Month: June 2020

उत्तराखंड के पहाड़ों से शुरू होता है वैदिक जल प्रबंधन व कृषि प्रबन्धन का स्वर्णिम इतिहास

उत्तराखंड के पहाड़ों से शुरू होता है वैदिक जल प्रबंधन व कृषि प्रबन्धन का स्वर्णिम इतिहास

साहित्‍य-संस्कृति
भारत की जल संस्कृति-6डॉ. मोहन चन्द तिवारीमैंने अपने पिछले लेख में वैदिक जलविज्ञान के प्राचीन इतिहास के बारे में बताया है कि वेदों के मंत्रद्रष्टा ऋषियों में ‘सिन्धुद्वीप’ सबसे पहले जलविज्ञान के आविष्कारक ऋषि हुए हैं, जिन्होंने जल के प्रकृति वैज्ञानिक‚ औषधि वैज्ञानिक, मानसून वैज्ञानिक और कृषिवैज्ञानिक महत्त्व को वैदिक संहिताओं के काल में ही उजागर कर दिया था. इस लेख में उत्तराखंड के पहाड़ों से शुरू हुए वैदिक कालीन कृषिमूलक जलप्रबंधन और ‘वाटर हारवेस्टिंग’ प्रणाली के बारे में जानकारी दी गई है. पहाड़ के बारे में वर्त्तमान में एक मिथ्या भ्रांति फैली हुई है कि “पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी पहाड़ के काम नहीं आनी.” इसी जुमले से नेता लोग चुनाव भी लड़ते हैं और पहाड़ के घर घर में नल पहुंचाने और यहां के नौजवानों को रोजगार देने का वायदा भी करते हैं. पर उत्तराखंड के पहाड़ों का सच यह है कि जलसंकट दि...
दिल्ली जन्नूहू, हेर्या जन

दिल्ली जन्नूहू, हेर्या जन

किस्से-कहानियां
लच्छू की रईसी के किस्सेकमलेश चंद्र जोशीबात तब की है जब दूर दराज गॉंव के लोगों के लिए दिल्ली सिर्फ एक सपनों का शहर हुआ करता था. उत्तराखंड के लगभग हर पहाड़ी परिवार का एक बच्चा फौज में होता ही था बाकी जो भर्ती में रिजेक्ट हो जाते वो या तो आवारा घूमते बीड़ी फूंकते नजर आते या फिर दिल्ली जाने की जुगत लगाते. उस समय में गॉंव के इक्का—दुक्का लड़के ही दिल्ली में नौकरी करते थे जिस वजह से गॉंव में उनकी पूछ और आव-भगत खूब होती थी. अलबत्ता पूरे गॉंव में मालूम किसी को नहीं होता था कि असल में लड़के दिल्ली में करते क्या हैं लेकिन बातें कहोगे तो ऐसी कि गॉंव के नाकारा निकम्मे लड़कों को मिसाल के तौर पर इन्हीं दिल्ली वाले लड़कों के उदाहरण दिये जाते थे. ईजा-बाज्यू तो बात-बात में कई बार कह देते थे “तुमर चेल त कति समझदार भै हो, टाइम में दिल्ली नौकरी में लाग गौ. एक हमर लाट छ दिन भर फेरिने में भै बस” (तुम्...
आम के इतने नाम कि…

आम के इतने नाम कि…

संस्मरण
मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—26प्रकाश उप्रेतीआज बात- 'आम' और 'नाम' की. हमारे गाँव में आम ठीक-ठाक मात्रा में होता है. गाँव का एक सामूहिक बगीचा है जिसमें सभी गाँव वालों के पेड़ हैं. उसमें बहुत से पेड़ तो गांवों के 'बुबुओं' (दादा जी लोगों के नाम के) के नाम के भी हैं. दुनिया में कई क़िस्म के आम और उनके अलग-अलग नाम होते हैं लेकिन अपने गाँव के आम और नाम की कहानी अलहदा ही है. घर से थोड़ा ही दूर यह सामूहिक बगीचा था. उसमें 14-15 आम के पेड़ हमारे भी थे. सभी अलग किस्म और नाम के आम थे. एक था- 'सुंदरी आम'. सुंदर दिखने के कारण उसका नाम 'सुंदरी आम' पड़ गया. इस आम में बड़ी अच्छी खुशबू आती थी, स्वरूप में ये लंबा व आगे से थोड़ा लाल सा होता था. पकने के बाद तो यह आम और ज्यादा सुंदर दिखाई देता था. एक था- 'कलमी आम'. 'कलम' के जरिए वह पेड़ लगा था तो 'कलमी आम' नाम पड़ गया. यह आम गोल और बहुत मीठा होता था. ज्...
निस्पृह प्रेमगाथा की शानदार प्रस्तुति

निस्पृह प्रेमगाथा की शानदार प्रस्तुति

साहित्यिक-हलचल
पुस्तक समीक्षादिनेश रावत'एक प्रेमकथा का अंत' महाबीर रवांल्टा की नवीन प्रकाशित नाट्य कृति है, जिसका ताना—बाना लोक की भावभूमि पर बुना गया है. गजू—मलारी की निश्चल प्रेमगाथा जहाँ नाटक की सुघट आत्मा है तो परिवेश और प्रचलित शब्दावली सौष्ठव. निश्चित ही ये गजू—मलारी की वही प्रेमगाथा है जिसे कभी प्रेम की पराकाष्ठा तय करने के लिए तो कभी आमोद—प्रमोद या मनरंजन के लिए सदियों से समान रूप से गाया, दोहराया जाता रहा हैं परन्तु सौभाग्य कहें या दुर्भाग्य की सांसारिक चहल—पहल से दूर दूरस्थ ग्राम्य अंचल दोणी—भितरी में घटित, प्रेम को नव आयाम प्रदान कर नई परिभाषा गढ़ती प्रस्तुत कृति की नायिका मलारी जहाँ बिना कुछ देखे, भोगे ही परलोक वासिनी बन स्वर्ण प्रतिमा के रूप में गजू की कंठ माला बन गजू के साथ बुग्यालों के विरंजन में विलीन हो जाती है तो प्रसंग गीत, गाथाओं में गूंथने के बाद भी सम्बंधित लोक की परिधि ...
नैतिक मूल्यों और पर्यावरण की रक्षा से ही सार्थक होगा अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस

नैतिक मूल्यों और पर्यावरण की रक्षा से ही सार्थक होगा अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस

योग-साधना
अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर विशेषडा.मोहन चंद तिवारीभारत सहित दुनियाभर में आज छठा अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाया जा रहा है. कोरोना महामारी के कारण इस बार योग दिवस का थीम है- "घर पर योग और परिवार के साथ योग". कोरोना संक्रमण के इस संकटकाल में योग की अहमियत और भी ज्यादा बढ़ गई है क्योंकि योग ही एक ऐसी क्रिया है,जिससे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य बेहतर होता है और बीमारियों से लड़ने की क्षमता भी बढ़ती है. इस अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र को संबोधित करते हुए कहा है कि  योग दिवस एकजुटता का दिन है.पीएम मोदी ने कहा, "आज भावात्मक योग का दिन है.जो दूरियां खत्म करे, वही योग है. योग से इम्युनिटी बढ़ाने में मदद मिलती है. हर दिन प्राणायाम कीजिए. दुनियाभर में योग का उत्साह बढ़ रहा है. योग का अर्थ समर्पण, सफलता है. हर परिस्थिति में समान रहने का नाम योग है. योग किसी से...
पिता तो पिता है, हमसे कब वो जुदा है

पिता तो पिता है, हमसे कब वो जुदा है

संस्मरण
पितृ दिवस पर विशेषडॉ. अरुण कुकसालमानवीय रिश्तों में सबसे जटिल रिश्ता पिता के साथ माना गया है. भारतीय परिवेश में पारिवारिक रिश्तों की मिठास में 'पिता' की तुलना में 'मां' फायदे में रहती है. परिवार में 'पिता' अक्सर अकेला खड़ा नज़र आता है. तेजी से बदलती जीवनशैली में परिवारों के भीतर पिता का पारंपरिक रुतवा लुढ़कता हुआ खतरे के निशान के आस-पास अपने अस्तित्व को बचाने की कोशिश कर रहा है. पर यह भी उतना ही सच है कि पिता के पैरों की नीचे की जमीन कितनी ही खुरदरी लगे परिवार में जीने का जज्बां और हौसला वहीं पनाह लेता है. पिता-पुत्र/पुत्र-पिता संबधों और उनकी आपसी कैमेस्ट्री की इवान सेर्गेयेविच तुर्गेनेव ने अपनी किताब 'पिता और पुत्र' में 150 साल पहले जो व्याख्या की थी वह आज भी प्रासंगिक है. इवान तुर्गेनेव (सन् 1818-1883) 19वीं शताब्दी के विश्व प्रसिद्व अग्रणी लेखकों में शामिल रहे हैं. टाॅलस्टा...
अंजीर ला सकता है रोजगार की बयार

अंजीर ला सकता है रोजगार की बयार

उत्तराखंड हलचल
बेडू और तिमला से ही विकसित हुआ है अंजीर. उत्तराखंड में उपेक्षित क्यों?जे. पी. मैठाणीपहाड़ों में सामान्य रूप से जंगली समझा जाने वाला बेडू और तिमला वस्तुत: एक बहुउपयोगी फल है. ​तिमला और बेडू के वृक्ष से जहां पशुओं के लिए जाड़ों में विशेषकर अक्टूबर से मार्च तक हरा चारा मिलता है, वहीं इसका फल अभी तक उपेक्षित माना गया है. दुनिया के कई देशों में लगातार शोध और अनुसंधान तथा कायिक प्रवर्धन से अंजीर को विकसित किया गया. शोध पत्र बताते हैं कि अंजीर जिसका वैज्ञानिक नाम फाइक्स कैरिका है यह मलबेरी ​परिवार यानी मोरेशी परिवार का सदस्य है. मूलत: अंजीर एशिया में तुर्की से उत्तर भारत तक का निवासी माना जाता है. पहले इसको गरीबों का भोजन भी कहा जाता था. जैसे कि आज भी उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में जिस परिवार को सब्जी नसीब ना हो, ऐसा माना जाता है कि वह परिवार तिमले की सब्जी बनाते हैं या चटनी बनाते ...
च्यलेल परदेश और चेलिलि सौरास जाणे होय

च्यलेल परदेश और चेलिलि सौरास जाणे होय

संस्मरण
मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—25प्रकाश उप्रेतीआज- ईजा, मैं और परदेश. ईजा की हमेशा से इच्छा रही कि हम भी औरों के बच्चों की तरह पढ़-लिखकर भविष्य बनाएँ. तब हमारे गाँव के बच्चों का भविष्य शहरों में जाकर ही बनता था. ईजा के लिए मुझे शहर भेजना मजबूरी और जरूरी दोनों था. ईजा बातों-बातों में कई बार कहती थीं- "च्यलेल परदेश और चेलिलि सौरास जाणे होय" (बेटे ने परदेश और बेटी ने ससुराल जाना ही है)... मुझे ईजा ने लड़की की तरह पाला था . ईजा मुझे फ्रॉक पहनाने से लेकर घास काटने तक साथ ले जाती थीं. मेरे बाल लंबे थे तो दो चोटी बनाकर ही खेलने भेजती थीं. रात को चूल्हे में रोटी बनाती तो मैं पास में बैठ जाता था. ईजा कहती थीं- "चुल हन लाकड़ लगा और आग ले फूंकने रहिए" (चूल्हे में लकड़ी लगाकर आग फूँकते रहना).रोटी बनाते हुए अंत में एक रोटी बनाने के लिए मुझे भी देती थीं. कहती थीं- "रोट बनाण सिख ले तो भो हैं प...
बहुत कठिन है माँ हो जाना

बहुत कठिन है माँ हो जाना

समसामयिक
डॉ. दीपशिखाजैसे-जैसे कोविड-19 भारत में भी अपने पैर फैलाता जा रहा, वैसे-वैसे मेरी एक माँ के तौर पर चिंता बढ़ती जा रही है. ये चिंताएं मुझ तक महदूद नहीं हैं, मेरे जैसी हर माँ सिर्फ अपने लिए नहीं बल्कि अपने बच्चे/बच्चों के लिए चिंतित है. ऊपर से जब से प्रेगनेंट हाथी की मौत वाली न्यूज सुनी है, हर समय दिमाग़ में वो ही चलता रहता है. फिर सुशांत की आत्महत्या की ख़बर. अब भारतीय सीमाओं पर बढ़ता तनाव. बड़ी घबराहट सी होती है. अजीब-अजीब ख़्याल, सपने आते हैं. कुछ समय से बस केवल नकारात्मकता ही फैल रही है विश्व में. हर माँ के लिए ये सबसे कठिन समय है मेरी नज़रों में. मैं भी नयी-नयी माँ बनी हूँ ना, तो ज़्यादा महसूस कर रही हूँ.एक माँ कैसे अपने बच्चे को शरहदों की रखवाली करने भेजती होगी? फिर कैसे वो सो पाती होगी? कैसे बहुत दिनों तक उस की आवाज़ सुने बिना निवाला गले से जाता होगा उसके. जब सुनती होगी सीमा ...
वो गाँव की लड़की

वो गाँव की लड़की

साहित्यिक-हलचल
एम. जोशी हिमानीगाँव उसकी आत्मा में इस कदर धंस गया है कि शहर की चकाचौंध भी उसे कभी अपने अंधेरे गाँव से निकाल नहीं पाई है वो गाँव की लड़की बड़ी बेढब सी है खाती है शहर का ओढ़ती है शहर को फिर भी गाती है गाँव को उसके गमले में लगा पीपल बरगद का बौनसाई जब पंखे की हवा में हरहराता है और उसके बैठक में एक सम्मोहन सा पैदा करता है वो गाँव की लड़की खो जाती है चालीस साल पहले के अपने गाँव में और झूलने लगती है अपने खेत में खड़े बुजुर्ग मालू के पेड़ की मजबूत बाहों में पड़े प्राकृतिक झूलों में अब किसी भी गाँव में उसका कुछ नहीं है सिवाय यादों केवो लड़की थी इसलिए किसी खसरा-खतौनी में उसका जिक्र भी नहीं है शहर में ब्याही वो गाँव की लड़की अपनी साँसों में बसाई है अब तक काफल, बांज, चीड़-देवदार बड.म्योल उतीस के पेड़ों को सभी नौलों धारों गाड़-गधेरों और बहते झरनों को ...