Tag: हरेला

नये साल में लोकपर्वों पर भी मिलेगा अवकाश

नये साल में लोकपर्वों पर भी मिलेगा अवकाश

उत्तराखंड हलचल
देहरादून: सरकार ने नये साल यानी 2024 के लिए छुट्टियों का कैलेंडर जारी कर दिया है। इस कैलेंडर में सरकार ने लोकपर्व ईगास (बग्वाल), हरेला और वीर केशरीचंद के शहीद दिवस की छुट्टियां भी शामिल की हैं।  
आगाज संस्था द्वारा हरेला पर्व पर 2000 कचनार – क्विराल के पौधों का रोपण

आगाज संस्था द्वारा हरेला पर्व पर 2000 कचनार – क्विराल के पौधों का रोपण

चमोली
आगाज संस्था द्वारा दशोली ब्लाक के  किरूली गाँव में हरेला के सुअवसर 2000 कचनार - क्विराल के पौधों के रोपण का कार्य प्रारंभ किया गया. इस कार्य में किरुली गाँव के 20 रिंगाल हश्त शिल्पी परिवारों जिनके पास निजी जमीन है, या जो भी परिवार इच्छुक है  उनको शामिल किया गया है. साथ ही इन सभी किसानों का जड़ी बूटी शोध संस्थान के साथ पंजीकरण भी किया जाएगा. आगाज के अध्यक्ष जे पी मैठाणी ने बताया की, तीन वर्ष तक चलने वाली इस परियोजना अभी तक अकेले जनपद चमोली और देहरादून के 783 किसान जुड़े हुए हैं. हिमालय की महत्वपूर्ण जड़ी बूटी जैसे - सुगंधबाला, तगर, टिमरू, लोध, रागा ( ब्लू पाइन ), कचनार के अलावा मैदानी जिले देहरादून में वरुणा और कुटज का रोपण किया जा रहा है. उन्होंने जानकारी दी कि किसानों  को यह पौधे नि:शुल्क दीए जा रहे हैं. इस परियोजना के लिए जीवन्ति वेलफेयर एंड चेरिटेबल ट्रस्ट / डाबर इंडिया लिमिटेड, नई दिल्...
अधिमास और सावन में पार्थिव पूजन

अधिमास और सावन में पार्थिव पूजन

लोक पर्व-त्योहार
भुवन चंद्र पंत इस वर्ष अधिकमास अथवा पुरूषोत्तम मास सावन के महीने में पड़ रहा है. सावन का महीना हर सनातनी के लिए शिवार्चन अथवा पार्थिव पूजन का पवित्र महीना माना जाता है. लेकिन इस माह में अधिकमास होने से कई लोगों में यह शंका होना स्वाभाविक है कि क्या इस साल श्रावण माह में शिवार्चन अथवा पार्थिव पूजा की जा सकेगी अथवा नहीं? पुरोहितवर्ग में मतैक्य न होने से लोग भ्रमित हैं. पुरोहितों का एक वर्ग कहता है कि इस बार श्रावण माह में शिवार्चन नहीं किया जा सकेगा, जब कि दूसरा वर्ग कहता है कि जो नियमित रूप से करते आये हैं, वे तो शिवार्चन कर सकते हैं जब कि जो पहली बार शिवार्चन की शुरुआत कर रहे हों, वे अधिकमास से शिवार्चन की शुरुआत न करें. दूसरी ओर पुरोहितों का एक बड़ा वर्ग का कहना है कि अधिकमास यदि श्रावण माह में पड़ रहा है, तो यह शिवार्चन के लिए सबसे उपयुक्त काल व अधिक पुण्य व फलदायी है. क्योंकि मांगलिक का...
जीवन-जगत में हरियाली का प्रतीक ‘हरेला’

जीवन-जगत में हरियाली का प्रतीक ‘हरेला’

लोक पर्व-त्योहार
प्रकाश उप्रेती ईजा ने आज हरेला 'बूत' (बोना) दिया. जो लोग 10वे दिन हरेला काटते हैं उन्होंने 7 तारीख और हम 9वे दिन हरेला काटते हैं इसलिए ईजा ने आज यानि 8 तारीख को बोया. हरेला का अर्थ हरियाली से है. यह हरियाली जीवन के सभी रूपों में बनी रहे उसी का द्योतक यह लोकपर्व है. 'पर्यावरण’ जैसे शब्द की जब ध्वनि भी नहीं थी तब से प्रकृति पहाड़ की जीवनशैली का अनिवार्य अंग है. जीवन के हर भाव, दुःख-सुख, शुभ-अशुभ, में प्रकृति मौजूद रहती है. जीवन के उत्सव में प्रकृति की इसी मौजूदगी का लोकपर्व हरेला है. हरेला ऋतुओं के स्वागत का पर्व भी है. नई ऋतु के अगमान के साथ ही यह पर्व भी आता है. इस दिन के लिए कहा जाता है कि अगर पेड़ की कोई टहनी भी मिट्टी में रोप दी जाए तो वो भी जड़ पकड़ लेती है. यहीं से पहाड़ों में हरियाली छाने लगती है. नई कोपलें निकलने लगती हैं. हरेला हरियाली और समृद्धि का प्रतीक है. सावन का महीना आरम्भ...
हरेला : कोरोना काल में एक दूसरे की मदद को प्रेरित करता त्योहार

हरेला : कोरोना काल में एक दूसरे की मदद को प्रेरित करता त्योहार

लोक पर्व-त्योहार
सुख समृद्धि की कामना का पर्व हरेला ऋतु खंडूरी विधायक, यमकेश्वर हरेला. यानी हर्याव. सुख समृद्धि की कामना का पर्व. दूसरों को आशीवर्चन देने का पर्व. खिलखिलाने का पर्व. दूसरों को खुश देखकर खुद खुश होने का पर्व. ऐसे ही तो कई संदेश छिपे हैं because उत्तराखंड के लोकपर्व हरेला में. इसे स्थानीय बोली में हर्याव भी कहते हैं. मूलत: कुमाऊं क्षेत्र में मनाये जाने वाला यह पर्व आज विश्वव्यापी है. यूं तो साल में तीन बार हरेला पर्व मनाया जाता है, लेकिन सावन मास की शुरुआत में मनाये जाने वाले इस पर्व का विशेष महत्व है. नेता जी सावन यानी हरियाली की शुरुआत. हरियाली यानी सुख-समृद्धि. इस शुरुआत पर हरेला का त्योहार मनाकर हम जहां अपने because परिवेश में खुशहाली की कामना करते हैं, वहीं दूर देश में जा बसे अपने अपनों की भी समृद्धि के लिए प्रार्थना करते हैं. बहनें चहकती हैं कि भाई को आशीर्वचन स्वरूप हरेला लगाए...
बेटा! हरेला बोना कभी नहीं छोड़ना!

बेटा! हरेला बोना कभी नहीं छोड़ना!

लोक पर्व-त्योहार
आज हरेला है, ईजा की बहुत याद आती है… डॉ. मोहन चंद तिवारी आज श्रावण संक्रांति के दिन हरेले का  त्योहार है. सुबह से ही ईजा (मां) की और कॉलेज की बहुत याद आ रही है.आज मुझे हरेला लगाने के लिए न तो मेरी मां जीवित है because और न ही कॉलेज जाने की कोई जल्दी!कॉलेज से सेवानिवृत्त हुए लगभग आठ साल हो गए हैं.ईजा के बिना हरेले का त्योहार कुछ सूना सूना सा लग रहा है.त्योहार की खुशी बहुत है किंतु आत्मतुष्टि बिल्कुल भी नहीं.पर मुझे संतोष है कि मातृत्वभाव का आशीर्वाद दिलाने वाला यह हरेला का त्यौहार आज भी मेरे और मेरे परिवारजनों के पास धरोहर के रूप में संरक्षित है. नेता जी मुझे याद है कि गर्मियों की छुट्टी के बाद हर साल 16 जुलाई को दिल्ली विश्वविद्यालय में कालेज खुलते थे तो संयोग से उसी दिन हरेले का त्यौहार भी होता था.मेरी मां मुझे because रात से ही सचेत करते हुए कहती- "च्यला यौ त्यौर कौलीज लै कौस छू ...
“इजा मैंले नौणि निकाई, निखाई”

“इजा मैंले नौणि निकाई, निखाई”

लोक पर्व-त्योहार
घृत संक्रान्ति 16 अगस्त पर विशेष डॉ. मोहन चंद तिवारी ‘घृत संक्रान्ति’ के अवसर पर समस्त देशवासियों और खास तौर से उत्तराखण्ड वासियों को गंभीरता से विचार करना चाहिए कि कृषिमूलक हरित क्रान्ति से पलायन करके आधुनिक औद्योगिक क्रान्ति के लिए की गई दौड़ ने हमें इस योग्य तो बना दिया है कि हम पहाड़ों की देवभूमि में देशी और विलायती शराब की नदियां घर घर और गांव गांव में बहाने में समर्थ हो गए हैं पर ये देश का कैसा दुर्भाग्य है कि हमारे देश के नौनिहालों को शुद्घ घी की बात तो छोड़ ही दें गाय और भैंस का ताजा और शुद्ध दूध भी नसीब नहीं है. संक्रान्ति के दिन उत्तराखण्ड के कुमाऊं मंडल में प्रतिवर्ष  ‘घृत संक्रान्ति’ का लोकपर्व मनाया जाता है.  इस पर्व को अलग अलग स्थानों में ‘सिंह संक्रान्ति’, 'घ्यू संग्यान', अथवा 'ओलगिया' के नाम से भी जाना जाता है. मूलतः यह वर्षा ऋतु (चौमास) में मनाया जाने वाला ऋतुपर्...
च्यला! हर्याव बुण कभें झन छोड़िए!

च्यला! हर्याव बुण कभें झन छोड़िए!

लोक पर्व-त्योहार
डॉ. मोहन चंद तिवारी आज श्रावण संक्रांति के दिन हरेले का शुभ पर्व है. हमारे घर में नौ दिन पहले आषाढ़ के महीने में बोए गए हरेले को आज प्रातःकाल श्रावण संक्रांति के दिन काटा गया. कल रात हरेले की गुड़ाई की गई  उसे पतेशा भी गया.हरेला पतेशने के कुछ खास मंत्र होते हैं,जो हमें याद नहीं इसलिए 'सर्व मंगल मांगल्ये' इस देवी के मंत्र से हम हरेला पतेश देते हैं.   इस बार पिछले साल की तरह हरेले की पत्तियां ज्यादा बड़ी और चौड़ी नहीं हुई, मौसम की वजह से या अच्छी मिट्टी की वजह से कोई भी कारण हो सकता है. कोरोना काल भी इस हरेले के लिए संकटपूर्ण रहा,जितने उत्साह से इसे मनाया जाना था वह सब नहीं हो सका. प्रातःकाल हरेला काटे जाने के बाद मेरी पत्नी ने सबसे पहले हमारे इष्टदेव के मंदिर में मां दुर्गा और इष्टदेव ग्वेल सहित सभी कुल देवताओं और मुकोटी देवताओं को हरेला चढ़ाया. उसके बाद घर-परिवार की सबसे बड़ी और वर...
हरेला पर्व, अँधेरे समय में विचार जैसा है

हरेला पर्व, अँधेरे समय में विचार जैसा है

लोक पर्व-त्योहार
प्रकाश उप्रेती पहाड़ों का जीवन अपने संसाधनों पर निर्भर होता है. यह जीवन अपने आस-पास के पेड़, पौधे, जंगल, मिट्टी, झाड़ियाँ और फल-फूल आदि से बनता है. इनकी उपस्थिति में ही जीवन का उत्सव मनाया जाता है. पहाड़ के जीवन में प्रकृति अंतर्निहित होती है. दोनों परस्पर एक- दूसरे में घुले- मिले होते हैं. एक के बिना दूसरे की कल्पना भी नहीं की जा सकती है. यह रिश्ता अनादि काल से चला आ रहा है. 'पर्यावरण' जैसे शब्द की जब ध्वनि भी नहीं थी तब से प्रकृति पहाड़ की जीवनशैली का अनिवार्य अंग है. वहां जंगल या पेड़, पर्यावरण नहीं बल्कि जीवन का अटूट हिस्सा हैं. इसलिए जीवन के हर भाव, दुःख-सुख, शुभ-अशुभ, में प्रकृति मौजूद रहती है. जीवन के उत्सव में प्रकृति की इसी मौजूदगी का लोकपर्व है, हरेला. हरेला का अर्थ हरियाली से है. यह हरियाली जीवन के सभी रूपों में बनी रहे उसी का द्योतक यह लोक पर्व है. एक वर्ष में तीन बार मनाया जा...
पर्यावरण को समर्पित उत्तराखंड का लोकपर्व हरेला

पर्यावरण को समर्पित उत्तराखंड का लोकपर्व हरेला

साहित्‍य-संस्कृति
अशोक जोशी देवभूमि, तपोभूमि, हिमवंत, जैसे कई  पौराणिक नामों से विख्यात हमारा उत्तराखंड जहां अपनी खूबसूरती, लोक संस्कृति, लोक परंपराओं धार्मिक तीर्थ स्थलों के कारण विश्व भर में प्रसिद्ध है,  तो वहीं यहां के लोक पर्व भी पीछे नहीं, जो इसे ऐतिहासिक दर्जा प्रदान करने में अपनी एक अहम भूमिका रखते हैं. हिमालयी, धार्मिक व सांस्कृतिक राज्य होने के साथ-साथ देवभूमि उत्तराखंड को सर्वाधिक लोकपर्वों वाले राज्य के रूप में भी देखा जाता है. विश्व भर में कोई त्यौहार जहां वर्ष में सिर्फ एक बार आते हैं तो वही हरेला जैसे कुछ लोक पर्व देवभूमि में वर्ष में तीन बार मनाए जाते हैं. हरेला लोक पर्व उत्तराखंड में मनाया जाने वाला एक हिंदू पर्व है, जो विशेषकर राज्य के कुमाऊं क्षेत्र में अधिक प्रचलित है. कुछ लोगों के द्वारा चैत्र मास के प्रथम दिन  इसे बोया जाता है, तथा नवमी के दिन काटा जाता है. तो कुछ जनों के द्वारा...