November 28, 2020
योग/साधना

नैतिक मूल्यों और पर्यावरण की रक्षा से ही सार्थक होगा अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर विशेष

  • डा.मोहन चंद तिवारी

भारत सहित दुनियाभर में आज छठा अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाया जा रहा है. कोरोना महामारी के कारण इस बार योग दिवस का थीम है-
“घर पर योग और परिवार के साथ योग”.

कोरोना संक्रमण के इस संकटकाल में योग की अहमियत और भी ज्यादा बढ़ गई है क्योंकि योग ही एक ऐसी क्रिया है,जिससे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य बेहतर होता है और बीमारियों से लड़ने की क्षमता भी बढ़ती है.

इस अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र को संबोधित करते हुए कहा है कि  योग दिवस एकजुटता का दिन है.पीएम मोदी ने कहा, “आज भावात्मक योग का दिन है.जो दूरियां खत्म करे, वही योग है. योग से इम्युनिटी बढ़ाने में मदद मिलती है. हर दिन प्राणायाम कीजिए. दुनियाभर में योग का उत्साह बढ़ रहा है. योग का अर्थ समर्पण, सफलता है. हर परिस्थिति में समान रहने का नाम योग है. योग किसी से भेदभाव नहीं करता. योग कोई भी कर सकता है. योग से शांति और सहनशक्ति मिलती है. कर्म की कुशलता ही योग है.कोरोना से बचने के लिए योग जरूरी है.”

भारत के लिए यह गौरव का विषय है कि विश्व आज फिर से हमारे पूर्वजों के योग चिंतन की प्रासंगिकता को स्वीकार कर रहा है.अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर प्रत्येक देशवासी का कर्तव्य होना चाहिए कि भारत के ज्ञान की इस अमूल्य धरोहर की रक्षा के लिए ऐसा कुछ करे, जिससे कि व्यक्ति और राष्ट्र दोंनों लाभान्वित हों और समूचा विश्व जो आज भुखमरी, कुपोषण, आर्थिक विषमता,आतंकवाद,अकाल, सूखा, ग्लोबल वार्मिंग,जलवायु परिवर्तन आदि प्राकृतिक आपदाओं की विभीषिकाएं झेल रहा है उनके तनावों से भी मुक्त हो सके.तभी अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस के वास्तविक संदेश और इसकी मूल भावना को सही मायनों में विश्व पटल पर चरितार्थ किया जा सकेगा.

यह अच्छा संकेत है कि अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाए जाने की घोषणा के बाद से ही पूरे विश्व में हिन्दू धर्मानुयायियों के साथ साथ दूसरे समुदाय के लोगों की भी योग चिंतन के प्रति जिज्ञासा बढ़ी है.

योगी चित्त पर अधिकार पाने के लिए शरीर और उस को संचालित करने वाली इन्द्रियों को वश में करने का जो प्रयत्न करता है उस प्रक्रिया को योगदर्शन में  ‘आसन’ और ‘प्राणायाम’ कहा जाता है. ‘आसन’ से शरीर निश्चल बनता है.

पर पिछले सालों के योग समारोह के प्रदर्शनों को देखने से ऐसा लगता है कि अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस के आयोजक ज्यादा जोर आसनों के प्रदर्शन पर दे रहे हैं तथा जिन मौलिक सिद्धान्तों के आधार पर भारतीय योगशास्त्र की वैचारिक आधार शिला रखी गई है उनकी सर्वत्र उपेक्षा की जा रही है. योग दिवस पर जो योगासन सिखाए जाते हैं उनका पातंजल योग से कोई लेना देना नहीं उन्हें ‘हठयोग’ या शारीरिक व्यायाम की संज्ञा दी जा सकती है.इसी प्रकार ‘सूर्य नमस्कार’ आसन भी पातंजल योगसूत्र का हिस्सा नहीं और न ही इस आसन का अभ्यास करते हुए सूर्य सम्बंधी मंत्रों का प्रयोग करने का विधान योगशास्त्र के प्राचीन ग्रन्थों में कहीं मिलता है.

निस्संदेह, पातंजल योगदर्शन आज भी साधकों के लिये एक बहुत ही उपयोगी शास्त्र है. योगी चित्त पर अधिकार पाने के लिए शरीर और उस को संचालित करने वाली इन्द्रियों को वश में करने का जो प्रयत्न करता है उस प्रक्रिया को योगदर्शन में  ‘आसन’ और ‘प्राणायाम’ कहा जाता है. ‘आसन’ से शरीर निश्चल बनता है. पतंजलि ने ‘आसन’ के बारे में साफ कहा है कि ‘स्थिरसुखमासनम्’ अर्थात् जिस मुद्रा में देर तक बिना कष्ट के सुखपूर्वक बैठा जा सके वही आसन श्रेष्ठ है. ऐसा लगता है कि ज्यादा उछल कूद वाले आसनों को पतंजलि श्रेष्ठ नहीं मानते थे. समय के साथ-साथ आज योग का महत्व दिन-प्रतिदिन बढता जा रहा है. वर्त्तमान समय में हर व्यक्ति मानसिक तनाव के दौर से से गुजर रहा है. इसी तनाव को दूर करने के लिए भी आज हर कोई योग की ओर आकर्षित हो रहा है. इसलिए आधुनिक योग के आचार्यों को चाहिए कि वे भारतीय योगशास्त्र की पुरातन मर्यादाओं की रक्षा करते हुए योगासनों को ऐसे सरल तरीकों से सिखाएं जिससे कि प्रत्येक धर्म के व्यक्ति आकृष्ट हो सकें और वे धार्मिक आस्थाओं की बाध्यता से भी मुक्त रहें.

दरअसल, योग केवल आसनों के माध्यम से किया जाने वाला शारीरिक व्यायाम का नाम नहीं है बल्कि यह,शरीर को प्रकृति के साथ संतुलन बैठाने की एक ऐसी वैज्ञानिक प्रक्रिया भी है जो मानसिक तनावों के कारण उत्पन्न होने वाले मनुष्य के शारीरिक विकारों को शान्त करता है एवं मनुष्य को आध्यात्मिक विकास की प्रेरणा भी देता है.आज भारत के संदर्भ में पश्चिमी शैली के रहन सहन और खान पान के तौर तरीकों से शारीरिक रोगों के साथ-साथ मानसिक विकृतियों और तनावों में जो लगातार बढ़ौतरी हुई है उन्हें भारतीय योग के अष्टांग-मार्ग पर चल कर ही सुधारा जा सकता है. पातंजल योगसूत्र के अनुसार योग के आठ अंग हैं-
1.यम,  2.नियम‚  3.आसन‚  4.प्राणायाम,  5.प्रत्याहार‚  6.धारणा‚ 7.ध्यान और  8.समाधि.

वर्त्तमान संदर्भ में पातंजल योगसूत्र के अष्टांग योग की व्याख्या दो दृष्टियों से की जा सकती है व्यक्ति के धरातल पर और राष्ट्र के धरातल पर. ‘आसन’ और ‘प्राणायाम’ व्यक्ति के शरीर और मन को स्वस्थ और निर्मल बनाते हैं तो ‘यम’ और ‘नियम’ उसके नैतिक चरित्र को ऊंचा उठाते हैं. पातंजल योगसूत्र में ‘यम’ के अंतर्गत  जिन पांच नैतिक आदर्शों को स्वीकार किया गया है वे हैं- अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह (योगसूत्र, 2.30).

प्रकृति का उपासक एक प्राचीन देश होने के कारण भारत इस अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर पूरे विश्व को यह संदेश दे सकता है कि प्रकृति संरक्षण से ही विश्व का कल्याण संभव है ताकि ‘ग्लोबल वार्मिंग’ के तनाव से विश्व पर्यावरण की रक्षा हो सके.

महात्मा गांधी ने योगदर्शन के इन्हीं पांच नैतिक आदर्शों को जीवन में उतार कर स्वतंत्रता का संग्राम लड़ा था और विश्व को यह दिखा दिया कि भारत का योगचिंतन आज भी अन्तर्राष्ट्रीय धरातल पर उतना ही प्रासंगिक है जितना वह प्राचीन काल में था. कुछ और पीछे जाएं तो भगवान बुद्ध और महावीर स्वामी का समाज दर्शन भी योग के इन्हीं नैतिक आदर्शों की आधार शिला पर टिका है. आज भारत के आध्यात्मिक विकास के लिए योगदर्शन के इन नैतिक आदर्शों को अपनाने की भी बहुत जरूरत है.

भारत की सभ्यता व संस्कृति,जो कि प्रकृति तथा मनुष्य के स्नेहपूर्ण रिश्तों पर टिकी है, इसका तात्विक विवेचन भी हमें योग के सहयोगी दर्शन ‘सांख्य’ में मिलता है जिसके अनुसार प्रकृति ही प्रधान रूप से आराध्या है. पर चिन्ता की बात है कि आज प्राकृतिक संसाधनों का निर्ममता पूर्वक दोहन ही विश्व पर्यावरण को बिगाड़ने का बहुत बड़ा कारण बना हुआ है. लगभग आठ हजार वर्ष पुराने इस ‘भारत राष्ट्र’ के पास योगचिंतन का एक समृद्ध इतिहास है जिसके बलपर मानव मूल्यों का सर्वांगीण विकास किया जा सकता है और ‘अष्टांग योग’ की आचारसंहिता के माध्यम से विभिन्न राष्ट्रों के मध्य ऐसी भावना पैदा की जा सकती है जिससे शक्तिशाली राष्ट्र कमजोर और पिछड़े राष्ट्रों के प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन बंद कर दें. प्रकृति का उपासक एक प्राचीन देश होने के कारण भारत इस अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर पूरे विश्व को यह संदेश दे सकता है कि प्रकृति संरक्षण से ही विश्व का कल्याण संभव है ताकि ‘ग्लोबल वार्मिंग’ के तनाव से विश्व पर्यावरण की रक्षा हो सके. अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर समस्त देशवासियों को हार्दिक शुभकामनाएं !!

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज से एसोसिएट प्रोफेसर के पद से सेवानिवृत्त हैं. एवं विभिन्न पुरस्कार व सम्मानों से सम्मानित हैं. जिनमें 1994 में संस्कृत शिक्षक पुरस्कार’, 1986 में विद्या रत्न सम्मानऔर 1989 में उपराष्ट्रपति डा. शंकर दयाल शर्मा द्वारा आचार्यरत्न देशभूषण सम्मानसे अलंकृत. साथ ही विभिन्न सामाजिक संगठनों से जुड़े हुए हैं और देश के तमाम पत्रपत्रिकाओं में दर्जनों लेख प्रकाशित।)

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