समाज सेवा मेरे भावी जीवन का ‘पाथेय’ थी

पर्वतारोही एअरफोर्स पाइलट नलनी 

मैं सन् 1951 में अपने विख्यात पर्वतारोही भाई मेजर नन्दू जयाल व दोस्त गुरूदयाल से प्रेरित हो ‘त्रिशूल’ की चोटी नापने गया। मैं त्रिशूल पर तो न चढ़ सका पर यही अभियान भारतीय पर्वतारोहण की कहानी की शुरुआत बना। हम दून स्कूल के लड़कों ने ही देश में पर्वतारोहण का इतिहास लिखा। पर्वतारोहण का शौक मुझे कामेट,  नंदादेवी, लाहौल त्रिकोण, नन-कुन समेत कई बर्फानी चोटियों व सैकड़ों दुर्गम ट्रैकिंग रास्तों पर ले गया जिसने मुझे जिंदगी में बड़े उद्देश्‍यों हेतु जोखिम उठाने को प्रेरित किया। मैं अब एअरफोर्स में फाइटर पायलेट था पर निर्दोशों पर बम बरसाना मेरे स्वभाव के खिलाफ था। मैंने कम्यूनिकेशन स्कवॉड्रन में तबादला लिया। यहां मुझे पं नेहरू, डा. राजेन्द्र प्रसाद और सी. राजगोपालाचार्य जैसी विभूतियों को उड़ाने का मौका मिला। मैंने दिल की आवाज सुनकर एअरफोर्स में 8 साल रहने के बाद 1956 में नौकरी छोड़ दी।

मैं जून 1960 में हिमाचल प्रदेश के दुर्गम क्षेत्र किन्नौर जिले में डिप्टी कमिश्नर तैनात हुआ। यह बहुत सुंदर इलाका है। यहां के 77 गांव 8 से 12 हजार फीट की ऊंचाई पर फैले हैं। किन्नौर मेरे जीवन में विस्मय और जीवन के सत्य को सीखने-सिखाने वाला बोध साबित हुआ। सही मायने में डिप्टी कमिश्नर कैसे बना जाता है यह मुझे किन्नौर ने ही सिखाया।

जून 1953 में जब एडमंड हिलेरी और तेन सिंग ऐवरेस्ट की चोटी पर चढ़े तो श्री जयाल एअरफोर्स की उस 9 सदस्यीय टीम का हिस्सा थे जो एवरेस्ट पर एअरफोर्स के लिब्रेटर विमान में स्टिल व सिने कैमरों के साथ उड़ी। विमान ने दो अलग-अलग दिनों में जमाने वाली ठंड -17 डिग्री F पर 30 से 32,000 फीट की ऊंचाई पर उड़ान भरी। विमान में कैमरों व टीम को ठंड में जाम होने से बचाने को बिजली के खास सर्किट व विशेष आक्सीजन सप्लाई की व्यवस्था की गई थी। इस अभियान के बाद फोटोग्राफर श्री जयाल एंड टीम ने पहली बार दुनिया को ऐवरेस्ट समेत कई हिमालयी चोटियों की दुर्लभ तस्वीरों की सौगात दी। इन कैमरों में कैद फुटेजों को बाद में ‘द कौंक्वेस्ट ऑफ ऐवरेस्ट’ नामक ब्रिटिश डाक्यूमेंटरी में प्रयोग किया गया। यह रोमांचक अभियान ब्रिगेडियर वी. जयाल की पुस्तक ‘चक्रधर जुयालः द ट्रैडिशन आॅफ हिस फैमिली’ में दर्ज है।

अंग्रेज साल में एक बार अपना कानूनी दावा मजबूत करने व तिब्बत बार्डर को सुरक्षित के उद्देश्य से यहां आते। यह बात पूरे क्षेत्र में अविश्वास और विद्रोह का कारण थी। मैंने गांव-गांव घूम कर टूटी-फूटी स्थानीय बोली में लोगों का विश्वास जीता। मैं समझ गया था कि ये लोग दोस्ताना स्वभाव के सीधे लोग हैं जो आपको अपने बराबर का मानकर सीधे आंखों में देख बात करना पसंद करते हैं। चावल की बीयर से मेहमानों का स्वागत करना इनकी संस्कृति है।

ट्यूटिंग, नेफा फ्रंट व आदि जन जाति

सन् 1956 में देश में इंडियन फ्रंटियर एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस शुरू हुई। पहाड़ों का मेरा प्रेम मुझे फ्रंटियर सेवा में ले गया। यहां मेरे जीवन का रूपांतरण हुआ। पं. नेहरू की पहल पर मानवविज्ञानी अंग्रेज पादरी डा. वैरियर एल्विन हमें व्याख्यान देने आये। जीवन के बुनियादी मूल्यों पर टिके इस व्याख्यान ने मुझे भेद भाव, अन्याय, अत्याचार, ऊंच नीच की हदों से आगे बढ़कर प्रेम, करुणा, सेवा और शाश्वत जीवन मूल्यों का बोध कराया। इस व्याख्यान ने मेरा जीवन ही बदल दिया। मैंने आदिवासियों व उनकी संस्कृति को सम्मान देना सीखा। अब पादरी एल्विन मार्गदर्शक के रूप में मेरे साथ खड़े थे। मैंने समझा कि आदिवासियों के साथ आदिवासी वाली सरल मानसिकता से ही काम करा जा सकता है। इस आन्तरिक बोध का असर हुआ कि मैं दीवानी ऐशो आराम में पला लड़का देश के सबसे दुर्गम क्षेत्र ट्यूटिंग नेफा-नार्थ ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी में नौकरी के बजाय सेवा के आन्तरिक भाव से असिस्टेंट पौलीटिकल आफिसर बनकर चला गया। यह सर्विस भारत सरकार की मिनिस्टरी ऑफ एक्सटरनल अफेयर्स के अधीन थी। नेफा में बिखरी जनसंख्या वाले कुछ गांवों में ‘आदि’ जाति के लोग बांस, घास व बेंत की झोपड़ियों में रहते थे। मैं एक चूती झोपड़ी में दो साल रहा, जिसमें सांप, बिच्छु और जोंक अनचाहे मेहमानों की तरह आते। उष्ण कटिबंधीय जंगलों का यह इलाका बहुत गर्म था। देश के अन्य हिस्सों के प्रति ऐतिहासिक शक की परम्परा व अंग्रेजों के साथ यदा-कदा विवाद यहां की पृष्ठभूमि थी। अंग्रेज साल में एक बार अपना कानूनी दावा मजबूत करने व तिब्बत बार्डर को सुरक्षित के उद्देश्य से यहां आते। यह बात पूरे क्षेत्र में अविश्वास और विद्रोह का कारण थी। मैंने गांव-गांव घूम कर टूटी-फूटी स्थानीय बोली में लोगों का विश्वास जीता। मैं समझ गया था कि ये लोग दोस्ताना स्वभाव के सीधे लोग हैं जो आपको अपने बराबर का मानकर सीधे आंखों में देख बात करना पसंद करते हैं। चावल की बीयर से मेहमानों का स्वागत करना इनकी संस्कृति है। मेरी ‘आदियों’ से दोस्ती हो गई। वह दिन भर मेरी झोपड़ी में अपनी समस्याओं के समाधान को आने लगे। यह जंगलों में रहकर वहीं से ताजा पानी, भोजन, हवा, पुलों व झोपड़ी के लिए बेंत, जड़ी बूटियां व फल लेते। इन आत्मनिर्भर लोगों की सीधी-सादी जिंदगी को देख मैं सोचता कि मैं नेफा किसके विकास को आया हूं? यह तो पहले से ही आत्मनिर्भर हैं। यह सामुदायिक जीवन जीते हुए जिंदगी के हर जरूरी पहलु का ख्याल रख उसी दायरे में अपने विवाद निपटाते हैं। मैं सोचता कि यहां के लोगों की आत्मनिर्भर जीवन शैली ने मेरा ही विकास कर दिया है। मैं क्या कोई भी इनका क्या विकास करेगा? यह सहृदय लोग पारंपरिक ज्ञान की धरोहर के चैकीदार हैं। यहां शहरों की शान शौकत नहीं है फिर भी ये कितने संतुष्ट हैं। ये सब कुछ प्रकृति से लेकर प्रकृति को वापस कर देते हैं। जमाखोरी व शोषण इनकी जीवन शैली नहीं है। हां यहां शिक्षा का प्रसार जरूर होना चाहिए लेकिन जबरदस्ती नहीं बल्कि इनके ही तौर तरीकों से इनको षिक्षित करना होगा। वही कोषिष मैंने की। मैं नेफा चार साल रहा, जहां मैंने असल में जिंदगी को पढ़ना-लिखना सीखा। मैंने सीखा कि लोगों के साथ घुल मिलकर उनके बारे में जानो। जितना तुम उनको जानोगे उतना ही अच्छा काम उनके लिए कर सकोगे। यही सीख मेरा मूलमंत्र बनी। दरअसल आदि जाति ने ही ब्यूरोक्रेट नलनी को जंगल व जीवन का असली संगीत और पूर्णता का अर्थशास्त्र सिखाया। मैं तेजू जिले में भी पॉलिटिकल आफीसर रहा।

किन्नौर, हिमालय के यादगार सात साल

मैं जून 1960 में हिमाचल प्रदेश के दुर्गम क्षेत्र किन्नौर जिले में डिप्टी कमिश्नर तैनात हुआ। यह बहुत सुंदर इलाका है। यहां के 77 गांव 8 से 12 हजार फीट की ऊंचाई पर फैले हैं। किन्नौर मेरे जीवन में विस्मय और जीवन के सत्य को सीखने-सिखाने वाला बोध साबित हुआ। सही मायने में डिप्टी कमिश्नर कैसे बना जाता है यह मुझे किन्नौर ने ही सिखाया। किन्नौर पाठशाला में मुझे बोध हुआ कि डिप्टी कमिश्नर बनने के लिए मुझे लोगों का सेवक बनना होगा ना कि मालिक। सेवक भाव में ही लोगों के दु:ख—दर्द व मुश्किलें समझकर उनकी सेवा की जा सकती है, जिसके लिए सरकार हमें नियुक्त करती है। किन्नौरी सीधे, सरल, ईमानदार, न्यायप्रिय व दयालु लोग हैं। तिब्बती शरणार्थियों की वजह से उस वक्त चीन के साथ सीमा विवाद चल रहा था। चीन ने परम्परागत व्यापार व पशुओं के लिए तिब्बत स्थित चारागाहों को बंद करने के मकसद से अपने बार्डर बंद करना शुरू कर दिया था। यह बात किन्नौरी लोगों के जीवन में आर्थिक कठिनाईयों का कारण बन रही थी। इन समस्याओं को मानवीय आधार पर सुलझाने के अनुभव ने मुझे परिपक्व व संवेदनशील बनाया। प्रधानमंत्री की पहल पर बना ढ़ेबर कमीशन उस वक्त देश में यह का दौरा कर रहा था कि किन लोगों व क्षेत्रों को अनुसूचित जाति व जनजाति में शामिल होना है और क्यों? ढ़ेबर कमीशन किन्नौर आया। मैं तब तक किन्नौर का भूगोल, इतिहास, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, संस्कृति व दर्शन जान चुका था। इसी वजह से मैंने किन्नौरियों के प़क्ष को कमीशन के सामने मजबूती से रखा कि ये लोग हिन्दु व बौद्ध दर्शन का मिश्रण लिए एक अनोखी संस्कृति के वाहक हैं। इनकी भाषा, संस्कृति और आर्थिकी अनोखी है। सो इनकी खास पृष्ठभूमि के कारण इनको अनुसूचित जनजाति में रखना उचित होगा। कमीशन ने मेरे तर्कों को समझकर इस क्षेत्र को अनुसूचित जनजाति क्षेत्र घोषित कर दिया। इस आरक्षण की वजह से आज किन्नौरी युवा देश में ऊंचे-ऊंचे पदों पर नियुक्त हैं। एक जिलाधिकारी के नाते मेरे लिए यह बड़ी खुशी की बात थी।

मैंने किन्नौर के विकास हेतु वहां की खास परिस्थितियों का हवाला दे सरकार के सामने सिंगल लाइन एडमिनिस्ट्रेशन की बात रखी। मेरा तर्क था कि जब जिले के सभी विभाग प्रशासनिक तौर पर जिलाधिकारी के अधीन होंगे तो प्रशासनिक निर्णय लेने व विकास योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन में आसानी होगी। सरकार ने मेरी बात मान किन्नौर में सिंगल लाइन सिस्टम लागू कर डिप्टी कमिश्नर को लेफ्टिनेंट गर्वनर के अधीन कर दिया। अब मेरे पास सभी विभाग प्रमुखों की चरित्र पंजिका लिखने का अधिकार था। यह तीसरी पंचवर्षीय योजना का वक्त था। हिमाचल प्रदेश तब केन्द्रशासित प्रदेश था। किन्नौर जिले हेतु सरकार के पास बजट नहीं था। मैं योजना आयोग के मुखिया से मिला। मैं किन्नौर के सभी 77 गांवों में घूम चुका था- कहीं घोड़ा, कहीं पैदल, कहीं गाड़ी, जहां जैसे जरूरत पड़ी मैं वैसा कर सभी गांवों की जानकारियां ले चुका था। इस आधार पर मैंने एक पंचवर्षीय योजना बना बजट मांगा। मैंने योजना आयोग को किन्नौर आने का न्यौता दिया। योजना आयोग ने किन्नौर आकर इस धरालती योजना को समझा। वह बहुत प्रभावित हुए। मुझे अपनी मांग के अनुसार पैसा मिला। अब मैं योजना के क्रियान्वयन में जुट गया। मेरी सोच थी कि यहां के लोगों की जमीन इनके पास ही रहनी चाहिए। मैंने प्रस्ताव पास कराया कि कोई भी बाहरी व्यक्ति किन्नौर में जमीन की खरीद-फरोख्त नहीं कर सकता। इसका दूरगामी परिणाम निकला। जमीनों के खरीद-फरोख्त के इस युग में आज भी किन्नौरियों की जमीन उनके हाथों में है। यही यहां की समृद्धि का राज है। मैंने किसानों को जमीनों का आबंटन किया। किन्नौर आज देश के खुशहाल इलाकों में एक है। इसके दो कारण हैं- एक तो जमीन बेचने पर लगी पाबंदी और दूसरा उस वक्त खेती व फलदार पौधों के रोपण की शुरुआत ने किन्नौर को मशहूर फलपट्टी में बदलकर इसे देश की सबसे बढ़िया प्रजाति के सेब, बादाम, अंगूर आदि का निर्यातक बना दिया। इस काम में मुझे यहीं के एक कृषि वैज्ञानिक ने सहयोग दिया। उसने यहां की जरूरतें समझ कृषि संस्थान खुलवाने में अहम भूमिका निभाई। इस संस्थान ने किन्नौर के विकास की कहानी को नया मोड़ दिया। उस कृषि विज्ञानी ने प्राकृतिक रूप से पैदा होने वाली प्रजातियों को बढ़ावा दिया। लोगों ने इन प्रजातियों को खेतों में जगह दी क्योंकि यहां बिना बारिश व बढ़िया धूप में बहुत अच्छी प्रजाति का सेब उगता है। वैज्ञानिकों, काश्तकारों व प्रशासनिक अमले के साथ काम करने का परिणाम आज किन्नौर की समृद्धि के रूप में दिखता है।

किन्नौर का कायाकल्प एक ‘पू’ गांव के उदाहरण से समझ सकते हैं। यहां गांव वालों व तिब्बत के बीच भेड़, बकरियों व कपड़़ों की अदला-बदली का व्यापार होता था। गांव का बड़ा क्षेत्र बिना पानी का था। मैंने हिमाचल के चीफ इंजीनियर को समझाया कि गांव में पानी आयेगा तो इसे फलदार घाटी में बदला जा सकता है। इससे गांव में समृद्धि आयेगी। मेरी देखरेख में एक बर्फानी नदी से ‘पू’ में पानी आया। सिंचाई हेतु नहरें बनीं। उद्यान विभाग ने एक ‘बगीचा कालोनी’ बनाई जिसमें काश्तकारों को एक-एक एकड़ जमीनें आंबटित कीे गईं। सरकारी विशेषज्ञों ने किसानों को तकनीकी सहायता दी। बगीचा कालोनी में सेब, आड़ू, नाशपती, चेरी आदि के पेड़ लगे। सबने मेहनत की। कुछ सालों बाद इस उष्ण कटिबंधीय इलाके में फलों के बगीचे तैयार हो गये। दिल्ली के व्यापारी काश्तकारों को फलों के बहुत कम दाम देते। वे यहां से चिलगोजा 5-10 रू. किलो खरीदकर दिल्ली में 60-70 रू़ किलो बेचते। मैंने किसानों के ‘फैडरेशन’ बनाकर नया प्रयोग किया। मैंने किसानों से 60-70 रू़ किलो चिलगोजा खरीदकर सरकारी ट्रकों से दिल्ली भेजा। इससे लोग जागरूक हुए और आढ़तियों को मजबूरी में किन्नौर में ही दिल्ली के भाव पर फल खरीदने पड़े। किन्नौर के हर गांव के विकास की यही कहानी है जिसमें किसानों की मेहनत, प्रशासन की दूरदर्शिता, गांव की जरूरत के मुताबिक बनी योजना और टीम भावना मुख्य है। आज किन्नौरी काश्तकार लाखों रूपये के फल सालाना बेचते हैं। पेड़ों पर फूल आते ही आढ़ती किसानों को एडवांस दे जाते हैं। यहां लोग खेती को इज्जत से देखते हैं।

मैंने हर गांव की जरूरतें जानकर पानी, सफाई व्यवस्था, स्कूल, डिस्पेंसरी व पंचायत में आयुर्वेदिक दवाखाने खुलवाने शुरू किये। मैंने सुनिश्चित किया कि कर्मचारी अपनी तैनाती की जगहों पर रहकर तय समय में काम पूरा करें। किन्नौर में खेती, स्वास्थ्य, स्कूल व अन्य जरूरी चीजों को सुधारते हुए गांवों में रोजगार पैदा करना मेरी प्राथमिकता थी क्योंकि यही टिकाऊ विकास की बुनियाद है।

गांवों में घूमकर मुझे समझ आया कि यहां स्कूल नहीं हैं। सो हर गांव में एक व बड़े गांवों में एक से ज्यादा प्राइमरी स्कूल, तहसील स्तर पर मिडिल व सब डिवीजन स्तर पर आवासीय हाईस्कूल खोलने की योजना बनी। इस योजना को जमीन पर उतारकर शिक्षा के प्रचार-प्रसार की शुरुआत हुई। यह क्षेत्र अनुसूचित जनजाति घोषित हो चुका था जिससे यहां के नौजवान केन्द्रीय सेवाओं में आए। बाकी लोग खेती कर समृद्ध हैं। मैंने तय किया कि हर परिवार का सामाजिक व आर्थिक खाका प्रशासन के पास मौजूद हो। प्रत्येक गांव का परिवार रजिस्टर तैयार हुआ। इसमें परिवार के सदस्य, सम्पति, जरूरतों, खेती-बाड़ी, जानवरों, जिम्मेदारियों, चारागाह की उपलब्धता, सिंचाई व आजीविका के साधनों आदि का सामाजिक-आर्थिक नक्षा तैयार किया। सार्वजनिक सुविधाओं- स्कूल, अस्पताल, पानी, सिंर्चाइं के साधनों, संचार, आय बढ़ाने वाले तरीकों, बागवानी, सब्जियों, स्थानीय शिल्प व उसके विपणन के तौर तरीकों का पूरा ब्यौरा रात-रात बैठकर तय सीमा में जुटाया गया। इस आधार पर लोगों को चार श्रेणियों में बांटा गया। पहली व दूसरी श्रेणी में सेब व चिलगोजा उगाने वाले लोग थे। तीसरी व चैथी श्रेणी के लोगों की पारिवारिक स्थितियों के अध्ययन के बाद मैंने प्रशासन को गांवों में जाकर गांवों की जरूरतें जानने का आदेश दिया कि गांव वाले प्रशासन के पास नहीं आएंगे और ऐसा हुआ भी। मैंने हर गांव की जरूरतें जानकर पानी, सफाई व्यवस्था, स्कूल, डिस्पेंसरी व पंचायत में आयुर्वेदिक दवाखाने खुलवाने शुरू किये। मैंने सुनिश्चित किया कि कर्मचारी अपनी तैनाती की जगहों पर रहकर तय समय में काम पूरा करें। किन्नौर में खेती, स्वास्थ्य, स्कूल व अन्य जरूरी चीजों को सुधारते हुए गांवों में रोजगार पैदा करना मेरी प्राथमिकता थी क्योंकि यही टिकाऊ विकास की बुनियाद है।

श्री जयाल किन्नौर में सात साल रहे। सन् 1960 में ही उन्होंने वहां अपनी दूरदर्शिता, नेकनीयती व सबको साथ लेकर चलने की कार्यशैली से ग्रामीण विकास का ऐसा मॉडल खड़ा कर दिया, जिसकी वकालत बरसों बाद नोबुल पुरूस्कार विजेता अर्मत्य सेन ने सन् 1998 में की। अर्मत्य सेन ने शिक्षा व स्वास्थ्य में सुधार लाकर लोगों का जीवन स्तर बदलना चाहा पर श्री जयाल ने किन्नौर में यह उन हालतों में किया जब वहां सिर्फ 6 माह ही काम हो सकता था। बारिष व बर्फबारी के कारण बर्फ के 6 महीनों में पेपर वर्क होता। यदि कोई दिक्कत होती तो वह डिस्ट्रिक्ट प्लानिंग कमेटी की बैठक करते, जिसमें सभी विभागाध्यक्ष, गांव वाले व प्रधान आते। बैठक में क्रियान्वयन सम्बधी दिक्कतों पर बात होती। यहां एक साल एडवांस में योजना बनाने की परिपाटी थी, जिससे प्रषासन के पास उसकी समीक्षा, उसमें बदलाव व लोगों के सुझाव लेने का समय होता। एक नेक डिप्टी कमिश्‍नर की अगुवाई में सिर्फ सात सालों की मेहनत से आज किन्नौर देश का समृद्ध इलाका है। इसका कारण सिंगल लाइन एडमिनिस्ट्रेशन, राजनैतिज्ञों की ना के बराबर दखलबाजी, डिप्टी कमिश्नर को काम हेतु पूरा समय मिलना व पूरे जिले का टीम भावना से काम करना था।

 

मेरी मुलाकात एक जापानी महिला रैकू तेरेसावा व हिरोमी निम्मी से हुई। वह हर साल किन्नौर और अरूणाचल घूमने आती हैं। किन्नौर की खुशहाली देख उन्होंने स्थानीय लोगों से पूछा तो उन्हें पता चला कि सालों पहले एक देवता सरीखा डिप्टी कमिश्नर यहां आया था। उसकी कहानी हमने अपने पुरखों से सुनी है कि कैसे गांवों में घूमकर उसने यहां की जरूरतें समझकर विकास किया। उसने ही स्कूल, अस्पताल, पानी, जमीनों का आबंटन, फलदार पेड़ों को उगाने की शुरुआत कराई। उसी के नियमों के कारण आज हमारी जमीनें हमारे हाथों में हैं और हम अनुसूचित जनजाति में शामिल हैं। उस बंदे का नाम श्री एन.डी. जयाल है। वह तो इस घाटी के भगवान ही निकले! ऐसे ही अनुभव दून स्कूल में पढ़े एक लड़के जोगेश्वर सिंह के हैं जो यहां 1983 में वहां कलक्टर बनकर गये। उस कलक्टर के शब्द हैं कि श्री जयाल आज किन्नौर की खूबसूरत वादियों में एक ‘जिंदा कहानी’ के रूप में लोगों के दिल दिमाग और वहां की समृद्धि के रूप में रचे बसे हैं। ऐसे अनुभव मैंने सैकड़ों लोगों से सुने। किसी इंसान के जीवन में सफलता का इससे सुंदर और मुकाम क्या हो सकता है कि वह अपने कामों की बदौलत लोगों के दिल दिमागों में एक जीवंत किवदंती बन जाए? श्री जयाल मानव संसाधन व टिकाऊ विकास की कहानी के जीवंत नायक की तरह गंधर्वों की भूमि में खुशहाली व हरियाली में रचे बसे हैं। काश! श्री जयाल की तरह के कुछ और नायक इस देश को मिले होते? श्री जयाल को अंत में किन्नौर में वह सब देखना पड़ा जो हमारी राजनैतिक व्यवस्था में एक नायक को झेलना होता है। राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं के कारण उन्हें वापस भेज दिया गया। जनता ने बहुत विरोध किया पर क्या कभी जनता की सुनी गई? वह किन्नौर की वादियों में अपने खुबसूरत रंग भरकर दिल्ली चले आये।

प्राकृतिक संरक्षणः केेन्द्र सरकार वन एवं वन्य जीव विभाग 

किसी दैवीय योजना के तहत श्री जयाल सन् 1976 में किन्नौर से भारत सरकार में चले आये। यहां वह स्वास्थ्य एवं परिवार नियोजन, शिक्षा, योजना आयोग, कृषि व पर्यावरण मंत्रालय में रहे। उनका सबसे यादगार काम पर्यावरण, वन एवं वन्य जीवों की संरक्षण हेतु की गई पहल है। शिक्षा मंत्रालय में वह यूनेस्को के इंचार्ज थे। इससे उन्हें यूनेस्को हेतु एक लिंक मिला जिसने पर्यावरण मंत्रालय के दिनों में कई महत्वपूर्ण कदम उठाने में मदद की। श्री जयाल बताते हैं कि सत्तर के दशक में पर्यावरण शब्द प्रचलन में नहीं था और ना कोई इसका अर्थ जानता था। मैं तब कृषि मंत्रालय के वन एवं वन्य जीव विभाग में ज्वांइट सैक्रेटरी था। यहां पहाड़ों के प्रति मेरी दीवानगी काम आई क्योंकि प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी यहां ऐसे व्यक्ति को चाहती थी जिसका दिल व दिमाग सही जगह पर हो क्योंकि उस वक्त जंगल व वन्य जीव चैंकाने वाली गति से खत्म हो रहे थे। मेरा ध्यान विनाष से संरक्षण की सोच पर था। इसी वक्त प्रकृति प्रेमी प्रधानमंत्री ने वन नीति में बदलाव लाकर सुनिश्चित किया था कि जंगलों के दोहन के बजाय संरक्षण की नीति को अपनाया जाये। मुझे डा. सालिम अली, प्रसिद्ध लेखक जफर फतेह अली जैसे कई अनुभवी लोगों का सानिध्य मिला। कृषि मंत्रालय के दिनों में मैं IUCN के लिए चयनित हुआ। IUCN प्राकृतिक संरक्षण हेतु विश्व के सर्वोच्च संस्थानों में एक है। यहां मुझे दुनिया के सर्वोच्च प्रतिभाषाली लोगों से सीखने का मौका मिला। हमने विष्व में प्राकृतिक संरक्षण हेतु World Conservation Strategy का मसौदा तैयार किया जिसमें दुनिया के हर देश के पर्यावरण संरक्षण मसलन – साफ पानी, हवा, हरे भरे जंगलों व खेत खलिहानों आदि को संरक्षित रखने हेतु नीति निर्देश हैं। सन् 1980 में श्रीमती गांधी दुबारा प्रधानमंत्री बनीं। उनका पूरा ध्यान पर्यावरण संरक्षण पर टिका था। प्रधानमंत्री ने विज्ञान व तकनीकी मंत्रालय के अन्तर्गत नारायण दत्त तिवारी की अध्यक्षता में एक हाईपावर कमेटी बनाई। प्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक डा.स्वामीनाथन इसके उपाध्यक्ष व मैं इसका सदस्य सचिव था। कमेटी का काम देष के पर्यावरण को सुधारने हेतु कार्य योजना बनाना था। कमेटी ने नवम्बर 1980 की रिपोर्ट में संस्तुति दी कि केन्द्र में प्रधानमंत्री के अधीन अलग से पर्यावरण मंत्रालय बनाया जाये। और ऐसी ही व्यवस्था राज्यों में भी हो। इसे स्वीकारा गया। ऐसे देश में पर्यावरण मंत्रालय अस्तित्व में आया।

पर्यावरण मंत्रालय की स्थापना

प्रधानमंत्री ने हाईपावर कमेटी की संस्तुति को गंभीरता से लिया। मुझे ज्वांइट सैक्रेटरी बनाकर पर्यावरण मंत्रालय की स्थापना का समग्र रोड मैप तैयार करने की जिम्मेदारी दी गई। मैं पर्यावरण मंत्रालय में 1980 से 1983 तक रहा। इस दौरान हुई पर्यावरण संरक्षण की नीतिगत शुरुआत का असर आज देश में देखा जा सकता है। इसमें किसी भी प्रोजेक्ट की स्वीकृति हेतु ‘स्वतंत्र पर्यावरणीय प्रभाव आंकलन’ संस्तुति को आवश्यक शर्त बनाना व देश भर में पर्यावरणीय विकास हेतु आवश्यक वैज्ञानिक संस्थानों की स्थापना का काम शामिल है। यह निर्णय पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक मील का पत्थर है। श्री जयाल नम्रता से स्वीकारते हैं कि मेरे पास पर्यावरण व विज्ञान का पूरा ज्ञान नहीं था पर मेरा दिल सही जगह पर था इसलिए मैंने इस क्षेत्र के अनुभवी लोगों की मदद ली। उनकी सूची में डा. सालिम अली, डा. वन्दना शिवा, डा. सतीश व डा. शांति नायर, डा. अनिल अग्रवाल, पर्यावरण पत्रकार ऊषा राय जैसे कई लोग थे। सबने जनहित में ‘नौकरषाही ईगो’ से मुक्त इस नेकदिल इंसान की दिल खोलकर मदद की। इस वक्त केरल में पष्चिमी घाट के उश्णकटिबंधीय जंगलों में साइलैंट वैली बांध बनना प्रस्तावित था। वहां बांध का बहुत विरोध हो रहा था। श्री जयाल बताते हैं कि मैं इसका जायजा लेने केरल गया। डा. षांति व डा. सतीष नायर ने मुझे प्रोजेक्ट की जमीनी जानकारियों पर तैयार स्लाईडें दिखाईं। इनके आधार पर मैंने इस प्रोजेक्ट पर प्रधानमंत्री से एक हाई पावर कमेटी बनाकर जमीनी सच्चाईयां एकत्र करने का आग्रह किया। प्रधानमंत्री ने डा.एम.जे.के. मेनन की अध्यक्षता में एक हाईपावर कमेटी बनाई। देष में यह पहला मौका था कि जब किसी उच्चस्तरीय कमेटी की रिपोर्ट पर कोई बांध प्रधानमंत्री ने बंद करने का निर्णय लिया हो। इससे मेरे मन में एक बात बैठ गई कि किसी बात की गहराई को फाईलों में डूबने के बजाय लोगों से सीधे संवाद कर ही उसकी थाह में जाया जा सकता है। सीधे संवाद की कला ने मुझे अनुभवी, संवेदनशील, परिपक्व और उत्साही बनाया। मैं जहां भी अटकता चुपचाप उस क्षेत्र के विशेषज्ञों व आम आदमी से बात करने पहुंच जाता। प्रधानमंत्री की पहल पर तय किया गया कि देश में सटीक जानकारी देने वाले वैज्ञानिक संस्थानों की कमी को पूरा करके ही पर्यावरण संरक्षण की सोच पुख्ता की सकती है क्योंकि भविश्य में यही संस्थान जनमानस तक वैज्ञानिक प्रमाणों पर आधारित पर्यावरणीय जानकारियों का प्रचार-प्रसार कर सकेंगे। मैं प्रसिद्ध वैज्ञानिक डा. माधव गाडगिल से मिला, जिनकी देखरेख में पर्यावरण सम्बधी शोध हेतु इंडियन इंस्टिटयूट ऑफ सांइस बैंगलोर की स्थापना की गई। भारत सरकार ने पर्यावरणीय शिक्षा के प्रचार-प्रसार एवं शोध कार्यो हेतु वाइल्ड लाइफ इंस्टिटयूट ऑफ इंडिया देहरादून, इन्वायरनमेंटल एजूकेषन एंड इन्फोरमेशन सेंटर अहमदाबाद, जी.बी.पंत इंस्टिट्यूट ऑफ हिमालयन इन्वायरमेंट एंड डवलपमेंट कोसी कटारमल अल्मोड़ा आदि कई संस्थानों की स्थापना की। इसी वक्त पहली बार यूनेस्को द्वारा प्रतिपादित बायोस्फेयर रिजर्व की पद्वति देश में अपनाई गई। यह भी निर्णय हुआ कि देश के 33 प्रतिशत हिस्से पर जंगल होंगे।

सन् 1982 में मैंने सुना कि नंदा देवी क्षेत्र में गांव वाले जानवरों के साथ भीतरी कोर जोन में घुसे हैं। इस खबर ने मुझे भावी खतरे का संकेत दिया। मैंने प्रधानमंत्री श्रीमती गांधी व डा. सालिम अली की मदद से जैव विविधता संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण काम किया। मैंने उत्तरप्रदेश सरकार के समक्ष प्रस्ताव रखा कि नंदा देवी क्षेत्र व फूलों की घाटी को नेशनल पार्क बनाकर संरक्षित करा जा सकता है। ऐसे ही हिमाचल प्रदेश में ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क कुल्लु, सिक्किम में कंचनजंघा नेशनल पार्क और नामदाफा नेशनल पार्क नार्थ ईस्ट बनवाने की शुरुआत हुई। इस दौरान मैं डा. सालिम अली के साथ लद्दाख गया। जम्मू काष्मीर की तासो मोरारी झील क्षेत्र में कुछ दुलर्भ वन्य जीव प्रजातियों को देख मैंने सरकार से उस क्षेत्र को नेषनल पार्क में बदलने का आग्रह किया। इस तरह मेरी पहल पर 6 नेषनल पार्क बने। इनमें से कुछ बाद में बायोस्फेयर रिजर्व घोशित हुए। इनमें से नंदा देवी व फूलों की घाटी नेशनल पार्क को 1988 व ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क को 2014 में यूनेस्को द्वारा अपनी विष्व धरोहर सूची में षामिल किया गया। इसके अलावा तत्कालीन प्रधानमंत्री की मदद से जैवविविधता के बेशकीमती भंडार साइलेंट वैली प्रोजेक्ट, ग्रेट निकोबार आइलैंड रिजर्व व मन्नार की खाड़ी में स्थापित देश का पहला समुद्री राष्ट्रीय पार्क बनाने का श्रेय भी श्री जयाल के हिस्से आया। पर्यावरण मंत्रालय व योजना आयोग में नीतिगत स्तर पर किये कामों के बावत वह कहते हैं कि उम्र के कारण मेरी स्मृति कम हो गई है। अब कुछ याद नहीं है पर एक बात याद है कि मुझे डा. सालिम अली व प्रकृति प्रेमी प्रधानमंत्री श्रीमती गांधी की मदद से जंगलात विभाग की सोच को जंगलों के शोषण से संरक्षण की ओर मोड़ने में सफलता मिली। मेरा मानना है कि प्राकृतिक संसाधनों को संरक्षित कर ही धरती को सुरक्षित रखा जा सकता है। उसी समय सामाजिक वानिकी के तहत लगने वाले यूकेलिप्टिस व पापुलर की खेती को नियंत्रित किया गया।

सत्तर के दशक में उत्तराखंड के जंगलों में चले चिपको आन्दोलन के दौरान मैं स्थानीय लोगों व प्रशासन से पल-पल की खबर ले रहा था। मैंने चिपको आन्दोलन पर कुमांऊ डिवीजन के वनसंरक्षक की रिपोर्ट का संज्ञान लिया। उस ईमानदार भगवान के बंदे जंगलात अधिकारी ने लिखा था कि उत्तराखंड के जंगलों में अब और विनाश की गुुंजाइश नहीं बची है। इस रिपोर्ट को आधार बनाकर मैंने प्रधानमंत्री और डी.जी.पी. जंगलात को र्निभीकता से लिखा कि अब ज्यादा दिनों तक पहाड़ों की आवाजों को नकारा नहीं जा सकता। हिमालय को बचाने को कुछ निर्भीक निर्णय लेने होंगे क्योंकि हिमालय देष की जीवन रेखा है। प्रधानमंत्री ने तत्काल मुद्दे की गंभीरता समझ एक उच्चस्तरीय कमेटी बनाई। भारत सरकार ने ऐतिहासिक निर्णय लेकर हिमालय में 1000 फीट से ऊंचाई पर हरे पेड़ों का कटान प्रतिबंधित कर दिया। यह भी तय हुआ कि प्राकृतिक कारणों से गिरने वाले पेड़ों का प्रयोग ही गांव वाले अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु करेंगे। कुछ संवेदनशील लोगों की समझ, दूरदर्शिता और निर्भीकता जिसमें पेडों से चिपकने वाली औरतें, सामाजिक कार्यकर्ता, जंगलात-उत्तर प्रदेश-भारत सरकार के कुछ संवेदनशील अधिकारी, मीडिया की स्पष्ट, तथ्यपरक और निर्भीक रिर्पोंटिग और निश्चित तौर पर पर्यावरणीय मुद्दों के प्रति संवेदनशील प्रधानमंत्री की समन्वित कोशिशों से मैं गांवों की आवाजों को मंत्रालय के गलियारों तक ले जाने में सफल हुआ। वह भावशून्य होकर कहते हैं कि कुसुम! जनहित व प्राकृतिक संरक्षण की अच्छी नीतियां-रीतियां तो बनती हैं पर उनका ईमानदार क्रियान्वयन सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। आज इन नियमों का कितना पालन हो रहा है यह तो ईश्वर ही जानता होगा पर पहाड़ की महिलाओं के चिपको आन्दोलन ने देष ही नहीं दुनिया को भी पर्यावरण को समझने के लिए एक नई दृष्टि दी।

दुनिया भर में पत्रकार स्व. कुंवर प्रसून के दिये नारे क्या है जंगल के उपकार, मिट्टी पानी और बयार की गूंज हुई, जो चिपको आंदोलन का पर्याय बन गया। रैणी व हेंवलघाटी में चले चिपको आंदोलन को सरकारी मान्यता मिली और जंगलों का कटान रोक दिया गया। इसी वक्त प्रकृति के संरक्षण हेतु भारत के संविधान में प्रत्येक नागरिक के कर्तव्य एवं जिम्मेदारियों का प्राविधान जोड़ा गया। मैं उस समय वन्य जीव संरक्षण में निदेशक भी था। जिस वजह से कई नियमों द्वारा जन्तुओं एवं वनस्पतियों की कई प्रजातियों का दोहन या तो पूरी तरह रोका गया या उन पर सख्ती से नियंत्रण किया गया। जिन्हें बाद में कई राष्ट्रीय व अंतराष्ट्रीय कानूनों द्वारा खतरे की श्रेणी में आने वाली प्रजातियां घोषित कर संरक्षित करने का प्रयास किया गया। पर्यावरण मंत्रालय ने संस्तुति दी कि आर्थिक फायदों हेतु चीड़ के पेड़ लगाने की परंपरा पर्यावरण हित में नहीं है इसलिए चीड़ को चैड़ी पत्ती वाले बांज के जंगलों से प्रतिस्थापित करना उचित होगा। तब से मिश्रित प्रजाति के पेड़ों के रोपण को बढ़ावा मिला और चीड़ वन विभाग की नर्सरियों से गायब होता गया। इसी वक्त देश में पर्यावरण एक महत्वपूर्ण शब्द बन कर उभरा, जिसकी मजबूूत धुरी पर ही विकास के पहिये को घूमने की आजादी मिली। इसी दौर में मंत्रालय ने डा. शिवा व अवधेश कौशल के नेतृत्व में दून घाटी में चले आंदोलन की आवाज सुनकर देहरादून की चूना खदानों को बंद कराकर दून घाटी को भावी विनाश से बचाया था। श्री जयाल इन बातों का श्रेय तत्कालीन डी.जी. फारेस्ट, अपने विशेषज्ञ मित्रों और तत्कालीन प्रधानमंत्री को देते हैं जो उनकी बातों को गौर से सुनकर बड़े निर्णयों का मार्ग प्रशस्त करते थे। एक नौकरशाह होने के बावजूद उनका मानना है कि लोकतंत्र में सही निर्णय लेने हेतु जनता की आवाज को ध्यानपूर्वक सुनना होगा। वह स्वस्थ लोकतंत्र हेतु जनमत को उचित स्थान देना विकास की एक स्वस्थ रणनीति मानते हैं। अब श्री जयाल प्रमोशन पर योजना आयोग में सलाहकार बन कर चले गये। श्री जयाल की मंथर यात्रा एक सुंदर उदारहण है कि कैसे एक व्यक्ति की दूरदर्शी पर्यावरणीय सोच पहले देश की नीति बनी और आज वह यहां की रीति बन चुकी है। आज जब देश में सेंचुरी, नेशनल पार्क, बायोस्फेयर रिजर्व व यूनेस्को द्वारा घोषित दो विष्व धरोहरों के माध्यम से पर्यावरण, वन्य जीवों और मौसम बदलाव के मुहाने पर बैठी मानव सभ्यता को बचाने की मुहिम चल रही है तो मुझे इसका श्रेय प्रधानमंत्री श्रीमती गांधी व श्री जयाल को देने में रत्ती भर भी संकोच नहीं है जिन्होंने सालों पहले इस खतरे का अहसास कर उस दौर में ही फौरी कदम उठाने की शुरुआत कर दी थी जब कोई पर्यावरण शब्द का अर्थ भी नहीं जानता था।

योजना आयोग में मेरा अनुभव

अब मैं पर्यावरण मंत्रालय के व्यापक अनुभवों के साथ योजना आयोग में था। सन् 1990 में पर्यावरणविद् डा. वन्दना शिवा ने देश के कई हिस्सों में जमीन के अंदर पानी के गिरते स्तर पर शोध किया। वह उसके आधार पर भविष्य में पानी के संकट की चेतावनी दे रही थीं। उन्होंने महाराष्ट्र के गन्ना किसानों को आगाह किया कि गन्ना जमीन का पानी खत्म कर रहा है। इससे महाराष्ट्र पानी के संकट से जूझेगा। डा. षिवा ने सावधान किया कि भविष्य में तीसरा विश्वयुद्ध पानी के लिए होगा। मैंने इस चेतावनी की गहराई समझ महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री को गन्ने की खेती बंद करने की सलाह दी। लेकिन मुझे नहीं सुना गया। गन्ना वहां की मुख्य फसल बन गई। परिणाम हुआ कि आज महाराश्ट्र की राजनीति चीनी मिलों से नियंत्रित होती है। वहां पानी के लिए त्राहि-त्राहि मची है। मैंने IUCN की आम सभा में ‘भारत में पानी का संकट’ नामक एक रिपोर्ट पेश की जिसका संज्ञान प्रधानमंत्री श्रीमती गांधी ने लेकर जल मंत्रालय से टिप्पणी चाही। उस वक्त तथ्यों की अनदेखी की गई। परिणाम हुआ कि एक महत्वपूर्ण भावी जल संकट जिस पर अधिकारियों की दूरदर्षिता से ठोस राष्ट्रीय नीति बन सकती थी वह नहीं बनी। आज पूरे देश में पानी का कितना संकट है, यह बात किसी से छिपी नहीं हैं?

सन् 1980 के दशक में वाणिज्य मंत्रालय अंडमान निकोबार व लक्षदीप समूह के उष्ण  कटिबंधीय जंगलों को काटकर उसे हांगकांग की तर्ज पर एक्सपोर्ट-इंर्पोट सेंटर बनाने की योजना बना रहा था। यह द्वीप समूह धरती पर सबसे समृद्ध जैवविविधता का भंडार हैं। यहां घास, लकड़ी, पानी, जड़ी बूटियां, फलों का अकूत भंडार है, जिसका कुछ ही हिस्सा वैज्ञानिक खोज पाये हैं। किसी उत्साही वन अधिकारी ने मिडिल अंडमान के मिश्रित जंगलों को काटकर सागौन के पेड़ लगाये। इससे यहां की स्थानीय प्रजातियां खत्म हो गईं। मैं इस खबर से व्यथित था। मैंने डा. मेनन की मदद से एक रिपोर्ट योजना आयोग में प्रधानमंत्री राजीव गांधी के समक्ष पेश की कि ऐसी विकास योजना ना बनाने में ही इन द्वीपों का भला है। इस पर प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में एक हाईपावर आईलैंड डवपमेंट ऑथोरिटी बनी। इसका काम यह जांच करना था कि क्या यह प्रोजेक्ट द्वीप की जैवविविधता खत्म कर रहे हैं? देष की कैबिनेट के साथ मैं भी इसका सदस्य था। मैंने ट्रापिकल जंगलों के अनुभवी वैज्ञानिक डा. सतीष नायर के साथ पूरे द्वीप समूह का सर्वेक्षण कर यहां की प्रजातियों के बारे में चैंकाने वाली जानकारियां हासिल कीं। डा. नायर ने वैज्ञानिक, सामाजिक, आर्थिक सांस्कृतिक पहुलुओं को समेटेते हुए रिपोर्ट बनाई जिसको आधार बनाकर मैंने मजबूती से कहा कि विकास की यह परिभाशा सर्वथा अनुचित है। मेरी दलील थी कि निकोबार द्वीप समूह को बायोस्फेयर बना कर ही उसे विनाश से बचाया जा सकता है। मेरा सुझाव था कि अरुणाचल प्रदेश, अंडमान निकोबार द्वीप समूह व दक्षिणी पश्चिमी घाट के जंगल भूमध्यरेखा से नजदीक होने के कारण जैव विविधता के लिहाज से दुनिया के सबसे समृद्ध जंगलों में एक हैं, इसलिए इनका विनाश रोकना ही होगा। कमेटी ने मेरी दलीलों को माना और इस तरह एक जिद्दी, ईमानदार मगर सच के लिए प्रतिबद्ध नौकरशाह की दूरदर्शिता और संवेदनशील प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सोच के कारण निकोबार द्वीप समूह बायोस्फयेर रिजर्व बनकर हमेशा के लिए संरक्षित हो गया।

इन्टैकः प्राकृतिक धरोहरों के संरक्षण हेतु एक कदम

सन् 1985 में श्रीमती गांधी ने देष में कला, सांस्कृतिक विरासत व धरोहरों के संरक्षण हेतु मील का पत्थर रखा। मुझे काॅमनवेल्थ देशों में सांस्कृतिक व ऐतिहासिक धरोहरों को बचाने हेतु समर्पित लंदन व स्काटलैंड स्थित एक गैर सरकारी नेचुरल ट्रस्ट के बारे में जानकारी लेने भेजा गया। मेरी रिपोर्ट पर सन् 1985 में देश में ‘इंटैक’-इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हैरिटेज की स्थापना हुई। श्रीमती पुपुल जयकर उसकी अध्यक्ष बनीं। मैं 1985 में रिटायरमेंट के बाद ‘प्राकृतिक धरोहर’ शाखा का महानिदेशक बनकर इंटैक की स्थापना में जुट गया। मैंने महसूस किया कि देश में अलग-अलग विशयों पर लोगों को जागरूक करने हेतु सरल भाषा में ब्रोशर, बुकलेट व किताबों की जरूरत है। सुंदरलाल बहुगुणा, डा. वन्दना शिवा, श्री एन.एन.बोरा, डा. सतीश नायर, प्रो. विनोद गौड़, इंदिरा रमेश जैसेे कई लोग इस अभियान में जुड़े। इस टीम ने बड़े बांधों के खतरे, जैवविविधता पर मंडराते संकट, न्यूकलियर ऊर्जा के प्रभाव, पानी का संकट जैसे हिमालयी विशयों पर प्रचार-प्रसार सामग्री तैयार कर देष भर में जानकारियां बांटी। इंटैक नर्मदा बचाओ आंदोलन की मेधा पाटकर व टिहरी बांध विरोधी आंदोलन की कानूनी लड़ाई लड़ रहे बी.डी.सकलानी व सुन्दर लाल बहुगुणा के साथ खड़ा रहा। सन् 1991 में हिमालय में भूकम्प से हुई तबाही के बाद मैं व्यक्तिगत तौर पर जनहित याचिका दायर कर टिहरी बांध के विरोध में सुप्रीम कोर्ट गया। यह केस सरकार के पक्ष में गया। हां इसका फायदा हुआ कि कोर्ट ने व्यवस्था की कि स्थानीय लोगों को आजीविका व समुचित पुर्नवास के हक से वंचित नहीं किया जा सकता। मैं इंटैक में दस साल रहकर ज्वलंत सामाजिक व पर्यावरणीय मुद्दों पर देषव्यापी जन जाग्रति व बौद्धिक चेतना फैलाने में सफल हुआ। मैं संतुष्ट हूं कि मैंने यथासंभव विनाशकारी नीतियों को प्रकृति व गरीबों के हित में बदलवाने में अपनी भागेदारी निभाई।

एक पूर्ण चक्र- हिमालय ट्रस्ट

मैं 1993 में अपने अनुभवों को जमीन पर उतारने की चाह में हिमालय ट्रस्ट बनाकर देहरादून आ गया। मेरा साथ कई गांधीवादी मित्रों ने दिया। मैं जमीन पर दोहराने लायक सामुदायिक विकास के छोटे-छोटे टिकाऊ माॅडल खड़ा करना चाहता था। हमारा उद्देश्य प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण कर लोगों में आत्मसम्मान व आत्मनिर्भरता की भावना फैलाना था। ‘हेंवलवाणी व ‘मंदाकनी की आवाज’ नामक सामुदायिक रेडियो स्टेशन तथा ‘ओरल टैस्टामोनी’ प्रोजेक्ट सहित कई जमीनी गतिविधियां ट्रस्ट की यादगार गतिविधियों में हैं।

श्री जयाल अपनी जीवन यात्रा से संतुष्ट हैं कि उन्होंने जिंदगी को और सुंदर बनाने के लिए वही सब किया जैसा जमीन पर खड़े होकर किया जा सकता था। बड़े पदों की शहरत व अट्लिकाओं की भव्यता उनके काम में बाधा नहीं बनी। उनके पांव हमेशा आम आदमी की हित में जमीन पर टिके रहे। श्री जयाल की ‘खामोश यात्रा’ के कुछ अंश चुराकर उन पर एक पुस्तक नलनीधर जयालः ए मैनी स्पैलन्डरड लाइफ लिखी गई। मार्च 2019 में उसका लोकापर्ण उनकी ही उपस्थिति में हुआ। पुस्तक का संपादन सुरजीत दास, इंदिरा रमेश, कुसुम रावत ने किया। पुस्तक का प्रकाशन दून लाईब्रेरी व बिशन सिंह महेन्द्र पाल सिंह देहरादून ने किया। उस दिन दून स्कूल के हैड मास्टर से लेकर षहर के संभ्रात व बुद्धिजीवी लोग मौजूद थे। एक खामोश बहुआयामी व्यक्त्वि का इससे ज्यादा क्या सम्मान हो सकता है कि उसकी उपस्थिति में ही उसके कामों का गरिमामय लोकापर्ण हो। यह पुस्तक श्री जयाल के व्यक्तित्व से ज्यादा मानवीय मूल्यों, देश के ग्रामीण विकास, पर्यावरण संरक्षण, पर्वतारोहण, सामाजिक व राजनैतिक तथ्यों का जीवंत दस्तावेज है। मौका मिले तो इसे जरूर पढ़ें। ईश्वर ऐसे विनम्र कर्मयोगी को शतायु बनाए!  दून स्कूल से प्रेरित इस प्रकृृतिप्रेमी व्यक्तित्व को हमारा सलाम!

 

 

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