December 6, 2020
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संस्मरण

‘सरूली’ जो अब नहीं रही

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—48 प्रकाश उप्रेती अविष्कार, आवश्यकता की उपज है. इस उपज का इस्तेमाल मनुष्य पर निर्भर करता है. पहाड़ के लोगों की निर्भरता उनके संसाधनों पर है. आज अविष्कार और आवश्यकता की उपज “थेऊ” और “सरूली” की बात. ‘थेऊ’ पहाड़ के जीवन का अनिवार्य हिस्सा है. खासकर
संस्मरण

इनसे खेत आबाद रहे, हमसे जो बर्बाद हुए

प्रकाश उप्रेती मूलत: उत्तराखंड के कुमाऊँ से हैं. पहाड़ों में इनका बचपन गुजरा है, उसके बाद पढ़ाई पूरी करने व करियर बनाने की दौड़ में शामिल होने दिल्ली जैसे महानगर की ओर रुख़ करते हैं. पहाड़ से निकलते जरूर हैं लेकिन पहाड़ इनमें हमेशा बसा रहता है। शहरों की भाग-दौड़ और कोलाहल के बीच इनमें ठेठ […]
संस्मरण

‘खोपड़ा’ यही तो नाम मेरे गाँव का है

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—46 प्रकाश उप्रेती आज बात ‘खोपड़ा’ की. ये मेरे ‘गाँव’ का नाम है. गाँव मेरे लिए सिर्फ एक शब्द नहीं बल्कि पूरा जीवन है. गाँव सुनते ही चेहरा खिल उठता है. आँखों के सामने ‘वारे-पारे’ (आमने-सामने) बाखे और हमारी ‘बीचेक कुड़ी’ (बीच वाला घर) तैरने लगती है. गाँव सुनते […]
पुस्तक समीक्षा

आत्मकथा में बस ‘अ’ और ‘ह’ बाकी कथा

कॉलम: किताबें कुछ कहती हैं… प्रकाश उप्रेती किसी को गिराया न ख़ुद को उछाला, कटा ज़िंदगी का सफर धीरे-धीरे. जहाँ आप पहुँचे छ्लांगे लगाकर, वहाँ मैं भी आया मगर धीरे-धीरे.. रामदरश मिश्र जी की इन पंक्तियों से विपरीत यह आत्मकथा है. स्वयं उनका जिक्र भी आत्मकथा में है. आत्मकथा ‘स्व’ से सामाजिक होनी की कथा […]
संस्मरण

गुड़ की भेलि में लिपटे अखबार का एक दिन

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—44 प्रकाश उप्रेती आज किस्सा- “ईजा और अखबार” का.  ईजा अपने जमाने की पाँच क्लास पढ़ी हुई हैं. वह भी बिना एक वर्ष नागा किए. जब भी पढ़ाई-लिखाई की बात आती है तो ईजा ‘अपने जमाने’ वाली बात को दोहरा ही देती हैं. हम भी कई बार गुणा-भाग और […]
पुस्तक समीक्षा

जो मजा बनारस में, न पेरिस में, न फारस में…

कॉलम: किताबें कुछ कहती हैं… प्रकाश उप्रेती इस किताब ने ‘भाषा में आदमी होने की तमीज़’ के रहस्य को खोल दिया. ‘काशी का अस्सी’ पढ़ते हुए हाईलाइटर ने दम तोड़ दिया. लाइन- दर- लाइन लाल- पीला करते हुए कोई पेज खाली नहीं जा रहा था. भांग का दम लगाने के बाद एक खास ज़ोन में […]
संस्मरण

‘वड’ झगडै जड़

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—43 प्रकाश उप्रेती आज बात “वड” की. एक सामान्य सा पत्थर जब दो खेतों की सीमा निर्धारित करता है तो विशिष्ट हो जाता है. ‘सीमा’ का पत्थर हर भूगोल में खास होता है. ईजा तो पहले से कहती थीं कि- “वड झगडै जड़” (वड झगड़े का कारण). ‘वड’ उस […]
संस्मरण

पहाड़ों में ‘छन’ की अपनी दुनिया

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—42 प्रकाश उप्रेती आज बात “छन” की. छन मतलब गाय-भैंस का घर. छन के बिना घर नहीं और घर के बिना छन नहीं.  पहाड़ में घर बनाने के साथ ही छन बनाने की भी हसरत होती थी. एक अदत छन की इच्छा हर कोई पाले रहता है. ईजा को […]
संस्मरण

कंकट सिर्फ लकड़ी नहीं बल्कि पहाड़ की विरासत का औज़ार है

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—41 प्रकाश उप्रेती पहाड़ जरूरत और पूर्ति के मामले में हमेशा से उदार रहे हैं. वहाँ हर चीज की निर्मिति उसकी जरूरत के हिसाब से हो जाती है. आज जरूरत के हिसाब से इसी निर्मिति पर बात करते हैं. यह -“कंकट” है. इसका शाब्दिक अर्थ हुआ काँटा, काटने वाला. […]
संस्मरण

अब कौन ‘नटार’ से डरता है…

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—40 प्रकाश उप्रेती पहाड़ में खेती हो न हो लेकिन “नटार” हर खेत में होता था. “नटार” मतलब खेत से चिड़ियों को भगाने के लिए बनाया जाने वाला ढाँचा सा. तब खेतों में जानवरों से ज्यादा चिड़ियाँ आती थीं. एक -दो नहीं बल्कि पूरा दल ही आता था. झुंगर, […]