
तीलू रौतेली पुरस्कार के बाद उत्तराखंड गौरव रत्न सम्मान से सम्मानित हुईं कोटियाल गांव की स्वतंत्री बंधानी, लाल धान के साथ विलुप्ति की कगार पर पहुँचे चीणा-कौणी जैसे पारंपरिक अनाजों के संरक्षण में जुटीं
- आशिता डोभाल, नौगांव (उत्तरकाशी)
पहाड़ की पहचान केवल उसकी ऊँची चोटियों, नदियों और प्राकृतिक सौंदर्य से नहीं, बल्कि उन खेतों और पारंपरिक बीजों से भी है, जिन्होंने सदियों से यहाँ की संस्कृति और खानपान को समृद्ध बनाया है। बदलते समय के साथ जब कई पारंपरिक फसलें खेतों से गायब होने लगीं, तब सीमांत जनपद उत्तरकाशी के नौगांव ब्लॉक के कोटियाल गांव की स्वतंत्री बंधानी ने इस कृषि विरासत को सहेजने का बीड़ा उठाया। आज वे ‘रेड राइस लेडी’ के नाम से पहचानी जाती हैं।
तीलू रौतेली पुरस्कार से सम्मानित स्वतंत्री बंधानी को अब उत्तराखंड गौरव रत्न सम्मान से नवाजा गया है। डिस्कवर उत्तराखंड 24 न्यूज चैनल द्वारा आयोजित सम्मान समारोह में उत्तराखंड विधानसभा अध्यक्ष श्रीमती ऋतु खंडूड़ी भूषण ने उन्हें यह सम्मान प्रदान किया। यह सम्मान पारंपरिक लाल धान, स्थानीय बीजों और पहाड़ी अनाजों के संरक्षण एवं संवर्धन में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए दिया गया।
लाल धान को दिलाई नई पहचान
उत्तरकाशी का पुरोला क्षेत्र अपने विशिष्ट लाल धान के लिए जाना जाता है। बदलती कृषि पद्धतियों और पारंपरिक फसलों के प्रति घटते रुझान के बीच स्वतंत्री बंधानी ने इस धान के संरक्षण और उत्पादन को बढ़ावा देने की पहल की। उन्होंने स्थानीय बीजों को सहेजने के साथ महिला किसानों को भी पारंपरिक खेती से जोड़ने का प्रयास किया। उनके इन्हीं कार्यों ने पुरोला के लाल धान को नई पहचान दिलाई और वे ‘रेड राइस लेडी’ के रूप में प्रसिद्ध हुईं।

चीणा-कौणी को फिर से खेतों तक पहुँचाने की मुहिम
स्वतंत्री बंधानी का योगदान केवल लाल धान तक सीमित नहीं है। उन्होंने विलुप्ति की कगार पर पहुँचे चीणा और कौणी जैसे पारंपरिक पहाड़ी अनाजों के संरक्षण और दोबारा खेती को प्रोत्साहित करने की दिशा में भी कार्य किया है। इसके साथ ही मंडुवा, झंगोरा और अन्य स्थानीय अनाजों के संवर्धन को अपने अभियान का हिस्सा बनाया है।
कभी पहाड़ी परिवारों के भोजन का अभिन्न हिस्सा रहे ये अनाज बदलती खाद्य आदतों और खेती के तौर-तरीकों के कारण धीरे-धीरे उपेक्षित होते गए। बंधानी के प्रयास इन्हें फिर से खेतों और रसोई तक पहुँचाने के साथ पहाड़ की पोषण परंपरा और कृषि जैव विविधता को सुरक्षित रखने की दिशा में महत्वपूर्ण हैं।
पहाड़ की महिलाओं के लिए प्रेरणा
पर्वतीय कृषि में महिलाओं की भूमिका हमेशा महत्वपूर्ण रही है। बीजों के संरक्षण से लेकर खेती और फसल प्रबंधन तक उनका पारंपरिक ज्ञान पीढ़ियों से कृषि व्यवस्था का आधार रहा है। स्वतंत्री बंधानी ने इसी अनुभव और सहभागिता को अपने प्रयासों से जोड़कर स्थानीय खेती के संरक्षण को नई दिशा देने का काम किया है।
तीलू रौतेली पुरस्कार के बाद उत्तराखंड गौरव रत्न सम्मान से सम्मानित होना स्वतंत्री बंधानी के कृषि संरक्षण के क्षेत्र में किए जा रहे उल्लेखनीय कार्यों की सार्थक पहचान है। पलायन, खेती के प्रति घटते रुझान और पारंपरिक फसलों के सामने बढ़ती चुनौतियों के बीच कोटियाल गांव की स्वतंत्री बंधानी के प्रयास पहाड़ की कृषि विरासत को सहेजने और नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने की प्रेरणा देते हैं। उनकी यह यात्रा बताती है कि पारंपरिक बीजों को बचाना केवल खेती को बचाना नहीं, बल्कि पहाड़ की संस्कृति, पोषण परंपरा और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को सहेजना भी है।
