January 17, 2021
Home Posts tagged प्रकाश उप्रेती (Page 3)
Uncategorized

ईजा को ‘पाख’ चाहिए ‘छत’ नहीं

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—39 प्रकाश उप्रेती पहाड़ के घरों की संरचना में ‘पाख’ की बड़ी अहम भूमिका होती थी. “पाख” मतलब छत. इसकी पूरी संरचना में धूप, बरसात और एस्थेटिक का बड़ा ध्यान रखा जाता था. पाख सुंदर भी लगे और टिकाऊ भी हो इसके लिए रामनगर से स्पेशल पत्थर मँगा कर
साहित्यिक हलचल

सुन रहे हो प्रेमचंद! मैं विशेषज्ञ बोल रहा हूँ

प्रकाश उप्रेती पिछले कई दिनों से आभासी दुनिया की दीवारें प्रेमचंद के विशेषज्ञों से पटी पड़ी हैं. इधर तीन दिनों से तो तिल भर रखने की जगह भी नहीं बची है. एक से बढ़कर एक विशेषज्ञ हैं. नवजात से लेकर वयोवृद्ध विशेषज्ञों की खेप आ गई है. गौर से देखने पर मालूम हुआ कि इनमें […]
संस्मरण

ओ हरिये ईजा..कुड़ी मथपन आग ए गो रे

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—38 प्रकाश उप्रेती ‘ओ…हरिये ईजा ..ओ.. हरिये ईज… त्यूमर कुड़ी मथपन आग ए गो रे’ (हरीश की माँ… तुम्हारे घर के ऊपर तक आग पहुँच गई है). आज बात उसी- “जंगलों में लगने वाली आग” की. मई-जून का महीना था. पत्ते सूख के झड़ चुके थे. पेड़ कहीं से […]
संस्मरण

“खाव” जब आबाद थे

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—37 प्रकाश उप्रेती पहाड़ में पानी समस्या भी है और समाधान भी. एक समय में हमारे यहाँ पानी ही पानी था. इतना पानी कि सरकार ने जगह-जगह सीमेंट की बड़ी-बड़ी टंकियाँ बना डाली थी. जब हमारी पीढ़ी सीमेंट की टंकियाँ देख रही थी तो ठीक उससे पहले वाली पीढ़ी […]
संस्मरण

जीवन का अँधेरा दूर करने वाला ‘लम्फू’

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—36 प्रकाश उप्रेती आज बात रोशनी के उस सीमित घेरे की जहां से अंधेरा छटा. जीवन की पहली किताब उस रोशनी के नाम थी जिसे हम ‘लम्फू’ कहते थे. ‘लम्फू’ मतलब लैम्प. वह आज के जैसा लैम्प नहीं था. उसकी रोशनी की अदायगी निराली थी. पढ़ाई से लेकर लड़ाई तक […]
संस्मरण

बाबिल की घास सिर्फ घास नहीं है

प्रकाश उप्रेती मूलत: उत्तराखंड के कुमाऊँ से हैं. पहाड़ों में इनका बचपन गुजरा है, उसके बाद पढ़ाई पूरी करने व करियर बनाने की दौड़ में शामिल होने दिल्ली जैसे महानगर की ओर रुख़ करते हैं. पहाड़ से निकलते जरूर हैं लेकिन पहाड़ इनमें हमेशा बसा रहता है। शहरों की भाग-दौड़ और कोलाहल के बीच इनमें ठेठ […]
संस्मरण

कैद होते जंगलों के बीच पतरोल का आतंक

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—33 प्रकाश उप्रेती आज बात- “पतरौ” और जंगलात की. ‘पतरौ’ का मतलब एक ऐसा व्यक्ति जिसे सरकार ने ग्राम -प्रधान के जरिए हमारे जंगलों की रक्षा के नाम पर तैनात किया हुआ था. रक्षा भी हमसे और वह भी हमारे जंगलों की. धीरे-धीरे हमें पता चला कि रक्षा की […]
लोक पर्व/त्योहार

हरेला पर्व, अँधेरे समय में विचार जैसा है

प्रकाश उप्रेती पहाड़ों का जीवन अपने संसाधनों पर निर्भर होता है. यह जीवन अपने आस-पास के पेड़, पौधे, जंगल, मिट्टी, झाड़ियाँ और फल-फूल आदि से बनता है. इनकी उपस्थिति में ही जीवन का उत्सव मनाया जाता है. पहाड़ के जीवन में प्रकृति अंतर्निहित होती है. दोनों परस्पर एक- दूसरे में घुले- मिले होते हैं. एक […]
संस्मरण

च्यला देवी थान हैं ले द्वी बल्हड़ निकाल दिए

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—32 प्रकाश उप्रेती आज बात-“उमि” की. कच्चे गेहूँ की बालियों को आग में पकाने की प्रक्रिया को ही ‘उमि’ कहा जाता था. गेहूँ कटे और उमि न पके ऐसा हो ही नहीं सकता था. उमि पकाने के पीछे का एक भाव ‘तेरा तुझको अर्पण’ वाला था. साथ ही गेहूँ […]
संस्मरण

दीमक, मिट्टी और म्यर पहाड़

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—30 प्रकाश उप्रेती आज बात- ‘धुड़कोटि माटेक’. मतलब दीमक के द्वारा तैयार मिट्टी की. पहाड़ में बहुत सी जगहों पर दीमक मिट्टी का ढेर लगा देते हैं. एक तरह से वह दीमक का घर होता है लेकिन दीमक उसे बनाने के बाद बहुत समय तक उसमें नहीं रहते हैं. […]