संस्मरण

‘खोपड़ा’ यही तो नाम मेरे गाँव का है

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—46

  • प्रकाश उप्रेती

आज बात ‘खोपड़ा’ की. ये मेरे ‘गाँव’ का नाम है. गाँव मेरे लिए सिर्फ एक शब्द नहीं बल्कि पूरा जीवन है. गाँव सुनते ही चेहरा खिल उठता है. आँखों के सामने ‘वारे-पारे’ (आमने-सामने) बाखे because और हमारी ‘बीचेक कुड़ी’ (बीच वाला घर) तैरने लगती है. गाँव सुनते ही ‘भ्यार-भतेर’ (अंदर-बाहर) जाती ईजा, पानी लेने ‘नोह’ जाते ‘नन’ (बच्चे), घास काटने जाती ‘काखि'(चाची), ‘भौजि’ (भाभी) और ‘स्यार पन’ खेतों में काम करती ‘ज्येठी’ (ताई) और ‘अम्मा’ (दादी) नज़र आते हैं.

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आँखों ने जब देखना शुरू किया तो उस गाँव को देखा जिसके ‘भ्योव’ घसियारियों से गूंजते, स्यार आपसी बातचीत से चहकी रहती, ‘खो’ बच्चों के खेलने से और घर बुबू की ‘हड़कत:’ से डोलता था. पूरा गाँव अलग-अलग तरह की आवाजों से गूँजता रहता था. शाम को कोई पानी लेने डब्बा बजाते हुए जाता, कोई बाजार जाने के लिए ‘धात’ because (आवाज) लगा रहा होता- “ओ भावना ईजा दुकानुपन जाम छै तो एक पौंड चाहे पत्ति हमुहें ले ली हया” (भावना की माँ, दुकान में जा रही हो तो एक चाय पत्ती का पैकेट हमारे लिए भी ले आना), दूसरी तरफ से कोई-‘अरे घट पिसे हैं जाम छा’ (गेहूँ पीसने चल रहे हो) आवाज लगाता था. जंगलों में से लकड़ी फोड़ने की आवाज-कट…कट आती, तो पूरा गध्यर गूंजने लग जाता था. उधर खाली पड़े खेतों से बच्चों के क्रिकेट खेलने की आवाज, शोर बनकर गूँजती थी. एक तरह से पूरे गाँव में रौनक बनी रहती थी.

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ईजा जैसे बोलतीं- “पारपन जरा ब्या because हैं घा ली हैं कहा ढैय्” (सामने के घरों में शाम को घास लाने के लिए कह आ). हम ठीक छु ईजा कहकर, दौड़ लगाते जाते थे. मतलब कि बाखे जाने का कोई मौका नहीं छोड़ते थे. खासकर तब तो बिल्कुल नहीं जब कोई बाखे में दिल्ली से आया हो.

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हमारा घर अकेले था. तब 4 घर इधर की ‘बाखे’ (पंक्तिबद्ध कुछ घर)  में और 6 घर उधर की बाखे में थे. घास, पानी, दुकान से सामान, कुछ बात कहने अगर बाखे जाना हो तो हम because तैयार रहते थे. ईजा जैसे बोलतीं- “पारपन जरा ब्या हैं घा ली हैं कहा ढैय्” (सामने के घरों में शाम को घास लाने के लिए कह आ). हम ठीक छु ईजा कहकर, दौड़ लगाते जाते थे. मतलब कि बाखे जाने का कोई मौका नहीं छोड़ते थे. खासकर तब तो बिल्कुल नहीं जब कोई बाखे में दिल्ली से आया हो.

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दिल्ली से आए व्यक्ति को देखने की उत्सुकता चरम पर होती थी. हमारे घर में बौज्यू जब दिल्ली से आते तो अलग-अलग तरह की टॉफियाँ, बिस्किट, चने, गट्टा, मिश्री, ‘भुजे मिट्ठे’ (पेठे की मिठाई) लाते थे. दिन में जब सब घर पर होते तो दिल्ली से आया हुआ सामान खोला जाता था. एक-एक चीज निकाली जाती थी. बौज्यू बताते because भी थे-“यूँ टॉफियक पाकेट छैं, यो 3 किलो भुजे मिट्ठे छु” (ये टॉफी के पैकेट हैं, ये 3 किलो पेठे की मिठाई है). ऐसा बताते हुए वो अम्मा की तरफ सामान खिसकाते रहते थे. अम्मा ईजा की तरफ खिसका देती थीं- “ले ब्वारी समा इनुकें” (ले बहू संभाल इनको). हम उन खिसकती चीजों के खुलने का इंतजार कर रहे होते थे.

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ईजा टॉफी का पैकेट खोलकर हमको 2-2 टॉफी दे देती थीं लेकिन हमारी नज़र तो मिठाई पर होती थी. दिल्ली का मतलब ही मिठाई था. ईजा फिर एक पीस मिठाई देती और कहतीं- “जा गोठ बे ब्यल ली आ, बाखेपन ले तो बाटेणि, मैसुक पैहेंण खा रहो” ( जा नीचे से कटोरी ले आ, गाँव में भी तो बाँटना है, लोगों का खा रखा है). because हम चट से गोठ जाते और 10 कटोरी और एक बड़ी थाली ले आते थे. ईजा मुठ्ठी भर चने और एक-एक पेठे की मिठाई का पीस कटोरी में रखती जाती थीं. किसी-किसी में दो भी रखती थीं, और झट से कहतीं भी- “इके ढे में दिए हां, इकें शांतिक आमके,  इकें पारेक आमेकें दी दिए( इसको ऊपर जिनका घर है उनको देना, इसको शांति की दादी को, इसे सामने वाली दादी को देना है ). हम चट-चट सब कटोरियों को थाली में रखते और ऊपर से तौलिए से ढक कर बाखे में बाँटने निकल जाते थे-“ओ आम्म, के कम छा, ये लियो” ( दादी क्या कर रहे हो , ये लो). उधर से- “के ल्याम छै नाति” (क्या ला रहा है ,पोते). हम तुरंत कहते-  “कै न बाज्यू दिल्ली बे आ रहीं” (कुछ नहीं पिताजी दिल्ली से आए हैं). ऐसा कहते और मिठाई बाँटते हुए पूरा गाँव हम घूम लेते थे.

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जब भी बाखे जाते तो ईजा का सख़्त निर्देश होता- “बाखेपन झन बैठि रहे हां,चट जा फट आ”  (उन घरों में ही मत बैठे रहना, जल्दी जा और जल्दी आ). हम हो…हो..बोलते लेकिन because बाखे जाकर खेलने लग जाते थे. ईजा तब तक इधर से- “ओ परिया तू घर हैं आमछै नहीं आ म्ये”( प्रकाश घर आ रहा है कि नहीं). ईजा की गुस्से से भरी आवाज सुनते ही हम दौड़ लगाकर घर की तरफ चल देते थे.

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गाँव अब सूना हो गया है. गिनती के 7 परिवार, 20 लोग और 12-13 जानवर रह गए हैं. इनमें भी ज्यादार बूढ़े लोग ही हैं. बच्चे तो अब पहली कक्षा से भविष्य बनाने निकल आते हैं. because ईजा से जब भी बात होती है, कहतीं हैं- “गौं म अब पेलिकेक जेसि रौनक जे के छु, च्यला सब तलि ह्न बहि गई”. ऐसा कहते हुए ईजा का गला भर आता है..मैं बस चुप…

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गाँव में अगर किसी ने दूसरे की घास काट ली या किसी के जानवर ने खेत चर लिए तो फिर गाली दी जाती थी. गाली भी अपने-अपने स्वभाव के हिसाब से देते थे लेकिन गाली देने के लिए समय तय होता था. खेत दिन में चरा हो या सुबह-शाम लेकिन गाली, दिन छिपने के बाद अंधेरा होने पर ही दी जाती थी. उस समय सब घर पर because बैठ कर चाय पी रहे होते थे, अचानक से पार से आवाज आती- “अरे जाके ले बलदुल हमर उज्याड खा, ऊँ भ्योव घुरि जी हाँ…. पट है जो….”( जिसके बैलों ने हमारे खेत चरे वो पहाड़ से गिर जाएँ…). गाली का यह सिलसिला लगभग 20 मिनट तक चलता रहता था. बीच-बीच में ब्रेक भी ले लेते थे लेकिन फिर वहीं से शुरू हो जाते थे.  ईजा के कान में आवाज जाते ही कहतीं- “च्यला भ्यार जा बे सुण ढैय् को पार बाखे में ग्या दी मों” (बेटा बाहर जाकर सुनना कोई, सामने के घरों से गाली दे रहा है). हम अंदर से ही कान लगाकर सुनते थे क्योंकि अँधेरे में बाहर जाने से डर लगता था. ईजा फिर खुद उठकर बाहर जाती और थोड़ा देर सुनकर अंदर आ जाती थीं. कभी-कभी कुछ बोलतीं और कभी चुप ही रहती थीं. फिर अपने काम पर लग जाती थीं.

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गाँव अब सूना हो गया है. गिनती के 7 परिवार, 20 लोग और 12-13 जानवर रह गए हैं. इनमें भी ज्यादार बूढ़े लोग ही हैं. बच्चे तो अब पहली कक्षा से भविष्य बनाने निकल आते हैं. ईजा से because जब भी बात होती है, कहतीं हैं- “गौं म अब पेलिकेक जेसि रौनक जे के छु, च्यला सब तलि ह्न बहि गई” (गाँव में अब पहले जैसी रौनक थोड़ा न है, सब दिल्ली चले गए हैं”). ऐसा कहते हुए ईजा का गला भर आता है..मैं बस चुप…

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(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं.पहाड़ के सवालों को लेकर मुखर रहते हैं.)

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