फिर महकेगी दून बासमती की खुशबू: 160 किसानों ने संभाली विरासत बचाने की जिम्मेदारी

Basmati Rice Production in uttarakhand

 

मुख्यमंत्री के संकल्प, जिला प्रशासन की पहल और किसानों की मेहनत से देहरादून की पहचान रही दून बासमती के पुनर्जीवन की नई कहानी

  • नीरज उत्तराखंडी, देहरादून

कभी अपनी प्राकृतिक सुगंध और बेमिसाल स्वाद के कारण देश-विदेश में पहचान बनाने वाली दून बासमती एक समय विलुप्ति के कगार पर पहुंच गई थी। बदलती खेती, अधिक उत्पादन देने वाली किस्मों की बढ़ती मांग और घटते रकबे ने इस पारंपरिक धान को लगभग भुला दिया था। लेकिन अब उत्तराखंड की इसी ऐतिहासिक कृषि विरासत को फिर से जीवित करने की शुरुआत हो चुकी है।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के संकल्प, जिला प्रशासन की योजनाबद्ध पहल और किसानों की बढ़ती भागीदारी ने दून बासमती की वापसी की नई उम्मीद जगाई है। वर्ष 2025 में हुए सफल ट्रायल के बाद इस बार इसकी खेती का दायरा बढ़ाकर 75 हेक्टेयर कर दिया गया है और 160 किसान इसकी खेती से जुड़ चुके हैं। यह पहल अब केवल एक कृषि कार्यक्रम नहीं, बल्कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक और कृषि विरासत को पुनर्जीवित करने का मिशन बन चुकी है।

basmati rice varieties in india
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ट्रायल से विश्वास तक का सफर

दून बासमती को पुनर्जीवित करने की शुरुआत पिछले वर्ष सीमित क्षेत्र में ट्रायल के रूप में हुई थी। प्रारंभिक परिणाम इतने सकारात्मक रहे कि इस वर्ष खेती का दायरा और किसानों की संख्या दोनों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।

जिलाधिकारी डॉ. आशीष चौहान के अनुसार, शुरुआत में यह प्रयास लगभग 65 हेक्टेयर क्षेत्र तक सीमित था, लेकिन अब इसे विस्तार देते हुए सहसपुर और विकासनगर के साथ-साथ रायपुर और डोईवाला के किसान भी इस अभियान से जुड़ चुके हैं। किसानों का उत्साह इस बात का संकेत है कि दून बासमती की खोई हुई पहचान फिर से लौट सकती है।

बेहतर बाजार ने बढ़ाया किसानों का भरोसा

किसानों के विश्वास को मजबूत करने में प्रशासन की खरीद व्यवस्था ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

मुख्य विकास अधिकारी अभिनव शाह बताते हैं कि वर्ष 2025 में 100 से अधिक किसानों ने दून बासमती की खेती की थी। उस दौरान रीप (ग्रामीण उद्यमिता एवं आजीविका परियोजना) के माध्यम से किसानों से सीधे धान खरीदा गया।

Basmati dhan ki ropai

प्रशासन ने 200 क्विंटल से अधिक दून बासमती धान ₹65 प्रति किलोग्राम की दर से खरीदा, जिससे किसानों के खातों में 13 लाख रुपये से अधिक की राशि सीधे हस्तांतरित की गई। समय पर भुगतान और बेहतर मूल्य मिलने से किसानों का भरोसा बढ़ा और इस वर्ष अधिक किसान इस अभियान से जुड़े।

बीज से ब्रांड तक की तैयारी

दून बासमती की पहचान केवल उसकी खुशबू नहीं, बल्कि उसकी शुद्धता भी है। इसी कारण जिला प्रशासन अब इसके लिए दीर्घकालिक व्यवस्था तैयार कर रहा है।

विकासनगर में सीड बैंक स्थापित किया जाएगा, जहां गुणवत्तापूर्ण बीजों का संरक्षण होगा। साथ ही आधुनिक टेस्टिंग सेंटर भी विकसित किया जाएगा, जिससे इसकी गुणवत्ता और विशिष्ट सुगंध का वैज्ञानिक परीक्षण किया जा सके।

इसके अलावा हिलान्स और रीप के माध्यम से दून बासमती की ब्रांडिंग, पैकेजिंग और मार्केटिंग पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है, ताकि किसानों को स्थायी और बेहतर बाजार उपलब्ध हो सके।

Basmati Rice Production in india
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550 हेक्टेयर से घटकर 150 हेक्टेयर तक

मुख्य कृषि अधिकारी देवेंद्र सिंह बताते हैं कि एक समय दून बासमती की खेती लगभग 550 हेक्टेयर क्षेत्र में होती थी। समय के साथ इसका रकबा लगातार घटता गया और यह केवल 150 से 200 हेक्टेयर तक सीमित रह गया। अब प्रशासन का लक्ष्य इस पारंपरिक किस्म को फिर से बड़े स्तर पर स्थापित करना है। इसके लिए गुणवत्तापूर्ण बीज संरक्षण, किसानों का प्रशिक्षण और आधुनिक विपणन व्यवस्था पर एक साथ काम किया जा रहा है।

किसानों की उम्मीद लौटी

हरबर्टपुर के किसान सूर्य प्रकाश बहुगुणा कहते हैं कि प्रशासन, कृषि विभाग और ग्रामोत्थान के सहयोग से किसानों का उत्साह लगातार बढ़ रहा है। उनके क्षेत्र के 25 से 30 किसान इस अभियान से जुड़ चुके हैं। उनका मानना है कि यदि सरकार का सहयोग इसी तरह मिलता रहा तो दून बासमती एक बार फिर किसानों की आय का मजबूत आधार बन सकती है।

खुशबू के साथ लौटेगी पहचान

दून बासमती की वापसी केवल एक फसल की वापसी नहीं है। यह उत्तराखंड की मिट्टी, किसानों की मेहनत और पारंपरिक कृषि ज्ञान के पुनर्जागरण की कहानी है। जिला प्रशासन ने बीज संरक्षण, वैज्ञानिक परीक्षण, किसानों से सीधी खरीद, ब्रांडिंग और मूल्य संवर्धन जैसी पूरी श्रृंखला पर एक साथ काम शुरू किया है। यही समग्र रणनीति इस पहल को अन्य कृषि कार्यक्रमों से अलग बनाती है।

यदि सरकार, प्रशासन और किसान इसी समर्पण के साथ आगे बढ़ते रहे तो वह दिन दूर नहीं, जब “दून की बासमती” एक बार फिर अपनी प्राकृतिक सुगंध के साथ राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में विशेष पहचान बनाएगी। यह पहल न केवल किसानों की आय बढ़ाने का माध्यम बनेगी, बल्कि उत्तराखंड की समृद्ध कृषि विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित पहुंचाने की मजबूत नींव भी साबित होगी।

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