Tag: दिनेश रावत

शिक्षक दिनेश रावत को रोटरी क्लब कनखल ने किया ‘नेशन बिल्डर अवार्ड’ से सम्मानित

शिक्षक दिनेश रावत को रोटरी क्लब कनखल ने किया ‘नेशन बिल्डर अवार्ड’ से सम्मानित

हरिद्वार
  रवांई घाटी की मिट्टी से निकले शिक्षक एवं युवा साहित्यकार को शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए मिला सम्मानहिमांतर वेब डेस्कहरिद्वार। रोटरी क्लब-कनखल, हरिद्वार की ओर से शिक्षकों के सम्मान में विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाले चुनिंदा शिक्षकों को ‘नेशन बिल्डर अवार्ड’ से सम्मानित किया गया। इस दौरान करीब आधा दर्जन शिक्षकों को सम्मानित कर उनके शैक्षिक एवं सामाजिक योगदान की सराहना की गई। सम्मानित होने वाले शिक्षकों में रवांई घाटी की माटी में जन्मे प्रसिद्ध शिक्षक एवं युवा साहित्यकार दिनेश रावत भी शामिल रहे। शिक्षा के क्षेत्र में अपने समर्पण, विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास तथा साहित्य के माध्यम से समाज को जागरूक करने के प्रयासों के लिए उन्हें रोटरी क्लब-कनखल की ओर से ‘Nation Builder Award’ प्र...
एक मुट्ठी चावल से बताते हैं भूत, भविष्य और वर्तमान! जानिए शक्ति प्रसाद सेमवाल की अनोखी गणत विद्या

एक मुट्ठी चावल से बताते हैं भूत, भविष्य और वर्तमान! जानिए शक्ति प्रसाद सेमवाल की अनोखी गणत विद्या

देहरादून
  ‘भक्ति की शक्ति’ कहें या ‘शक्ति की भक्ति’?दिनेश रावत “आप अपने घर से चावल की केवल एक मुट्ठी लेकर उनके पास जाइए। वे अपना स्यांरू-पासू निकालेंगे और उसी एक मुट्ठी चावल को देखकर आपके भूत, वर्तमान और भविष्य की कुछ तस्वीरें आपके सामने रख देंगे; यूँ कहें कि आपके बारे में बहुत कुछ बताने लगेंगे।”लोकपूजित एवं प्रतिष्ठित इष्टदेवी माँ रेणुका की दिव्य उपासना, प्रचलित देवपरंपरा और पीढ़ियों से चली आ रही गणत विद्या की साधना—इन तीनों को यदि एक साथ देखें, तो सहज ही एक नाम सामने आता है—श्रद्धेय श्री शक्ति प्रसाद सेमवाल जी।उन्हें देखते-समझते हुए मन में सहज ही एक प्रश्न उठता है कि इसे ‘भक्ति की शक्ति’ कहें या ‘शक्ति की भक्ति’? शायद दोनों ही अभिव्यक्तियाँ उनके व्यक्तित्व और साधना पर समान रूप से सार्थक बैठती हैं। क्योंकि जहाँ उनकी भक्ति में शक्ति का अनुभव होता है, वहीं उनकी शक्ति का मूल भी भक...
शिक्षक दिनेश रावत ने फिर बढ़ाया रवांई का मान, मिला “देवभूमि शिक्षा उत्कृष्टता सम्मान”

शिक्षक दिनेश रावत ने फिर बढ़ाया रवांई का मान, मिला “देवभूमि शिक्षा उत्कृष्टता सम्मान”

उत्तराखंड हलचल
हल्द्वानी: शिक्षा विभाग में अपनी रचनात्मकता के लिए पहचान रखने वाले शिक्षक दिनेश रावत को मिलने वाले सम्मानों की फेहरिस्त एक और सम्मान जुड़ गया है। उनको अमर उजाला और MIET की ओर से “देवभूमि शिक्षा उत्कृष्टता समान” से सम्मानित किया गया है। समारोह का आयोजन MIET कुमाऊं के लामाचौड़, हल्द्वानी स्थित परिसर में किया गया।समारोह के दौरान मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित प्रदेश के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने शैक्षिक व सह-शैक्षिक गतिविधियों में उत्कृष्ट प्रदर्शन के आधार पर प्रदेशभर के विद्यालयों और महाविद्यालयों से चयनित अध्यापक/ प्राध्यापकों को ‘देवभूमि शिक्षा उत्कृष्टता समान’ से सम्मानित किया। सम्मानित होने वाले शिक्षकों में सीमांत उत्तरकाशी के रवांई क्षेत्र के कोटी, बनाल निवासी शिक्षक दिनेश सिंह रावत भी शामिल हैं, जो वर्तमान में हरिद्वार जनपद के बहादराबाद विकास खंड के राजकीय प्रा.वि.न.-4 में से...
डॉ. अशोक कुमार गुसाईं : सीमांत में भी सराही गई जिनकी सक्रियता और संजीदगी

डॉ. अशोक कुमार गुसाईं : सीमांत में भी सराही गई जिनकी सक्रियता और संजीदगी

संस्मरण
दिनेश रावत डॉ. अशोक कुमार गुसाईं जी! शिक्षा विभाग के एक ऐसे अधिकारी रहे जिनकी प्रशासनिक एवं अकादमिक समझ जितनी गहरी है, भाव-स्वभाव, कार्य व व्यवहार उतना ही सहज-सरल. कार्य एवं दायित्वों के प्रति सजग-समर्पित तथा शिक्षक अभिभावक व जन सामान्य के लिए सदैव सुलभ. ना समय की पाबंदी, ना पद का कोई मद. आप ना केवल स्वयं बेहतर करने के लिए पर्यत्नशील रहते थे बल्कि शिक्षकों को भी निरंतर प्रेरित—प्रोत्साहित करते रहते थे. आपकी पारखी नज़रें बहुत आसानी से काम करने और ना करने वालों को पहचान लेती थीं. फिर चाहे वह अतिदुर्गम में हों या अतिसुगम में. काम न करने वालों के खिलाफ आवश्यक कार्यवाही तथा काम करने वालों को यथोचित मान-सम्मान-स​हयोग प्रदान करना आपकी विशिष्टता रही है. काम करने वाले शिक्षक-शिक्षिकाएं आपकी जुबां पर होते थे और अवसर मिलने पर उनके प्रयासों की प्रशंसा भी करते थे. आपके इन सद्प्रयासों से न केवल सबंधिं...
बहिनों के प्रति स्नेह और सम्मान  की प्रतीक है ‘दोफारी’

बहिनों के प्रति स्नेह और सम्मान  की प्रतीक है ‘दोफारी’

लोक पर्व-त्योहार
दिनेश रावत बात संग्रांद (संक्रांति) से पहले एक रोज की है. शाम के समय माँ जी से फोन पर बात हो रही थी. उसी दौरान माँ जी ने बताया कि- ‘अम अरसू क त्यारी करनऽ लगिई.’ ( हम अरसे बनाने की तैयारी में लगे हैं.) अरसे बनाने की तैयारी? मैं कुछ समझ नहीं पाया और मां जी से पूछ बैठा- ‘अरस! अरस काले मां?(अरसे! अरसे क्यों माँ?) तो माँ ने कहा- ‘भोव संग्रांद कणी. ततराया कोख भिजऊँ अर कुठियूँ.’ (कल संक्रांति कैसी है. उसी वक्त कहाँ भीगते और कूटे जाते हैं.) ‘काम भी मुक्तू बाजअ. अरस भी लाण, साकुईया भी उलाउणी, स्वाअ भी लाण अर त फुण्ड भी पहुंचाण.’ (काम भी बहुत हो जाता है. अरसे भी बनाने हैं. साकुईया भी तलनी है. स्वाले यानी पूरी भी बनानी है और फिर वह पहुंचाने भी हैं.) माँ जी से बात करते-करते मैं सोचने को विवश हो गया कि आख़िर गांव-घर से दूर होते ही हम कितनी चीजों से दूर हो जाते हैं. हमारी जीवन शैली कितनी बदल जाती है. ...
देवलांग से रू-ब-रू करवाता दिनेश रावत द्वारा लिखित एक तथ्यात्मक गीत

देवलांग से रू-ब-रू करवाता दिनेश रावत द्वारा लिखित एक तथ्यात्मक गीत

सोशल-मीडिया, साहित्‍य-संस्कृति
पूर्णता एवं तथ्यात्मकता के साथ देवलांग की विशेषताओं से परिचय करवाता दिनेश रावत का यह गीतशशि मोहन रवांल्टा सीमांत जनपद उपर साहित्यकार दिनेश रावत द्वारा लिखित गीत अब तक का सबसे पूर्णता एवं तथ्यात्मकता गीत है. रवांई घाटी के सुप्रसिद्ध देवलांग उत्सव की विशेषताओं को दर्शाता यह गीत रामनवमी के अवसर पर लॉन्च किया गया. because गीत साहित्यकार दिनेश रावत ने लिखा, जिसे रवांई घाटी सुप्रसिद्ध गायिका रेश्मा शाह ने आवाज दी और राजीव नेगी ने संगीतबद्ध किया है. गाने को इस तरह से पिरोया गया है कि उसमें देवलांग के आयोजन को आसानी से समझा जा सकता है. देवलांग पर लिखे गए इस गीत को हारूल शैली में गाया व संगीतबद्ध किया गया है.हरताली गीत में देवलांग की तैयारियों से लेकर देवलांग के खड़े होने और वहां से आखिर ओल्ला को मड़केश्वर महादेव तक ले जाने की पूरी जानकारी दी गई है. देवलांग के आयोजन में एक—एक गाँव की हिस्से...
स्मृति मात्र में शेष रह गए हैं ‘सी रौता’ और थौलधार जातर

स्मृति मात्र में शेष रह गए हैं ‘सी रौता’ और थौलधार जातर

लोक पर्व-त्योहार
दिनेश रावतसी रौता बाई! सी रौता!! कितना उल्लास, उत्सुकता और कौतुहल होता था. गाँव, क्षेत्र के सभी लोग ख़ासकर युवाजन जब हाथों में टिमरू की लाठियाँ लिए ढोल—दमाऊ की थाप पर नाचते, गाते, थिरकते, हो—हल्ला करते हुए अपार जोश—खरोश के साथ गाँव से थौलधार के लिए निकलते थे. कोटी से निकला यह जोशीला जत्था बखरेटी से होकर थौलधार पहुँचता था. रास्ते भर में उनका उन्मुक्त नृत्य देखते ही बनता था. थौलधार पहुँचने पर तो इनके जोश को मानो चिंगारी मिल जाती थी. लोक वादक तन—मन को उत्साहित करने वाले ताल बजाते और जोशीले युवाओं के जत्थे उनके पीछे—पीछे हो नाचते, गाते रहते. नृत्याभिन शैली एकदम आक्रामक होती थी. ठीक वैसे ही जैसे किसी पर विजय प्राप्ति के लिए चल रहे हों. इस दौरान कुछ खास पंक्तियों को गीत या नारों के रूप में पूरे जोशीले अंदाज़ में जोर—जोर से गाया, दोहराया जाता था, जिसके बोल होते थे— 'सी रौता बाई! सी रौता!!' थ...